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AIIMS भोपाल देश का पहला ऐसा अस्पताल बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मरीजों और उनके परिजनों को खुद सही रास्ता बताएगा। रोजाना यहां 10 हजार से अधिक लोग इलाज, जांच और परामर्श के लिए आते हैं। बड़े और एक जैसे दिखने वाले भवनों के कारण लोगों को अक्सर सही विभाग ढूंढने में दिक्कत होती है। अब इस समस्या का समाधान AI आधारित नेविगेशन सिस्टम से किया जाएगा।
QR कोड स्कैन करते ही मिलेगा रास्ता
एम्स भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर संदेश जैन के अनुसार, परिसर में लगाए गए QR कोड को स्कैन करते ही मरीज को यह जानकारी मिल जाएगी कि कार्डियोलॉजी, अमृत फार्मेसी, न्यूरोसर्जरी, पैथोलॉजी, एमआरआई या डॉक्टर का कक्ष किस दिशा में है। यह सुविधा गूगल मैप की तरह काम करेगी और चरणबद्ध दिशा-निर्देश देगी।
एक जैसी बिल्डिंग, इसलिए AI का सहारा
एम्स का कैंपस काफी विस्तृत है और भवनों की आंतरिक बनावट लगभग एक जैसी है। अलग-अलग ब्लॉक होने के बावजूद रास्ते मिलते-जुलते हैं। ऐसे में पहली बार आने वाले मरीजों को ओपीडी, वार्ड, पैथोलॉजी या एमआरआई ढूंढने में काफी समय लग जाता है। बार-बार स्टाफ से पूछने की स्थिति बनती है, जिससे समय के साथ तनाव भी बढ़ता है। इसी परेशानी को खत्म करने के लिए AI तकनीक को अपनाया जा रहा है।
बिल्डिंग की डिजाइन ऐसी कि एआई का सहारा लेना पड़ा
भोपाल एम्स का परिसर काफी बड़ा है। अस्पताल भवनों की अंदरूनी बनावट एक जैसी है। अलग-अलग ब्लॉक हैं, लेकिन सब एक जैसे नजर आते हैं, रास्ते भी एक जैसे हैं। ऐसे में बार-बार आने पर भी मरीजों और उनके परिजन को सही विभाग तक पहुंचने में परेशानी होती है।
वहीं, पहली बार आने वाले मरीजों का पैथोलॉजी, एमआरआई, ओपीडी या वार्ड ढूंढ़ने में ही काफी समय लग जाता है। बार-बार स्टाफ या सुरक्षाकर्मियों से रास्ता पूछना पड़ता है।
इससे न केवल समय बर्बाद होता है, बल्कि मरीज और परिजन तनाव भी महसूस करते हैं। इसलिए अब इस समस्या को दूर करने के लिए एआई का सहारा लिया जा रहा है।
एआई आधारित नेविगेशन सिस्टम बना रहे
इसी समस्या को दूर करने के लिए एम्स भोपाल ने आईआईटी इंदौर की दृष्टि टीम के साथ मिलकर स्मार्ट मार्गदर्शन प्रणाली विकसित करने की पहल की है। भोपाल के एक स्टार्टअप की मदद से एआई आधारित नेविगेशन सिस्टम तैयार किया जा रहा है।
यह सिस्टम गूगल मैप की तरह काम करेगा। एम्स के मोबाइल एप या परिसर में लगाए गए क्यूआर कोड को स्कैन करने के बाद व्यक्ति जिस स्थान पर जाना चाहता है, उसे सर्च करेगा। इसके बाद एआई उसे चरणबद्ध तरीके से सही रास्ता दिखाएगा।
क्यूआर कोड और मोबाइल ऐप से मिलेगा रास्ता
इस प्रणाली के दो स्वरूप होंगे। पहला वेब आधारित होगा। एम्स के मुख्य प्रवेश द्वार और प्रमुख स्थानों पर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे। जैसे ही कोई व्यक्ति क्यूआर कोड स्कैन करेगा, उसके मोबाइल पर इंटरैक्टिव मैप खुल जाएगा।
दूसरा स्वरूप मोबाइल ऐप आधारित होगा। यूजर ऐप डाउनलोड कर सीधे नेविगेशन का लाभ ले सकेंगे। भवनों के बीच पहुंचने के लिए जीपीएस तकनीक का उपयोग होगा।
भवनों के अंदर, जहां जीपीएस की सटीकता कम हो जाती है, वहां हर 15 मीटर पर रिले सिस्टम लगाए जाएंगे। ये उपकरण मोबाइल को सटीक दिशा-निर्देशन देंगे, जिससे व्यक्ति बिना भटके सही जगह पहुंच सकेगा।
एक माह का पायलट, फिर पूरे परिसर में लागू
इस प्रोजेक्ट को शुरुआत में एक माह के पायलट की तरह लागू किया जाएगा। इस दौरान यह देखा जाएगा कि सिस्टम कितना प्रभावी है और लोगों को कितना फायदा हो रहा है। यदि रिजल्ट संतोषजनक रहे तो इसे पूरे परिसर में लागू किया जाएगा। इससे मरीजों का समय बचेगा, भीड़ का दबाव कम होगा और स्टाफ पर रास्ता बताने का अतिरिक्त बोझ भी घटेगा।
IIT इंदौर के सहयोग से विकसित होगा सिस्टम
इस परियोजना को विकसित करने के लिए एम्स भोपाल ने Indian Institute of Technology Indore की दृष्टि टीम और भोपाल के एक स्टार्टअप के साथ साझेदारी की है। AI आधारित यह स्मार्ट मार्गदर्शन प्रणाली मोबाइल ऐप और वेब दोनों प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी।
दो तरीकों से काम करेगा नेविगेशन
वेब आधारित सिस्टम: मुख्य प्रवेश द्वार और प्रमुख स्थानों पर QR कोड लगाए जाएंगे। स्कैन करते ही मोबाइल पर इंटरैक्टिव मैप खुल जाएगा।
मोबाइल ऐप से मिलेगा सटीक दिशा-निर्देशन
दूसरा स्वरूप मोबाइल ऐप आधारित होगा। भवनों के बीच जाने के लिए जीपीएस तकनीक का उपयोग किया जाएगा। वहीं भवनों के अंदर, जहां जीपीएस कमजोर होता है, वहां लगभग हर 15 मीटर पर रिले उपकरण लगाए जाएंगे। इससे दिशा-निर्देशन और अधिक सटीक होगा।
पहले पायलट, फिर पूरे परिसर में लागू
एम्स प्रवक्ता डॉ. केतन मेहरा ने कहा कि आइआइटी इंदौर के साथ मिलकर सिस्टम को विकसित कर रहा है। इसे अप्रेल के अंत में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा। बुजुर्गों, दिव्यांगों और गंभीर मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। सबसे अहम बात, बड़े अस्पताल को लेकर जो झिझक होती है, वह कम होगी।
मोबाइल ऐप आधारित सिस्टम: यूजर ऐप डाउनलोड कर सीधे नेविगेशन सुविधा का उपयोग कर सकेंगे।
भवनों के बीच दिशा बताने के लिए GPS तकनीक का उपयोग किया जाएगा। वहीं, भवनों के अंदर जहां GPS की सटीकता कम होती है, वहां हर 15 मीटर पर रिले सिस्टम लगाए जाएंगे, जो सटीक दिशा-निर्देशन सुनिश्चित करेंगे।
AIIMS भोपाल में बेड क्षमता-
जनरल वार्ड एवं एचडीयू – 816 बेड
आईसीयू वार्ड – 128 बेड
प्राइवेट वार्ड – 34 बेड
इमरजेंसी वार्ड – 56 बेड
डे-केयर वार्ड – 268 बेड
डे-केयर सर्विस वार्ड – 87 बेड
यह पहल न केवल समय की बचत करेगी, बल्कि मरीजों और उनके परिजनों के तनाव को भी कम करेगी, जिससे अस्पताल सेवाएं और अधिक सुगम बन सकेंगी।
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कैंसर अस्पताल और ट्रामा सेंटर का निर्माण
सांसद शर्मा ने बताया कि एम्स में 200 बेड का अत्याधुनिक अपेक्स आन्कोलॉजी सेंटर (कैंसर अस्पताल) बनाया जाएगा। आंकड़ों के अनुसार, एम्स भोपाल में हर साल 36 हजार से ज्यादा कैंसर मरीज आते हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत मरीज भोपाल के बाहर के जिलों जैसे आगर मालवा, रायसेन और विदिशा से होते हैं। इसके साथ ही एम्स दिल्ली के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा 'लेवल-1 अपेक्स ट्रामा सेंटर' भी भोपाल में तैयार होगा। 150 बेड वाले इस सेंटर के पहले चरण के लिए 295 करोड़ रुपये का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा गया है।
रोबोटिक सर्जरी और हाई-टेक सुविधाएं
एम्स भोपाल का यूरोलॉजी विभाग अब दुनिया की सबसे उन्नत 'द विंची रोबोट 4.0' प्रणाली से लैस होगा। लगभग 30 करोड़ की लागत वाले इस सिस्टम के लगने के बाद एम्स भोपाल सेंट्रल इंडिया का पहला सरकारी संस्थान बनेगा, जहां रोबोटिक तकनीक से प्रोस्टेट कैंसर और किडनी ट्यूमर जैसे जटिल ऑपरेशन न्यूनतम चीर-फाड़ के साथ हो सकेंगे। इसके अलावा वर्चुअल ऑटोप्सी और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाओं के विस्तार पर भी प्रेजेंटेशन दिया गया।
मरीजों की बढ़ती संख्या और बजट की उम्मीद
बता दें कि एम्स में मरीजों का भार तेजी से बढ़ रहा है। साल 2022 में जहां 36 हजार मरीज आए थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 85 हजार से अधिक हो गई है। बैठक में एम्स निदेशक डॉ. माधवानंद कर और डिप्टी डायरेक्टर संदेश जैन सहित मंत्रालय के आला अधिकारी मौजूद रहे। इन प्रोजेक्ट्स के लिए बजट जल्द ही स्वीकृत हो जाएगा, जिससे मध्य प्रदेश सहित पूरे मध्य भारत के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज मिल सकेगा।
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घाव भरने और पारदर्शिता बनाए रखने में करती है मदद
एम्स भोपाल के सर्जन डॉक्टर समेंद्र खुरकुर ने बताया कि "नवजात शिशुओं के जन्म के बाद उनके गर्भनाल को पहले फेंक दिया जाता था, लेकिन अब यही आंखों की गंभीर समस्याओं में दवाई का काम कर रही है. गर्भनाल की जीवित झिल्ली घाव भरने में मदद करती है. इसके साथ ही आंखों की पारदर्शिता बनाए रखने में भी मदद करती है. वहीं निजी अस्पतालों में जहां इस तरह के इलाज में 40 से 50 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. भोपाल एम्स में आयुषमान कार्डधारकों का यह इलाज निशुल्क किया जा रहा है. जबकि जिनके पास आयुष्मान कार्ड नहीं है, उनसे भी केवल 250 रुपए लिए जा रहे हैं.
मरीजों की आंखों का 80 प्रतिशत विजन लौटा
डॉक्टर समेंद्र खुरकुर ने बताया किए मनियोटिक मेम्ब्रेन तकनीकी ऐसे लोगों के लिए कारगर है, जिनकी आंखें केमिकल के पटाखों से खराब हुई है. उनके कार्नियल अल्सर या संक्रमण की स्थिति में और एलर्जिक सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों के इलाज में बेहतर रिजल्ट मिलता है. इसके साथ ही इसका इस्तेमाल ट्रामा या सर्जरी के बाद ऊतकों की बेहतर रिकवरी के लिए भी किया जाता है. उन्होंने बताया कि एम्स भोपाल में जिन मरीजों का इलाज चल रहा है, उनका विजन 80 प्रतिशत से अधिक लौट चुका है. इनमें अधिकतर मरीजों की आंखें कार्बाइड गन से डैमेज हुई थी.
इस तरह किया जाता है एमनियोटिक मेम्ब्रेन से इलाज
आंखो में चोट, इंफेक्शन या पटाखों से आंखों की ऊपरी सतह झुलसने पर यदि दवाइयों से घाव ठीक नहीं होते तो एमनियोटिक मेम्ब्रेन ग्राफ्टिंग की जाती है. सबसे पहले डिलेवरी के बाद नवजात शिशु को इससे अलग किया जाता है. फिर इसे स्टरलाइज करने के बाद नार्मल स्लाइन से साफ किया जाता है. इसके बाद इसे एंटीबायोटिक या बीटाडीन सॉल्यूशन से साफ किया जाता है. इसके बाद आंखों के क्षतिग्रस्त हिस्से को साफ कर टांकों के माध्यम से इसकी ग्राफ्टिंग की जाती है. इससे घाव जल्द भरते हैं और मरीज की रिकवरी जल्दी होती है.
जानिए क्या होता है एमनियोटिक मेम्ब्रेन
एमनियोटिक मेम्ब्रेन एक पतली और मजबूत झिल्ली होती है, जो गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को घेरे रहती है. विशेष रूप से, यह एमिनियोटिक थैली की आंतरिक या भीतरी परत होती है, जो भ्रूण को धारण करने वाला आवरण होती है. एमनियोटिक थैली में एमनियोटिक द्रव और एक बाहरी परत भी होती है, जिसे कोरियोन कहा जाता है. ये संरचनाएं मिलकर भ्रूण के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण बनाती हैं, ताकि वह बढ़ सके और विकसित हो सके.
]]>एम्स के उपसंचालक संदेश जैन ने नवभारत टाइम्स डॉट कॉम को बताया कि यह सुविधा कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत प्रारंभ की जाएगी। नवंबर से रोगियों को इस सुविधा का लाभ मिलने की उम्मीद है। एम्स में आएगी ये 6 अत्याधुनिक मशीनें
बाई प्लेन कार्डियक कैथलैब
यह एक नई लैब है जो एक साथ दो अलग-अलग एंगल से एक्सरे वाली इमेज देती है। इस रिपोर्ट को देखकर डॉक्टर हार्ट और धमनियों का दो तरह का दृश्य देख सकता है। बच्चों में जन्मजात हृदय रोग जटिल ब्लॉकेज, वाल्व रिपेयर, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों के बारे में आसानी से जानकारी लग पाती है।
होल्टर मशीन
इस मशीन के द्वारा लगातार 24 से 48 घंटे तक हार्टबीट को रिकॉर्ड किया जाता है। इससे हार्ट की धड़कन में अनियमितता जैसी समस्याओं का पता चल जाता है। वर्तमान में इस जांच में मरीजों को दो महीने तक इंतजार करना पड़ता है।
आधुनिक ट्रेडमिल एक्सरसाइज मशीन
यह मशीन हार्ट और फेफड़ों की क्षमता की जांच करती है। जब किसी रोगी का हार्ट सर्जरी होती है तो उसकी रिकवरी का आकलन किया जाता है। अभी इस जांच के लिए करीब 3 से 4 महीने इंतजार करना पड़ता है।
ट्रांस ईसोफेगल इकोकार्डियोग्राफी मशीन
इस मशीन के द्वारा हृदय की 2D, 3D और 4D तस्वीर निकाल कर आती हैं। जन्मजात हृदय दोष, हार्ट वाल्व ऑपरेशन के लिए यह बेहद कारगर है।
ऑप्टिकल कोहरेंस टोमोग्राफी
इस तंत्र के द्वारा धमनियों का 3D दृश्य मिलता है। रक्त का प्रवाह को मापा जाता है। दवा देने के दौरान मरीज को इसका असर होगा या नहीं? इस जांच में आसानी होती है।
इंट्रावैस्कुलर अल्ट्रासाउंड तंत्र
इस तंत्र के द्वारा धमनियों के अंदर की बहुत ही हाई डेफिनेशन वाली फोटो मिल जाती है। इससे ब्लॉकेज का सही आकलन किया जा सकता है। इस मशीन के द्वारा डॉक्टर अनुमान लगाते हैं कि क्या स्टंट के द्वारा इलाज संभव है या दवा देने जरूरत है।
मरीजों की लंबी कतार
आपको बता दें कि वर्तमान में भोपाल एम्स में दो कैथलैब हैं। लेकिन यहां मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई बार हार्ट अटैक के पेशेंट को तुरंत इलाज नहीं मिल पाता। 22 करोड़ से मिलने वाली 6 मशीन से मरीज का इंतजार खत्म होगा।वर्तमान में एम्स भोपाल में हर दिन करीब 200 से 300 एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और पेसमेकर जैसी इलाज होते हैं।
मशीनों की कमी के चलते मरीजों को इको और कैथलैब प्रोसीजर के लिए ढाई से तीन माह तक इंतजार करना पड़ता है। नई कैथ लैब और मशीनों के जुड़ने से वेटिंग टाइम लगभग आधा रह जाएगा। इसके साथ ही हमीदिया में भी नई कैथलेब शुरू होने दिल के रोगियों को काफी मदद मिलेगी
]]>पहले टेस्ट रिपोर्ट आने में 3 दिन का लगता था समय
बता दें कि ऑटोप्सी के दौरान पहले कल्चर रिपोर्ट आने में 3 से 4 दिन का समय लगता था, लेकिन अब प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट से 15 से 20 मिनट में डॉक्टर मरीज के शरीर में संक्रमण का पता लगा सकेंगे. इस शोध को अमेरिका के बाल्टीमोर में हाल में ही आयोजित 77वें अमेरिकन एकेडमी ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया. इस शोध के जरिए जो टूल बनाया गया है, उससे मरीज के शरीर में संक्रमण के स्तर का पता बहुत ही कम समय में लगाया जा सकता है.
एम्स भोपाल में पारिसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग की हेड डॉ. अरनीत अरोरा ने बताया कि "पॉइंट ऑफ केयर टूल मरीजों के इलाज में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. इस शोध में ऑटोप्सी के दौरान सेप्सिस का पता लगाने के लिए प्रोकैल्सिटोनिन (पीसीटी) बायोमार्कर का उपयोग किया गया है.
यह टूल 15 से 30 मिनट में बता देता है संक्रमण
बता दें कि यह टूल एक सरल विधि पर कार्य करता है, इसके लिए पोस्टमार्टम के दौरान मृतक के शरीर से केवल एक बूंद खून और अंग का नमूना लिया जाता है. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट के जरिए 10 से 15 मिनट में परिणाम मिल जाते हैं. इसकी ग्रेडिंग होती है. जो 05 से 50 के पार तक होती है. यदि अंक 10 से ऊपर हैं, तो यह संकेत देता है कि मृतक के शरीर में संक्रमण का स्तर बहुत अधिक था. यह टेस्ट मरीज के जीवित रहते भी किया जा सकता है, जैसे कल्बर टेस्ट. यह 15 से 30 मिनट में बता देता है कि शरीर में संक्रमण किस स्तर तक फैल चुका है, इससे पहले कल्बर टेस्ट (जिसकी रिपोर्ट दिन में आती है) पर ही निर्भर रहना पड़ता था.
भारत में अभी केवल एम्स भोपाल में हुआ शोध
दरअसल, कल्चर टेस्ट की रिपोर्ट में 3 दिन लगते थे, जिससे इलाज में देरी होती थी. बॉयोकेमिस्ट्री की मशीनों से प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट में 3 घंटे लगते थे, जो ऑटोप्सी के लिए उपयुक्त नहीं था. भारत में अभी यह शोध केवल एम्स भोपाल में हुआ है. विदेशों में जर्मनी और फ्रांस जैसे कुछ देशों में ही सीमित संस्थान इसका उपयोग करते हैं. देश में ऐसी तकनीक अभी व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है.
बैक्टीरिया, वायरस के संक्रमण से शुरू होता है सेप्सिस
यह टूल मरीजों को तुरंत सही इलाज दिलाने में मदद करेगा. सेप्सिस की जल्द पहचान से जान बचाने की संभावना बढ़ेगी. अस्पताल में भर्ती मरीजों का समय पर यह टेस्ट हो गया तो, संक्रमण के स्तर का पता लगाकर जरूरी दवाएं समय पर देकर उसकी जान बचाई जा सकती है. सेप्सिस एक जानलेवा स्थिति है, जो शरीर में बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होने वाले गंभीर संक्रमण से शुरू होती है.
यह तब होता है, जब शरीर का इम्यून सिस्टम संक्रमण से लड़ते हुए खुद के ऊतकों और अंगों को नुकसान पहुंचाने लगता है. यह आमतौर पर फेफड़े, मूत्र मार्ग या पेट के रास्ते से शुरू हो सकता है. यदि समय पर इलाज न हो तो यह मल्टी-ऑर्गन फेलियर होने से मौत का कारण बन सकता है.
अभी 1000 से 1300 रुपये में होती हैं जांच
एम्स भोपाल के डायरेक्टर प्रो. अजय सिंह ने बताया कि "अभी तक डॉक्टरों को यह पता नहीं चल पाता था कि मरीज में संक्रमण कितना गंभीर है. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट से नंबर के आधार पर तुरंत स्थिति स्पष्ट हो जाती है, जिससे सही समय पर सटीक इलाज शुरू हो सकता है. यह चिकित्सा क्षेत्र में तेज और प्रभावी निदान को दिशा में इनोवेशन ला सकता है. अभी तक 100 केस पर टेस्ट किए गए हैं, 300 और केस के बाद निष्कर्ष निकाले जाएंगे. यह टूल सेप्सिस की त्वरित पहचान कर इलाज को आसान बनाएगा. इसकी लागत करीब 1000 रुपए से 1300 तक प्रति टेस्ट है."
]]>भोपाल AIIMS और पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ट्रस्ट के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता (MOU) पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते का उद्देश्य आयुर्वेद, चिकित्सा अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है. दोनों संस्थाएं संयुक्त रूप से फैटी लीवर डिजीज और एलर्जी जैसी बीमारियों पर क्लिनिकल रिसर्च करेंगी.
पतंजलि की ओर से अनुराग वार्ष्णेय और एम्स की ओर से प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार ने संयुक्त रूप से बताया, यह एक सकारात्मक पहल है, जो भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को वैज्ञानिक रूप से स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम है. रिसर्च ईएमसीआर के मानकों के अनुरूप होगी. सेफ्टी प्रोटोकॉल के तहत एक इंडीपेंडेंट मॉनिटरिंग बॉडी बनाई जाएगी. रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों का बीमा कराया जाएगा. सभी नैतिक मानकों का पालन होगा.
अब भोपाल के एम्स अस्पताल में सिर्फ एलोपैथी का इलाज ही नहीं, बल्कि हमारी पुरानी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का खजाना भी मिलेगा। एम्स भोपाल और बाबा रामदेव की पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन मिलकर प्रदेश का सबसे बड़ा हर्बल गार्डन बनाने जा रहे हैं।
एम्स के निदेशक डॉ. अजय सिंह ने बताया कि यह हर्बल गार्डन कोई साधारण बगीचा नहीं होगा। इसमें सिर्फ मध्य प्रदेश के ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों और पूरे देश में मिलने वाले उन खास औषधीय पौधों को लगाया जाएगा जो शायद आपने पहले कभी न देखे हों। एम्स का मानना है कि इन पौधों में कई बीमारियों को ठीक करने की ताकत है, जिनके बारे में हम भूलते जा रहे हैं।
मध्य प्रदेश की 'रिच ट्राइबल मेडिसिन' ढूंढ़कर निकालेंगे डॉ. सिंह के अनुसार प्रदेश में कई ऐसे इलाके हैं जहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय रहते हैं। ये समुदाय सदियों से जंगलों और प्रकृति के करीब रहे हैं। इन समुदायों के पास पेड़-पौधों, जड़ों, पत्तियों और छालों से बीमारियों का इलाज करने का बहुत पुराना और गहरा ज्ञान होता है। यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चलता रहता है। इसे 'समृद्ध' इसलिए कहा गया है क्योंकि इस ज्ञान में कई ऐसी जड़ी-बूटियां और उनके इस्तेमाल के तरीके शामिल हैं जिनके बारे में आधुनिक विज्ञान अभी भी पूरी तरह नहीं जानता।
एम्स और पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन की टीमें ऐसे ट्राइबल वैद्य, हकीम या बुजुर्गों से मिलेंगे, जो इस पारंपरिक ज्ञान को जानते हैं। उनकी मदद से पौधों की पहचान करेंगे। जो जड़ी-बूटियां खोजी जाएंगी, उन पर एम्स में वैज्ञानिक रिसर्च की जाएगी। इससे पता चलेगा कि वे कितनी असरदार हैं, उनमें कौन से रासायनिक तत्व हैं। अगर ये पारंपरिक औषधियां वैज्ञानिक रूप से प्रभावी साबित होती हैं, तो उनसे नई, सस्ती और असरदार दवाएं बनाई जा सकेंगी। इससे आम लोगों को कम खर्च में बेहतर इलाज मिल पाएगा।
ये गठबंधन चिंताजनक…
हालांकि, इस समझौते को लेकर राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया है. कांग्रेस पार्टी ने पतंजलि की विश्वसनीयता और उसके उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए MOU की आलोचना की है. कांग्रेस प्रवक्ता भूपेन्द्र गुप्ता ने कहा, सुप्रीम कोर्ट पहले ही पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों पर सख्त टिप्पणी कर चुका है और कंपनी अदालत में तीन बार माफी मांग चुकी है. ऐसे में उसके साथ सरकारी चिकित्सा संस्थान का गठबंधन चिंताजनक है.
देना होगा पूरा मुआवजा..
कांग्रेस का यह भी कहना है कि जिन मरीजों पर यह ट्रायल किया जाएगा, उनकी सुरक्षा की गारंटी एम्स और पतंजलि दोनों को देनी चाहिए. पार्टी ने आशंका जताई कि कहीं गरीब मजदूरों और आम लोगों पर परीक्षण कर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो. साथ ही यह मांग भी उठाई कि यदि किसी मरीज को नुकसान होता है तो उसका पूरा मुआवजा पतंजलि और एम्स मिलकर दें.
तीन चरणों में बनेगा यह गार्डन:
पहला चरण: आसानी से उगने वाले पौधे: शुरुआत में उन औषधीय पौधों को लगाया जाएगा जिन्हें उगाने के लिए किसी खास इंतजाम (जैसे एसी या खास मिट्टी) की जरूरत नहीं होती। ये पौधे भोपाल के मौसम में आसानी से उग सकेंगे।
दूसरा चरण: मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों की खोज: यह चरण सबसे ज्यादा दिलचस्प होगा। एम्स की टीम मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में जाएगी, जहां आज भी लोग इलाज के लिए अपनी पुरानी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं। इन छुपी हुई औषधियों को तलाशा जाएगा, उनकी पहचान की जाएगी और फिर उन्हें एम्स के हर्बल गार्डन में लगाया जाएगा ताकि उन पर रिसर्च की जा सके। यह हमारी अपनी पारंपरिक दवाओं को दोबारा सामने लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।
तीसरा चरण: पहाड़ और देश-विदेश के खास पौधे: आखिरी चरण में उत्तराखंड में मिलने वाले कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण औषधीय पौधों को लगाया जाएगा। इसके साथ ही, देश भर से कुछ 'एग्जॉटिक' यानी दुर्लभ और खास जड़ी-बूटियों को भी लाया जाएगा। चूंकि इन पौधों को भोपाल के मौसम में जिंदा रखना मुश्किल हो सकता है, इसलिए इन्हें खास 'आर्टिफिशियल सेटअप' (नकली वातावरण) में रखा जाएगा। जिससे वो बिना समस्या के पनप सकें।
पुराने ज्ञान को नए विज्ञान से जोड़ना इस पूरे प्रोजेक्ट का मकसद सिर्फ एक सुंदर बगीचा बनाना नहीं है। यह न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020 के तहत भी आता है, जिसमें कहा गया है कि मेडिकल की पढ़ाई में हर तरह के इलाज (जैसे एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी) को जोड़कर देखा जाना चाहिए। यानी, मरीजों को सिर्फ एक तरह का इलाज नहीं, बल्कि सबसे बेहतर, सस्ता और असरदार इलाज मिले। चाहे वह किसी भी चिकित्सा पद्धति से क्यों न हो। इसे मॉडर्न साइंस में 'इंटिग्रेटेड मेडिसिन' नाम दिया गया है।
इलाज के साथ-साथ अब होगी रिसर्च भी यह हर्बल गार्डन बनने से दो बड़े फायदे होंगे। पहला, अस्पताल में ही आयुष विभाग के मरीजों के इलाज के लिए औषधीय जड़ी-बूटियां उपलब्ध हो सकेंगी। दूसरा, एम्स में मेडिकल के छात्र इन पौधों पर गहराई से रिसर्च कर सकेंगे। डॉ. सिंह ने बताया कि अभी तक छात्र सिर्फ किताबों में ही इन पौधों के बारे में पढ़ते थे, लेकिन अब वे इन्हें अपनी आंखों से देख सकेंगे, छू सकेंगे और इनके गुणों को समझ सकेंगे। इनपर जांच भी कर सकेंगे।
पांच खास हिस्सों में बंटेगा गार्डन:
ह्यूमन हेल्थ हर्बल गार्डन: इसमें वे पौधे होंगे जो सीधे इंसानों की बीमारियों के इलाज में काम आते हैं।
रसायन वन: यह रिसर्च के लिए होगा, जहां पौधों के रासायनिक गुणों का अध्ययन किया जाएगा।
दुर्लभ एवं लुप्तप्राय औषधि वन: इसमें वे पौधे लगाए जाएंगे जो अब मुश्किल से मिलते हैं या खत्म होने की कगार पर हैं, ताकि उन्हें बचाया जा सके।
नवग्रह वाटिका: यह ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार नौ ग्रहों से संबंधित पौधों का समूह होगा।
अमृता वन: यह एक ऐसा हिस्सा होगा जहां जीवनदायिनी माने जाने वाले पौधों को लगाया जाएगा।
यह पौधे लगाने की योजना
गुडुची (गिलोय)
यष्ठिमधु (मुलेठी)
कुष्ठ
सारिवा
मदनफल
त्रिवृत
जीमूलक
कम्पिल्लक
विडगं
जटामांसी
गुग्गुलु
वासा
रास्ना
शल्लकी
पिप्पली
चित्रक
कालमेघ
पुनर्नवा
पर्पट
जीवक
मेषश्रृंगी
ब्राह्मी
आमलकी (आंवला)
बिल्व (बेल)
बला
गम्भारी
कुटज
शटी
अग्नि मंथ
पारस पीपल
एलोवेरा (घृतकुमारी)
दमबेल
पथरचट्टा
सतावरी
पान
अडूसा
जाम पत
यह इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी ने बाल किडनी रोग देखभाल में 2018 से 2024 तक कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी के साथ सफल साझेदारी के लिए दिया है। जिसे एस भोपाल की ओर से डॉ. गिरीश भट्ट ने विश्व नेफ्रोलॉजी कांग्रेस 2025 में प्राप्त किया।
यह इसलिए है अहम पुरस्कार
पुरस्कार डॉ. रॉबर्ट डब्ल्यू श्रियर के नाम पर दिया जाता है, जो गुर्दा शोध और वैश्विक नेफ्रोलॉजी शिक्षा में उत्कृष्ट योगदान के लिए जाने जाते हैं। यह समान उन संस्थानों को दिया जाता है। एस भोपाल अब विश्व के उन 57 आइएसएन सिस्टर रीनल सेंटर में से एक है, जिन्हें यह मान्यता मिली है।
आइएसएन क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में मिली मान्यता से एस की प्रतिष्ठा को बढ़ाएगी। भारत और अन्य देशों में विभिन्न चिकित्सा केंद्रों को सहयोग प्रदान करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।- डॉ. अजय सिंह, निदेशक, एम्स
एक साल में हुए 1000 डायलिसिस
सत्र बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शिखा मलिक ने बताया कि डायलिसिस यूनिट ने पिछले साल एक हजार से अधिक डायलिसिस सत्र और 150 प्लाज्मा एक्सचेंज सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। इससे इन बच्चों की जान बचाई गई है। बाल किडनी रोग देखभाल को और बेहतर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाल नेफ्रोलॉजी संघ फैलोशिप और बाल रोग नेफ्रोलॉजी में डीएम कार्यक्रम शुरू किए हैं।
जीवन में उजाला बने डॉक्टर
एम्स के डॉक्टर्स उसके जीवन में उम्मीद का उजाला बनकर सामने आए। डॉक्टर्स के अनुसार यह एक दुलर्भ किस्म की बीमारी होती है, जो बहुत कम लोगों में ही होती है। युवक इसी बीमारी से पीड़ित था। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों 18 वर्षीय युवक थकान और सांस फूलने की शिकायत के साथ एम्स भोपाल के कार्डियोलॉजी ओपीडी में पहुंचा था। उसने पहले बाहर कुछ अस्पतालों में परामर्श लिया था, जहां माइट्रल वाल्व में लीकेज पाया गया था और उसे वाल्व बदलने के लिए सर्जरी की सलाह दी गई थी।
उम्मीद लेकर एम्स पहुंचा था युवक
वही युवक जब एम्स पहुंचा तो यहां पर वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. भूषण शाह ने ईकोकार्डियोग्राम (ईसीएचओ) से मरीज की गहन जांच की। जांच में रूमेटिक हृदय रोग, संक्रमण (इंफेक्टिव एंडोकार्डाइटिस), संयोजी ऊतक विकार या वाल्व की जन्मजात असामान्यताओं जैसे कोई लक्षण नहीं पाए गए। इसके बाद, 3D ट्रांसइसोफेगल इकोकार्डियोग्राफी (TEE) के माध्यम से माइट्रल वाल्व की संरचना की मैपिंग की गई और यह पता चला कि लीकेज वाल्व के बाहरी हिस्से से हो रहा था, जो एक दुर्लभ स्थिति है और सामान्यतः इसका इलाज सर्जरी से किया जाता है।
बिना दिल खोले सर्जरी
हालांकि, मरीज की कम उम्र को ध्यान में रखते हुए, डॉ. भूषण शाह ने बिना सर्जरी के लीकेज बंद करने का निर्णय लिया। उन्होंने निटिनॉल डिवाइस का उपयोग कर इस दुर्लभ स्थिति का इलाज किया।
एनेस्थीसिया एक्सपर्ट के साथ मिलकर किया काम
इस न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रिया के द्वारा डॉ. भूषण शाह और डॉ. आशीष जैन ने एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. हरेश कुमार और उनकी टीम के साथ मिलकर 3D TEE की सहायता से माइट्रल वाल्व परफोरेशन को ट्रांसकैथेटर विधि से सफलतापूर्वक बंद कर दिया। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) अजय सिंह ने बताया कि यह प्रक्रिया हमारे कार्डियक टीम की विशेषज्ञता और समर्पण का प्रमाण है।
भारत में दूसरी बार हुई ऐसी सर्जरी
डॉक्टर अजय सिंह ने बताया कि यह भारत में दूसरी बार है जब ऐसी प्रक्रिया की गई है। यह एम्स भोपाल की जटिल परिस्थितियों के लिए उन्नत उपचार प्रदान करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। खुली हृदय सर्जरी से बचाकर, हमने इस युवा मरीज के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया है। मरीज को अगले ही दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
]]>बता दें कि कोलकाता में हुई घटना के बाद पूरे देशभर के डॉक्टर पीड़िता को न्याय दिलाने और सुरक्षा की मांगों को लेकर हड़ताल पर थे। हालांकि प्रदेश के जूनियर डॉक्टरों ने हाई कोर्ट के आदेश के बाद अपनी हड़ताल वापस ले ली है, लेकिन एम्स के रेजिडेंट डाक्टर अभी भी अपनी मांगों को लेकर अडिग हैं और लगातार हड़ताल कर रहे हैं। इसमें एम्स प्रबंधन ने उनकी कुछ मांगों को पूरा कर दिया है।
परिसर में लगेंगे अलार्म
एम्स भोपाल परिसर में ऐसे क्षेत्रों को भी चिह्नित किया जाएगा, जो संदिग्ध क्षेत्र में आते हैं, यहां करीब 150 से अधिक अलार्म लगाए जाएंगे। यह तेज आवाज और सेंसर आधारित होगा, इसमें अगर किसी डॉक्टर पर आपराधिक गतिविधियां होती हैं तो यह अलार्म स्वत: बजने लगेगा। इस पर डॉक्टर की सुरक्षा की जा सकेगी। हालांकि अभी इसे लेकर अभी प्रबंधन ज्यादा जानकारी नहीं दे पा रहा है कि यह किस तरह काम करेगा। इसके अलावा परिसर के अंदर और बाहर अंधेरी जगह पर पर्याप्त रोशनी की सुविधा भी रहेगी।
महिला गार्डों की बढ़ेगी संख्या
महिला मरीज और डॉक्टर की सुरक्षा के लिए एम्स प्रबंधन महिला गार्डों की तैनाती करेगा। अभी एम्स में गिनी-चुनी महिला गार्ड हैं, इसलिए इसके लिए उनकी संख्या भी बढ़ाई जाएगी। यह गार्ड सुरक्षा के लिहाज से भर्ती होने वाली महिला मरीजों की बारीकी से जांच करेंगी। जिसमें वह देखेंगी कि उक्त मरीज ने किसी प्रकार का हथियार जैसी चीज तो साथ में नहीं रखी है।
]]>कोलकाता में ट्रेनी डॉक्टर से रेप और हत्या के बाद देशभर में डॉक्टर्स का विरोध शुरू हो गया है। भोपाल एम्स में भी रेसीडेंट डॉक्टर्स आज मंगलवार से हड़ताल पर ।हमीदिया अस्पताल में सोमवार को डॉक्टर्स ने काली पट्टी बांधकर काम किया। शाम 7 बजे कैंडल मार्च भी निकाला। बता दें कि घटना को लेकर देशभर के 3 लाख रेजिडेंट डॉक्टर हड़ताल पर हैं। एम्स दिल्ली समेत देशभर के सभी सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवाएं प्रभावित हुई हैं। इमरजेंसी सेवाएं चालू रखी गई हैं।
इस घटना का करेंगे विरोध
कोलकाता में अस्पताल के सेमिनार हॉल में जूनियर डॉक्टर का शव मिला था. रेप के बाद जूनियर डॉक्टर की आरोपी संजय ने हत्या की थी. आरोपी पर सख्त कार्रवाई के साथ डॉक्टर की सुरक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन करने की तैयारी भोपाल एम्स के डॉक्टर करेंगे. इसके खिलाफ अपना विरोध जताते हुए एमपी के कई जिलों में सोमवार को जूनियर डॉक्टरों ने काली पट्टी बांधकर काम किया.
इन मांगों को लेकर करेंगे प्रदर्शन
भोपाल एम्स के डॉक्टर मंगलवार को कई मांगों को लेकर प्रदर्शन करेंगे और हड़ताल करेंगे. इस दिन एम्स में केवल इमरजेंसी सुविधाएं ही बहाल रहेंगे. डॉक्टरों का करना है कि उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार कोई ठोस कद
सुरक्षा की कर रहे मांग, जाने क्या थी पूरी घटन
कोलकाता में महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद डॉक्टरों में खौफ का माहौल है। लिहाजा सुरक्षा की मांग और मृत पीड़िता को न्याय दिलाने को लेकर भोपाल एम्स के डॉक्टरों ने भी कल हड़ताल में जाने का ऐलान कर दिया है। गौरतलब है कि कोलकाता के आरजी कर मेंडिकल कॉलेज में बीते दिनों ड्यूटी पर तैनात एक महिला ट्रेनी डॉक्टर का शव संदिग्ध हालात में मिलने से हड़कंप मच गया था। पोस्टमार्टम की प्रारंभिक रिपोर्ट में रेप के बाद हत्या की पुष्टि हुई है। मृतका का शव चौथी मंजिल के सेमिनार हॉल से अर्ध नग्न अवस्था में बरामद हुआ था। वहीं गुप्तांगों पर खून के निशान और चेहरे पर नाखून के निशान पाए गए थे। इस घटना ने कानून व्यवस्था और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। वहीं इसे लेकर जगह जगह विरोध किया जा रहा है।
दिल्ली AIIMS के डॉक्टरों ने रखी ये 6 डिमांड
1. मामले को बिना देरी किए तुरंत CBI के हवाले किया जाए.
2. प्रिंसिपल के साथ-साथ MS और अल्पताल के सिक्योरिटी इंचार्ज का तुरंत इस्तीफा लिया जाए.
3. केंद्र सरकार से लिखित में यह आश्वसन मिले कि डॉक्टरों के लिए सेंट्रल प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया जाएगा.
4. मृतक डॉक्टर के नाम पर किसी मेडिकल कॉलेज की बिल्डिंग या लाइब्रेरी का नाम किया जाए.
5. डॉक्टर के परिवार को पर्याप्त मुआवजा दिया जाए.
6. शारीरिक हमले के खिलाफ पुलिस सख्त कार्रवाई करे.
सेमिनार हॉल में मिली थी लाश
दरअसल, 9 अगस्त को कोलकाता के आरजी कर अस्पताल के सेमिनार हॉल में एक महिला डॉक्टर का शव मिला था. इसके बाद से ही डॉक्टर मामले में पीड़िता के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं. सरकारी आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात 31 वर्षीय पोस्टग्रेजुएट रेजिडेंट डॉक्टर के साथ 8 अगस्त की रात कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया गया और उसकी हत्या कर दी गई. अधिकारियों ने चेस्ट मेडिसिन विभाग के सेमिनार हॉल में द्वितीय वर्ष की छात्रा का अर्धनग्न शव बरामद किया था, जिस पर कई चोटों के निशान थे.
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हुआ यह खुलासा
हाल ही में इस मामले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी सामने आ गई है, जिसे पुलिस ने पीड़िता के परिवार को सौंपा है. इस रिपोर्ट में हत्या से पहले की प्रकृति और सेक्सुअल पेनेट्रेशन की बात की कही गई है. बताया गया है कि पीड़िता की हत्या गला घोंटकर हुई थी. उससे पहले उसके साथ बलात्कार हुआ था. आरोपी ने दो बार उसका गला घोंटा था. उसकी मौत सुबह 3 से 5 बजे के बीच हुई थी.
शराब पीकर अश्लील फिल्में देखने का आदी
आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है. वहीं, पुलिस सूत्रों का कहना है कि आरोपी संजय रॉय शराब पीते हुए अश्लील फिल्में देखने का आदी था. वारदात वाली रात वो अस्पताल के अंदर कई बार आया गया. आरोपी से पूछताछ, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कई सनसनीखेज बातें सामने आई हैं. पुलिस पूछताछ और सीसीटीवी फुटेज के जरिए इस पूरे मामले की टाइमलाइन सामने आई है.
IMA ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को लिखा पत्र
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर महिला डॉक्टर के साथ हैवानियत की घटना के संबंध में तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह किया है. IMA ने मामले की निष्पक्ष और गहन जांच की मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए. साथ ही, एसोसिएशन ने उन परिस्थितियों की विस्तृत जांच की मांग की है, जिनके कारण ऐसा अपराध हुआ. IMA ने तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए यह अनुरोध किया कि कार्यस्थल पर डॉक्टरों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कदम उठाए जाएं.
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