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दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेता अर्जुन कपूर को बड़ी राहत देते हुए उनके व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति या संस्था उनकी अनुमति के बिना उनके नाम, छवि, आवाज या पहचान का व्यावसायिक उपयोग नहीं कर सकेगा। कोर्ट ने इस मामले में ऑनलाइन कंटेंट को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। इसके साथ ही अदालत ने टेक कंपनियों Google और Meta को निर्देश दिए हैं कि वे अर्जुन कपूर से जुड़े आपत्तिजनक या अनधिकृत कंटेंट को हटाने और उसके प्रसार को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं।
यह आदेश न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जो अभिनेता ने कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और वेबसाइट्स के खिलाफ दायर की थी। अदालत ने अपने आदेश में पाया कि अर्जुन कपूर के नाम, छवि और पहचान का बिना अनुमति व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा था। इसमें उनके नाम पर सामान बेचना, प्रचार के लिए उनकी तस्वीरों का उपयोग करना और विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन जैसे मामले शामिल थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह का अनधिकृत उपयोग उनके व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों का उल्लंघन है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इस फैसले के बाद अब किसी भी व्यक्ति या संस्था को अर्जुन कपूर की पहचान का व्यावसायिक उपयोग करने से पहले उनकी अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
हर कंटेट सिर्फ छवि या नाम के आधार पर नहीं हटा सकते
29 अप्रैल को हुई सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति से जुड़ा हर कंटेंट केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि उसमें उनका नाम या छवि शामिल है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि कोई सामग्री मानहानिकारक, अपमानजनक या अवैध रूप से व्यावसायिक उपयोग वाली हो, तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है और उसे हटाया भी जा सकता है।
अदालत ने कहा कि “सामान्य व्यक्ति व्यक्तित्व अधिकारों (Personality Rights) के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाता,” क्योंकि ऐसे अधिकारों से जुड़े विवाद आमतौर पर सार्वजनिक हस्तियों तक ही सीमित रहते हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अधिक जांच-परख और आलोचना का सामना करना पड़ता है, इसलिए उनके मामलों में संतुलन बनाकर निर्णय लेना आवश्यक होता है।
गूगल और मेटा को निर्देश
अदालत ने कहा कि अभिनेता ने अपने नाम, छवि या पहचान के इस तरह के किसी भी उपयोग के लिए कोई अनुमति या लाइसेंस नहीं दिया था। इसके बावजूद उनका नाम और तस्वीरें कई जगहों पर अनधिकृत रूप से इस्तेमाल की जा रही थीं। कोर्ट ने टेक कंपनियों Google और Meta को निर्देश दिया कि ऐसी आपत्तिजनक या गलत सामग्री को तुरंत हटाया जाए और जिन अकाउंट्स के जरिए यह कंटेंट फैलाया जा रहा है, उनकी पूरी जानकारी भी उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही अदालत ने AI से बनाए गए डीपफेक वीडियो और अश्लील सामग्री पर भी गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का दुरुपयोग न केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि उसे अपूरणीय क्षति भी पहुंचा सकता है।
क्या थी अर्जुन कपूर की मांग
अर्जुन कपूर की ओर से पेश वकील प्रवीण आनंद ने कोर्ट को बताया कि कई लोग बिना अनुमति उनके नाम और छवि का दुरुपयोग कर रहे हैं। दलील के अनुसार, कुछ मामलों में अर्जुन कपूर के नाम पर फर्जी बुकिंग की जा रही है, जबकि कुछ लोग उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल करके सामान बेचने जैसी गतिविधियों में शामिल हैं। इस याचिका में यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ टेक कंपनियों Google और Meta को भी पक्षकार बनाया गया है, ताकि अनधिकृत कंटेंट के प्रसार पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फेक न्यूज
अर्जुन कपूर की ओर से पेश वकील प्रवीण आनंद ने अदालत को बताया कि इंटरनेट पर अभिनेता से जुड़ा ऐसा कंटेंट मौजूद है जिसमें अश्लील सामग्री, फेक न्यूज और आपत्तिजनक तस्वीरें शामिल हैं। इनमें कई इमेज AI से बनाई गई या मॉर्फ्ड (बदली हुई) हैं। दलील के अनुसार, कुछ तस्वीरों में अभिनेता को जानवरों के साथ जोड़कर दिखाया गया है, जबकि कुछ में उन्हें गोलगप्पे बेचते हुए दिखाया गया है। वकील ने कहा कि यह सामग्री न तो मजाक के दायरे में आती है और न ही व्यंग्य मानी जा सकती है।
उन्होंने अदालत को बताया कि इस तरह का कंटेंट स्वीकार्य सीमाओं से बाहर जाकर अभिनेता की छवि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है। इस मामले में पहले ही कोर्ट ने व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश दिए हैं।
]]>दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी बच्चे के शिक्षा के अधिकार में उसके लिए कोई खास स्कूल चुनने का अधिकार शामिल नहीं है। कोर्ट का यह फैसला एक महिला की अपील पर आया, जिसमें उसने अपने बच्चे को ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी।
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि शिक्षा का अधिकार एक्ट एक फायदेमंद कानून है। इसे सामाजिक समावेश के लक्ष्यों को पाने और यह पक्का करने के लिए बनाया गया था कि स्कूल एक ऐसी जगह बनें, जहां जाति, नस्ल या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। कोर्ट ने 25 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा के इस अधिकार को किसी खास स्कूल को चुनने के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट का यह फैसला एक मां की अपील पर आया था, जिसमें उसने अपने बच्चे को 2024-2025 के एकेडमिक सेशन के लिए ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी।
एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी थी
अपीलकर्ता ने इससे पहले 2023-2024 के शैक्षणिक सत्र के लिए एक निजी स्कूल की पहली कक्षा में ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत अपने बच्चे के दाखिले के लिए हाई कोर्ट की एकल जज की पीठ से संपर्क किया था। इस अपील में, अपीलकर्ता ने एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि चूंकि स्कूल के पास अपीलकर्ता के बच्चे को दाखिला देने से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं था, फिर भी संबंधित शैक्षणिक वर्ष के खत्म हो जाने के कारण कोर्ट उसके बच्चे को अगले शैक्षणिक वर्ष यानी 2024-25 में एडमिशन देने का आदेश जारी करने में असमर्थ थी।
दूसरी कक्षा में प्रवेश चाहती थी महिला
एकल जज ने कहा था कि इस शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा एक में ईडब्ल्यूएस की जो सीटें खाली रह गई हैं, उन्हें अगले वर्ष इसी कक्षा के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। यदि कोई ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार आवेदन करना चाहता है, जिसमें अपीलकर्ता का बच्चा भी शामिल है तो ये सीटें उसके लिए उपलब्ध होंगी। लेकिन, अपीलकर्ता ने डिवीजन बेंच के सामने यह तर्क दिया कि उसके बच्चे को शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के लिए स्कूल में कक्षा दो में प्रवेश दिया जाना चाहिए।
डिवीजन बेंच का राहत देने से इनकार
डिवीजन बेंच ने अपील में राहत देने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा कि याचिका के लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के तहत अस्थायी दाखिला या सीट आरक्षित करने का कोई आदेश न होने की स्थिति में शैक्षणिक वर्ष समाप्त होते ही स्कूल में दाखिला पाने का
छात्र का अधिकार समाप्त हो गया।
बेंच ने यह भी कहा कि जब स्कूल ने दाखिला देने से इनकार कर दिया तो शिक्षा निदेशालय ने अपीलकर्ता के बच्चे को एक दूसरे स्कूल में समायोजित कर दिया। यह स्कूल उन पसंदीदा स्कूलों में से एक था जिन्हें अपीलकर्ता ने आवेदन पत्र भरते समय चुना था। हालांकि, कोर्ट ने यह नोट किया कि अपीलकर्ता ने दूसरे स्कूल को स्वीकार नहीं किया।
लॉटरी ड्रॉ के दौरान चुना गया नाम
अपीलकर्ता ने बताया कि मार्च 2023 में शिक्षा निदेशालय द्वारा किए गए लॉटरी ड्रॉ के दौरान उनके बच्चे का नाम एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन के लिए चुना गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह डॉक्यूमेंट्स के वेरिफिकेशन और एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए स्कूल गईं तो उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। बताया गया कि उन्हें आगे की जानकारी दी जाएगी।
वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया
कोर्ट को बताया गया कि बाद में अपीलकर्ता को सूचित किया गया कि ईडब्ल्यूएस बच्चों को तब तक एडमिशन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि जनरल कैटेगरी की सभी सीटें भर न जाएं। इसलिए उनके बच्चे को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। इसलिए, उसने एक रिट याचिका दायर की, जिसमें स्कूल को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह शिक्षा निदेशालय द्वारा लॉटरी के माध्यम से चुनी गई उम्मीदवारों की सूची के आधार पर प्रवेश दे।
नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश
अपील की सुनवाई के दौरान, शिक्षा निदेशालय के वकील ने अपीलकर्ता के बच्चे को किसी भी नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश की। अपीलकर्ता के वकील ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता आवंटित स्कूल के अलावा किसी अन्य संस्थान में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनकी ओर से कोई गलती न होने के बावजूद उनके बच्चे को प्रवेश देने से मना कर दिया गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी बच्चे के शिक्षा के अधिकार में उसके लिए कोई खास स्कूल चुनने का अधिकार शामिल नहीं है। कोर्ट का यह फैसला एक महिला की अपील पर आया, जिसमें उसने अपने बच्चे को ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी।
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि शिक्षा का अधिकार एक्ट एक फायदेमंद कानून है। इसे सामाजिक समावेश के लक्ष्यों को पाने और यह पक्का करने के लिए बनाया गया था कि स्कूल एक ऐसी जगह बनें, जहां जाति, नस्ल या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। कोर्ट ने 25 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा के इस अधिकार को किसी खास स्कूल को चुनने के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट का यह फैसला एक मां की अपील पर आया था, जिसमें उसने अपने बच्चे को 2024-2025 के एकेडमिक सेशन के लिए ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी।
एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी थी
अपीलकर्ता ने इससे पहले 2023-2024 के शैक्षणिक सत्र के लिए एक निजी स्कूल की पहली कक्षा में ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत अपने बच्चे के दाखिले के लिए हाई कोर्ट की एकल जज की पीठ से संपर्क किया था। इस अपील में, अपीलकर्ता ने एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि चूंकि स्कूल के पास अपीलकर्ता के बच्चे को दाखिला देने से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं था, फिर भी संबंधित शैक्षणिक वर्ष के खत्म हो जाने के कारण कोर्ट उसके बच्चे को अगले शैक्षणिक वर्ष यानी 2024-25 में एडमिशन देने का आदेश जारी करने में असमर्थ थी।
दूसरी कक्षा में प्रवेश चाहती थी महिला
एकल जज ने कहा था कि इस शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा एक में ईडब्ल्यूएस की जो सीटें खाली रह गई हैं, उन्हें अगले वर्ष इसी कक्षा के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। यदि कोई ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार आवेदन करना चाहता है, जिसमें अपीलकर्ता का बच्चा भी शामिल है तो ये सीटें उसके लिए उपलब्ध होंगी। लेकिन, अपीलकर्ता ने डिवीजन बेंच के सामने यह तर्क दिया कि उसके बच्चे को शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के लिए स्कूल में कक्षा दो में प्रवेश दिया जाना चाहिए।
डिवीजन बेंच का राहत देने से इनकार
डिवीजन बेंच ने अपील में राहत देने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा कि याचिका के लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के तहत अस्थायी दाखिला या सीट आरक्षित करने का कोई आदेश न होने की स्थिति में शैक्षणिक वर्ष समाप्त होते ही स्कूल में दाखिला पाने का
छात्र का अधिकार समाप्त हो गया।
बेंच ने यह भी कहा कि जब स्कूल ने दाखिला देने से इनकार कर दिया तो शिक्षा निदेशालय ने अपीलकर्ता के बच्चे को एक दूसरे स्कूल में समायोजित कर दिया। यह स्कूल उन पसंदीदा स्कूलों में से एक था जिन्हें अपीलकर्ता ने आवेदन पत्र भरते समय चुना था। हालांकि, कोर्ट ने यह नोट किया कि अपीलकर्ता ने दूसरे स्कूल को स्वीकार नहीं किया।
लॉटरी ड्रॉ के दौरान चुना गया नाम
अपीलकर्ता ने बताया कि मार्च 2023 में शिक्षा निदेशालय द्वारा किए गए लॉटरी ड्रॉ के दौरान उनके बच्चे का नाम एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन के लिए चुना गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह डॉक्यूमेंट्स के वेरिफिकेशन और एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए स्कूल गईं तो उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। बताया गया कि उन्हें आगे की जानकारी दी जाएगी।
वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया
कोर्ट को बताया गया कि बाद में अपीलकर्ता को सूचित किया गया कि ईडब्ल्यूएस बच्चों को तब तक एडमिशन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि जनरल कैटेगरी की सभी सीटें भर न जाएं। इसलिए उनके बच्चे को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। इसलिए, उसने एक रिट याचिका दायर की, जिसमें स्कूल को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह शिक्षा निदेशालय द्वारा लॉटरी के माध्यम से चुनी गई उम्मीदवारों की सूची के आधार पर प्रवेश दे।
नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश
अपील की सुनवाई के दौरान, शिक्षा निदेशालय के वकील ने अपीलकर्ता के बच्चे को किसी भी नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश की। अपीलकर्ता के वकील ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता आवंटित स्कूल के अलावा किसी अन्य संस्थान में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनकी ओर से कोई गलती न होने के बावजूद उनके बच्चे को प्रवेश देने से मना कर दिया गया था।
सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया है कि वह तीन वर्षीय और पांच वर्षीय लॉ कोर्स के लिए अनिवार्य उपस्थिति के नियमों की समीक्षा करे और उन्हें संशोधित करे। कोर्ट ने साफ कहा है कि अटेंडेंस की कमी के आधार पर छात्रों को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाना चाहिए।
जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस अमित शर्मा की बेंच ने यह आदेश एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान दिया जो 2016 में एक छात्र की कथित आत्महत्या से जुड़ा था। छात्र को कम अटेंडेंस के कारण परीक्षा देने से रोक दिया गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि लीगल एजुकेशन केवल रटने या क्लासरूम तक सीमित नहीं है। इसमें कानून को समझना, व्यवहार में लागू करना और प्रभावी ढंग से उसका इस्तेमाल करना शामिल है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ क्लासरूम में शारीरिक उपस्थिति समग्र शिक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है और यह छात्रों की क्रिएटिव फ्रीडम को भी सीमित करती है।
इन गतिविधियों को भी मिले क्रेडिट
हाई कोर्ट ने BCI से कहा है कि वह अपने नियमों में बदलाव करे और छात्रों की भागीदारी को भी अकैडमिक जुड़ाव का हिस्सा माने।
BCI को यह निर्देश दिया गया है कि छात्रों द्वारा निम्नलिखित गतिविधियों में भाग लेने के लिए भी उन्हें क्रेडिट दिया जाए:
मूट कोर्ट
सेमिनार
मॉक पार्लियामेंट
वाद-विवाद (डिबेट)
कोर्ट विजिट
कोर्ट ने कहा कि ये बदलाव नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 और यूजीसी (UGC) के 2023 के नियमों के अनुरूप होने चाहिए।
छात्रों की सुरक्षा के लिए तत्काल निर्देश-
छात्रों के जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, हाई कोर्ट ने देश भर के सभी लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटी को अंतरिम निर्देश भी जारी किए हैं। किसी भी छात्र को सिर्फ उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा देने या आगे करियर बनाने से नहीं रोका जाएगा। कोई भी लॉ कॉलेज या इंस्टीट्यूट BCI द्वारा निर्धारित न्यूनतम प्रतिशत से अधिक अटेंडेंस की शर्त नहीं लगाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने सभी यूनिवर्सिटी को शिकायत निवारण समितियां स्थापित करने और यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है कि इन समितियों में छात्रों की भागीदारी 50% हो ताकि छात्रों की समस्याओं का उचित समाधान हो सके।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन को बड़ी राहत दी है। अदालत ने ऋतिक रोशन के पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए एक अहम आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत कोर्ट ने बिना अनुमति के सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर लगाए गए पोस्ट्स के यूआरएल हटाने का निर्देश दिया है। यह कदम ऋतिक रोशन की पहचान और छवि के अनधिकृत उपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।
न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि आदेश पारित करने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुना जाएगा ताकि न्यायसंगत निर्णय लिया जा सके।
अदालत ने ऋतिक रोशन के वकील से प्रोफाइल पेजों का विवरण मांगा है और साथ ही मूल सब्सक्राइबर की जानकारी भी हासिल करने को कहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आदेश पारित करते समय सभी पक्षों की बात सामने आए और न्याय प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़े। इस मामले में अदालत ने ईबे, फ्लिपकार्ट, और टेलीग्राम जैसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की दलीलों को भी रिकॉर्ड पर लिया है। इन प्लेटफॉर्म्स ने बताया है कि कुछ पोस्ट का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है और इसलिए उन पोस्ट के यूआरएल हटाने की मांग की जा रही है।
ऋतिक रोशन की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि उनकी तस्वीरों और नाम का ऑनलाइन दुरुपयोग किया जा रहा है। इसमें कई बार उनकी पहचान से जुड़ी गलत और भ्रामक सामग्री भी शामिल है, जो उनके व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन है। इसके अलावा, कुछ लोग उनकी छवि का इस्तेमाल करके कमाई भी कर रहे हैं, जो पूरी तरह से गैरकानूनी है। इसी वजह से अभिनेता ने न्यायालय से आग्रह किया कि उनके पर्सनैलिटी राइट्स की कड़ी सुरक्षा की जाए और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बिना अनुमति उनके फोटो, वीडियो या नाम के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए।
ऋतिक रोशन के अलावा कई अन्य मशहूर हस्तियों ने भी अपने पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अदालत का रुख किया है। इनमें ऐश्वर्या राय बच्चन, अभिषेक बच्चन, करण जौहर और कुमार सानू जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने बिना अनुमति के अपनी तस्वीरों, आवाज और पहचान के इस्तेमाल को रोकने के लिए अदालत से राहत मांगी थी। अदालतों ने इन सभी को अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि उनकी पहचान का अपमानजनक या गलत तरीके से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
भारत में पर्सनैलिटी राइट्स को लेकर अभी तक कोई विशेष कानून नहीं बना है, लेकिन न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार की रक्षा करते हुए हस्तियों को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। यह अधिकार किसी भी व्यक्ति की पहचान, छवि और आवाज को बिना अनुमति के उपयोग से बचाता है।
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इसके अलावा आरोप है कि सिख्स फॉर जस्टिस ने पीएम नरेंद्र मोदी, होम मिनिस्टर अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को भी धमकी दी। यह जानकारी ट्राइब्यूनल के ऑर्डर में दी गई है, जिसे सरकार ने गजट नोटिफिकेशन के तौर पर प्रस्तुत कराया है। खुफिया एजेंसियों की ओर से तैयार नोट में कहा गया कि सिख्स फॉर जस्टिस ने भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ाया है। उसने भारत के खिलाफ हिंसा की कोशिशें की हैं और पंजाब के लोगों को उकसाने के अलावा उसने मुसलमानों और ईसाइयों को लेकर भी विवादित बयान दिए हैं। उसने तमिलों को उकसाते हुए द्रविड़िस्तान की मांग करने की बात कही। इसके अलावा मुसलमानों के लिए उर्दूस्थान की भी मांग की। इस तरह उसने अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के फर्जी प्रोपेगेंडे के नाम पर देश के टुकड़े करने वाली बातें की हैं।
यही नहीं इस संगठन ने दलितों को भी उकसाया और कहा कि भारत की सरकार उनका उत्पीड़न कर रही है। इसलिए उन्हें अलग देश की मांग का समर्थन करना चाहिए। केंद्र सरकार का कहना है कि इस संगठन ने पंजाब और हरियाणा के किसानों को कृषि बिलों के खिलाफ भड़काने की भी कोशिश की थी। इसके अलावा हिंसा प्रभावित मणिपुर में भी सिख्स फॉर जस्टिस की नापाक कोशिशों की बात सामने आई है।
सिख्स फॉर जस्टिस ने ईसाइयों और मुसलमानों को यहां उकसाया था। उसने कुकी समाज के लोगों को उकसाया, जिनमें ज्यादातर लोग ईसाई हैं। इसके अलावा मैतेई समुदाय के उन लोगों को भी उकसाया, जो मुस्लिम हैं। इन्हें पंगल कहा जाता है। बता दें कि सिख्स फॉर जस्टिस पर जुलाई 2020 में बैन लगाया गया था। इसके अलावा सरगना गुरपतवंत सिंह पन्नू को भी आतंकी घोषित किया गया था। अब उस बैन को 5 और सालों के लिए बढ़ा दिया गया है।
]]>न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह व न्यायमूर्ति अमित शर्मा की पीठ एएसआइ को जामा मस्जिद का कोई स्केच या टेबल रिकार्ड पर पेश करके यह बताने को कहा है कि मस्जिद परिसर का उपयोग किन उद्देश्य के लिए हो रहा है। अदालत ने यह भी बताने को कहा कि राजस्व और दान का उपयोग किस तरह से किया जा रहा है।
चार सप्ताह के अंदर स्थिति रिपोर्ट पेश करने का भी निर्देश
पीठ ने दिल्ली वक्फ बोर्ड को यह बताने के लिए कहा है कि क्या जामा की प्रबंध समिति के संविधान में कोई परिवर्तन किया गया है या नहीं। अदालत ने बोर्ड को जामा मस्जिद व इसके आसपास के संरक्षण या सुरक्षा के लिए सुझाव व प्रस्ताव भी पेश करने को कहा। मामले की सुनवाई 11 दिसंबर तक के लिए स्थगित करते हुए अदालत ने चार सप्ताह के अंदर स्थिति रिपोर्ट पेश करने का भी निर्देश दिया।
तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे यासीन मलिक ने हाईकोर्ट से कहा कि वह अपनी पैरवी खुद करना चाहता है। उसे किसी कानूनी परामर्श की जरूरत नहीं है। उसे इसकी अनुमति दी जाए। बेंच ने मलिक के आग्रह को मंजूर करते हुए कहा कि यासीन को अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया जाता है। वह इस मामले में अपनी दलीलें पेश करने के लिए तैयारी करे। मामले में अगली सुनवाई 19 सितंबर को दोपहर 3 बजे होगी।
वर्ष 2022 में दोषी करार दिए गए थे यासीन मलिक
उम्रकैद की सजा काट रहे यासीन मलिक को 24 मई 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने यूएपीए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत अपराधों के लिए दोषी करार दिया था। यासीन मलिक ने यूएपीए के तहत लगाए गए आरोपों सहित सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया था।
एनआईए ने की थी मौत की सजा की मांग
सजा के खिलाफ अपील करते हुए एनआईए ने कहा कि किसी आतंकवादी को केवल इसलिए उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती क्योंकि उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। मुकदमा नहीं चलाने का विकल्प चुना है। सजा को बढ़ाकर मौत की सजा में बदलने की मांग करते हुए एनआईए ने कहा है कि अगर ऐसे खूंखार आतंकवादियों को दोषी मानने के कारण मौत की सजा नहीं दी जाती है, तो सजा नीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी और आतंकवादियों को मौत की सजा से बचने का एक रास्ता मिल जाएगा।
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दिल्ली उच्च न्यायालय ओम बिरला की बेटी अंजलि की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इस दौरान कोर्ट में अंजलि बिरला के खिलाफ सोशल मीडिया पर लगातार शेयर किए जा रहे दावों का ब्यौरा दिया गया. अंजलि की तरफ से बताया गया कि तीन साल बीत जाने के बाद भी उसके खिलाफ झूठा सोशल मीडिया अभियान चलाया जा रहा है. वरिष्ठ वकील विनय सक्सेना ने कोर्ट को बताया कि सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उसकी छवि को धूमिल किया जा रहा है. इसे जारी नहीं रखा जा सकता है. इसके बाद अब दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल और एक्स को 24 घंटे के अंदर ऐसे सभी पोस्ट को हटाने का निर्देश दिया है जिनमें इस तरह के दावे किए जा रहे हैं.
क्या है मामला ?
आपको बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट में अंजलि बिरला ने मानहानि का केस दायर किया था. उन्होंने यह केस सोशल मीडिया पर लगातार हो रहे उस दावों के खिलाफ दायर किया था जिममें कहा जा रहा था कि अंजलि ने UPSC परीक्षा अपने पिता के प्रभाव के कारण पास की है. इससे पहले अंजलि ने उनके खिलाफ लगातार लग रहे आरोपों के बेबुनियाद बताते हुए कहा था कि इस तरह की बातें एक षड़यंत्र के तरह चलाई जा रही हैं और उनके पिता की छवि खराब करने की कोशिश हो रही है.
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की बेटी अंजलि बिरला भारतीय रेलवे कार्मिक सेवा (IRPS) की अधिकारी हैं. सोशल मीडिया में उनके खिलाफ लगातार हो किए जा रहे दावों के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उन्होंने ऐसे सभी सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने की मांग की थी.
इस मामले में अंजलि ने कोर्ट से तत्काल सुनवाई की मांग की थी. जिसके बाद कोर्ट ने अब गूगल और X से उनके खिलाफ ऐसे सभी पोस्ट को हटाने का आदेश जारी कर दिया है. यह एक अंतरिम आदेश है, जो अगले आदेश तक वैध है. मामले की अगली सुनवाई अब 15 अक्टूबर को होगी.
]]>क्या है पूरा मामला
पटियाला हाउस कोर्ट के एक सेशन जज ने अभियोजन की पुनर्विचार याचिका पर यह आदेश पारित किया था, जो मामले में आरोप तय करने को लेकर ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोलंकी के खिलाफ बाकी धाराओं में अपराध के आरोप तो तय किए, पर उसे आर्म्स एक्ट के सेक्शन 30 के तहत अपराध के आरोप से बरी कर दिया था।
क्या बोले जस्टिस नवीन चावला
जस्टिस नवीन चावला ने अपने जजमेंट में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आर्म्स एक्ट के सेक्शन 30 के तहत अपराध के आरोप से बरी करके भारी गलती की थी, जिसे बाद में एएसजे ने ठीक कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि आर्म्स एक्ट के सेक्शन 30 के तहत लाइसेंस या रूल के उल्लंघन में की गई हरकत के लिए सजा का प्रावधान है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी आर्म्स रूल का उल्लंघन, जिसके लिए कहीं किसी सजा का जिक्र न हो, आर्म्स एक्ट के सेक्शन 30 के तहत अपने आप में एक दंडनीय अपराध है। क्योंकि आर्म्स एक्ट का रूल 32(3) पब्लिक प्लेस पर हथियार ले जाने से रोकता है।
26 फरवरी 2021 में दर्ज हुआ था केस
मौजूदा केस 26 फरवरी 2021 में दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वह जब अपने घर से बाहर आया, तो उसने देखा कि बाहर गैस पाइपलाइन बिछाने का काम चल रहा था और याचिकाकर्ता (सोलंकी) मजदूरों को काम करने से रोक रहा था। आपत्ति जताने पर वह शिकायतकर्ता से ही लड़ने लगा। आरोप के मुताबिक, उसने अपने बैग से लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाली और शिकायतकर्ता पर तानते हुए उसे जान से मारने की धमकी दी। शिकायतकर्ता ने वहां पुलिस को बुला लिया, जिसने याचिकाकर्ता से उसकी रिवाल्वर लेकर उसे जब्त कर लिया। हाई कोर्ट ने कहा कि मौजूदा केस में, याचिकाकर्ता पर सार्वजनिक रूप से हथियार लहराने का आरोप है। उसके पास से कथित तौर पर छह कारतूस जब्त किए गए हैं। इसलिए, प्रथम दृष्टया उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 336 के तहत अपराध का मामला बनता है।
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