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चिकित्सा और पढ़ाई के तनावपूर्ण माहौल के बीच एम्स भोपाल ने अपने संकाय सदस्यों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों के लिए एक पहल की है। संस्थान का हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर आगामी 16 से 18 फरवरी तक 'पेपर माचे' कला पर कार्यशाला आयोजित करेगा।
लोगों को तनावमुक्त करना है टारगेट
इसका उद्देश्य केवल कला सिखाना नहीं, बल्कि 'आर्ट थैरेपी' के माध्यम से संस्थान से जुड़े लोगों को तनावमुक्त वातावरण और मानसिक शांति प्रदान करना है। 'पेपर माचे' एक ऐसी प्राचीन विधा है, जिसमें पुराने अखबारों, गोंद और पानी के मिश्रण का उपयोग कर आकर्षक मूर्तियां, मुखौटे और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं।
एम्स प्रशासन का मानना है कि जब हाथ किसी सृजनात्मक कार्य में व्यस्त होते हैं, तो मस्तिष्क को गहरा विश्राम मिलता है। यह कार्यशाला प्रतिभागियों को अपनी छिपी हुई प्रतिभा को पहचानने और दैनिक भागदौड़ से इतर कुछ नया रचने का अवसर देगी। एम्स भोपाल इन दिनों अपने कर्मचारियों और छात्रों के समग्र स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दे रहा है।
संस्थान के अनुसार एक स्वस्थ चिकित्सक या कर्मचारी ही बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दे सकता है। इसी सोच के साथ इस रचनात्मक गतिविधि को डिजाइन किया गया है। कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा पेपर माचे की बारीकियां सिखाई जाएंगी, जिससे प्रतिभागी शून्य लागत में घर की रद्दी से खूबसूरत कृतियां बनाना सीख सकेंगे।
]]>इस नई सुविधा की शुरुआत के साथ ही एक बेहद जटिल आपरेशन को अंजाम दिया गया है। डॉक्टरों ने एक मरीज की भोजन नली (इसोफेगस) के कैंसरग्रस्त हिस्से को निकाला। इसके बाद पेट के एक हिस्से से एक नई नली बनाकर उसे गले तक जोड़ा गया। यह पूरी सर्जरी दूरबीन और कैमरे वाली अत्याधुनिक थोरोस्कोपिक और लैप्रोस्कोपिक तकनीक से की गई।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें मरीज को बड़े चीरे नहीं लगाए जाते, जिससे दर्द कम होता है और वह जल्दी ठीक हो पाता है। एम्स भोपाल का सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग पहले से ही मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों के लगभग 20 हजार कैंसर मरीजों का हर साल इलाज करता है।
अब तक छाती से जुड़े जटिल कैंसर के ऑपरेशन के लिए मरीजों को दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाना पड़ता था, जो काफी खर्चीला और मुश्किल होता था। अब यह विश्वस्तरीय सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने से हजारों मरीजों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
विशेषज्ञ नेतृत्व और मजबूत टीम
इस महत्वपूर्ण पहल का नेतृत्व प्रो. डॉ. माधवानंद कर रहे हैं, जो न केवल एक बेहतरीन सर्जन हैं, बल्कि एक कुशल शिक्षक भी हैं। उन्होंने देश के कई एम्स संस्थानों का मार्गदर्शन किया है और लगातार युवा डाक्टरों को प्रशिक्षित करते रहते हैं। उनके नेतृत्व में डॉ. विनय कुमार (विभागाध्यक्ष, सर्जिकल आंकोलाजी), डॉ. अंकित, डॉ. वैशाली, डॉ. जैनब और डॉ. शिखा सहित एक विशेषज्ञ टीम ने पहली जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा किया।
]]>यह सर्वेक्षण एम्स भोपाल के दंत विभाग और रीजनल ट्रेनिंग सेंटर फार ओरल हेल्थ प्रमोशन एंड डेंटल पब्लिक हेल्थ के नोडल अधिकारी डा. अभिनव सिंह के नेतृत्व में किया गया। इसमें मध्यप्रदेश शासन के स्वास्थ्य सेवाएं संचालनालय ने सहयोग दिया। अध्ययन में प्रदेश के 41 जिलों के शहरी और ग्रामीण इलाकों से करीब 48 हजार लोगों को शामिल किया गया।
नतीजे चौंकाने वाले
सर्वे के मुताबिक, प्रदेश में दांतों में कीड़े लगना 40 से 70 प्रतिशत लोगों में पाया गया। मसूड़ों की बीमारी 50 से 87 प्रतिशत और मुंह के कैंसर दो से 17 प्रतिशत तक देखी गईं। सबसे गंभीर स्थिति यह रही कि 70 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग और लगभग 50 फीसद 5 साल के बच्चे दांतों की सड़न यानी कैविटी से जूझ रहे हैं।
देश का पहला मौखिक स्वास्थ्य डेटा बैंक
एम्स भोपाल ने केवल सर्वे ही नहीं किया, बल्कि इसके आधार पर देश का पहला मौखिक स्वास्थ्य डेटा बैंक भी बनाया है। डब्ल्यूएचओ माडल पर आधारित इस डेटा बैंक में जिलेवार मौखिक स्वास्थ्य की स्थिति और सेवाओं का ब्योरा दर्ज है। सरकार और नीति-निर्माता अब इस आधार पर नई योजनाएं बना सकेंगे।
तकनीक से आई पारदर्शिता
सर्वेक्षण को पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए मोबाइल एप और जीपीएस तकनीक का उपयोग किया गया। साथ ही एम्स भोपाल ने अपने ट्रेनिंग सेंटर के माध्यम से डॉक्टरों, शिक्षकों और काउंसलरों को विशेष प्रशिक्षण देने की भी शुरुआत की है, ताकि रोकथाम और उपचार की सुविधाएं सीधे समाज तक पहुंच सकें।
विशेषज्ञों की राय
डॉ. अभिनव सिंह का कहना है कि अब जब मौखिक स्वास्थ्य की वास्तविक तस्वीर सामने आ चुकी है तो जनजागरुकता बढ़ाने, बचाव और उपचार के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। यह सर्वे मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मौखिक स्वास्थ्य को नई दिशा देगा।
दांतों में कीड़े (कैविटी) – 40% से 70%
मसूड़ों की बीमारी (गम डिजीज) – 50% से 87%
मुंह के कैंसर से पहले की अवस्थाएं – 2% से 17%
बुजुर्गों में दांतों की सड़न – 70% से अधिक
5 साल के बच्चों में कैविटी – लगभग 50%
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भोपाल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में दवाओं की ऊंची कीमतों पर खरीद के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की एक टीम ने गुरुवार को भोपाल एम्स का दौरा किया. टीम ने दवा खरीद से जुड़े दस्तावेजों की जांच की और एम्स डायरेक्टर डॉ. अजय सिंह सहित प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों से करीब चार घंटे तक मुलाकात कर खरीद प्रक्रिया की जानकारी ली.
यह मामला भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने एम्स की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में उठाया था. सांसद शर्मा ने 'आजतक' से बातचीत में बताया कि सांसद होने के नाते वह स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं और उनके पास शिकायत आई थी कि भोपाल एम्स में जेमसिटाबिन (Gemcitabin) इंजेक्शन 2100 रुपए प्रति नग की दर से खरीदा गया, जबकि छत्तीसगढ़ के रायपुर AIIMS में यही इंजेक्शन 425 रुपए और दिल्ली AIIMS में 285 रुपए प्रति नग में खरीदा गया. अन्य दवाओं की कीमतें भी भोपाल एम्स में अन्य एम्स की तुलना में अधिक थीं.
BJP सांसद शर्मा ने बताया कि 15 मई को दिल्ली के निर्माण भवन में हुई स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव मौजूद थीं. इस बैठक में उन्होंने भोपाल एम्स में ऊंची कीमतों पर दवा खरीद की शिकायत की जानकारी दी, जिसके बाद जांच का आश्वासन दिया गया.
आरोप है कि भोपाल एम्स ने कोरोना काल के बाद से केंद्र सरकार के दवा खरीद नियमों (GFR 2017) का पालन नहीं किया और अमृत फार्मेसी के जरिए सीधे दवाएं खरीदीं. अमृत फार्मेसी से केवल आपात स्थिति में दवाएं खरीदने की अनुमति थी, न कि पूरी सप्लाई के लिए. अन्य सभी एम्स डायरेक्ट टेंडर के जरिए दवाएं खरीदते हैं, लेकिन भोपाल एम्स अकेला ऐसा संस्थान है जो पूरी खरीद अमृत फार्मेसी से करता है और GFR नियमों का पालन नहीं करता.
लोकसभा सदस्य आलोक शर्मा ने बताया कि अन्य सरकारी अस्पतालों की तरह एम्स में भी टेंडर के जरिए दवा सप्लाई होनी चाहिए, लेकिन कोरोना काल में आपात स्थिति के लिए दी गई सीधी खरीद की मंजूरी का दुरुपयोग हुआ. कोरोना काल खत्म होने के बावजूद सीधी खरीद जारी रही, जिसका आंकड़ा करोड़ों में पहुंच गया. पहले 10-15 लाख की आपातकालीन सप्लाई, कोविड काल में 2-3 करोड़ तक पहुंची, लेकिन पिछले तीन सालों में यह 25-60 करोड़ तक हो गई, जो एक बड़े भ्रष्टाचार का संकेत है.
इस मामले में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की जांच टीम की ओर की गई कार्रवाई से भोपाल एम्स में दवा खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों के पालन की उम्मीद जताई जा रही है.
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3 डी प्रिंटिंग तकनीक से किया सफल इलाज
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रोफेसर अजय सिंह ने बताया कि, ''ऑर्थोपेडिक्स विभाग में अब इन-हाउस 3 डी प्रिंटिंग सुविधा की शुरुआत की गई है, जो चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. हाल ही में इस तकनीक का उपयोग करते हुए एक डिस्टल फीमर मैलयून के जटिल मामले का सफलतापूर्वक सर्जिकल सुधार किया गया है. इस प्रक्रिया के लिए रोगी-विशिष्ट 3-डी प्रिंटेड कटिंग गाइड का निर्माण एम्स भोपाल में ही किया गया, और यह पूरी तरह निःशुल्क प्रदान किया गया, जिससे मरीज पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ा.''
पेशेंट फर्स्ट के आधार पर होगा इलाज
3-डी प्रिंटिंग तकनीक की मदद से हड्डियों की सर्जरी अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी बनती है. यह मरीजों को उनकी विशेष शारीरिक संरचना के अनुसार कस्टमाइज्ड उपचार उपलब्ध कराती है, जो पारंपरिक तरीकों की तुलना में बेहतर परिणाम देती है. इस तकनीक का उपयोग भविष्य में कई अन्य जटिल मामलों में भी किया जाएगा. प्रो. सिंह ने बताया कि, ''एम्स भोपाल में इन-हाउस 3 डी प्रिंटिंग सुविधा की शुरुआत चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी प्रगति है. यह तकनीक हमें हर मरीज के लिए व्यक्तिगत और सटीक उपचार की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुविधा मरीजों को बिना किसी आर्थिक बोझ के उपलब्ध कराई जा रही है, जो हमारे पेशेंट फर्स्ट दृष्टिकोण को दर्शाती है.''
3 डी प्रिंटिंग तकनीकी से ये होगा फायदा
अब तक हड्डी रोग की सर्जरी में धातु प्रत्यारोपण और दान की गई हड्डी का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें सर्जन मरीज के शारीरिक रचना के अनुसार उसमें ऊतक प्रदान करते हैं. लेकिन कई बार यह मरीज की शारीरिक संरचना के अनुसार फिट नहीं होता है. अब इन समस्याओं को दूर करने के लिए 3 डी प्रिंटर तकनीकी का इस्तेमाल किए जाने से हड्डी की जगह धातु की प्लेट लगाने की जरुरत नहीं होती. इससे संक्रमण का खतरा भी नहीं रहेगा.
एम्स भोपाल के डायरेक्टर डॉक्टर अजय सिंह का इसे लेकर कहना है कि यह ऐप तकनीक के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा। यह रिसर्च 24 महीनों तक चलेगी। एम्स भोपाल के डॉक्टर अंशुल राय इस प्रोजेक्ट को लीड कर रहे हैं। वे ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग में प्रोफेसर हैं।
कई विभागों के डॉक्टर शामिल
इस रिसर्च में कई और विभागों के डॉक्टर भी शामिल हैं। जैसे कि रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, पैथोलॉजी और सामुदायिक चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ। यह ऐप कैंसर के लक्षणों को पहचानेगा। साथ ही, यह लोगों को तंबाकू, सुपारी और धूम्रपान के नुकसान बताएगा। इससे लोग इन्हें छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे।
प्रोजेक्ट के लिए लाखों की मदद
एमपीसीएसटी ने इस प्रोजेक्ट के लिए 7.4 लाख रुपए दिए हैं। पहली किस्त के रूप में 3.7 लाख रुपए मिल चुके हैं। इस ऐप से मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान जल्दी हो सकेगी। इससे लोगों को समय पर इलाज मिल पाएगा। और उनकी जान बच सकेगी। यह ऐप एक बहुत ही उपयोगी साबित हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए जो गांवों में रहते हैं और जिनके पास डॉक्टर तक पहुंचने के लिए साधन नहीं हैं।
शोध के लिए लिए मिली मंजूरी, 7.4 लाख स्वीकृत
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक डॉ. अजय सिंह ने बताया कि "ओरल कैंसर और अन्य प्री-मेलिग्मेंट (पूर्व-कैंसर) स्थितियों की पहचान के लिए एक मोबाइल ऐप के माध्यम से स्क्रीनिंग के लिए एक अभिनव अनुसंधान परियोजना प्रारंभ की है. इसके लिए एमपी काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने दो साल के रिसर्च प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है. इस दो वर्षीय अनुसंधान परियोजना के लिए कुल 7.4 लाख की राशि स्वीकृत की गई है, जिसमें से पहले साल के लिए 3.7 लाख रुपये की पहली किस्त जारी की जा चुकी है. जबकि बची हुई राशि दूसरी किश्त में प्रदान की जाएगी."
इस तरह मोबाइल एप से होगी कैंसर की स्क्रीनिंग
एम्स के डाक्टरों ने बताया कि यह मोबाइल ऐप ओरल कैंसर, मुंह खोलने में रुकावट की बीमारी और अन्य गंभीर मुख स्थितियों की स्क्रीनिंग करने में मदद करेगा. यह एप कुछ ही मिनटों में परिणाम देगा और सभी रोगियों की जानकारी पूर्ण रूप से गोपनीय रखेगा. बता दें कि इस रिसर्च का नेतृत्व एम्स भोपाल के ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के डॉ. अंशुल राय करेंगे. उनके साथ को-प्रोजेक्ट इन्वेस्टिगेटर के रूप में डॉ. सैकत दास (रेडिएशन ऑन्कोलॉजी), प्रो. अभिनव सिंह, डॉ. दीप्ति जोशी (पैथोलॉजी) और डॉ. अंकुर जोशी (कम्युनिटी एंड फैमिली मेडिसिन) शामिल हैं.
जूनियर रिसर्च फेला को मिलेंगे 4 लाख 70 हजार
डॉ. अंशुल राय ने बताया कि "रिसर्च के लिए स्वीकृत राशि में से दो साल के लिए जूनियर रिसर्च फेलो की सैलरी 4 लाख 80 हजार रुपए तय की गई है. कंज्यूमेबल्स पर 60 हजार रुपए, यात्रा व्यय पर 1 लाख रुपए और पब्लिकेशन व प्रिंटिंग पर 1 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे. बता दें कि यह रिसर्च मोबाइल ऐप के जरिए बड़ी आबादी में मुंह से जुड़ी गंभीर बीमारियों की पहचान और इलाज की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. डॉ. अंशुल राय ने जानकारी दी कि इस मोबाइल ऐप पर वे गत एक वर्ष से कार्य कर रहे हैं."
एक हजार मरीजों पर किया जाएगा शोध
एमपी काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा कुल 7.5 लाख रुपये की धनराशि इस परियोजना के लिए प्रदान की गई है. आगामी दो वर्षों में यह अनुसंधान 1,000 व्यक्तियों पर किया जाएगा. एक व्यापक रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की जाएगी. जिससे ओरल कैंसर से संबंधित नीति निर्माण में सहायता मिल सके. यह ऐप उपयोगकर्ताओं को तंबाकू, सुपारी, सिगरेट और बीड़ी जैसे हानिकारक पदार्थों के प्रभावों के बारे में जागरूक करेगा और उन्हें इनका सेवन छोड़ने के लिए प्रेरित करेगा. यह ऐप अपनी तरह का पहला इनोवेशन है, जिसे सरकार ने फंडिंग दी है और यह स्पष्ट तरह से कैंसर होने के कितने चांसेस हैं उसका प्रमाण देगा.
]]>एम्स प्रबंधन के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक न केवल कैंसर की शुरुआती पहचान में मदद करेगी, बल्कि यह कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने में भी सहायक होगी।
पारंपरिक तरीकों की तुलना में एआइ आधारित मशीन तेजी से कैंसर की पहचान कर सकेगी, जिससे मरीजों का इलाज जल्द शुरू किया जा सकेगा।
इससे दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को भी लाभ मिलेगा क्योंकि इस तकनीक के जरिए कैंसर की स्क्रीनिंग को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कैंसर के मामलों को समय रहते रोका जा सकेगा और मरीजों को लंबी एवं स्वस्थ जिंदगी देने में मदद मिलेगी।
पहले चरण में कैंसर का पता लगाएगी मशीन
एम्स भोपाल के डायरेक्टर डा. अजय सिंह ने बताया कि "एआई आधारित कैंसर स्क्रीनिंग मशीन से कैंसर का निदान तेजी से अधिक सटीक और व्यापक रूप से सुलभ हो जाएगा. यह क्रांतिकारी तकनीक कैंसर के निदान को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखती है. यह बिना लक्षण वाले मरीजों में भी प्रारंभिक चरण में कैंसर का पता लगा सकती है. कैंसर की स्क्रीनिंग को तेज और अधिक सुलभ बनाकर, हम विशेष रूप से दूर-दराज और पिछड़े क्षेत्रों में अनगिनत जानें बचा सकते हैं. यह तकनीक मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करके कैंसर की सटीक पहचान करने में मदद करती है और आनुवंशिकी एवं जीवनशैली के आधार पर कैंसर के जोखिम का अनुमान भी लगाती है."
कैंसर के उपचार और निदान में क्रांति ला रहा एआई
इस कार्यशाला में दो अत्याधुनिक एआई सिस्टम भी पेश किए गए. इसमें ऑप्टास्कैन अल्ट्रा, जो बड़े प्रयोगशालाओं के लिए आदर्श है और एक बार में 80 से 480 स्लाइड स्कैन कर सकता है. वहीं दूसरा ऑप्टास्कैन लाइट, जो छोटी प्रयोगशालाओं के लिए डिज़ाइन किया गया है और जिसकी क्षमता 15 स्लाइड तक है. रोगियों को एआई संचालित कैंसर पहचान से त्वरित निदान, उच्च सटीकता, अधिक पहुंच और कम लागत का लाभ मिलेगा, क्योंकि यह महंगे सीटी स्कैन और एमआरआई की आवश्यकता को समाप्त कर देगा.
एम्स भोपाल में आएगी एआई आधारित कैंसर स्क्रीनिंग मशीन
डायरेक्टर डॉ. अजय सिंह ने बताया कि "एम्स भोपाल में जल्द ही एआई आधारित कैंसर स्क्रीनिंग मशीन खरीदी जाएगी. जिससे कैंसर मरीजों को समय पर बेहतर उपचार मिल सके. साथ कैंसर स्क्रीनिंग की रफ्तार को भी बढ़ाया जा सके, जिससे मामलों में कमी आए. अजय सिंह ने बताया कि इस मशीन को खरीदने में करीब 40 लाख रुपये की लागत आएगी."
पहले चरण में स्क्रीनिंग पर होगा फोकस
इस तकनीक को प्रारंभिक चरण में कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए उपयोग किया जाएगा। एआइ तकनीक मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग कर आनुवांशिकी और जीवनशैली के आधार पर कैंसर के जोखिम का अनुमान भी लगा सकती है।
अब ये मशीनें आएंगी
आप्टास्कैन अल्ट्रा – बड़ी प्रयोगशालाओं के लिए उपयुक्त है, जो एक बार में 80 से 480 स्लाइड स्कैन कर सकती है।
आप्टास्कैन लाइट – इसे छोटी प्रयोगशालाओं के लिए डिजाइन किया है, जिसकी क्षमता 15 स्लाइड स्कैन तक है।
महंगे सीटी स्कैन और एमआरआई की जरूरत कम होगी कम
अंकोलाजी के प्रो. जगत आर. कंवर ने बताया कि एआई के उपयोग से कैंसर का इलाज अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी होगा।
इस तकनीक से महंगे सीटी स्कैन और एमआरआई की जरूरत कम हो जाएगी, जिससे मरीजों को कम लागत में अधिक सटीक इलाज मिल सकेगा।
यह तकनीक रोगियों के लिए अधिक सुलभ, किफायती और प्रभावी होगी, जिससे मरीजों को बेहतर उपचार और तेज रिकवरी का लाभ मिलेगा।
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किडनी रोग से पीड़ित बच्चों के इलाज करने में एम्स भोपाल ने कीर्तीमान रचा है। दरअल एम्स लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बना रहा है। अब एम्स को इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी (ISN) द्वारा 2025 का प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय श्रियर पुरस्कार दिया गया है। यह सम्मान बाल किडनी रोग के इलाज में उत्कृष्ट योगदान और 2018 से 2024 तक मैकगिल यूनिवर्सिटी, कनाडा के साथ सफल साझेदारी के लिए दिया गया है। साथ ही, एम्स भोपाल को पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी में आईएसएन क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में नामित किया गया।
विश्व के 57 आईएसएन सिस्टर रीनल सेंटर जोड़ों शामिल
यह पुरस्कार डॉ. रॉबर्ट डब्ल्यू, श्रियर के नाम पर दिया जाता है, जो गुर्दा शोध और वैश्विक नेफ्रोलॉजी शिक्षा में उत्कृष्ट योगदान के लिए जाने जाते है। यह सम्मान उन संस्थानों को दिया जाता है जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोगों के माध्यम से नेफ्रोलॉजी इलाज, शिक्षा और शोध में अद्वितीय प्रगति दिखाते हैं। एम्स भोपाल अब विश्व के उन 57 आईएसएन सिस्टर रीनल सेंटर जोड़ों में से एक है, जिसने यह मान्यता प्राप्त की है।
एक हजार से ज्यादा बच्चों का किया डायलिसिस
एम्स बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शिखा मलिक ने बताया कि बाल रोग डायलिसिस यूनिट ने पिछले वर्ष में 1000 से अधिक डायलिसिस सत्र और 150 प्लाज्मा एक्सचेंज सफलतापूर्वक पूरे किए हैं, जिससे अनेक बच्चों की जान बचाई गई है। यह पुरस्कार एम्स भोपाल की ओर से डॉ. गिरीश भट्ट ने विश्व नेफ्रोलॉजी कांग्रेस 2025 में प्राप्त किया। एम्स भोपाल ने बाल किडनी रोग देखभाल को और बेहतर बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाल नेफ्रोलॉजी संघ (IPNA) फैलोशिप और बाल रोग नेफ्रोलॉजी में डीएम कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें दो डीएम फेलो पहले ही नामांकित हो चुके हैं। इन पहलों का उद्देश्य अधिक विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करना और पूरे भारत में बाल रोग नेफ्रोलॉजी सेवाओं का विस्तार करना है।
इस सम्मान से बढ़ी एम्स की प्रतिष्ठा
एम्स के डायरेक्टर डॉ. अजय सिंह ने बाल रोग नेफ्रोलॉजी इकाई की समर्पित सेवाओं और अग्रणी कार्यों पर खुशी जाहिर की है। उन्होंने डॉ. शिखा मलिक (बाल रोग विभागाध्यक्ष), डॉ. अंबर कुमार और डॉ. गिरीश भट्ट को बधाई देते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हमारी टीम के बाल किडनी रोग देखभाल को उन्नत बनाने के सतत प्रयासों का प्रमाण है। एम्स भोपाल को आईएसएन क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में मिली यह मान्यता न केवल हमारी प्रतिष्ठा को बढ़ाएगी, बल्कि भारत और अन्य देशों में विभिन्न चिकित्सा केंद्रों को सहयोग प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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आनुवांशिक बीमारियों की हिस्ट्री
चिकित्सकों का कहना है कि प्रसवपूर्व यह परीक्षण उन गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जिनके परिवार में आनुवांशिक बीमारियों का इतिहास रहा हो या जिनकी उम्र 35 साल से अधिक हो चुकी है।
भ्रूण की हेल्थ पता चलेगी
वे अब एम्स भोपाल में भ्रूण के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगी। एम्स भोपाल में विजिटिंग फीटल मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. मनुप्रिया माधवन ने यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की है। उनके अनुसार, यह प्रक्रिया सुरक्षित और प्रभावी है। एम्स भोपाल के निदेशक डॉ. अजय सिंह का कहना है कि सीवीएस सफलतापूर्वक पूरा होना हमारे संस्थान में फीटल मेडिसिन सेवाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
क्या होंगे लाभ
भ्रूण में आनुवांशिक विकारों का शीघ्र पता लगाना : सीवीएस के माध्यम से गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ही भ्रूण में आनुवंशिक विकारों का पता लगाया जा सकता है।
भविष्य में जन्म लेने वाले बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार : सीवीएस के माध्यम से जन्म के साथ दोषों को रोका जा सकता है। इससे भविष्य में जन्म लेने वाले बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार होगा।
एम्स भोपाल यह सफल ऑपरेशन करने वाला दूसरा अस्पताल बन गया है। इसके पहले एम्स दिल्ली में ऐसा प्रत्यारोपण किया जा चुका है। यह जटिल प्रक्रिया एम्स भोपाल के चिकित्सा ऑन्कोलॉजी और हीमेटोलॉजी विभाग के डॉ. गौरव ढींगरा और डॉ. सचिन बंसल के नेतृत्व में की गई।
बच्ची का इलाज बाल्य आन्कोलाजी विभाग में डॉ. नरेंद्र चौधरी की देखरेख में हो रहा था। ट्रांसप्लांट के लिए मरीज के भाई को डोनर के रूप में चुना गया, जो आधे एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) में मेल खाते थे।
क्या है हापलो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट
एम्स के हीमेटोलाजी विभाग के डा. गौरव ढींगरा ने बताया कि यह सामान्य बोन मैरो ट्रांसप्लांट से कई गुना अधिक जटिल प्रक्रिया है। इसमें रोगी को आधे एचएलए मिलान वाले डोनर से स्टेम सेल दिए जाते हैं। जहां एक तरफ मैच्ड बोन मैरो ट्रांसप्लांट में डोनर और रिसीवर के 12 के 12 जीन मेल खाते हैं और सफलता दर 60 फीसद होती है, वहीं हापलो आइडेंटिकल में सिर्फ छह जीन ही मेल खाते हैं। ट्रांसप्लांट के सफल होने की दर सिर्फ 30 प्रतिशत रहती है।
भाई को डोनर के रूप में चुना गया
बच्ची का इलाज एम्स भोपाल के बाल्य आन्कोलाजी विभाग में डॉ. नरेंद्र चौधरी की देखरेख में हो रहा था। ट्रांसप्लांट के लिए मरीज के भाई को डोनर के रूप में चुना गया, जो आधे एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) में मेल खाते थे। एम्स के हीमेटोलाजी विभाग के डॉ. गौरव ढींगरा ने बताया कि यह सामान बौनमेरौ ट्रांसप्लांट से कई गुना अधिक जटिल प्रक्रिया है।
जहां एक तरफ मैच्ड बोनमैरो ट्रांसप्लांट में 12 के 12 जीन डोनर और रिसीवर के मेल खाते हैं। इसमें भी सफलता दर 60 फीसदी होती है। हेप्लो आइडेंटिकल में सिर्फ छह जीन ही मेल खाते हैं। इस ट्रांसप्लांट के सफल होने की दर सिर्फ 30 प्रतिशत के करीब रहती है।
ऐसे हुआ प्रत्यारोपण
सबसे पहले पीड़ित बच्चे के भाई से स्टेम सेल निकाले गए। इसके बाद बच्चे को फुल बाडी रेडिएशन दिया गया। इससे उसकी बाडी इंफेक्शन मुक्त और इम्यूनिटी भी बेहद कम हो जाए। इससे रिसीवर की बाडी डोनर से आए स्टेम सेल को खत्म नहीं कर पाती है।
इसके साथ ध्यान रखा गया कि डोनर के स्टेम सेल रिसीवर के सेल्स को मारने का कार्य न करें। यह एक बेहद और बहु स्तरीय प्रक्रिया है। इसमें कई फैक्टर्स को एक साथ निगरानी करना होता है।
क्या है हापलो
आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट हापलो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें रोगी को आधे एचएलए मिलान वाले डोनर से स्टेम सेल दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया उन रोगियों के लिए एक आशा की किरण है, जिनके लिए पारंपरिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट उपलब्ध नहीं है।
मरीज को माइलो-अब्लेटिव कंडीशनिंग रेजिमेन के तहत संपूर्ण शरीर की रेडियोथेरेपी (टोटल बाडी इरैडिएशन) दी गई, जिसे रेडिएशन आन्कोलाजी विभाग के डॉ. सैकत दास, डॉ. विपिन खराडे और भौतिक विज्ञानी (आरएसओ) अवनीश मिश्रा द्वारा सफलतापूर्वक संचालित किया गया।
रक्त कैंसर के इलाज में नई उम्मीद जगाएगा
यह एम्स भोपाल के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने से यह स्पष्ट होता है कि हमारे संस्थान में उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। यह बच्चों में रक्त कैंसर के इलाज में एक नई उम्मीद जगाएगा। – प्रो. डॉ. अजय सिंह, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल
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