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पाकिस्तान ने चीन की मदद से एक रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट लॉन्च किया है। इसकी लॉन्चिंग भी चीन स्थित शिचांग सैटेलाइट लॉन्चिंग सेंटर से हुई है। पाकिस्तान की स्पेस एंड अपर एटमॉस्पियर रिसर्च कमिशन यानी SUPARCO ने इसकी जानकारी गुरुवार को दी है। एजेंसी के प्रवक्ता ने कहा कि यह सैटेलाइट पाकिस्तान और चीन को CPEC की निगरानी में मदद करेगी। इसके अलावा अंतरिक्ष से ही चीन और पाकिस्तान की कई साझा परियोजनाओं पर नजर रखी जा सकेगी। बता दें कि चीन पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर का एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरता है, जो वास्तव में भारत का हिस्सा है।
यह सैटेलाइट पीओके पर भी नजर रखेगा और यह भारत के लिए भी एक अलर्ट रहने वाली खबर है। पाकिस्तानी एजेंसी का कहना है कि इस सैटेलाइस से कृषि क्षेत्र की जानकारी जुटाई जा सकेगी। इसके अलावा पर्यावरणीय मसलों का विश्लेषण करने में भी मदद मिलेगी। रणनीतिक महत्व की चीजों पर भी निगरानी रखी जा सकेगी और प्राकृतिक संसधानों का भी प्रबंधन किया जा सकेगा। पाकिस्तानी एजेंसी के प्रवक्ता ने कहा कि सैटेलाइट से हमें पता चलेगा कि कहां पर भौगोलिक बाधाएं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है।
एजेंसी का कहना है कि रिमोट से संचालित होने वाला पाकिस्तान का यह दूसरा सैटेलाइट है। इससे पहले PRSS-1 की लॉन्चिंग की गई थी। उसे 2018 में लॉन्च किया गया था। इस नए सैटेलाइट के साथ ही पाकिस्तान के कुल 5 सैटेलाइट अंतरिक्ष की कक्षा में सक्रिय हो गए हैं। पाकिस्तान का कहना है कि इससे हमें स्पेस आधारित मॉनिटरिंग और आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी। बता दें कि पाकिस्तान अंतरिक्ष अभियानों में भी पूरी तरह चीन पर ही निर्भरता रखता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि उसका यह सैटेलाइट भी चीन से ही लॉन्च किया गया है।
]]>रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी अभियान में मदद करने के लिए सैन्य सहायता देने की पेशकश की है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने जाफर एक्सप्रेस हाईजैक को लेकर पूछे गये सवाल पर कह है कि "हमने रिपोर्टों पर गौर किया है और इस आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की है।" चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि "चीन पाकिस्तान के साथ आतंकवाद विरोधी और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने और संयुक्त रूप से क्षेत्र को शांतिपूर्ण, सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए तैयार है।"
बलूचों के आंदोलन से क्यों घबराया चीन?
आपको बता दें कि पिछले हफ्ते BLA के फ्रीडम फाइटर्स ने जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया था, जिसमें 440 यात्री सवार थे। BLA ने 200 से ज्यादा पाकिस्तानी सेना के जवानों को मारने का दावा किया है। जबकि पाकिस्तान की सेना ने करीब 50 मौतों की बात कबूली है। जाफर एक्सप्रेस हाईजैक ने बीजिंग में तहलका मचा दिया है। वो अपने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की सुरक्षा को लेकर डर गया है। चीन को लग रहा है कि अरबों डॉलर के इस प्रोजेक्ट को बलूच फूंक देंगे। चीन ने 3,000 किलोमीटर लंबे CPEC में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है। अनुमान है कि चीन ने बलूचिस्तान में अलग अलग प्रोजेक्ट्स के जरिए करीब 65 अरब डॉलर का निवेश किया है, जो बीजिंग के लिए मध्य पूर्व के बाजारों तक सस्ते और तेज मार्ग और दक्षिण एशिया में प्रभाव बनाने का रास्ता बनाता है। लेकिन अब चीन का ये प्रोजेक्ट फंस गया है और भारत को घेरने का प्लान फेल होता नजर आ रहा है।
बलूच विद्रोहियों की मांग ना सिर्फ पाकिस्तान से आजादी है, बल्कि वो चीनी प्रोजेक्ट का भी विरोध कर रहा हैं। बलूचों का कहना है की चीन उनकी संसाधनों को लूट रहा है। लिहाजा बलूच विद्रोही, बलूचिस्तान को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ने वाली सीपीईसी परियोजनाओं पर काम कर रहे चीनी कर्मियों पर भी कई हमले किए हैं। बलूचिस्तान संसाधन संपन्न इलाका है, जहां प्राकृतिक गैस, कोयला, तांबा और अन्य मूल्यवान खनिजों का भंडार है। पाकिस्तान और चीन मिलकर इन खनिजों को लूट रहे हैं और बलूचों को कुछ भी नहीं मिल रहा है। लिहाजा बलूचों ने अब बंदूक उठा लिए हैं।
बलूच नेशनल मूवमेंट के अध्यक्ष नसीम बलूच ने कहा है कि इस प्रोजेक्ट की वजह से बलूचों को काफी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि ग्वादर पोर्ट बनाने के लिए हजारों बलूचों को उनके घरों से विस्थापित कर दिया गया और उन्हें कहीं और बसाने के भी कोई इंतजाम नहीं किए गये। लिहाजा चीनी कर्मचारियों पर हमले हो रहे हैं। जिससे घबराए चीन ने पाकिस्तान पर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवानों को तैनात करने के लिए पाकिस्तान पर भारी दबाव बना रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान, चीन के प्रस्ताव को स्वीकार करने में हिचकिचा रहा है, क्योंकि उसे अपनी धरती पर चीनी सुरक्षाकर्मियों को अनुमति देने पर घरेलू राजनीतिक प्रतिक्रिया का डर है। लेकिन अब जबकि बलूचों के हमले खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं तो ऐसी आशंका है कि चीन अपने जवानों को बलूचिस्तान में तैनात कर सकता है।
]]>पाकिस्तान (Pakistan) के बलूचिस्तान प्रांत में कई ठिकानों पर हाल ही में हुए हमले इलाके में बढ़ रही उठापटक की तरफ इशारा हैं. पिछले दिनों मार्च के दौरान बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर बंदरगाह पर कुछ हथियारबंद लोग ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी (GPA) के परिसर में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. पाकिस्तानी अखबारों की रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि स्थानीय सुरक्षाकर्मियों ने जवाबी कार्रवाई में आठ हमलावरों को ढेर कर दिया. इस हमले की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ली थी. ये हमले बलूचिस्तान के सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वाली समस्याओं और नासूर बन चुके हालात का नतीजा थे. हमलों का एक प्रमुख कारण CPEC (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) की इच्छा है, जो बलूचिस्तान के जरिए झिंजियांग से ग्वादर तक एक कम्यूनिकेशन कॉरिडोर चलाने की थी, जिसका प्रांत के निवासियों ने समर्थन नहीं किया.
पाकिस्तान को मिलता रहा है चीन का समर्थन
दशकों से चीन का करीबी सहयोगी रहा पाकिस्तान अपनी कई समस्याओं के समाधान के लिए चीन की उदारता का इस्तेमाल करना चाहता है. जबकि उनके भारत-केंद्रित एजेंडे में कई समानताएं हैं. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि चीन, भारत के खिलाफ उसके साथ जुड़ जाएगा. 1947 के बाद पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि पाकिस्तान को चीन का कूटनीतिक और सैन्य समर्थन मिलता रहा है.
साल 1963 में एक दिखावटी सीमा समझौते के आधार पर कश्मीर की शक्सगाम घाटी को चीन को सौंपने से लेकर सीपीईसी की मेजबानी और उत्तरी गिलगित पर नियंत्रण को लगभग सौंपने तक, चीन को पाकिस्तान द्वारा दिए गए रणनीतिक उपहारों की सूची लंबी है.
ऐतिहासिक रूप से, पाकिस्तान ने ज्यादातर सुरक्षा और विकास संबंधी प्राथमिकताओं के आधार पर गठबंधन चुने हैं. अमेरिका के साथ देश के जुड़ाव ने उसे कई फायदे दिए हैं. हालांकि, अफगानिस्तान में फायदा उठाने और रणनीतिक गहराई हासिल करने के लिए गुप्त संस्थाओं का उपयोग करने की इसकी दोषपूर्ण दृष्टि उजागर हो गई है. नतीजतन, अफगानिस्तान सहित पूरे इलाके में असुरक्षा फैली हुई है. अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली सहयोगियों की तलाश में, पाकिस्तान ने पश्चिमी प्रांतों और उनके लोगों को एकीकृत करने की उपेक्षा की है.
पाकिस्तान ने हमेशा सुलह पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय प्रतिरोध आंदोलनों से निपटने के लिए सैन्य बल का उपयोग करना पसंद किया है. इस वजह से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच आंदोलन पाकिस्तानी दृष्टिकोण का विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं.
पाकिस्तान में हिंसा से हुई हजारों मौतें
साल 2009 में पाकिस्तान में आंतरिक संघर्ष की वजह से 11,317 मौतें हुईं. 2019 में यह संख्या घटकर 365 हो गई. 2020 की शुरुआत से, हिंसा और मौतों की संख्या में साफ तौर से बढ़ोतरी दर्ज की गई और 2023 में यह तादाद 1,502 पर पहुंच गई है. इस साल यह संख्या 1,240 है.
साल 2023 में, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में पाकिस्तान में सभी मौतों का 90 फीसदी और सभी हमलों का 84 फीसदी हिस्सा होगा. खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में 2021 की तुलना में क्रमशः 54 प्रतिशत और 63 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. मौजूदा साल में अब तक पाकिस्तान में सभी मौतों का 92 फीसदी इन दो इलाकों में हुआ है.
क्या कहते हैं हाल के दिनों में हुए हमले?
अकबर बुगती की पुण्यतिथि पर हाल ही में हुए हमलों ने एक अलग संदेश दिया है. सुरक्षा और पुलिसकर्मियों पर क्रूर हमलों से लेकर बलूचिस्तान के बोलन में बुनियादी ढांचे पर हमला और नागरिकों को जातीय रूप से निशाना बनाना.
कब-कब हुए बड़े हमले?
– इसी साल अप्रैल में, बलूचिस्तान के नोशकी शहर के पास आतंकवादियों ने पंजाबी यात्रियों के पहचान पत्र की जांच करने के बाद गोली मारकर हत्या कर दी थी.
– पिछले अक्टूबर में केच जिले में छह पंजाबी मजदूरों को मार दिया गया, जिसे खुद स्थानीय अधिकारियों ने टारगेट किलिंग माना था.
– साल 2015 में कुछ बंदूकधारियों ने तुर्बत के पास मजदूरों के एक कैंप पर अटैक कर 20 लोगों को मार दिया, जो सभी पंजाब और सिंध से थे.
मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के बलूचिस्तान में खूनी खेल के पीछे बलूचों की स्वतंत्र देश की मांग है. बलूचों का आरोप है कि 1947 में भारत से अलग होने के बाद पाकिस्तान पिछले 76 सालों से बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा जमाया हुआ है. मई 2024 में बलूचिस्तान की आजादी के लिए बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) के डॉ अल्लाह नजर बलूच ने ईरान, अफगानिस्तान, भारत और मध्य-पूर्व देशों से मदद की अपील की थी. डॉ अल्लाह नजर बलूच ने कहा था कि बलूचिस्तान की आजादी के मुद्दे पर समर्थन करने के लिए उन्हें आगे आना चाहिए. बीएलएफ के अलावा बीएलए समेत फ्रीलांस जिहादियों की ओर से भी पाकिस्तान के कब्जे से बलूचिस्तान को आजादी दिलाने की मांग की जा रही है. बीते 25-26 अगस्त के हमले के बाद पाकिस्तान गृहमंत्री मोहसिन नकवी ने अपने एक बयान में कहा था कि प्रतिबंधित बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी एक अलग आजाद देश बनाना चाहता है.
मीडिया की रिपोर्ट्स की मानें, तो बलूचिस्तान की आजादी के समर्थक जिहादी समूह पाकिस्तानी सेना के जवान और चीनी अधिकारियों पर हमले कर रहे हैं. पाकिस्तान के साथ हुए समझौते के मुताबिक, चीन पाकिस्तान में साल 2015 से चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना पर काम शुरू कर चुका है. बलूचों का मानना है कि चीन के कंधों पर बंदूक रखकर पाकिस्तान इस आर्थिक गलियारे के जरिए बलूचिस्तान में अपने दबदबे को मजबूत करना चाहता है. बलूचों की नजर में उनकी आजादी में आर्थिक गलियारे के जरिए चीन रोड़ा अटकाता दिखाई दे रहा है. यही कारण है कि आजादी समर्थक बलूच जिहादी पाकिस्तानी सैनिकों के साथ-साथ चीनी अधिकारियों पर हमले कर रहे हैं.
क्यों आजादी चाहते हैं बलूच?
बलूचिस्तान में बलूच आतंकवादी पंजाबियों को क्यों निशाना बनाते हैं? इसका जवाब पाकिस्तान के इतिहास में है. लेकिन इससे पहले जानते हैं कि बलूच कौन हैं और क्यों भड़के रहते हैं.
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है, जहां बलूच मेजोरिटी है. ये वे लोग हैं, जिनकी अपनी अलग बोली और कल्चर है. लंबे समय से बलूच पाकिस्तान से अलग अपने देश की मांग करते रहे. यानी कहा जाए तो ये एक तरह का अलगाववादी आंदोलन है, जो पाकिस्तान में फलते-फूलते कई चरमपंथी आंदोलनों में से एक है. अफगानिस्तान से सटे हुए इस प्रांत के लोगों का कहना है कि पाकिस्तान ने हमेशा उससे भेदभाव किया.
– बलूचिस्तान के पास पूरे देश का 40% से ज्यादा गैस प्रोडक्शन होता है. ये सूबा कॉपर, गोल्ड से भी समृद्ध है. पाकिस्तान इसका फायदा तो लेता है, लेकिन बलूचिस्तान की इकनॉमी खराब ही रही.
– बलूच लोगों की भाषा और कल्चर बाकी पाकिस्तान से अलग है. वे बलूची भाषा बोलते हैं, जबकि पाकिस्तान में उर्दू और उर्दू मिली पंजाबी चलती है. बलूचियों को डर है कि पाकिस्तान उनकी भाषा भी खत्म कर देगा, जैसी कोशिश वो बांग्लादेश के साथ कर चुका.
– सबसे बड़ा प्रांत होने के बावजूद इस्लामाबाद की राजनीति और मिलिट्री में इनकी जगह नहीं के बराबर है.
– पाक सरकार पर बलूच ह्यूमन राइट्स को खत्म करने का आरोप लगाते रहे. बलूचिस्तान के सपोर्टर अक्सर गायब हो जाते हैं, या फिर एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग के शिकार बनते हैं. एक एनजीओ बलूच मिसिंग पर्सन्स के अनुसार, साल 2001 से 2017 के बीच पांच हजार से ज्यादा बलूच लापता हैं.
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पाकिस्तानी पत्रकार और एक्सपर्ट कामरान खान ने अपने शो में कहा कि सीपीईसी पाकिस्तान के कर्ज के जाल का क्लासिक उदाहरण है। चीन पहले कर्ज देकर अपने जाल में फंसाता है और जब कर्जदार देश अपने भुगतान को पूरा करने में असमर्थ हो जात है, तो खुद ही आर्थिक या राजनीतिक रियायतें निकालने के इरादे से कर्जदार देश को और ज्यादा कर्ज देकर अपना गुलाम बना लेता है। सबसे खास बात ये है कि इस दौरान कर्ज की शर्तों को अक्सर छिपा लिया जाता है।
17 प्रतिशत का ब्याज वसूल रहा चीन
पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने बताया कि चीन पाकिस्तान को दिए गए कर्ज पर 17 प्रतिशत का ब्याज लगाया हुआ है। ये ब्याज डॉलर के आधार पर तय किया गया है, जिसका मतलब है कि अगर डॉलर मजबूत होता है तो पाकिस्तान के ऊपर ज्यादा बोझ पड़ेगा। इसके पहले चीन ने नेपाल के साथ ही ऐसा ही किया है, जिसके चलते 3 प्रतिशत के ब्याज का रिटर्न की जगह काठमांडू को 36 फीसदी अदा करना पड़ रहा है।
पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय संकट
कामरान खान ने माना कि पाकिस्तान इस समय चीन का कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है और उसने हाथ खड़े कर दिए हैं। शो में ये भी खुलासा हुआ कि पाकिस्तान ने चीन के सामने कर्ज की अदायगी पर ब्याज को कम करने के लिए चीन से बात भी की थी। इस दौरान उसने अदा करने के लिए 10 साल की जगह 20 साल की समय सीमा करने की मांग की थी, लेकिन चीन ने इसे इनकार कर दिया। पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने कहा कि सीपीईसी का कर्ज जाल अब पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा संकट में बदल गया है और इससे बाहर निकलने की कुंजी केवल चीन के ही पास है।
पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार मारियाना बाबर ने भी चीन के कर्ज को पाकिस्तान के लिए खतरा बताया है। उन्होंने एक्स पर कामरान खान की पोस्ट शेयर करते हुए बताया कि अमेरिका ने बहुत पहले पाकिस्तान को चेतावनी दी थी। अमेरिका ने अफ्रीकी देशों का उदाहरण दिया था, जहां चीन ने धोखाधड़ी की थी। बाबर ने आगे बताया कि सीपीईसी में कभी कोई पारदर्शिता नहीं थी, केवल बहुत प्रचार किया गया। चीन एक बहुत जरूरी सहयोगी है, लेकिन इस कीमत पर नहीं।
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