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रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में भारत ने बड़ी और ऐतिहासिक छलांग लगाई है. भारतीय वैज्ञानिकों ने एयरक्राफ्ट्स के लैंडिंग गियर के लिए एक ऐसा हल्का और अत्यधिक मजबूत नैनोकॉम्पोजिट तैयार किया है, जो अमेरिका जैसे दुनिया के ताकतवर देशों के माथे पर पसीना ला सकता है. यह नया मटेरियल न केवल एयरक्राफ्ट्स को लैंडिंग के समय अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करेगा. साथ ही, इसकी कॉस्ट मौजूदा विकल्पों के मुकाबले 60 प्रतिशत से भी कम है।
दरअसल, किसी भी एयरक्राफ्ट का लैंडिंग गियर बेहद पार्ट होता है. एयरक्राफ्ट को जब आसमान से जमीन पर उतरना होता है, तो लैंडिंग गियर को भारी दबाव और घिसाव का सामना करना पड़ता है. रनवे पर उतरते समय एयरक्राफ्ट का सारा वजन इन्हीं पहियों और गियर पर पड़ता है. मौजूदा समय में लैंडिंग गियर बनाने के लिए अल्ट्रा-हाई-स्ट्रेंथ स्टील, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि एल्युमिनियम वजन में हल्का होता है, लेकिन अधिक दबाव पड़ने पर इसका टिकना मुश्किल हो जाता है. वहीं, दूसरी ओर स्टील और टाइटेनियम भारी होने के साथ-साथ काफी महंगे भी होते हैं. इससे एयरक्राफ्ट का कुल वजन तो बढ़ता ही है, साथ ही फ्यूल की खपत भी ज्यादा होती है।
एनआईटी राउरकेला की पहल से चौंकी दुनिया
इस समस्या का हल निकालने के लिए एनआईटी राउरकेला के मेटलर्जिकल और मैटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का नया मैटेरियल तैयार किया है।
इसे हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट कहा जाता है. यह नैनोकॉम्पोजिट इंसान के बाल से करीब 1 लाख गुना ज्यादा पतला होता है. इसके बावजूद यह बहुत मजबूत है और आसानी से घिसता नहीं है।
इस खास सामग्री का वजन भी बहुत कम है, इसलिए इसे फाइटर प्लेन और ड्रोन (यूएवी) जैसे एयरक्राफ्ट्स के साथ-साथ सिविल एविएशन के एयरक्राफ्ट्स में इस्तेमाल करने के लिए बेहद अच्छा माना जा रहा है।
हल्का होने के कारण यह एयरक्राफ्ट की परफॉर्मेंस को नकेवल बेहतर करेगा, बल्कि फ्लूल की खपत भी कम होगी. इस नैनोकॉम्पोजिट को बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।
इसमें कार्बन नैनोट्यूब्स का उपयोग किया गया, जिससे यह ज्यादा दबाव सहने और वजन को बराबर बांटने में सक्षम है. इसके साथ ही ग्रेफाइट नैनोप्लेटलेट्स मिलाए गए, जिससे इसकी मजबूती और बढ़ जाती है।
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में स्थिर रखने के लिए क्या किया गया?
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में भी स्थिर बनाए रखने के लिए हेक्सागोनल बोरॉन नाइट्राइड का इस्तेमाल किया गया है. यह एक खास तरह का मैटेरियल है, जो गर्मी को सहने की क्षमता बढ़ाता है और मैटेरियल को खराब होने से बचाता है. इसके कारण यह नैनोकॉम्पोजिट हाई टैंपरेचर में भी मजबूत बना रहता है. यही वजह है कि इसे एयरोस्पेस जैसे सेक्टर में उपयोग के लिए सबसे बेहतर माना जा रहा है।
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एक समान कैसे मिलाया गया?
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एल्युमिनियम के साथ अच्छी तरह मिलाने के लिए हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स यानी तेज ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल किया गया. इन वेव्स की मदद से सभी छोटे-छोटे कंपोनेंट पूरे मिक्सचर में बराबर फैल जाते हैं. इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि मैटेरियल के हर हिस्से में एक जैसी मजबूती बनी रहें।
इस मैटेरियल को मजबूत बनाने के लिए आगे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई?
सभी कंपोनेंट्स को मिलाने के बाद इस मिक्सचर को बिना ऑक्सीजन वाले इंवायमेंट में रखा गया. फिर इसे ज्यादा टैंपरेचर और प्रेशर पर गर्म करके दबाया गया. इस प्रक्रिया से कंपोनेंट आपस में मजबूती से जुड़ गए और एक मजबूत मैटेरियल तैयार हुआ. ऑक्सीजन न होने से मैटेरियल में किसी तरह का ऑक्सीनाइजेशन नहीं हुआ, जिससे इसकी गुणवत्ता बनी रही।
इस शोध को किन वैज्ञानिकों ने पूरा किया और इसका नेतृत्व किसने किया?
इस रसिर्च का नेतृत्व प्रोफेसर सैयद नसीमुल आलम ने किया. उनके साथ डॉ. अर्का घोष, डॉ. आशुतोष दास, डॉ. पंकज श्रीवास्तव, नित्यानंद साहू और पार्थ पटेल जैसे कई शोधकर्ता शामिल थे. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के एक वैज्ञानिक ने भी इस प्रोजेक्ट में अपना योगदान दिया. यह एक ऐसा टीम वर्क है, जिसमें अलग-अलग विशेषज्ञों ने मिलकर इस बेहतरीन तकनीक को तैयार किया है।
इस नए मैटेरियल की खासियतें क्या हैं और यह कैसे घिसाव को कम करता है?
प्रोफेसर आलम के अनुसार, यह नया मैटेरियल घिसाव को काफी हद तक कम करता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सतह पर एक पतली सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो इसे जल्दी खराब होने से बचाती है. इसके अलावा इसका अंदरूनी ढांचा बहुत मजबूत होता है, जिससे यह भार को सही तरीके से संभाल सकता है. यही गुण इसे लंबे समय तक टिकाऊ और भरोसेमंद बनाते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां लगातार घर्षण होता है।
रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में भारत ने बड़ी और ऐतिहासिक छलांग लगाई है. भारतीय वैज्ञानिकों ने एयरक्राफ्ट्स के लैंडिंग गियर के लिए एक ऐसा हल्का और अत्यधिक मजबूत नैनोकॉम्पोजिट तैयार किया है, जो अमेरिका जैसे दुनिया के ताकतवर देशों के माथे पर पसीना ला सकता है. यह नया मटेरियल न केवल एयरक्राफ्ट्स को लैंडिंग के समय अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करेगा. साथ ही, इसकी कॉस्ट मौजूदा विकल्पों के मुकाबले 60 प्रतिशत से भी कम है।
दरअसल, किसी भी एयरक्राफ्ट का लैंडिंग गियर बेहद पार्ट होता है. एयरक्राफ्ट को जब आसमान से जमीन पर उतरना होता है, तो लैंडिंग गियर को भारी दबाव और घिसाव का सामना करना पड़ता है. रनवे पर उतरते समय एयरक्राफ्ट का सारा वजन इन्हीं पहियों और गियर पर पड़ता है. मौजूदा समय में लैंडिंग गियर बनाने के लिए अल्ट्रा-हाई-स्ट्रेंथ स्टील, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि एल्युमिनियम वजन में हल्का होता है, लेकिन अधिक दबाव पड़ने पर इसका टिकना मुश्किल हो जाता है. वहीं, दूसरी ओर स्टील और टाइटेनियम भारी होने के साथ-साथ काफी महंगे भी होते हैं. इससे एयरक्राफ्ट का कुल वजन तो बढ़ता ही है, साथ ही फ्यूल की खपत भी ज्यादा होती है।
एनआईटी राउरकेला की पहल से चौंकी दुनिया
इस समस्या का हल निकालने के लिए एनआईटी राउरकेला के मेटलर्जिकल और मैटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का नया मैटेरियल तैयार किया है।
इसे हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट कहा जाता है. यह नैनोकॉम्पोजिट इंसान के बाल से करीब 1 लाख गुना ज्यादा पतला होता है. इसके बावजूद यह बहुत मजबूत है और आसानी से घिसता नहीं है।
इस खास सामग्री का वजन भी बहुत कम है, इसलिए इसे फाइटर प्लेन और ड्रोन (यूएवी) जैसे एयरक्राफ्ट्स के साथ-साथ सिविल एविएशन के एयरक्राफ्ट्स में इस्तेमाल करने के लिए बेहद अच्छा माना जा रहा है।
हल्का होने के कारण यह एयरक्राफ्ट की परफॉर्मेंस को नकेवल बेहतर करेगा, बल्कि फ्लूल की खपत भी कम होगी. इस नैनोकॉम्पोजिट को बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।
इसमें कार्बन नैनोट्यूब्स का उपयोग किया गया, जिससे यह ज्यादा दबाव सहने और वजन को बराबर बांटने में सक्षम है. इसके साथ ही ग्रेफाइट नैनोप्लेटलेट्स मिलाए गए, जिससे इसकी मजबूती और बढ़ जाती है।
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में स्थिर रखने के लिए क्या किया गया?
हाइब्रिड नैनोकॉम्पोजिट को ज्यादा टैंपरेचर में भी स्थिर बनाए रखने के लिए हेक्सागोनल बोरॉन नाइट्राइड का इस्तेमाल किया गया है. यह एक खास तरह का मैटेरियल है, जो गर्मी को सहने की क्षमता बढ़ाता है और मैटेरियल को खराब होने से बचाता है. इसके कारण यह नैनोकॉम्पोजिट हाई टैंपरेचर में भी मजबूत बना रहता है. यही वजह है कि इसे एयरोस्पेस जैसे सेक्टर में उपयोग के लिए सबसे बेहतर माना जा रहा है।
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एक समान कैसे मिलाया गया?
इस नैनोकॉम्पोजिट के सभी कंपोनेंट्स को एल्युमिनियम के साथ अच्छी तरह मिलाने के लिए हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स यानी तेज ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल किया गया. इन वेव्स की मदद से सभी छोटे-छोटे कंपोनेंट पूरे मिक्सचर में बराबर फैल जाते हैं. इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि मैटेरियल के हर हिस्से में एक जैसी मजबूती बनी रहें।
इस मैटेरियल को मजबूत बनाने के लिए आगे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई?
सभी कंपोनेंट्स को मिलाने के बाद इस मिक्सचर को बिना ऑक्सीजन वाले इंवायमेंट में रखा गया. फिर इसे ज्यादा टैंपरेचर और प्रेशर पर गर्म करके दबाया गया. इस प्रक्रिया से कंपोनेंट आपस में मजबूती से जुड़ गए और एक मजबूत मैटेरियल तैयार हुआ. ऑक्सीजन न होने से मैटेरियल में किसी तरह का ऑक्सीनाइजेशन नहीं हुआ, जिससे इसकी गुणवत्ता बनी रही।
इस शोध को किन वैज्ञानिकों ने पूरा किया और इसका नेतृत्व किसने किया?
इस रसिर्च का नेतृत्व प्रोफेसर सैयद नसीमुल आलम ने किया. उनके साथ डॉ. अर्का घोष, डॉ. आशुतोष दास, डॉ. पंकज श्रीवास्तव, नित्यानंद साहू और पार्थ पटेल जैसे कई शोधकर्ता शामिल थे. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के एक वैज्ञानिक ने भी इस प्रोजेक्ट में अपना योगदान दिया. यह एक ऐसा टीम वर्क है, जिसमें अलग-अलग विशेषज्ञों ने मिलकर इस बेहतरीन तकनीक को तैयार किया है।
इस नए मैटेरियल की खासियतें क्या हैं और यह कैसे घिसाव को कम करता है?
प्रोफेसर आलम के अनुसार, यह नया मैटेरियल घिसाव को काफी हद तक कम करता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सतह पर एक पतली सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो इसे जल्दी खराब होने से बचाती है. इसके अलावा इसका अंदरूनी ढांचा बहुत मजबूत होता है, जिससे यह भार को सही तरीके से संभाल सकता है. यही गुण इसे लंबे समय तक टिकाऊ और भरोसेमंद बनाते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां लगातार घर्षण होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक्सप्रेसवे के चयनित हिस्से को इस तरह विकसित किया गया है कि जरूरत पड़ने पर यह पूरी तरह हवाई पट्टी का काम कर सके. इसके लिए सड़क की चौड़ाई, मजबूती और सतह की गुणवत्ता को विशेष मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है. साथ ही आसपास का क्षेत्र भी इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि विमान संचालन के दौरान किसी प्रकार की बाधा न आए।
इस समय होगा आयोजन
दोपहर 2 बजे से लेकर रात 8 बजे तक लगातार एयर शो का आयोजन होगा. खास बात यह है कि रात के अंधेरे में होने वाला एरियल लाइट शो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा. बताया जा रहा है कि बड़ी संख्या में फाइटर जेट्स इस हवाई पट्टी पर उतरेंगे, जिससे आयोजन और भी भव्य बनेगा. वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान और इजराइल के बीच जारी तनाव और पहलगाम हमले की पहली बरसी को देखते हुए इस सैन्य प्रदर्शन ने लोगों में देशभक्ति का जज्बा और भी मजबूत कर दिया है।
ड्रिल का यह है उद्देश्य
प्रशासन और वायुसेना के अधिकारियों के बीच इस आयोजन को लेकर लगातार समन्वय किया जा रहा है. आज दोपहर दो बजे से यहां अभ्यास किया जाएगा, जिसमें सुखोई और मिराज जैसे लड़ाकू विमान इस एक्सप्रेसवे पर उतरकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन करेंगे. इस अभ्यास का उद्देश्य आपात स्थिति में वैकल्पिक रनवे की उपयोगिता को परखना है. यह अभ्यास इसलिए भी जरूरी है, ताकि युद्ध या अन्य संकट की स्थिति में पारंपरिक एयरबेस के अलावा भी विमानों के संचालन के विकल्प उपलब्ध होंगे. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पहले से ही उत्तर प्रदेश की एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना है, और अब इसका यह सैन्य उपयोग इसे और अधिक रणनीतिक महत्व प्रदान करता है. स्थानीय प्रशासन ने भी सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं, ताकि अभ्यास के दौरान आम लोगों को असुविधा न हो और सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जा सके।
कनाडा में राज्य सरकार का नया जेट विमान (चैलेंजर 3500) लगभग तैयार हो गया है। इसे तैयार कर रही बाम्बार्डियर कंपनी जून 2026 के अंत तक सरकार को सौंपने जा रही है। डिलीवरी लेने से पहले विमान की तकनीकी जांच की जाएगी जिसके लिए सरकार ने समिति गठित कर दी है।
विमान की तकनीकी जांच के लिए विशेषज्ञों की टीम चिह्नित की गई है। ये निजी विशेषज्ञ हैं, जो जांच के लिए 50 लाख रुपए ले रहे हैं। विमान की जांच टीम में विमानन विभाग में पदस्थ पायलट विश्वास राय, तकनीकी विशेषज्ञ जेपी शर्मा और रश्मि सिंह शामिल हैं।
250 करोड़ का है विमान, एक बार में करीब 3500 किमी का सफर तय करेगा
राज्य सरकार के नए विमान की कीमत 250 करोड़ है। यह अत्याधुनिक जेट विमान है जिसमें अनेक खूबियां हैं। नया विमान 870 प्रति किमी तक की रफ़्तार से उड़ान भर सकता है। विमानन विशेषज्ञों के अनुसार यह जेट विमान एक बार में करीब 3500 किमी का सफर तय करेगा। एक वरिष्ठ अफसर ने इसे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस विमान बताया है। अधिकारी के अनुसार इसमें 8 से 10 यात्री सफर कर सकते हैं। विमान में दो कैबिन क्रू अलग से होंगे।
नया जेट विमान आते ही राज्य सरकार को किराए से राहत मिल जाएगी
बता दें, अभी सरकार के पास खुद का विमान नहीं है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के हवाई दौरों या अन्य अनिवार्य सेवाओं के लिए जरूरत के वक्त राज्य सरकार द्वारा किराए से विमान लिए जा रहे हैं। इसपर हर महीने लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं। नया जेट विमान आते ही राज्य सरकार को किराए से राहत मिल जाएगी।
भारतीय वायुसेना का एक सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट गुरुवार शाम को असम में लापता हो गया. देर रात इसके क्रैश होने की पुष्टि हुई. फाइटर जेट ने असम के जोरहाट से उड़ान भरी थी और शाम 7.42 बजे के बाद रडार से उसका संपर्क टूट गया. विमान का पता लगाने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) ने सर्च और रेस्क्यू मिशन शुरू किया है।
वायुसेना ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि IAF स्क्वाड्रन लीडर अनुज और फ्लाइट लेफ्टिनेंट पुरवेश दुरगकर के निधन पर दुख जताता है, जिन्हें Su-30 क्रैश में जानलेवा चोटें आईं। IAF के सभी कर्मचारी गहरी संवेदना जताते हैं, और इस दुख की घड़ी में दुखी परिवार के साथ मजबूती से खड़े हैं।
भारतीय वायुसेना ने अपने X हैंडल पर खोए हुए फाइटर जेट का अपडेट शेयर करते हुए लिखा, 'हमारे एक Su-30 MKI के लापता होने की खबर है. एयरक्राफ्ट ने असम के जोरहाट से उड़ान भरी थी और आखिरी बार शाम 7.42 बजे रडार के संपर्क में आया था. आगे की जानकारी का पता लगाया जा रहा है. एक सर्च और रेस्क्यू मिशन शुरू किया गया है।'
इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी सुपरमैन्यूवरबिलिटी, लंबी मारक क्षमता और दो इंजन वाला शक्तिशाली डिजाइन है. सुखोई-30 एमकेआई ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ले जाने में भी सक्षम है, जिससे इसकी स्ट्राइक कैपेसिटी कई गुना बढ़ जाती है. इसमें आधुनिक एवियोनिक्स, मल्टी-फंक्शन रडार, थ्रस्ट वेक्टर कंट्रोल और लंबी दूरी तक उड़ान की क्षमता है. यह लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जाता है और देश की वायु सुरक्षा व सामरिक ताकत में इसकी भूमिका बेहद अहम है।
सुखोई-30 एमकेआई भारतीय वायुसेना का सबसे ताकतवर और भरोसेमंद मल्टी रोल फाइटर जेट है. इसे 2000 के दशक की शुरुआत में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था. यह रूस के सुखोई डिजाइन ब्यूरो द्वारा विकसित किया गया है. भारतीय वायुसेना इस फाइटर जेट का विशेष रूप से कस्टमाइज संस्करण इस्तेमाल करती है, जिसमें MKI का अर्थ है मॉडर्नाइज्ड, कमर्शियल और इंडियन. यह विमान हवा से हवा, हवा से जमीन और समुद्री लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है।
रूस में इस एयरक्राफ्ट का प्रोडक्शन 2000 में शुरू हुआ था, जब नई दिल्ली ने मॉस्को से 140 Su-30 फाइटर एयरक्राफ्ट बनाने के लिए कहा था. पहला एयरक्राफ्ट 2002 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था, और तब से, समय के साथ इसकी संख्या बढ़ती ही गई है।. आज, Su-30 भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों के बेड़े में सबसे बड़ा हिस्सा रखता है
]]>मध्यप्रदेश सरकार नए विमान खरीदी की तैयारी में जुटी है। जिसे लेकर मुख्य सचिव वीरा राणा के साथ मीटिंग हो चुकी है। 2 कंपनियों की ओर से इसमें रुचि दिखाई गई है, जिस पर डॉ. मोहन यादव कैबिनेट अंतिम फैसला करेगी।
साथ ही, 4 साल पहले दुर्घटनाग्रस्त राज्य सरकार के एयर क्राफ्ट को बेचने के लिए आफसेट प्राइज भी सरकार इसी माह तय करेगी। इसके लिए विमानन विभाग ने 13 जून तक विमानन कंपनियों से ईओआई के प्रस्ताव मांगे हैं। प्रस्ताव 14 जून को ओपन होंगे, और इसके बाद एयरक्राफ्ट बेचने की कम से कम कीमत तय हो जाएगी।
14 जून को 3 बजे ओपन होंगे प्रस्ताव
विमानन विभाग ने एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (EOI) के लिए शुरू की गई प्रक्रिया के अंतर्गत राज्य सरकार के डैमेज एयर क्राफ्ट एसकेए बी-200 जीटी, वीटी एमपीक्यू के लिए तकनीकी और वित्तीय प्रस्ताव मांगे हैं। विभाग की ओर से 24 मई को इसके लिए प्रस्ताव ऑफर करते हुए 13 जून तक इसके लिए इच्छुक कंपनियों से प्रस्ताव देने के लिए कहा है। इसके बाद 14 जून को दोपहर 3 बजे इन प्रस्तावों को ओपन किया जाएगा।
वेल्युएशन में जो प्रस्तावित कीमतें आएंगी वही इसकी आफसेट प्राइज होंगी और इसके बाद इसे बेचने के टेंडर जारी किए जाएंगे। इसे आफसेट प्राइज से कम कीमत में नहीं बेचा जाएगा।
एयरक्राफ्ट 4 साल पहले दुर्घटनाग्रस्त हुआ था
नए विमान की खरीदी के साथ ही राज्य सरकार के एयरक्राफ्ट को बेचने के लिए ऑफसेट प्राइज भी जून के महीने में ही तय किया जा रहा है। यह एयरक्राफ्ट 4 साल पहले दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इसके लिए विमानन विभाग ने 13 जून तक विमानन कंपनियों से ईओआई के प्रस्ताव भी मांगे हैं। यह प्रस्ताव 14 जून को ओपन होंगे और इसके बाद एयरक्राफ्ट बेचने की कम से कम कीमत तय हो जाएगी।
कीमत करीब 250 करोड़ हो सकती है
जानकारी के अनुसार मोहन यादव की सरकार में जिस नए विमान की खरीदारी करने का प्रस्ताव सामने आया है। जिसकी कीमत करीब 250 करोड़ हो सकती है। इसमें 2 पायलटों के साथ ही 8 से 10 लोगों के एक साथ बैठने की व्यवस्था रहेगी। चेयर फोल्डिंग सिस्टम की व्यवस्था भी इसमें रहेगी और एक छोटे किचन की जगह भी दी गई है।
कंपनियों से खरीदारी को लेकर वीरा राणा ने बैठक पूरी कर ली है
दोनों विख्यात विमानन कंपनियों के प्रस्ताव प्रदेश सरकार तक पहुंच चुके हैं। विमानन कंपनियों से खरीदारी को लेकर मुख्य सचिव वीरा राणा ने औपचारिक बैठक पूरी कर ली है। अब उनकी तरफ से सरकार के सामने जो प्रस्ताव भेजा जाएगा। उस पर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के मंत्री अपना निर्णय लेंगे। बता दें कि इससे पूर्व कमलनाथ की सरकार में नए विमान की खरीदारी की गई थी। 4 वर्ष पहले दुर्घटनाग्रस्त हुए विमान के बाद मोहन सरकार में नए सिरे से कवायद की गई और पूर्व निविदा जारी की गई। अब इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगना बाकी है।
4 साल पहले हुआ था दुर्घटनाग्रस्त
विमानन विभाग ने इच्छुक कंपनियों से कहा है कि वे डैमेज एयरक्राफ्ट की कीमत का प्रस्ताव देने के साथ इसके बारे में अन्य जानकारी देंगे। दरअसल, यह एयर क्राफ्ट ग्वालियर में 6 मई 2021 को लैंडिंग के दौरान दुर्घटना का शिकार हो गया था, और तब से वहीं उसी रूप में खड़ा है। सरकार ने ईओआई की इच्छुक कंपनियों से एयर क्राफ्ट के स्ट्रक्चरल मैकेनिकल और हवाई कंपोनेंट्स के बारे में भी जानकारी चाही है।
विभाग ने कहा है कि कंसल्टिंग फर्म्स के पास एयरक्राफ्ट एप्रेजल का स्पेशिफिक एक्सपीरियंस होने के साथ, एक्सीडेंट इंवेस्टिगेशन, एविएशन इन्श्योरेंस होना चाहिए। फर्म्स का एविएशन की वर्किंग में मजबूत परफार्मेंस होना चाहिए। इसके लिए एक माह की टाइम लाइन दी जाएगी।
रेमजेसिविर इंजेक्शन लेकर पहुंचा था एयरक्राॅफ्ट
यह एयर क्राफ्ट कोरोना काल के दौरान कोरोना सेकेंड फेज में नागरिक सेवाओं के लिए उपयोग में लाया जा रहा था, तभी दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह पहले अहमदाबाद से रेमडेसिविर इंजेक्शन लेकर इंदौर पहुंचा था। वहां अनलोडिंग के बाद बचे हुए डोज लेकर ग्वालियर एयरपोर्ट पहुंचा था लेकिन ग्वालियर में लैंडिंग से पहले ही प्लेन के इंजन में तकनीकी खराबी आ गई।
तब सीनियर पायलट कैप्टन सईद माजिद अख्तर ने निर्धारित पॉइंट से 200 मीटर पहले ही प्लेन को रनवे पर डाल दिया। उन्होंने स्पीड कम करते हुए विमान को कंट्रोल करने की कोशिश की लेकिन प्लेन रनवे पर फिसलकर एक तरफ पलट गया और तब से वहीं खड़ा है।
प्रस्तावित नए विमान में 8 से 10 लोग बैठ सकेंगे
सरकार के पास नए विमान खरीदी को लेकर दो अलग-अलग कंपनियों की ओर से जो प्रस्ताव पहुंचे हैं। उसमें 2 पायलट समेत 8 से 10 लोग बैठ सकेंगे। इसकी लागत 250 करोड़ से अधिक हो सकती है। बताया जाता है कि प्रस्ताव में शामिल नए विमान में छोटा सा किचन और चेयर फोल्डिंग सिस्टम होगा।
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