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पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार का घुसपैठियों पर एक्शन शुरू हो गया है. पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट नीति का जमीनी असर दिखने लगा है. राज्य सरकार की सख्त प्रशासनिक कार्रवाई और विदेशी नागरिकों के लिए होल्डिंग सेंटर बनाए जाने की घोषणा के बाद, बंगाल के विभिन्न हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी प्रवासियों में भारी हड़कंप मच गया है. मंगलवार सुबह उत्तर 24 परगना के हाकिमपुर चेकपोस्ट और मालदा के सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों बांग्लादेशी पुरुष और महिलाएं वापस अपने देश लौटने के लिए सीमा पर जुटने लगे. दूसरी ओर, मालदा के इंग्लिश बाजार टाउन में राज्य का पहला होल्डिंग सेंटर पूरी तरह सक्रिय हो गया है, जहां कड़ी सुरक्षा और सीसीटीवी निगरानी के बीच संदिग्ध प्रवासियों को रखा जा रहा है।
बांग्लादेशी घुसपैठिया बॉर्डर पर जुटने लगे.
नए इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 के तहत पुलिस को बिना वारंट संदिग्धों को गिरफ्तार करने की खुली छूट दी गई है. हालांकि, सीएए के दायरे में आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को इस कार्रवाई से पूरी तरह बाहर रखा गया है, लेकिन अवैध रूप से रह रहे अन्य प्रवासियों के खिलाफ यह अभियान अब राजनीतिक बयानों से निकलकर कड़े प्रशासनिक एक्शन में बदल चुका है।
दरअसल, यह नजारा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का हालिया आदेश के बाद सामने आया है। 21 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को आदेश दिया कि कहीं भी कोई बांग्लादेशी घुसपैठी पकड़ा जाए, तो सीधा सीमा सुरक्षा दल (BSF) को सौंप दो। उन्होंने कहा कि अब इन्हें अदालत नहीं ले जाया जाएगा बल्कि सीधे वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा।
सीएम शुभेंदु अधिकारी ने यह आदेश पिछले साल अप्रैल में संसद में पारित आव्रजन और विदेशी अधिनियम 2025 के तहत दिया। इस कानून के तहत विदेशियों के भारत में प्रवेश, प्रवास और निकास को नियंत्रित किया जा सकता है। इस आदेश के बाद बंगाल सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘होल्डिंग सेंटर‘ बना रही है, जिसमें ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ के तहत देश से निकाला जाएगा।
इस फ्रेमवर्क के तहत, जिन लोगों पर अवैध रूप से देश में घुसने का शक है, उन्हें 30 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है. इस दौरान, जिला मजिस्ट्रेट और तय अधिकारी उनकी पहचान की जांच करते हैं, बायोमेट्रिक जानकारी इकट्ठा करते हैं, और उन्हें वापस भेजने से पहले उनका रिकॉर्ड सेंट्रल डेटाबेस में अपलोड करते हैं।
मालदा के एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने न्यूज एजेंसी PTI को बताया, “हिरासत केंद्र ने काम करना शुरू कर दिया है. अभी वहां नौ बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है. जरूरी जांच और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं. हिरासत में लिए गए लोगों के साथ तय कानूनी नियमों के मुताबिक ही बर्ताव किया जा रहा है।
इस नए कदम को 'इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट, 2025' से भी जोड़ा जा रहा है. इस एक्ट ने इमिग्रेशन और विदेशी नागरिकों से जुड़े कई पुराने कानूनों की जगह ले ली है।
इस कानून ने निगरानी, हिरासत और देश-निकले के लिए एक टेक्नोलॉजी-बेस्ड ढांचा पेश किया. इसके साथ ही, हेड कांस्टेबल या उससे ऊपर के रैंक वाले पुलिस अधिकारियों को संदिग्ध उल्लंघन पट्टियों को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार भी दिया।
डिपोर्टेशन पर पॉलिटिक्स
सियासी स्तर पर इन डेवलपमेंट्स ने बंगाल में घुसपैठ और सिटिजनशिप पर लंबे वक्त से चल रही बहस को और तेज कर दिया है. बीजेपी नेताओं ने इस ड्राइव का स्वागत किया है और दावा किया है कि राज्य गैर-कानूनी माइग्रेशन और एक्सट्रीमिस्ट नेटवर्क के लिए कमजोर हो गया है।
नॉर्थ मालदा से बीजेपी सांसद खगेन मुर्मू ने कहा, "हमारे देश और हमारे राज्य को सुरक्षा की जरूरत है. बंगाल रोहिंग्या, आतंकवादियों और 'जिहादी' एलिमेंट्स के लिए एक कॉरिडोर बन गया था। हालांकि, राज्य सरकार का कहना है कि सिटिजनशिप (अमेंडमेंट) एक्ट के तहत सुरक्षित कम्युनिटीज इस कार्रवाई के दायरे से बाहर रहेंगी।
केंद्र सरकार के बाद के एक छूट आदेश के तहत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी गई है, जो 31 दिसंबर, 2024 से पहले भारत में दाखिल हुए थे।
जैसे-जैसे सीमा चौकियों के पास भीड़ जमा होती जा रही है और होल्डिंग सेंटर कड़ी सुरक्षा के बीच काम करना शुरू कर रहे हैं, पश्चिम बंगाल का घुसपैठ-रोधी अभियान अब सख़्त कार्रवाई वाले चरण में पहुंचता दिख रहा है. आने वाले हफ्तों में और भी लोगों को हिरासत में लिए जाने, उनकी पहचान की जांच और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रियाएं शुरू होने की संभावना है।
सीएए के दायरे से बाहर के लोग सीधे होंगे गिरफ्तार
बंगाल में अवैध प्रवासियों को पकड़ने के लिए जिला स्तर पर होल्डिंग सेंटर स्थापित करने की घोषणा के बाद शुरू हुई है. सीमा पर मौजूद अधिकारियों के मुताबिक, पकड़े जाने और जेल जाने के डर से ये प्रवासी अब खुद ही अपनी पहचान उजागर कर वापस लौटने की गुहार लगा रहे हैं. इस पूरी कार्रवाई की नींव मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और सीमा सुरक्षा बल के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में रखी गई थी. मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम यानी सीएए (CAA) के दायरे से बाहर के सभी लोगों को अवैध घुसपैठिया माना जाएगा।
24 घंटे सीसीटीवी से निगरानी
केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए राज्य के गृह और पर्वतीय मामलों के विभाग की फॉरेनर्स ब्रांच ने जिलों में होल्डिंग सेंटर बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है. इस कड़ी में मालदा जिला पूरे राज्य में पहला ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां होल्डिंग सेंटर ने बकायदा काम करना शुरू कर दिया है. मालदा के इंग्लिश बाजार टाउन के चंदन पार्क में बनाए गए इस सेंटर में 24 घंटे की सीसीटीवी निगरानी रखी जा रही है. इसकी सुरक्षा में 12 सशस्त्र पुलिसकर्मियों सहित नागरिक सुरक्षा स्टाफ और सिविक वॉलंटियर्स को तैनात किया गया है।
क्या है इमिग्रेशन एक्ट 2025
इस पूरे अभियान को कानूनी तौर पर बेहद मजबूत और प्रभावी बनाने का काम नए ‘इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025’ ने किया है. इस नए कानून ने पुराने और जटिल अप्रवासी कानूनों की जगह ली है. इसके तहत पूरे तंत्र को पूरी तरह से टेक्नोलॉजी-ड्रिवन (तकनीक आधारित) बना दिया गया है, जिससे अवैध प्रवासियों की सर्विलांस बेहद आसान हो गई है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस कानून ने अब पुलिस के हेड कांस्टेबल रैंक और उससे ऊपर के अधिकारियों को यह विशेष शक्ति दे दी है कि वे बिना किसी वारंट के किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को सीधे गिरफ्तार कर सकते हैं।
जिहादी तत्वों और रोहिंग्याओं का कॉरिडोर बन गया था बंगाल
इस डिपोर्टेशन ड्राइव ने बंगाल की राजनीति में नागरिकता और घुसपैठ की पुरानी बहस को फिर से पूरी तरह सुलगा दिया है. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सरकार के इस कदम का पुरजोर स्वागत किया है. उत्तरी मालदा से भाजपा सांसद खगेन मुर्मू ने प्रशासनिक कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा, “हमारे देश और हमारे राज्य को आंतरिक सुरक्षा की सख्त जरूरत है. पूर्ववर्ती सरकार की ढिलाई के कारण बंगाल रोहिंग्याओं, आतंकवादियों और ‘जिहादी’ तत्वों के लिए एक सुरक्षित कॉरिडोर बन चुका था, जिसे अब पूरी तरह ध्वस्त किया जा रहा है।
हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार के विशेष छूट आदेश के अनुसार, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को इस कार्रवाई से डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वे सीएए के तहत सुरक्षित हैं. सीमा पर बढ़ती भीड़ और होल्डिंग सेंटरों की सक्रियता यह साफ संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में बंगाल की धरती पर अवैध प्रवासियों के खिलाफ यह धरपकड़ और जांच अभियान और भी ज्यादा आक्रामक होने जा रहा है।
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भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर घुसपैठ और तस्करी पर लगाम कसने के लिए अब एक अनोखी और चौंकाने वाली रणनीति पर विचार किया जा रहा है. अब यहां सीमावर्ती इलाकों पर पारंपरिक बाड़ और टेक्नोलॉजी के अलावा प्रकृति का खतरनाक हथियार इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है. खबर है कि सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ ने अपने फील्ड यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे नदी और दलदली इलाकों में सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के इस्तेमाल की संभावनाओं का अध्ययन करें।
भारत-बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा में करीब 175 किलोमीटर नदी और दलदली इलाका है, जहां बाढ़ और भौगोलिक स्थिति के कारण सामान्य बाड़ लगाना संभव नहीं होता. ऐसे में BSF अब प्रकृति को ही सुरक्षा का हथियार बनाने की सोच रही है. माना जा रहा है कि अगर यह योजना लागू होती है, तो घुसपैठियों के लिए सीमा पार करना पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों के बाद यह विचार सामने आया है. 26 मार्च को BSF मुख्यालय से भेजे गए एक आंतरिक संदेश में कहा गया है कि जिन नदी वाले इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां ‘प्राकृतिक अवरोध’ के तौर पर सांप और मगरमच्छ जैसे जीवों का उपयोग किया जा सकता है. हालांकि, फिलहाल यह योजना केवल चर्चा और व्यवहार्यता जांच के स्तर पर है, इसे लागू करने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
बीएसएफ के प्लान में कहां रुकावट?
इसी साल फरवरी में दिल्ली स्थित बीएसएफ मुख्यालय में हुई एक बैठक के बाद यह कम्युनिकेशन जारी किया गया. संदेश में सीमा चौकियों (BOPs) को ‘डार्क जोन’ (जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है) के रूप में चिन्हित करने और वहां रहने वाले गांववालों के खिलाफ दर्ज मामलों की रिपोर्ट मांगी गई है।
हालांकि द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, BSF के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अभी यह सिर्फ चर्चा का विषय है. ‘अभी तक सांप-मगरमच्छ तैनात करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है. सिर्फ संभावना तलाशने को कहा गया है. इसमें कई चुनौतियां हैं… सरीसृपों को कहां से लाया जाए, उनका रखरखाव कैसे हो और नदी किनारे रहने वाले स्थानीय लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा।
घुसपैठियों के लिए डर का माहौल
अगर यह योजना लागू हुई तो घुसपैठिए और तस्करों के लिए भारत में घुसने का ख्याल आते ही कांप उठना तय है. नदी के पानी में मगरमच्छ और घने जंगलों में जहरीले सांप है… यह सोचकर ही कोई भी गैरकानूनी तरीके से सीमा पार करने से पहले सौ बार सोचेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी वाले इलाकों में जहां फेंसिंग नहीं लग पाती, वहां प्राकृतिक बाधाएं काफी प्रभावी साबित हो सकती हैं. लेकिन साथ ही यह भी चिंता जताई जा रही है कि बाढ़ के समय ये सरीसृप दोनों तरफ के गांवों के लिए खतरा बन सकते हैं।
बॉर्डर पर फेंसिंग अभी भी अधूरी
संसदीय स्थायी समिति की 17 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश सीमा की कुल 4,096.7 किमी में से सिर्फ 2,954.56 किमी ही फेंसिंग हो पाई है. अभी भी 371 किमी फेंसिंग बाकी है. कठिन भौगोलिक स्थिति, नदियां, पहाड़ियां और स्थानीय विरोध के कारण फेंसिंग कार्य धीमा चल रहा है।
गृह मंत्रालय की 2024-25 वार्षिक रिपोर्ट भी मानती है कि नदी और निचले इलाकों में फेंसिंग लगाना चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में BSF अब टेक्नोलॉजी (ड्रोन, सेंसर, कैमरा) के साथ-साथ प्राकृतिक तरीकों पर भी विचार कर रही है।
BSF अधिकारी मानते हैं कि सांप और मगरमच्छ तैनात करना आसान नहीं होगा. इनकी खरीद, रखरखाव, प्रजनन और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा. साथ ही बाढ़ के मौसम में इनके गांवों में घुस आने का खतरा भी बना रहेगा. फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा के चरण में है. BSF पूर्वी कमांड को डार्क जोन की मैपिंग करने और रिपोर्ट देने को कहा गया है।
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