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जनजातीय समाज, संस्कृति और विकास के अध्ययन-शोध के लिए विशेष पाठ्यक्रम; युवाओं के लिए शोध के अवसर
डीएवीवी में एमए, एमबीए और पीएचडी में प्रवेश प्रारंभ
इंदौर
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज द्वारा जनजातीय समाज, संस्कृति, परंपराओं और विकास के विविध आयामों को समझने के लिए एक अभिनव शैक्षणिक पहल की गई है। विश्वविद्यालय में जनजातीय अध्ययन एवं जनजातीय विकास पर केंद्रित विशेष पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को जनजातीय समुदायों के जीवन, ज्ञान परंपराओं, चुनौतियों और विकास की संभावनाओं से परिचित कराना है। यह पहल विद्यार्थियों में जनजातीय समाज के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने के साथ उन्हें ऐसे ज्ञान और कौशल से सुसज्जित करती है, जिससे वे भविष्य में जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण और विकास में सार्थक योगदान दे सकें।
स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज में एम.ए. (जनजातीय अध्ययन), एम.बी.ए. (जनजातीय विकास एवं प्रबंधन) तथा पीएचडी (जनजातीय अध्ययन) जैसे विशिष्ट कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। ये पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को जनजातीय समाज के इतिहास, संस्कृति, जीवन-पद्धति, पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक चुनौतियों तथा विकास संबंधी मुद्दों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
वर्तमान में जनजातीय समुदायों से जुड़े विषयों पर अध्ययन और शोध की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ये पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को अकादमिक ज्ञान के साथ जनजातीय विकास की नीतियों, योजनाओं और प्रबंधन से जुड़ी व्यावहारिक समझ भी प्रदान करते हैं। इससे छात्र शोध, शिक्षण, सामाजिक विकास, नीति निर्माण तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में बेहतर कॅरियर के अवसर बढ़ जाते हैं।
स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज द्वारा संचालित ये पाठ्यक्रम न केवल मध्यप्रदेश बल्कि देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। जनजातीय अध्ययन के प्रति रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए यह पाठ्यक्रम समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को निकट से समझने और उनके विकास में सार्थक योगदान देने का अवसर उपलब्ध कराते हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने विद्यार्थियों से इन विशेष पाठ्यक्रमों का लाभ उठाने और समय पर प्रवेश प्रक्रिया में शामिल होने की अपील की है।
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देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) झाबुआ में अपना मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। विश्वविद्यालय को इसके लिए आवश्यक भूमि आवंटित हो चुकी है, और अब प्रारंभिक कक्षाओं के संचालन हेतु एक अस्थायी व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई के नेतृत्व में यह महत्वाकांक्षी परियोजना 350 से 400 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत के साथ साकार होगी। विश्वविद्यालय प्रबंधन को आशा है कि इस माह के अंत तक इस संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय आ सकता है।
दरअसल विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोलने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस निर्णय के तहत, मध्यप्रदेश शासन ने उच्च शिक्षा विभाग के माध्यम से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय को मेडिकल कॉलेज के निर्माण के लिए 70 एकड़ भूमि आवंटित कर दी है। यह आवंटन विश्वविद्यालय को अपने स्वयं के चिकित्सा शिक्षा संस्थान की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
झाबुआ जिला अस्पताल को भी विश्वविद्यालय को सौंपने पर विचार किया जा रहा
परियोजना के एक अहम पहलू के रूप में, झाबुआ जिला अस्पताल को भी विश्वविद्यालय को सौंपने पर विचार किया जा रहा है। मध्यप्रदेश शासन इस संबंध में निर्णय ले रहा है कि जिला अस्पताल को विश्वविद्यालय को सौंप दिया जाए, ताकि यह नए मेडिकल कॉलेज के लिए एक शैक्षणिक अस्पताल के रूप में कार्य कर सके। वर्तमान में, झाबुआ जिला अस्पताल में लगभग 250 बिस्तर उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय मेडिकल काउंसिल (NMC) के मानदंडों के अनुसार, 100 सीटों वाले मेडिकल कॉलेज के लिए 300 बिस्तरों वाले अस्पताल की आवश्यकता होती है। विश्वविद्यालय का मानना है कि जिला अस्पताल के अधिग्रहण से यह आवश्यकता पूरी हो जाएगी, जिससे छात्रों को पर्याप्त नैदानिक अनुभव मिल सकेगा।
यूनिवर्सिटी का खुद का मेडिकल कॉलेज होगा
कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने बताया कि यूनिवर्सिटी की कार्यपरिषद में मेडिकल कॉलेज खोलने का फैसला लिया गया था। इसमें तय किया गया था कि झाबुआ में मेडिकल कॉलेज स्थापित किया जाएगा। इसके लिए मध्यप्रदेश शासन ने हायर एजुकेशन विभाग के माध्यम से यूनिवर्सिटी को जमीन भी आवंटित कर दी है।
झाबुआ डिस्टिक हॉस्पिटल है, उस हॉस्पिटल को, मध्यप्रदेश शासन ये निर्णय ले रहा है कि वह यूनिवर्सिटी को सौंप दिया जाएगा। जिससे हमारा जो शैक्षणिक अस्पताल है उसके रूप में वह जिला हॉस्पिटल काम कर सकेगा।
इंजीनियरिंग कॉलेज में मेडिकल कॉलेज चलाने की मांगी अनुमति
कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने बताया कि यह भी कोशिश की जा रही है कि वहां पर राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का इंजीनियरिंग कॉलेज है। यदि शासन उचित समझता है तो, यूनिवर्सिटी ने मांग की है कि जब तक नए परिसर में हमारा मेडिकल कॉलेज स्थापित नहीं हो जाता तब तक इंजीनियरिंग कॉलेज में मेडिकल कॉलेज चलाने की अनुमति दे दी जाए। इसके लिए नेशनल मेडिकल कांउसिल में यूनिवर्सिटी ने आवेदन भी कर दिया है।
उम्मीद है इस महीने तक निर्णय आ सकता है
उन्होंने बताया कि 100 सीट के लिए 300 बैड का हॉस्पिटल होना जरूरी है। वहां हमें बताया है कि वहां 250 बैड का हॉस्पिटल है। कुल मिलाकर हमें 300 बैड का हॉस्पिटल मिल जाएगा। कुलगुरु ने कहा कि अस्पताल तो हमें मिल रहा है, इसलिए उसकी लागत नहीं है, लेकिन कॉलेज बनाने के लिए कम से कम 350 से 400 करोड़ रुपए की लागत इनिशयली आएगी। उम्मीद है कि इस महीने तक इसका कुछ निर्णय हो सकता है।
आवेदन भी प्रस्तुत कर दिया गया
कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने बताया कि विश्वविद्यालय ने एक अभिनव प्रस्ताव भी रखा है। जब तक झाबुआ में मेडिकल कॉलेज का नया परिसर तैयार नहीं हो जाता, तब तक राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) के इंजीनियरिंग कॉलेज में मेडिकल कॉलेज चलाने की अनुमति मांगी गई है। विश्वविद्यालय ने नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) में इस अस्थायी व्यवस्था के लिए आवेदन भी प्रस्तुत कर दिया है। यह कदम यह सुनिश्चित करेगा कि कॉलेज की स्थापना प्रक्रिया में कोई देरी न हो और शैक्षणिक सत्र समय पर शुरू हो सके।
350 से 400 करोड़ रुपए का निवेश आवश्यक होगा
इस परियोजना की कुल लागत का अनुमान लगाया गया है। कुलगुरु ने स्पष्ट किया कि अस्पताल के अधिग्रहण से उसकी लागत अलग होगी, क्योंकि यह शासन द्वारा सौंपा जा रहा है। हालांकि, मेडिकल कॉलेज के भवन और अन्य आवश्यक बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए प्रारंभिक तौर पर 350 से 400 करोड़ रुपए का निवेश आवश्यक होगा। यह राशि कॉलेज के आधुनिक कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालय और प्रशासनिक खंड के निर्माण पर खर्च की जाएगी।
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रिकॉर्ड विश्वविद्यालय के बाहर नहीं भेजे जाएंगे
विश्वविद्यालय प्रशासन ने साफ किया है कि किसी भी गोपनीय दस्तावेज को विश्वविद्यालय परिसर से बाहर नहीं भेजा जाएगा। इसके लिए आरएनटी मार्ग स्थित नालंदा परिसर में ही संबंधित आईटी कंपनी का कार्यालय स्थापित किया जा रहा है। यह कंपनी डिजिटलीकरण का सारा कार्य विश्वविद्यालय परिसर में ही करेगी।
पुराने दस्तावेजों की हालत खराब
डीएवीवी की स्थापना 1964 में हुई थी और वर्षों से जमा रिकॉर्ड अब जर्जर होने लगा है। कई दस्तावेजों में दीमक लग चुकी है, टेबुलेशन चार्ट्स क्षतिग्रस्त हो गए हैं और जगह की भी कमी हो रही है। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय ने डिजिटल संरक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया है।
50 सालों में लाखों छात्रों का रिकॉर्ड
1970 से 2020 तक विश्वविद्यालय से लाखों छात्रों ने स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। बीए, बीकॉम, बीएससी, एमए, एमकॉम, एमएससी, बीबीए आदि पाठ्यक्रमों के छात्रों का पूरा डेटा अब डिजी-लॉकर (DigiLocker) में संरक्षित किया जाएगा।
साल 2018 से चल रही थी तैयारी
वर्ष 2018 में ही विश्वविद्यालय ने इस दिशा में पहल की थी। राजभवन द्वारा एक समिति बनाई गई थी जिसमें कई विश्वविद्यालयों के अधिकारी शामिल थे। कई सॉफ्टवेयर कंपनियों ने अपनी प्रस्तुतियां दी थीं, लेकिन कोविड-19 महामारी के चलते प्रक्रिया धीमी हो गई। अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत उच्च शिक्षा विभाग ने डेटा डिजिटलीकरण को अनिवार्य किया है।
80 हजार छात्रों का डेटा पहले से ऑनलाइन
वर्तमान में DAVV ने सत्र 2023-24 में स्नातक अंतिम वर्ष के 80 हजार छात्रों का डेटा पहले ही ऑनलाइन कर दिया है। अब यह काम पुराने रिकार्ड्स तक भी विस्तार पा रहा है।
10 महीनों में पूरा होगा कार्य
आईटी कंपनी को रिकॉर्ड डिजिटलीकरण के लिए 10 महीनों की डेडलाइन दी गई है। कार्य पूरा होने के बाद डेटा विशेष सॉफ्टवेयर में अपलोड किया जाएगा, जिसे कभी भी कर्मचारी या संबंधित विभाग देख सकेंगे। इससे न केवल प्रशासन को सुविधा होगी, बल्कि छात्रों को भी भविष्य में दस्तावेजों की आवश्यकता पड़ने पर तुरंत लाभ मिलेगा। डॉ. राकेश सिंघई, कुलगुरु, डीएवीवी ने बताया कि विश्वविद्यालय पूरी पारदर्शिता और गोपनीयता के साथ इस कार्य को शीघ्र पूरा करेगा।
]]>डीएवीवी के कुलगुरु डॉक्टर राकेश सिंघई ने बताया कि कार्य परिषद की बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि विश्वविद्यालय अपने सभी दस्तावेजों, उपाधियों, अंकसूचियों, देश-विदेश में होने वाले पत्र व्यवहार और रोजमर्रा के कामकाज में केवल 'भारत' शब्द का इस्तेमाल करेगा.
राकेश सिंघई ने कहा, यह प्रस्ताव 'एक राष्ट्र, एक नाम-भारत' की अवधारणा के तहत डीएवीवी की कार्य परिषद के एक सदस्य ने पेश किया जिसे ताली बजाकर पारित किया गया. उन्होंने कहा, डीएवीवी इस तरह का प्रस्ताव पारित करने वाला संभवतः देश का पहला विश्वविद्यालय है. राज्य सरकार के 1964 में स्थापित विश्वविद्यालय के कुलगुरु ने कहा, 'प्राचीन काल से हमारे देश का नाम भारत ही चला आ रहा है.
अंग्रेजों ने उनकी सुविधा के अनुसार दिया था 'इंडिया' नाम
उन्होंने कहा, देश को 'इंडिया' नाम अंग्रेजों ने उनकी सुविधा के अनुसार दिया था. हमें हर जगह अपने देश का मूल नाम भारत ही इस्तेमाल करना चाहिए. सिंघई ने बताया कि वह अपने विजिटिंग कार्ड पर हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में देश के नाम के तौर पर 'भारत' शब्द का इस्तेमाल लंबे समय से करते आ रहे हैं.
प्रो. गुप्ता देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ डेटा साइंस के विभागाध्यक्ष थे। पुनर्मूल्यांकन केंद्र के प्रभारी रहते हुए उन्होंने छात्रों को होने वाली समस्याओं को लेकर भी कई काम किए थे। करीब एक सप्ताह पहले उन्हें स्वाइन फ्लू डिटेक्ट होने पर निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह स्वस्थ होकर शनिवार को अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाले थे तभी दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। प्रोफेसर गुप्ता की मौत से कैंपस में माहौल गमगीन है।
विदेश से लौटकर हुए बीमार
बताया जा रहा है कि पिछले दिनों वे एक कॉन्फ्रेंस में भाग लेने विदेश गए थे। वहां से आने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और वे अस्पताल में भर्ती हुए थे। सात दिन के उपचार के बाद वे ठीक हो गए थे, शनिवार को अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाले थे तभी दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। कॉलेज स्टॉफ ने बताया कि वह बहुत ही मिलनसार व हंसमुख थे और स्टूडेंट की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। इंदौर में स्वाइन फ्लू से इस साल की यह पहली मौत है। सीएमएचओ का कहना है कि स्वाइन फ्लू की आधिकारिक रिपोर्ट आना अभी बाकी है।
कैसे होता है स्वाइन फ्लू
स्वाइन फ्लू, H1N1 वायरस के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संक्रामक रोग है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में खांसने, छींकने और खुले में थूकने से फैलता है। दूषित सतह को छूने और फिर उंगलियों का आंखें या नाक के संपर्क में आने से भी यह वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है।
स्वाइन फ्लू के लक्षण
तेज बुखार
मांसपेशियों में दर्द
गले में दर्द
खांसी, छींक आना
थकान, नाक बहना
सांस लेने में दिक्कत