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एक हजार से ज्यादा देशी गायों के सहारे 10 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार का एथिकल डेयरी मॉडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की है इस मॉडल से संरक्षित साहीवाल गाय की आरती और गोपूजन
सीएम योगी की प्रेरणा से अमेरिकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर समेत टीम 100 ने संभाला देशी गायों के संरक्षण का जिम्मा
देशी गायों से बने A2 दूध, बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, शतधौत घृत, कुकीज, लड्डू, हर्बल चाय समेत 150 प्रकार के प्रोडक्ट की दुनिया में धूम
लखनऊ,
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘गो संरक्षण से समृद्धि’ मॉडल अब जमीन से उठकर ग्लोबल मंच पर अपनी ताकत दिखा रहा है। उत्तर प्रदेश में देशी गायों के सहारे न सिर्फ 10 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार खड़ा हुआ है, बल्कि यूके, यूएसए, ऑस्ट्रेलिया समेत 10 से अधिक देशों में ‘मेड इन यूपी’ गो उत्पादों की धूम मच गई है।
यह मॉडल सिर्फ गोसेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक सशक्त आर्थिक ताकत में बदल दिया गया है। ‘हेता’ (HETHA) के जरिए 1000 से ज्यादा देशी गायों पर आधारित एथिकल डेयरी सिस्टम खड़ा किया गया है, जिसने देशी नस्लों को बाजार से जोड़कर आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा लिख दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मॉडल से संरक्षित साहीवाल गाय की आरती और गोपूजन कर चुके हैं।
सीएम योगी की प्रेरणा से सिकंदरपुर, गाजियाबाद के असीम रावत ने इस अभियान की शुरुआत की। असीम 14 साल तक लगातार अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देशों की दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनियों में इंजीनियर रहे। फिर इन्होंने गो संरक्षण की राह चुनी। आज 100 लोगों की एक स्पेशल टीम के साथ वे इस मिशन को न सिर्फ चला रहे हैं, बल्कि इसे ग्लोबल ब्रांड बना दिया है।
हेता का मॉडल देशी गायों के समग्र उपयोग पर आधारित है। यहां दूध से लेकर पंचगव्य, आयुर्वेदिक उत्पाद, ऑर्गेनिक फूड और वेलनेस प्रोडक्ट्स तक करीब 150 प्रकार के प्रोडक्ट तैयार किए जा रहे हैं। A2 दूध, बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, शतधौत घृत, कुकीज, लड्डू, हर्बल चाय, स्किन-हेयर केयर और गोमूत्र अर्क जैसे उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं।
अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप, सिंगापुर, दुबई तक यूपी की पहचान
इस मॉडल की सबसे खास बात यह है कि यहां वृद्ध गोवंश को भी बोझ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना गया है। उन्हें छोड़ा नहीं जाता, बल्कि संरक्षण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाता है। हेता के उत्पाद आज भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप, सिंगापुर, दुबई और अन्य मध्य-पूर्व व एशियाई देशों तक पहुंच रहे हैं, जिससे यूपी की पहचान वैश्विक स्तर पर मजबूत हो रही है।
डेयरी मास्टर प्लान के तहत लाखों रुपये अनुदान
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम के अनुसार योगी सरकार इस मॉडल को व्यापक बनाने के लिए बड़े स्तर पर नीतिगत समर्थन भी दे रही है। ‘ऑपरेशन-4’ के तहत स्वदेशी गायों के पालन पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। डेयरी मास्टर प्लान के तहत 2 से 25 गायों तक पशु पालकों को लाखों रुपये का अनुदान मिल रहा है। योजना में 15 प्रतिशत स्वयं निवेश, 35 प्रतिशत बैंक ऋण और 50 प्रतिशत सब्सिडी का स्पष्ट फार्मूला लागू किया गया है।
‘गो-इकोनॉमी’ मॉडल उत्तर प्रदेश को वैश्विक डेयरी शक्ति बनाने की दिशा में बड़ा कदम
साहीवाल, गिर, गंगातीरी और सिंधी जैसी उच्च गुणवत्ता वाली स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और विस्तार पर सरकार का विशेष फोकस है। प्रदेश में लागू चार बड़ी योजनाएं मिलकर डेयरी सेक्टर को नई रफ्तार दे रही हैं। इसका नतीजा यह है कि अब किसान देशी गायों के सहारे करोड़ों की आय अर्जित कर रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नया उछाल देखने को मिल रहा है। योगी सरकार का यह ‘गो-इकोनॉमी’ मॉडल अब सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश को वैश्विक डेयरी शक्ति बनाने की दिशा में बड़ा कदम बन चुका है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 का चुनाव गोमाता की रक्षा के मुद्दे पर लड़ा जाएगा। जो गोमाता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होगा, वही उनके वोट का अधिकारी होगा। इसी उद्देश्य से वह प्रदेश की प्रत्येक विधानसभा में पहुंचकर जन-जागरण अभियान चला रहे हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गाय केवल दूध देने का साधन नहीं, बल्कि आशीर्वाद का प्रतीक है। अब तक लोग बिजली, पानी और सड़क जैसे मुद्दों पर मतदान करते रहे हैं, लेकिन वर्ष 2027 में गोरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा। एक सवाल के जवाब में प्रदेश में चल रहे अवैध बूचड़खानों और गोहत्या पर चिंता जताई।
कहा कि लाइसेंस जारी होने से गोहत्या वैध नहीं हो सकती। सवाल उठाया कि गोमांस निर्यात से जुड़े लोग क्या वास्तव में गोमाता की रक्षा कर सकते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद का काफिला सुबह नौ बजे फुलवरिया पहुंचा।
इसके बाद यात्रा नेवादा, अंबरपुर, जलालपुर, रफीगंज और दुल्हूपुर होते हुए आलापुर विधानसभा के न्यौरी, ढोलबजवा और रामनगर, टांडा विधानसभा के हंसवर, सुलेमपुर और टांडा पहुंची। जुबेर चौराहा पर सरदार अमरजीत सिंह उर्फ सोनू, रौनक सिंह आदि ने माल्यार्पण कर स्वागत किया।
इसके बाद अकबरपुर के पटेलनगर तिराहा पर महेंद्र यादव, अमित वर्मा, संजय यादव, विशाल वर्मा ने स्वागत किया। जलालुपर में जिला पंचायत सदस्य जयप्रकाश यादव को अपना प्रतिनिधि नियुक्त करते हुए गोधाम केंद्र निर्माण के लिए सहयोग राशि एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी। पूर्व विधायक सुभाष राय, अभिषेक सिंह, जिला पंचायत सदस्य आलोक यादव, राधेश्याम यादव मौजूद रहे।
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पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला
अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा।
हादसों और मुआवजे का गणित
राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है।
किसानों की दोहरी मार
एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है।
मौजूदा व्यवस्था में पीले टैग की वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना कठिन था। हमने रंगों में बदलाव का प्रस्ताव दिया था जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। अब केसरिया या लाल टैग से प्रबंधन तेज़ और सटीक होगा।
अभी लगाए जाते हैं पीले टैग
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।
इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है।
स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में
अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।
कानून क्या कहता है?
मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है।
किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत
दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।
फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है।
पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु
समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।
मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है।
राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब
इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
क्या ह रहे अधिकारी
अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं।
इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके तहत पहले चरण में करीब 5,000 गांवों में मवेशियों की उत्पादकता बढ़ाने और परित्याग की समस्या कम करने पर काम किया जा रहा है।
इसके साथ ही पशुधन से जुड़े डाटा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की दिशा में भी काम चल रहा है. पशुधन मोबाइल ऐप के माध्यम से मवेशियों की नस्ल, मालिक और आधारकार्ड जैसे पहचान से जुड़ी जानकारी को डिजिटल डाटाबेस से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है. अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो आने वाले समय में मध्य प्रदेश की सड़कों और गांवों में एक नई पहचान दिखाई दे सकती है किसी आवारा गाय के कान में लगा केसरिया टैग, जो उसकी पहचान के साथ-साथ राज्य में बढ़ते मवेशी संकट से निपटने की कोशिश का प्रतीक भी होगा।
]]>पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला
अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा।
हादसों और मुआवजे का गणित
राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है।
किसानों की दोहरी मार
एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है।
मौजूदा व्यवस्था में पीले टैग की वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना कठिन था। हमने रंगों में बदलाव का प्रस्ताव दिया था जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। अब केसरिया या लाल टैग से प्रबंधन तेज़ और सटीक होगा।
अभी लगाए जाते हैं पीले टैग
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।
इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है।
स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में
अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।
कानून क्या कहता है?
मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है।
किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत
दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।
फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है।
पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु
समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।
मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है।
राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब
इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
क्या ह रहे अधिकारी
अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं।
इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके तहत पहले चरण में करीब 5,000 गांवों में मवेशियों की उत्पादकता बढ़ाने और परित्याग की समस्या कम करने पर काम किया जा रहा है।
इसके साथ ही पशुधन से जुड़े डाटा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की दिशा में भी काम चल रहा है. पशुधन मोबाइल ऐप के माध्यम से मवेशियों की नस्ल, मालिक और आधारकार्ड जैसे पहचान से जुड़ी जानकारी को डिजिटल डाटाबेस से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है. अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो आने वाले समय में मध्य प्रदेश की सड़कों और गांवों में एक नई पहचान दिखाई दे सकती है किसी आवारा गाय के कान में लगा केसरिया टैग, जो उसकी पहचान के साथ-साथ राज्य में बढ़ते मवेशी संकट से निपटने की कोशिश का प्रतीक भी होगा।
]]>प्रदेश की साढ़े सात हजार गोशालाओं में 12,58,000 गोवंश का संरक्षण: श्याम बिहारी
प्रदेश में 94,000 हेक्टेयर में गो आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा
सीएम योगी के नेतृत्व में गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए चल रहा अभियान
बुंदेलखंड के 7 जिलों में 23,500 हेक्टेयर में हो रही गो आधारित प्राकृतिक खेती
यूपी में 1 करोड़ 90 लाख गोवंश, गो आधारित प्राकृतिक खेती तय करेगी किसानों के भविष्य की दिशा
लखनऊ
प्रदेश में गो संरक्षण और प्राकृतिक खेती को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में गो तस्करी की घटनाएं होती थीं, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार आने के बाद अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई कर उन्हें बंद किया गया। इसके बाद से गो संरक्षण की व्यवस्था मजबूत हुई है और आज प्रदेश की साढ़े सात हजार गोशालाओं में लगभग 12,58,000 गोवंश का संरक्षण किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी के मार्गदर्शन में गोशालाओं को बनाया जा रहा आत्मनिर्भर
उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए ‘गो आधारित प्राकृतिक खेती मिशन’ तेजी से लागू किया जा रहा है। वर्तमान में पूरे उत्तर प्रदेश में करीब 94,000 हेक्टेयर क्षेत्र में गो आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि बुंदेलखंड के बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर और महोबा में लगभग 23,500 हेक्टेयर क्षेत्र में यह अभियान संचालित है।
एक गाय से प्रतिदिन 5 लीटर गोमूत्र और 10 किलोग्राम गोबर
श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि आने वाले समय में गो आधारित प्राकृतिक खेती ही किसानों के भविष्य की दिशा तय करेगी। एक गाय से प्रतिदिन लगभग 5 लीटर गोमूत्र और 10 किलोग्राम गोबर प्राप्त होता है, जो प्राकृतिक खेती के लिए अत्यंत उपयोगी है। प्रदेश में करीब 1 करोड़ 90 लाख गोवंश होने के कारण इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि गोमूत्र और गोबर से तैयार जैविक उत्पादों के उपयोग से किसानों की लागत घट रही है और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। इससे जहां किसानों की आय बढ़ रही है, वहीं मिट्टी की उर्वरता भी संरक्षित हो रही है।
7,716 स्थानों पर गो संरक्षण
प्रदेश में 7,716 स्थानों पर गो संरक्षण का कार्य किया जा रहा है और गोशालाएं अब जैविक खाद उत्पादन के केंद्र के रूप में विकसित हो रही हैं। प्राकृतिक खेती के इस मॉडल से न केवल किसानों को लाभ मिल रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिल रही है।
पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला
अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा।
हादसों और मुआवजे का गणित
राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है।
किसानों की दोहरी मार
एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है।
कानून क्या कहता है?
मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है।
पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला
अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा।
हादसों और मुआवजे का गणित
राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है।
किसानों की दोहरी मार
एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है।
कानून क्या कहता है?
मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है।
मध्य प्रदेश सरकार ने भरोसा दिलाया कि दो साल बाद राज्य की सड़कों पर कोई आवारा मवेशी घूमता हुआ नहीं दिखेगा. सरकार का यह भरोसा तब आया जब कुछ कांग्रेसी MLA ने आवारा मवेशियों की वजह से होने वाले सड़क हादसों पर चिंता जताई.
कांग्रेस MLA अजय सिंह और कैलाश कुशवाहा ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए यह मुद्दा उठाया और कहा कि मध्य प्रदेश में आवारा मवेशियों की समस्या गंभीर हो गई है.
उन्होंने कहा कि सरकार के करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद राज्य में लगभग 10 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं, जिससे किसानों की फसलों को भारी नुकसान हो रहा है, नेशनल हाईवे और दूसरी सड़कों पर ट्रैफिक में रुकावट आ रही है और हादसों की घटनाएं बढ़ रही हैं.
सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार की लापरवाही की वजह से इस समस्या को ठीक से हल नहीं किया जा रहा है, जिससे किसानों और दूसरे लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
'जुर्माना और नई नीति से होगा समाधान'
जवाब देते हुए राज्य के पशुपालन और डेयरी मंत्री लखन पटेल ने कहा कि आवारा पशुओं का मैनेजमेंट ग्रामीण इलाकों में पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग और शहरी इलाकों में शहरी और आवास विकास विभाग की जिम्मेदारी है, और संबंधित विभाग लगातार कार्रवाई कर रहे हैं.
मंत्री ने कहा कि 2025 में राज्य में शहरी निकायों द्वारा लगभग 78 हजार 153 आवारा पशु पकड़े गए और इन पशुओं के मालिकों पर कुल 25 लाख 58 हजार 753 रुपये का जुर्माना लगाया गया. राज्य में कुल 3 हजार 40 गौशालाएं चल रही हैं, जिनमें मुख्यमंत्री गौ सेवा योजना के तहत 2 हजार 325 गैर-सरकारी संगठनों द्वारा 703 और शहरी निकायों द्वारा 12 शामिल हैं.
पटेल ने कहा कि लगभग 4.80 लाख आवारा पशुओं को गौशालाओं में ले जाया गया है और उनका मैनेजमेंट एक लगातार चलने वाला प्रोसेस है.
मंत्री ने सदन को बताया कि राज्य सरकार ने 'मध्य प्रदेश में आत्मनिर्भर गाय आश्रय स्थलों की स्थापना राज्य नीति-2025' को मंजूरी दे दी है. इसका मकसद ऐसी आश्रय इकाइयों को आत्मनिर्भर बनाना और रोजगार के मौके पैदा करना है, साथ ही बेसहारा मवेशियों का बेहतर मैनेजमेंट करना है.
उन्होंने कहा कि इस नीति के तहत, कम से कम 5000 मवेशियों की क्षमता वाले आत्मनिर्भर गाय आश्रय (कामधेनु निवास) के लिए कम से कम 130 एकड़ रेवेन्यू जमीन दी गई है, जिसमें से 5 एकड़ जमीन का इस्तेमाल कमर्शियल गतिविधियों के लिए किया जा सकता है.
मंत्री के अनुसार, गाय आश्रय स्थलों में मौजूद मवेशियों के रखरखाव के लिए अनुदान राशि 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये प्रति जानवर प्रति दिन कर दी गई है.
पटेल ने कहा, "अगले दो सालों में जब नई गाय आश्रय स्थल बन जाएंगी और व्यवस्था हो जाएगी, तो बेसहारा मवेशी सड़कों पर नहीं दिखेंगे. मेरा विश्वास कीजिए. दो साल बाद, सड़कों पर एक भी गाय नहीं दिखेगी."
विधानसभा स्पीकर की टिप्पणी
मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि गौशालाओं को कमर्शियली आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है, साथ ही गौ रक्षा और सेवा के जरिए उन्हें बढ़ावा देने की भी जरूरत है. उन्होंने कहा कि देश की पहली गौ अभ्यारण्य पहले शाजापुर में बनाई गई थी, लेकिन इस एरिया में अभी और काम करने की ज़रूरत है.
तोमर ने कहा कि इस समस्या के परमानेंट समाधान के लिए सरकार और सभी स्टेकहोल्डर्स को मिलकर गंभीर कोशिशें करनी होंगी.
]]>कामधेनु निवास के लिए 7 स्थानों पर जमीन चिन्हित
पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने कहा कि "सड़कों पर घूमने वाले निराश्रित गौवंश के लिए प्रदेश में स्वावलंबी गौशालाओं कामधेनु निवास के लिए प्रदेश में 29 स्थान चयनित कर लिए गए हैं. उधर 7 स्थानों पर राजस्व विभाग द्वारा पशुपालन विभाग को जमीन आवंटित कर दी गई है. इसके तहत जबलपुर में 461 एकड़, रायसेन में 320 एकड़, सागर में 411 एकड़, अशोकनगर में 293 एकड, खरगौन में 133 और रीवा में 135 एकड़ भूमि आवंटन सहित 7 स्थान पर काम चल रहा है."
उन्होंने कहा कि "अगले 10 दिनों में गौशाला बनाने के लिए अनुबंध की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी. जल्द ही इनका भूमि पूजन किया जाएगा. मंत्री ने दावा किया कि देश में यह पहली योजना है, जिसमें निराश्रित गौवंश को रखा जाएगा. मंत्री ने कहा कि इनमें कई गौशालाएं ऐसी होंगी, जिसमें 20 हजार गौवंश को एक स्थान पर रखा जाएगा."
दुबई, ऑस्ट्रेलिया की संस्था ने भी डाला टेंडर
मंत्री लखन पटेल ने कहा कि "स्वावलंबी गौशालाओं के संचालन के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है. टेंडर प्रकिया में ऑस्ट्रेलिया और दुबई की भी 2 संस्थाओं द्वारा हिस्सा लिया जा रहा है. टेंडर प्रक्रिया अगले एक माह में पूरी कर ली जाएगी. गौशालाओं को पूरी तरह से तैयार होने में 2 साल का वक्त लेगा. इसके बाद एक भी गौवंश सड़क पर दिखाई नहीं देगा."
मंत्री ने सफाई दी कि "गौशालाओं को पूरी तरह से बनने के पहले ही गौवंशों को इनमें पहुंचाना शुरू कर दिया जाएगा. बरसात के पहले सभी गौवंशों को इनमें पहुंचा दिया जाएगा. इसके लिए जरूरी सुविधाएं जल्द से जल्द की जाएंगी."
मंत्री को नेता प्रतिपक्ष का सुझाव आया पसंद
ध्यानाकर्षण पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि "आमतौर पर दूध देना बंद कर देने के बाद किसान ही गौवंश को छोड़ देता है. जब सरकार गौशालाओं को प्रति गाय के हिसाब से 40 रुपए प्रतिदिन की राशि दे रही है, तो सीधी किसानों को यह राशि क्यों नहीं दी जाती. एआई के दौर में ऐसे पशुपालकों की निगरानी भी की जा सकती है." जवाब में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सुझाव की तारीफ करते हुए कहा कि इस पर सरकार विचार करेगी.
]]>वित्त विभाग ने ‘गौधाम योजना’ को मंजूरी दे दी है और पशुधन विकास विभाग ने कलेक्टरों और फील्ड अधिकारियों को आदेश जारी कर दिया है। गोवंशों की लगातार हो रही मौतों पर रोक लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार का यह बड़ा कदम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सरकार में आने के बाद गो अभ्यारण बनाने की बात कही थी।
बता दें कि दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री साय ने एक कार्यक्रम में कहा था कि गो माता हमारी समृद्धि का प्रतीक हैं और माना जाता है कि उनमें 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। उन्होंने कहा था कि गो अभ्यारण्य को ‘गौधाम’ कहना अधिक उचित है।
बेमेतरा में 50 एकड़ में ‘गौधाम’ तैयार
बेमेतरा के झालम में 50 एकड़ में गौधाम तैयार है। इसी तरह कवर्धा में 120 एकड़ में गौधाम निर्माण तेजी से जारी है। बता दें कि हाल ही में हाई कोर्ट ने सड़कों पर मृत पड़ी गायों की घटनाओं पर गंभीर टिप्पणी की थी। पिछले सप्ताह तीन अलग-अलग हादसों में 90 गायों की मौत और बिलासपुर रोड पर 18 गायों की दर्दनाक मौत के बाद मुख्य सचिव ने अफसरों को फटकार लगाई थी।
क्या होगा ‘गौधाम’ में
ये हैं कानूनी प्रविधान
छत्तीसगढ़ की सीमाएं सात राज्यों से जुड़ी हैं और यहां से राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं, जिससे अंतर्राज्यीय पशु परिवहन की संभावना रहती है। राज्य में कृषि पशु परिरक्षण अधिनियम 2004 (संशोधित 2011) और छत्तीसगढ़ कृषि पशु परिरक्षण नियम 2014 लागू हैं, जिनमें अवैध पशु परिवहन व तस्करी पर सख्ती से रोक है।
प्रदेश में बड़ी संख्या में निराश्रित और जब्त गोवंश पाए जाते हैं, जो फसलों को नुकसान और सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। राज्य सरकार का मानना है कि ‘गौधाम योजना’ से न केवल निराश्रित पशुओं की मौत पर रोक लगेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी नए अवसर पैदा होंगे। बेहतर प्रबंधन करने वाली संस्थाएं राज्य में माडल गौधाम के रूप में पहचान बनाएंगी।
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