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भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति संवेदनशील है लेकिन पूरी तरह नियंत्रण में है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में यहां 31 आतंकवादी मारे गए, जिनमें से 65 प्रतिशत पाकिस्तानी मूल के आतंकी थे। यहां मारे गए आतंकियों में पहलगाम हमले के तीनों मुख्य अपराधी भी शामिल हैं। ये आतंकी जम्मू कश्मीर में शुरू किए गए ऑपरेशन ‘महादेव’ में मारे गए थे। मंगलवार को दिल्ली में एक वार्षिक प्रेसवार्ता में जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि जम्मू कश्मीर में अब स्थानीय सक्रिय आतंकवादी न के बराबर है। उन्होंने बताया कि इनकी संख्या अब एकल अंक (सिंगल डिजिट) में रह गई है। यहां आतंकवादी भर्ती लगभग समाप्त हो चुकी है। सेनाध्यक्ष ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सकारात्मक बदलाव के ये स्पष्ट संकेत मिलते हैं। जम्मू कश्मीर में विकास गतिविधियां, पर्यटन का फिर से शुरू होना और शांतिपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा मजबूत सकारात्मक बदलावों को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि श्री अमरनाथ यात्रा में इस वर्ष 4 लाख से ज्यादा तीर्थयात्री आए। जम्मू कश्मीर में टेररिज्म टू टूरिज्म की थीम धीरे-धीरे आकार ले रही है।
सेनाध्यक्ष ने यहां पूर्वोत्तर में, विशेष रूप से मणिपुर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों की निष्पक्ष, पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई तथा सरकार की सक्रिय पहलों के कारण वर्ष 2025 में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पूर्वोत्तर की प्रमुख उपलब्धियों में शांतिपूर्ण डुरंड कप का आयोजन शामिल हैं। यहां सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे कि शिरुई लिली और संगाई जैसे सांस्कृतिक उत्सवों की वापसी हुई।
सितंबर 2025 में उग्रवादी समूहों के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (एसओओ) का नवीनीकरण किया गया। सेनाध्यक्ष ने बताया कि म्यांमार में अस्थिरता के मद्देनजर, असम राइफल्स, भारतीय सेना और गृह मंत्रालय के समन्वय से एक व्यापक बहु-एजेंसी सुरक्षा तंत्र स्थापित किया गया है। यह तंत्र इसलिए है ताकि पूर्वोत्तर को किसी भी प्रकार के सीमा-पार प्रभाव से सुरक्षित रखा जा सके। म्यांमार में चुनावों के सफल आयोजन के बाद आपसी सहयोग और प्रभावी होने की संभावना जताई गई।
थल सेनाध्यक्ष ने बताया कि भारतीय सेना ने वर्ष 2025 में दो पड़ोसी देशों और देश के 10 राज्यों में मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों को अंजाम दिया। इन अभियानों में 30,000 से अधिक लोगों को बचाया गया। वहीं पंजाब में बाढ़ के दौरान पटियाला में ढहती इमारत से सीआरपीएफ कर्मियों को सेना के हेलीकॉप्टर द्वारा बचाने की साहसिक कार्रवाई का विशेष उल्लेख किया गया। इस कार्रवाई ने सेना की त्वरित प्रतिक्रिया और मानवीय प्रतिबद्धता को दर्शाया।
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि म्यांमार में जारी अस्थिरता के मद्देनजर भारत ने पूर्वोत्तर को किसी भी दुष्प्रभाव से सुरक्षित रखने के लिए यह व्यापक बहु-एजेंसी सुरक्षा ग्रिड स्थापित किया है। इसमें असम राइफल्स, भारतीय सेना और गृह मंत्रालय मिलकर कार्य कर रहे हैं। म्यांमार में दूसरे चरण के चुनावों के सफल आयोजन के बाद अब दोनों देशों के बीच सहयोग और समन्वय को और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकेगा।
जनरल द्विवेदी ने कहा कि कई सीमावर्ती राज्यों में सेना ने औपचारिक अनुरोध मिलने से पहले ही राहत एवं बचाव कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय सेना आपदा के समय ‘नेचुरल फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाती है। थल सेनाध्यक्ष ने कहा कि चाहे वह सीमा-पार अस्थिरता हो या प्राकृतिक आपदाएं, भारतीय सेना हर परिस्थिति में राष्ट्र की सुरक्षा और नागरिकों की सहायता के लिए तत्पर रहती है।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने बताया कि सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मुझसे राम मंत्र की दीक्षा ली. मैंने उन्हें उसी राम मंत्र की दीक्षा दी, जो मां सीता ने भगवान हनुमान को दी थी, जिसके बाद उन्होंने लंका पर विजय प्राप्त की थी. मैंने उनसे दक्षिणा मांगी है कि, मुझे PoK चाहिए.
तुलसी पीठ आवास में जगद्गुरु ने पत्रकारों से कहा कि सेना प्रमुख का सम्मान करने में उन्हें बहुत गौरव की अनुभूति हुई. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अगर आगे कोई आतंकवादी वारदात को अंजाम देता है तो वह नेस्तनाबूद हो जाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि थल सेना अध्यक्ष ने उनसे उसी मंत्र की दीक्षा ली, जो मंत्र सीताजी ने हनुमानजी को लंका विजय के लिए दिया था.
सेना प्रमुख का यह दौरा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ा रहा. उन्होंने सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय का निरीक्षण किया और सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट की ओर से आयोजित अभिनंदन समारोह में भी भाग लिया. इस दौरान पद्मश्री डॉ. बीके जैन ने उनका स्वागत किया. जनरल द्विवेदी ने गुरु रामभद्राचार्य को एक स्मृति चिह्न भेंट किया और उनके सेवा कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें भारत की आध्यात्मिक और सामाजिक शक्ति का प्रतीक बताया.
सेना प्रमुख के आगमन से पहले ही तुलसीपीठ क्षेत्र में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे. आश्रम से लेकर कांच मंदिर तक हर मोड़ पर पुलिस और सुरक्षाबलों की कड़ी तैनाती रही. बताया जा रहा है कि उनके आगमन ने न केवल आध्यात्मिक वातावरण को ऊर्जावान किया बल्कि क्षेत्र में राष्ट्रभक्ति की भावना भी जीवंत कर दी.
हर जगह सेना के जवान तैनात थे
कई स्थानों पर बैरिकेड्स लगाकर आम लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई गई थी. जानकीकुंड स्थित सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय में इलाज के लिए आने-जाने वाले लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा. सेना के जवान हर स्थान पर सतर्कता से तैनात थे. मध्यप्रदेश पुलिस के अधिकारी भी सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते रहे.
जगद्गुरु से लिया आशीर्वाद
हेलीपैड से सेना प्रमुख का काफिला कड़ी सुरक्षा के बीच जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य महाराज के तुलसीपीठ आश्रम पहुंचा. यहां उन्होंने कांच मंदिर में विधिपूर्वक पूजा की, फिर जगद्गुरु से उनके कक्ष में मिलकर आशीर्वाद प्राप्त किया और उनके स्वास्थ्य की जानकारी भी ली.
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बांग्लादेश एक बार फिर नेतृत्व संकट से घिर गया है. ढाका की राजनीति संवेदनशील मोड़ पर आ खड़ी हुई है. देश के अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार और नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस अब खुद को बढ़ते दबावों के बीच घिरा पा रहे हैं. सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान की दो टूक चेतावनी के बाद यूनुस इस्तीफा देने पर विचार कर रहे हैं और प्लान B की तैयारी में जुट गए हैं. कहा जा रहा है कि यूनुस अब सत्ता में बने रहने के लिए सड़कों पर ताकत दिखाने जा रहे हैं. वहीं, राजनीतिक गलियारों और सैन्य हलकों में उनकी मंशा को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.
पिछले साल बांग्लादेश में जनविरोध के बाद सत्ता में उलटफेर हुआ था और 84 साल के यूनुस के हाथों में सत्ता सौंपी गई थी. बांग्लादेश के आर्मी चीफ जनरल वकर-उज-जमान ने रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि मुहम्मद यूनुस अगले डेढ़ साल तक सत्ता में रहेंगे. इसी बीच चुनाव कराए जाएंगे और नई सरकार का गठन होगा.उन्होंने आगे कहा था, हम जल्द ही देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करना चाहते हैं. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने आर्मी को मजिस्ट्रेट की पावर सौंपी है, जिसके बाद अंदेशा लगाया जा रहा था कि शायद अब सेना के हाथ में देश की सत्ता होगी और दोनों मिलकर सरकार चलाएंगे.
सेना प्रमुख ने साफ किया था कि जब तक अंतरिम सरकार रहेगी, तब तक सेना उसके पीछ रहकर काम करेगी. यह तब तक चलेगा, जब तक कि यूनुस देश में चल रहे सुधारों को पूरा नहीं कर लेते हैं. आर्मी चीफ ने यह भी आश्वासन दिया था कि वे अंतरिम सरकार के साथ हमेशा खड़े रहेंगे, कैसी भी परिस्थिति हो.
अब विवाद क्यों भड़का…
दरअसल, सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने यूनुस के सुधार एजेंडे को खारिज कर दिया है और दिसंबर 2025 तक चुनाव कराने का आह्वान किया. जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर कहा कि अंतरिम सरकार का काम सिर्फ चुनाव कराना है, नीतिगत निर्णय लेना नहीं. सैन्य मामलों में हस्तक्षेप, आंतरिक सुरक्षा में एकपक्षीय निर्णय और बाहरी शक्तियों के दबाव को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सेना को हर रणनीतिक और सुरक्षा नीति में विश्वसनीय साझेदार की तरह शामिल किया जाना चाहिए. यह बयान यूनुस की सत्ता को खुली चुनौती के रूप में देखा गया.
ज़मान ने इस बात पर भी जोर दिया कि अंतरिम सरकार कोई भी ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय ना ले, जिससे बांग्लादेश की स्थिरता और संप्रभुता पर असर पड़े. ऐसे मुद्दों को भविष्य में निर्वाचित सरकार पर छोड़ दिया जाए. बुधवार को सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि अब और देरी नहीं चलेगी. सेना को नजरअंदाज कर रणनीतिक फैसले नहीं लिए जा सकते हैं.
सेना प्रमुख ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि वे सैन्य अधिग्रहण के खिलाफ हैं. वे यूनुस से बस यही उम्मीद करते हैं कि वे स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव करवाएं ताकि सत्ता का सुचारू और शांतिपूर्ण हस्तांतरण निर्वाचित सरकार को हो सके, जिसके बाद सेना वापस अपने बैरक में जा सकती है. बुधवार को उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सेना अब भीड़तंत्र और अराजकता, अंतरिम सरकार द्वारा सैन्य मामलों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप और बांग्लादेश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण निर्णयों में सेना को दरकिनार करने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में सैन्य नेतृत्व से सलाह ली जानी चाहिए और पीठ पीछे कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए.
यूनुस आर्मी चीफ के खिलाफ ही रच रहे साजिश, भारत के दुश्मनों के साथ सीक्रेट मीट…
बांग्लादेश में सियासी माहौल फिर से गर्म हो गया है. यूनुस और सेना प्रमुख के बीच जुबानी जंग चल रही है. ऐसे में यूनुस सेना प्रमुख को हटाना चाहते हैं. अंतरिम सरकार के प्रमुख और नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने भारत विरोधी दलों की एक अहम बैठक बुलाई है, लेकिन इस बैठक में क्या बात होगी, यह अभी रहस्य बना हुआ है. ढाका की सड़कों पर चर्चा है कि यूनुस अगले पांच साल तक सत्ता में बने रहना चाहते हैं. इसके लिए उनके समर्थक ‘मार्च फॉर यूनुस’ नाम से एक विशाल जनसभा की तैयारी कर रहे हैं. दूसरी तरफ, सेना प्रमुख की सख्त चेतावनी और राजनीतिक दलों की नाराजगी ने इस ड्रामे को और रोचक बना दिया है.
मोहम्मद यूनुस अब सीक्रेट मीटिंग कर रहे हैं.
यूनुस ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें बुलाई हैं. बीएनपी के एक नेता ने बताया कि यूनुस के दफ्तर ने उन्हें इस बैठक के लिए आमंत्रित किया है. लेकिन, इन बैठकों का असली मकसद क्या है, यह कोई नहीं जानता. हालांकि उनके इस तरह के मीटिंग करने से माना जा रहा है मोहम्मद यूनुस सत्ता छोड़ने के मूड में नहीं हैं और वह सेना प्रमुख को ही विलेन बनाकर हटाना चाहते हैं. गुरुवार को यूनुस ने NCP नेता नाहिद इस्लाम से मुलाकत की थी. माना जा रहा है कि दोनों मिलकर सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान को हटाने की रणनीति बना रहे हैं. नाहिद वही भारत विरोधी नेता है, जिसने पिछले साल शेख हसीना की सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन को लीड किया था. नाहिद और यूनुस की मुलाकात के बाद ये अटकलें और तेज हो गई हैं.
यूनुस पांच साल संभालेंगे सत्ता?
यूनुस इस पूरी लड़ाई में अपनी चालें चल रहे हैं. एक तरह वह इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने समर्थकें के जरिए प्रदर्शन करवा रहे हैं. यूनुस के समर्थकों ने ढाका के मशहूर शाहबाग चौराहे पर शनिवार को ‘मार्च फॉर यूनुस’ नाम से एक बड़ी रैली की घोषणा की है. शहर में पोस्टर लगाए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर ‘पांच साल तक यूनुस को सत्ता में रखो’ और ‘पहले सुधार, फिर चुनाव’ जैसे नारे ट्रेंड कर रहे हैं. समर्थकों का कहना है कि यूनुस को देश में सुधार लाने के लिए लंबा समय चाहिए. लेकिन इस रैली की टाइमिंग ने सबके कान खड़े कर दिए हैं.
आर्मी चीफ की चेतावनी
सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने साफ कहा है कि बिना चुनाव के सत्ता में बने रहना गैरकानूनी है. सेना ने यूनुस सरकार को दिसंबर तक चुनाव कराने की चेतावनी दी है. लेकिन यूनुस और उनके समर्थक सुधारों के नाम पर चुनाव टालने की बात कर रहे हैं. बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल जल्द चुनाव चाहते हैं और यूनुस के इस रवैये से नाराज हैं. बीएनपी का कहना है कि अगर जल्द ही चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई, तो वे यूनुस सरकार का समर्थन बंद कर देंगे. लेकिन अब BNP और जमात को ही मीटिंग में यूनुस ने बुला लिया है.
सेना ने बढ़ा दी यूनुस की टेंशन
जानकारों का कहना है कि ज़मान का भाषण यूनुस की टेंशन बढ़ाने वाला है. यूनुस चुनावों में उतरे बिना सत्ता में बने रहने की उम्मीद पाल रहे है. ऐसे में अब वे सत्ता बनाए रखने के लिए सड़कों की ताकत पर भरोसा करते दिखाई दे रहे हैं. गुरुवार को नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (NCP) के नेता नाहिद इस्लाम ने मीडिया से कहा कि यूनुस इस्तीफे पर विचार कर रहे हैं. उनके मुताबिक, बुधवार को जो कुछ हुआ, उसके बाद डॉ. यूनुस को लग रहा है कि वो अब इस भूमिका में काम नहीं कर सकते. हालांकि यूनुस ने आधिकारिक तौर पर अभी तक कोई इस्तीफा नहीं दिया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह एक रणनीतिक भावनात्मक कार्ड है, जिससे वे अपने समर्थकों को सक्रिय और आंदोलित रख सकें.
सड़क से शक्ति प्रदर्शन की तैयारी
शुक्रवार को यूनुस ने अपने समर्थकों की ओर रुख किया. विशेष रूप से कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों जमात-ए-इस्लामी और हिफाज़त-ए-इस्लाम की तरफ, जो मदरसों के बड़े छात्र समूहों और यहां तक कि ढाका के अंडरवर्ल्ड के अपराधियों को भी एकजुट करने की क्षमता रखते हैं. ठीक उसी समय सेना के कुछ कमांडरों द्वारा कथित रूप से पर्चे बांटे गए, जिनमें गैर-निर्वाचित अंतरिम सरकार पर तीखा हमला किया गया. इन पर्चों में आरोप लगाया गया कि यह सरकार पिछले वर्ष के लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों की भावना के साथ विश्वासघात कर रही है.
शाहबाग में आज ‘March for Yunus’
यूनुस समर्थकों ने शनिवार को ढाका के ऐतिहासिक शाहबाग चौराहे पर ‘March for Yunus’ नाम से एक विशाल जनसभा की घोषणा की है. समर्थकों की तरफ से पोस्टर लगाए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर नारे दिए जा रहे हैं. 'पांच साल तक यूनुस को सत्ता में रखा जाए', 'पहले सुधार, फिर चुनाव' जैसे नारे दिए जा रहे हैं.
ढाका में शाहबाग चर्चित विरोध स्थल रहा है. ये जगह कभी 1971 के युद्ध अपराधियों के खिलाफ जनक्रांति का केंद्र थी. आज उन्हीं कट्टरपंथी ताकतों जमात-ए-इस्लामी और हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम के द्वारा यूनुस के समर्थन में प्रदर्शन का मंच बन रही है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये संगठन यूनुस के चेहरे का इस्तेमाल कर बांग्लादेश को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की योजना बना रहे हैं. इसके लिए वे 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को समाप्त करने और ‘जुलाई डिक्लेरेशन’ के जरिए यूनुस को राष्ट्रपति बनाए रखने का प्रस्ताव दे सकते हैं.
एक्टिव हो गया यूनुस खेमा
डॉ. यूनुस के विशेष सलाहकार फैज़ तैयब ने फेसबुक पर लिखा, सेना को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए. यूनुस साहब को सुधारों को पूरा करने का मौका मिलना चाहिए. वहीं, सलाहकार परिषद की सदस्य सयैदा रिज़वाना ने कहा, हम सिर्फ चुनाव के लिए नहीं आए हैं. हम लोकतंत्र की बहाली और फासीवाद से न्याय के लिए आए हैं.
सेना के भीतर असंतोष?
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, सेना के भीतर निचले स्तर के अधिकारी सरकार से नाराज हैं. कुछ पर्चे और घोषणाएं सामने आईं, जिनमें कहा गया कि हम अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे कि हमारी सेना को एक गैर-निर्वाचित सरकार के लिए गाली दी जाए या जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए. एक पर्चे में लिखा था, अब और नहीं… सेना इस राष्ट्र की रक्षक है, किसी भी ऐसी जनविरोधी प्रतिशोध मुहिम को सहन नहीं करेगी, जो देश को टुकड़ों में बांट रही है और उसे अराजकता व अंधकार की ओर धकेल रही है.
पूर्व सेना प्रमुख इकबाल करीम भुइयां ने आगाह किया कि 2006 के जैसे हालात दोबारा न बनने दें. यानी जब सेना समर्थित सरकार चुनाव टालती रही थी और अंततः वैश्विक दबाव में चुनाव कराए गए थे.
'नया किम जोंग उन’ बनने की चाह?
यूनुस पर आरोप है कि वे बांग्लादेश को सिंगापुर जैसा बनाना चाहते हैं, लेकिन चुनाव के बिना. उनके आलोचक उन्हें ‘बिना भीगे नहाने वाला व्यक्ति’ कहते हैं. यानी वे सत्ता चाहते हैं, लेकिन जनता की अदालत से गुजरने को तैयार नहीं हैं. यूनुस के आलोचकों का कहना है कि वे बिना चुनाव जीते सत्ता में बने रहना चाहते हैं, ठीक जैसे उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन. जबकि समर्थक कहते हैं कि बांग्लादेश को सिंगापुर बनाने का सपना तभी पूरा होगा, जब यूनुस को निर्विरोध सत्ता में रहने दिया जाए. वहीं, पश्चिमी देशों का दोहरा रवैया भी उजागर होने लगा है. जो पहले हसीना को लोकतंत्र का हत्यारा कहते थे, वे अब एक गैर-निर्वाचित नेता को समर्थन दे रहे हैं.
मिलिट्री और सरकार के बीच टकराव क्यों?
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने यूनुस से मुलाकात कर दिसंबर में चुनाव कराने की मांग दोहराई और म्यांमार के रखाइन राज्य को लेकर प्रस्तावित 'मानवीय सहायता गलियारे' पर असहमति जताई. इसके बाद सेना प्रमुख ने अगले दिन अपने वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक भी बुलाई और बताया कि उन्हें कई रणनीतिक नीतिगत निर्णयों की जानकारी नहीं दी जा रही है, जबकि सेना मौजूदा संकट में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भूमिका निभा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, यूनुस ने कैबिनेट बैठक में यह संकेत दिया कि यदि उन्हें राजनीतिक दलों का समर्थन नहीं मिला तो वे इस्तीफा दे सकते हैं. हालांकि, उनके सहयोगियों ने उन्हें ऐसा करने से रोका.
जन आंदोलन के बाद सत्ता में आए थे यूनुस
पिछले वर्ष जुलाई में छात्र आंदोलन ‘Students Against Discrimination (SAD)’ के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था, जिसके चलते 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था. इसके तीन दिन बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता यूनुस को पेरिस से बुलाकर अंतरिम सरकार का मुखिया बनाया गया था. यूनुस की सरकार ने हाल ही में शेख हसीना की आवामी लीग को आतंकवाद-रोधी कानून के तहत भंग कर दिया और कई नेताओं को गिरफ्तार किया है. वहीं, विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने जल्द चुनाव कराने की मांग के साथ बड़ी रैली की है.
दूसरी ओर NCP चाहती है कि पहले यूनुस की सुधार योजनाएं लागू हों, फिर चुनाव हो. वहीं, BNP ने यूनुस कैबिनेट से छात्र प्रतिनिधियों को हटाने की मांग की है. इधर, जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने यूनुस से अपील की है कि वे सभी राजनीतिक दलों की एक बैठक बुलाकर मौजूदा संकट का हल निकालें.
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पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर ने शनिवार को बलूचिस्तान का दौरा किया। आतंकियों के साथ संघर्ष के दौरान 18 सैनिकों की मौत के बाद उन्होंने कहा कि देश को निशाना बनाने वाले देश के मित्र शत्रुओं का हम पता लगाकर रहेंगे। हम उनको बख्शेंगे नहीं।
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पिछले 24 घंटों में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए 18 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है, जबकि 23 आतंकवादी भी मारे गए हैं। इस बीच सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर ने बलूचिस्तान के क्वेटा का दौरा किया। सेना ने कहा कि अधिकारियों ने सेना प्रमुख मुनीर को बलूचिस्तान में मौजूदा सुरक्षा स्थिति के बारे में जानकारी दी। इस मौके पर सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर ने कहा कि जो लोग अपने विदेशी आकाओं के आतंकी प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। जिन्होंने शिकारी कुत्ते के साथ शिकार करने और खरगोश के साथ दौड़ने के दोहरे मापदंड की कला हासिल कर ली है। हम उनके बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। ये तथाकथित मित्र-शत्रु चाहे कुछ भी कर लें, वे हमारे गौरवशाली राष्ट्र और इसके सशस्त्र बलों से पराजित होंगे। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभूमि और उसके लोगों की रक्षा के लिए जब भी आवश्यकता होगी और वे जहां भी होंगे हम जवाबी कार्रवाई करेंगे और उनको ढूंढ निकालेंगे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) मुनीर ने आतंकवाद से लड़ने के लिए सेना, फ्रंटियर कोर और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बहादुर अधिकारियों और सैनिकों के साहस व दृढ़ संकल्प की भी सराहना की। उन्होंने बलूचिस्तान के लोगों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के लिए सेना के संकल्प को फिर से दोहराया। साथ ही क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने के प्रयासों में प्रांतीय सरकार को समर्थन देने की प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है बलूचिस्तान
बता दें कि बलूचिस्तान में बलूच चरमपंथियों द्वारा नियमित रूप से सुरक्षा बलों पर हमले किए जा रहे हैं। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन अन्य प्रांतों की तुलना में इसके पास अधिक संसाधन होने के बावजूद यह सबसे कम विकसित है।