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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court)को एक्सपर्ट कमेटी के चेयरमैन ने अवगत कराया कि कान्हा टाइगर रिजर्व में रखे गए जंगली हाथी को 15 दिन में छोड़ दिया जाएगा। विदेश से मंगाई गई कॉलर आइडी पहनाई जाएगी। ताकि उसकी ट्रैकिंग की जा सके। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने उक्त जानकारी को रिकार्ड पर ले लिया। साथ ही शहडोल से पकड़कर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व लाए गए हाथी की मौत को गंभीरता से लेते हुए राज्य शासन को फटकार लगाई। याचिका रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने दायर की थी।
कोर्ट ने मांगा 30 साल का पूरा विवरण
एमपी कोर्ट ने निर्देश दिया कि जंगली हाथियों को पकड़ने की प्रक्रिया में वाइल्ड लाइफ एक्ट का पालन किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को नियत की गई। जंगली हाथियों को पकड़ने को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देशित किया था कि पिछले 30 वर्षों में पकड़े गए हाथियों का पूरा विवरण पेश किया जाए। सरकार की तरफ से पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2017 से अब तक 10 जंगली हाथियों को पकड़ा गया है। जिसमें से दो हाथियों को विदेश से मंगवाई गई कालर आइडी पहनाकर छोड़ दिया।
अब हाथियों की होगी एक पहचान
अब तक आपने बाघों के अलग-अलग नाम सुने होंगे, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी बाघों के अलग-अलग नाम रखे गए हैं. उनकी एक अलग आइडेंटिफिकेशन है. उनकी पूरी हिस्ट्री प्रबंधन के पास होती है, और जरूरत पड़ने पर एक ही झटके में ये किस तरह का टाइगर है, इसका व्यवहार कैसा रहता है, कहां-कहां मोमेंट रहता है, सब कुछ जानकारी मिल जाती है. ठीक उसी तरह से अब हाथियों की भी एक अलग पहचान बनाई जा रही है. मध्य प्रदेश में बांधवगढ टाइगर रिजर्व में ही ऐसा पहली बार हो रहा है जहां हाथियों को आईडेंटिफाई किया जा रहा है. उनको एक अलग नाम दिया जा रहा है, जिसकी शुरुआत भी हो चुकी है.
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उपसंचालक पीके वर्मा बताते हैं कि, ''हाथियों को नाम देने का काम, उनकी आइडेंटिटी बनाने का काम 25 मई से शुरु कर दिया है और जब तक पूरा नहीं हो जाएगा तब तक यह काम किया जाएगा. ये इसलिए किया जा रहा है कि अब लंबे वक्त से हाथी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में परमानेंट तौर पर निवास कर रहे हैं और वे बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के ही हो चुके हैं. इसलिए उनका आइडेंटिफिकेशन भी जरूरी है. उनका इतिहास, उनका डाटा तैयार करना ताकि एक क्लिक पर उनके बारे में सब कुछ जाना जा सके. इसी के लिए उनकी एक आईडी जेनरेट की जा रही है, जिससे उनकी एक इंडिविजुअल पहचान हो सकेगी. हम उन्हें एक अलग नाम दे देंगे, एक अलग आईडी दे देंगे. जैसे टाइगर का t1 T2 होता है ठीक इसी तरह से हाथियों का भी एक कोड वर्ड होगा और उनका एक अलग नाम होगा, और उसी नाम से वो जाना जाएगा.''
कैसे होगी पहचान ?
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उप संचालक बताते हैं कि, ''हाथियों की पहचान करने के लिए उनके जो शरीर में मार्क्स होते हैं, उस आधार पर उनको पहचान दी जाएगी. जैसे किसी हाथी का कान फोल्ड होता है, किसी का कान कटा होता है, कोई तस्कर होता है, किसी का दांत उठा हुआ होता है, किसी का टेढ़ा-मेढ़ा होता है, किसी का टूटा हुआ होता है. इसके अलावा पीठ की पॉजीशन किसी की फ्लैट होती है, किसी का उठा हुआ होता है. किसी के पूंछ में बाल नहीं होते हैं. किसी के पूंछ कटे होते हैं, हर हाथी के कुछ ना कुछ मार्क्स होते हैं. उनकी यूनिक पहचान होती है. इस आधार पर उनका आइडेंटिफिकेशन किया जा रहा है.
क्या होगा फायदा?
हाथियों का आईडेंटिफिकेशन कर देने से, उनको एक अलग नाम दे देने से आखिर क्या फायदा होगा. इसे लेकर उपसंचालक बताते हैं कि, ''उनकी एक अलग पहचान हो जाने से हम उन्हें ट्रैक कर पाएंगे. उनके हर मूवमेंट पर नजर रख पाएंगे. साथ ही हमारे पास हर हाथी का डाटा होगा, उसके बारे में पूरी जानकारी होगी. साल भर किस तरह का व्यवहार करता है, कौन सा हाथी कनफ्लिक्ट में शामिल रहता है, कौन शांत रहता है, कौन किस दिशा में किस सीजन में कहां मूवमेंट करता है. कौन सा हाथी हर्ड (झुंड) के साथ ही रहता है, कौन सा हर्ड के बाहर जाता है. किस तरह का व्यवहार होता है ये सब कुछ पता रहेगा तो हाथियों की देखरेख में भी मदद मिलेगी.''
जब बांधवगढ़ के हुए हाथी
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथी पिछले कई सालों से छत्तीसगढ़ से होकर संजय गांधी टाइगर रिजर्व के कॉरिडोर वाले रास्ते से बांधवगढ़ आते जाते रहे हैं. पहले स्थाई तौर पर नहीं रहते थे, आते थे चले जाते थे. लेकिन साल 2018 में जब बांधवगढ टाइगर रिजर्व में 40 हाथियों का एक दल पहुंचा, उसके बाद से यहीं रह गए और फिर वापस नहीं गये. इनकी संख्या में लगातार इजाफा होता गया और अब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में ही इन्होंने अपना नया ठिकाना बना लिया है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की पहचान बाघों के साथ-साथ हाथियों के लिए भी होने लगी है.
बांधवगढ़ में अभी कितने हाथी ?
बांधवगढ टाइगर रिजर्व में अभी कितने हाथी हैं इसे लेकर टाइगर रिजर्व के उप संचालक पीके वर्मा बताते हैं कि, ''40 से 50 के लगभग हाथी हैं. कुछ महीने पहले 10 साथियों की डेथ हो गई थी और 5 से 10 हाथी ऐसे हैं जिनका मूवमेंट इधर-उधर होता रहता है. कभी आते हैं, कभी चले जाते हैं. लगभग 50 हाथी परमानेंट तौर पर रह रहे हैं. अभी जब इनका आइडेंटिफिकेशन किया जा रहा है तो यह और अच्छी बात होगी कि इनका एक्चुअल डाटा भी निकल कर सामने आ जाएगा.''
हाथियों को बांधवगढ़ क्यों पसंद आया?
आखिर हाथियों को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ही क्यों पसंद आया? इसे लेकर कुछ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि, ''हाथियों की मेमोरी पावर बहुत ज्यादा होती है और उन्हें पीढ़ियों की चीजें याद रहती हैं, वो अपने रास्ते कभी नहीं भूलते हैं. जब कभी भी उन्हें कहीं पर थोड़ा अनसिक्योर लगता है, जंगल में मानव दखल बढ़ने लगता है, या उनके लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है, तो उस स्थान को छोड़कर वो दूसरी सुरक्षित जगह की तलाश में निकल जाते हैं. बांधवगढ टाइगर रिजर्व भी उनके लिए बेस्ट सुरक्षित जगह में से एक है.''
''उसकी वजह ये है कि बांधवगढ टाइगर रिजर्व में घना और बड़ा जंगल है. कई छोटी-छोटी नदियां हैं. साल भर पीने के लिए पर्याप्त पानी रहता है. उनका पसंदीदा भोजन बांस के जंगल की भरमार है, और सबसे बड़ी बात वो यहां खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. अभी उतना मानव दखल नहीं है, जिसके चलते हाथियों ने बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व को अपना नया ठिकाना बना लिया. जाहिर सी बात है, जब किसी भी जीव को सुरक्षित वातावरण मिलेगा, खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलेगा, रहने के लिए बेहतर संसाधन मिलेंगे, पीने के लिए पर्याप्त पानी मिलेगा तो फिर वो उस जगह को कभी नहीं छोड़ेगा. बांधवगढ टाइगर रिजर्व में भी हाथियों के लिए कुछ ऐसा ही है.''
बाघ-हाथी एक ही जंगल में साथ-साथ
भारत में हाथी केरल, कर्नाटक, असम जैसी जगहों पर बहुतायात में पाए जाते हैं. बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान और राजाजी नेशनल पार्क हाथियों के लिए ही फेमस है. लेकिन अब जिस तरह से बांधवगढ टाइगर रिजर्व में हाथियों की एंट्री हुई है, और लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही है, वो मध्य प्रदेश के इस टाइगर रिजर्व को अलग बना रही है. क्योंकि अब ये प्रदेश का ऐसा टाइगर रिजर्व बनता जा रहा है, जहां बाघ और हाथी साथ-साथ देखे जा सकते हैं. अब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पर्यटकों को बाघ के साथ हाथियों के भी दीदार होंगे. इतना ही नहीं कई बार तो ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें एक ओर बाघ मस्त अंदाज में बैठा हुआ है, तो वहीं दूसरी ओर हाथी मदमस्त चाल में जा रहे हैं. बीच में पर्यटक खड़े होकर उनकी तस्वीर निकाल रहे हैं. ऐसी तस्वीर देश में बहुत कम ही देखने को मिलती हैं, जो इस बार बांधवगढ टाइगर रिजर्व में देखने को मिला.
बांधवगढ़ कितना बड़ा है
मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में मौजूद है बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, जो 1536 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एरिया है. जिसमें 716 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र और 820 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल है. यहां पर कई जीव जंतु पशु पक्षी पाए जाते हैं, जो आकर्षण का केंद्र है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व बाघों का गढ़ है. लेकिन अब यह हाथियों के गढ़ से भी पहचाना जाने लगा है. यहां बारहसिंघा भी बसाए जा रहे हैं. बायसन भी लाये जा रहे हैं. चीता, तेंदुआ भालू इनके लिए भी खास पहचान रखता है बांधवगढ़. साथ ही यहां कई ऐसे जीव जंतु, पशु पक्षी, पेड़ पौधे पाए जाते हैं जो बहुत ही यूनिक है. अलग अलग प्रजातियों के गिद्धों के लिए भी बांधवगढ़ अब अपनी पहचान बना रहा है.
एप से आम लोगों को भी हर पल हाथियों की लाइव लोकेशन के साथ ही नोटिफिकेशन मिलेंगे। इससे उस क्षेत्र के लोग सतर्क हो सकेंगे। बता दें कि नवंबर 2024 में मप्र में पहली बार दो जंगली हाथियों को रेडियो कालर पहनाई गई थी। ये हाथी दल में शामिल रहते हैं। वन विभाग का दल इनकी लाइव लोकेशन भेजेगा।
ग्रामीणों पर हमले की हो चुकी हैं घटनाएं
यह भी बता दें कि पिछले कुछ दिनों में गांवों और ग्रामीणों पर हमले की तमाम घटनाएं हो चुकी हैं। हाथियों के हमले में कई लोग जान गंवा चुके हैं। इससे लोगों में हाथियों के प्रति गुस्सा है। अक्टूबर 2024 में उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में तीन दिनों के अंदर दस हाथियों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत का मामला देशभर में सुर्खियों में रहा था।
तब इस घटना को मानव-हाथी द्वंद्व का परिणाम कहा गया था। बाद में जांच में पता चला था कि हाथियों की मौत विषाक्त कोदो खाने से हुई थी। यही कारण है कि वन विभाग चाहता है कि द्वंद्व न हो। ग्रामीण और हाथी दोनों सुरक्षित रहें। इसके लिए अब एप का सहारा लिया जा रहा है।
सात साल पहले झारखंड और छग से आया था 60 हाथियों का दल
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में अगस्त 2018 में झारखंड और छत्तीसगढ़ से आया 60 हाथियों का दल अब यहीं का हो गया है। दल के यहीं बसने से उमरिया, अनूपपुर, शहडोल, मंडला, डिंडौरी और बालाघाट जिलों के जंगली क्षेत्र से लगे गांवों में आए दिन इनकी दहशत की खबरें आती रहती हैं। खासकर कच्चे घरों में रहने वाले ग्रामीणों को हर समय बड़ी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
जब हाथी घर के पास पहुंच जाते हैं तब इनकी मौजूदगी पता चलती है। हाथी दल अनाज खाने के साथ ही घरों को तोड़कर भी चले जाते हैं। अब एप में आए नोटिफिकेशन के मिलते ही खतरे का आकलन हो सकेगा और बचाव के उपाय किए जा सकेंगे। इससे मानव-हाथी द्वंद्व की स्थिति से बचा जा सकेगा।
मप्र के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्ड लाइफ) सुभरंजन सेन का कहना है कि गजरक्षक एप न सिर्फ उन क्षेत्रों में रहने वालों की सुरक्षा के लिए है जहां जंगली हाथियों का ज्यादा प्रभाव है, बल्कि हाथी-मानव द्वंद्व में कमी लाने और हाथी-मानव सुरक्षा के लिए भी है।
अब तक हुए यह प्रयास
सोलर पावर फेंसिंग, सेंसर अलार्म, हाथी मित्र दलों का गठन, वॉट्सएप ग्रुप बनाकर मॉनीटरिंग, जागरूकता के लिए स्थानीय स्तर और राष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाएं की जा चुकी हैं।
]]>शहडोल संभाग में हाथियों का मूवमेंट
पिछले कुछ समय से शहडोल संभाग में लगातार हाथियों का मूवमेंट देखने को मिल रहा है. यह हाथी कभी अनूपपुर में धमाचौकड़ी मचाते हैं, तो कभी शहडोल में चहलकदमी करते नजर आते हैं. वर्तमान में छत्तीसगढ़ से आए हुए ये हाथी अनूपपुर के रास्ते उमरिया होते हुए शहडोल पहुंचे हैं. जो कि शहडोल जिला मुख्यालय से लगे ग्राम ऐन्ताझर के जंगलों में पहुंच गए हैं.
ऐन्ताझर जंगल में चहलकदमी करते दिखे हाथी
ऐन्ताझर के फॉरेस्ट गार्ड राजनाथ बैगा ने बताया कि ''4 हाथी सोमवार तड़के सुबह ऐन्ताझर पहुंचे हैं, सभी हाथी अभी जंगल में हैं. उनकी हम लगातार निगरानी कर रहे हैं." जानकारी के अनुसार, हाथियों ने शहडोल जिले के बैगिन टोला निवासी चंद्रवती बैगा के घर को नुकसान पहुंचाया है. साथ ही कुछ जगहों पर पेड़ पौधे को भी नुकसान पहुंचाया है.
हाथियों ने विचारपुर में बिताई छुट्टी
बता दें कि, हाथी छत्तीसगढ़ से पहले अनूपपुर जिले में आए, जहां कुछ गांवों में जमकर धमाचौकड़ी मचाने के बाद अहिरगमा रेंज से होते हुए उमरिया जिले के घुनघुटी रेंज में पहुंच गए. यहां से शहडोल के विचारपुर गांव पहुंचे. जहां बीते रविवार को पूरे दिन रहे. फिर यहां से सोमवार तड़के सुबह ऐन्ताझर के जंगलों में पहुंच गए हैं.
छत्तीसगढ़ वापस लौटने की राह
चारों हाथी व्यस्क और दंतैल बताए जा रहे हैं. फिलहाल ये सभी पतखई घाट के रास्ते छत्तीसगढ़ वापस लौटने की राह पर नजर आ रहे हैं. हालांकि वन विभाग की टीम एक्टिव हो गई है. साउथ डीएफओ श्रद्धा प्रेंद्रे ने कहा, "छत्तीसगढ़ से 4 हाथी ऐन्ताझर जंगल में पहुंच गए हैं. ये सभी अनूपपुर के रास्ते उमरिया होते हुए यहां तक पहुंचे हैं."
उन्होंने आगे बताया कि "वन विभाग की टीम लगातार इन हाथियों पर नजर बनाए हुए हैं, उनकी निगरानी में वन विभाग की टीम को तैनात किया गया है. लोगों को इनसे डरने की बजाए सतर्क रहना चाहिए. जंगल की ओर जाने से लोग बचें और हाथियों को देखने पर उनके साथ छेड़छाड़ न करें."
]]>शहडोल से बूढ़ा बाउर ग्राम पंचायत के कुआं गांव में पहुंचे थे हाथी
शहडोल जिले की जंगलों में एक हफ्ते से मूवमेंट कर रहे जंगली ही हाथियों का दल बीती रात मैहर जिले के रामनगर तहसील अंतर्गत बूढ़ा बाउर ग्राम पंचायत के गांव कुआं पहुंच गया। जहां विद्युत विभाग की हाइट टेंशन के तार में चपेट में आने से एक मेल हाथी की मौत हो गई है। अभी क्षेत्र में चार जंगली हाथियों का मूवमेंट बताया जा रहा है।
पीएम के लिए पन्ना से डॉक्टर संजय गुप्ता को मौके पर बुलाया गया
मुकुंदपुर रेंज की सभी बीट की टीमों को अन्य चार जंगली हाथियों की तलाश के लिए लगाया गया है। जबकि पीएम के लिए पन्ना से डॉक्टर संजय गुप्ता को मौके पर बुलाया गया है।
टीमों को अन्य चार जंगली हाथियों की तलाश के लिए लगाया गया …
अन्य जंगली हाथी करंट के चपेट में ना आए इसके लिए सुबह ही मुकुंदपुर रेंज के आसपास के गांव की विद्युत सप्लाई बंद कराई गई है।
लगातार टीम में अन्य चार की संख्या मौजूद हाथियों के दल को खोज रहा है। हाथी की मौत की सूचना पाकर मैहर कलेक्टर रानी बाटड मौके के पर पहुंची।
उन्होंने पूरे घटनाक्रम की न केवल जानकारी ली बल्कि अन्य जंगली हाथियों की तलाश के लिए जरूरी दिशा निर्देश भी जारी किया है।
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सामान्य वनमंडल के एक ही रेंज में मादा बाघ के साथ हाथियों के मूवमेंट ने वन विभाग की मुश्किलें बढ़ा दी है। मादा बाघ के रिहायशी क्षेत्र में मूवमेंट व हाथियों के द्वारा घरों व फसलों को नुकसान पहुंचाए जाने से ग्रामीण दहशत में है। वन्यजीवों के बढ़ते मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए आस-पास के विद्यालयों में 25 से 29 नवंबर तक पांच दिन का अवकाश घोषित कर दिया गया है। वहीं इन वन्यजीवों पर लगातार नजर रखी जा रही है। इनकी निगरानी के लिए तीन रेंज का अमला तैनात किया गया है।
घर से ना निकलने की सलाह
खौफ के चलते ग्रामीण खेत, बाजार और स्कूलों से दूरी बना रहे हैं। वन अमला भी ग्रामीणों को घर से नहीं निकलने की समझाइश दे रहा है। बता दें, शुक्रवार से पश्चिम करंजिया वन परिक्षेत्र अंतर्गत ठाढ़ पथरा वन ग्राम में मादा बाघ का मूवमेंट बना हुआ है। शुक्रवार सुबह संभर पिता गुलौआ गौड़ के घर के सामने बछिया का शिकार किया था। इसके बाद वन विभाग ने ट्रैप कैमरा लगाया, जिसमें दूसरी बार यहां पहुंची मादा बाघ ट्रैप हुई। फोटो और वीडियो को देखने के बाद बताया गया कि बाघिन की उम्र तीन साल है।
हाथियों का उत्पात एक सप्ताह से जारी
ग्राम पंचायत पंडरी पानी व ढाढ़पथरा के गांवों अम्हादादर, झिरिया बहरा, इमली टोला व चकरार में हाथियों का उत्पात एक सप्ताह से जारी है। हाथी के दल ने अब ग्राम चकरार के किसानों के खेत की खड़ी फसल को खाकर चौपट करने के साथ शेष खड़ी फसलों को रौंद दिया। वहीं बाघिन की सतत मौजूदगी से ग्रामीण भय में हैं और सर्दी में भी रात जागरण कर रहे हैं।
फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हाथी
जंगली हाथियों का दल लगातार चकरार, उद्दौर, आम्हा, पंडरीपानी, ख्हारखुदरा, चकमी, ठाढपथरा, इमली टोला सहित दर्जनों गांव में फसलों के साथ घरों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। शनिवार रात हाथियों ने चकरार में प्रमिला गौंड, दिनेश पिता धनेश्वर और दिनेश पिता सुखदेव सिंह नामक किसानों की फसल को क्षति पहुंचाई है।
कड़कड़ाती ठंड से दोगुनी मार
वर्तमान में जिन क्षेत्रों में हाथियों के दल ने आतंक मचा रखा है वहां के ग्रामीणों चैन सुकून छिन गया हैं। वनांचल के लोगों की मानें तो वे दिन किसी तरह से तो गुजार लेते हैं लेकिन रात होते ही उनके घरों पर हाथियों के हमले का डर सताने लगता हैं। ऐसे में अपनी जान की सलामती के लिए कच्चे मकानों को यूं ही भगवान भरोसे छोड़ मकानों की छतों पर कड़कड़ाती ठंड में तंबू तान रात काटने मजबूर हैं। शुक्रवार की रात में पंडरी पानी, कांदाटोला, केंद्रा बहरा व ठाढ़पथरा के लोगों ने हमले की आशंका से जहां छत में बैठकर जागरण किया वहीं कुछ युवाओं ने अपने घरों की निगरानी के लिए रतजगा किया। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों का दल दिन भर जंगल के आसपास रुका रहता हैं, लेकिन शाम होते ही आबादी में घुस रहें हैं ऐसे स्थिति में ग्रामीण बहुत भयभीत हैं।
बाजारों में कराई गई मुनादी
हाथी और बाघिन के आतंक का वनांचल क्षेत्र ग्रामीणों के मन में फिलहाल डर बैठा हुआ है। फलस्वरूप अब लोग रात की बजाए दिन में भी सुरक्षा की दृष्टि से सूनसान इलाकों में जाने से बच रहें हैं। ग्रामीणों का मानना हैं कि जब तक इन वन्य प्राणियों का यहां से गमन नहीं हो जाता तब तक इस क्षेत्र में इनके हमले की आशंका बरकरार है। ऐसी स्थिति में वे किसी भी सूरत में जान जोखिम में डालकर कोई काम नहीं करना चाहते।
इसी क्रम में रविवार को ग्राम पंडरी पानी के साप्ताहिक बाजार में पंचायत द्वारा खतरे को भांपते हुए दुकानदार व ग्राहकों को सतर्क और जागरूक करने के उद्देश्य से कोटवार के माध्यम से मुनादी कराकर सचेत किया गया। पंचायत सचिव दिलीप कुमार मरावी ने बताया कि दो सप्ताह से लगातार इसी प्रकार मुनादी कराई जा रही हैं।
रविवार को एक बार फिर मुनादी के बाद जहां सूर्यास्त के पहले दुकानदारों व बाजार करने आए लोग बाजार बंद कर घर की ओर चले गए। रविवार का साप्ताहिक बाजार आम दिनों की अपेक्षा समय से पहले दिन डूबने के पूर्व ही बंद हो गया।
मटके का पानी पी गई बाघिन
बाघिन ने दो दिन पूर्व शिकार करने के बाद पुनः शनिवार की रात आबादी के अंदर पहुंचकर गौशाला में बंधे पशुओं का शिकार करने का प्रयास किया। इस दरमियान बाघिन ने मटके में रखे पानी को पीकर अपनी प्यास बुझाई है। ग्रामीणों ने बताया कि वह सभी पास के मकान की छत पर वह सुरक्षित होने के लिहाज से बैठ रहे।
रात्रि में ज बाघिन ने गौशाला के नजदीक पहुंचकर पशुओं को ले जाने के चक्कर में झपट्टा मारी तो आहट और पशुओं द्वारा चिल्लाने की आवाज आने लगी। तब हमारे द्वारा टार्च के रोशनी और हल्ला मचाया गया। तब बाघिन वहां से हटकर अरहर के खेत में रात भर डेरा जमाएं रहीं और सुबह उजाला होने के पूर्व जंगल में चली गई।
]]>फसलों को पहुंचा रहे नुकसान
बता दें, हाथियों का यह दल क्षेत्र में टमाटर और धान की फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है, जिससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर रहा है. ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल मदद की मांग की है. बता दें, सरगुजा में हाथियों का आतंक कोई नई बात नहीं है, लेकिन ठंड के इस मौसम में यह समस्या ग्रामीणों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है.
वहीं और वन विभाग की टीम लगातार ग्रामीणों को सतर्क रहने व हाथियों से दूर रहने की सलाह दे रही है और साथ ही हाथियों को जंगल की ओर खदेड़ने की कोशिश कर रही है. वन विभाग की अपील है कि ग्रामीण किसी भी परिस्थिति में हाथियों के करीब न जाएं और आस-पास हाथी दिखाई देने पर विभाग को तत्काल सूचित करें.
]]>मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों की रहस्यमय मौत के मामले में एनजीटी ने खुद संज्ञान लिया है। एनजीटी ने इस मामले में कई अधिकारियों को नोटिस जारी किए हैं। इनमें प्रधान मुख्य वन संरक्षक (मध्य प्रदेश), मुख्य वन्यजीव व warden (एमपी), कलेक्टर (उमरिया), भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के निदेशक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सचिव शामिल हैं।
एक सप्ताह में मांगी रिपोर्ट
वहीं, एनजीटी ने सभी को एक हफ्ते के अंदर, अगली सुनवाई से पहले, जवाब दाखिल करने को कहा है। यह मामला शुरुआत में एनजीटी की प्रधान पीठ के सामने आया था, जिसे बाद में केंद्रीय पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया। एनजीटी के आदेश में उन रिपोर्टों का हवाला दिया गया है जो बांधवगढ़ में 10 हाथियों की मौत को दूषित कोदो बाजरा खाने से जोड़ती हैं।
ये हैं शुरुआती वजह
शुरुआती जांच से पता चलता है कि मौतें बाजरा में मायकोटॉक्सिन संदूषण के कारण हुई हो सकती हैं। प्रभावित क्षेत्र से नमूने आगे के विश्लेषण के लिए दो प्रयोगशालाओं में भेजे गए थे, उत्तर प्रदेश में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान और मध्य प्रदेश के सागर में एक फोरेंसिक लैब।
मायकोटॉक्सिन का पड़ता है प्रभाव
एनजीटी के आदेश में आगे कहा गया है कि कोदो बाजरा, जो भारत के कई हिस्सों में मुख्य भोजन है, अपने उच्च फाइबर और खनिज सामग्री के लिए जाना जाता है। हालांकि, जब यह मायकोटॉक्सिन से संक्रमित हो जाता है। खासकर मानसून के मौसम में नमी की स्थिति में तो इसमें फंगल संक्रमण हो सकता है। यह संदूषण मनुष्यों और जानवरों दोनों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। इससे लीवर और किडनी खराब हो सकती है और साथ ही गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं भी हो सकती हैं।
कोदो को ठहराया जा रहा जिम्मेदार
यह आरोप लगाया गया है कि बांधवगढ़ में हाथियों ने दूषित कोदो बाजरा या उसके उपोत्पादों का सेवन किया होगा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें जहर मिला होगा। माना जा रहा है कि फंगल संदूषण से उत्पन्न मायकोटॉक्सिन से हाथियों की मौत हुई है। एनजीटी ने इस तरह के व्यापक प्रभावों के बारे में चिंता व्यक्त की है। उसने कहा कि इससे वन्यजीवों और पशुधन दोनों को खतरा हो सकता है जो दूषित फसल के संपर्क में आ सकते हैं।
इस फैसले का दिया हवाला
एनजीटी ने यह भी कहा कि यह घटना संभावित रूप से वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का उल्लंघन हो सकती है, जो महत्वपूर्ण पर्यावरणीय अनुपालन मुद्दों को जन्म देती है। ट्रिब्यूनल ने मामले को स्वत: संज्ञान लेने के अपने अधिकार पर जोर दिया। इसके लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के नगर निगम ग्रेटर मुंबई बनाम अंकिता सिन्हा और अन्य (2021 एससीसी ऑनलाइन एससी 897) के मामले में फैसले का हवाला दिया।
एक सप्ताह में जवाब मांगा
अपने आदेश के हिस्से के रूप में, एनजीटी ने राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों को अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले ट्रिब्यूनल की केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ के समक्ष हलफनामे के रूप में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रतिवादी अपने कानूनी वकील की सलाह के बिना जवाब दाखिल करता है, तो उसे ट्रिब्यूनल की सहायता के लिए वर्चुअली उपस्थित रहना होगा।
यह मामला भोपाल में केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण इस पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया था। मूल केस रिकॉर्ड को तदनुसार अग्रेषित करने का निर्देश दिया गया था।
]]>मध्य प्रदेश में चीते और बाघ की तर्ज पर अब हाथियों को भी सैटेलाइट कॉलर लगाये जायेंगे. सैटेलाइट कॉलर लगाने से हाथियों की लोकेशन का पता चल सकेगा. वन विभाग के एपीसीसीएफ एल. कृष्णमूर्ति ने बताया कि हाथी झुंड में रहते हैं. इसलिए सैटेलाइट कॉलर झुंड के किसी एक हाथी को लगाई जाएगी.
इसकी मॉनिटरिंग कॉरिडोर वाले जिलों के डीएफओ और वाइल्ड लाइफ मुख्यालय स्थित कंट्रोल कमांड सेंटर से होगी. उन्होंने बताया कि हाथियों की लोकेशन पता करने के लिए नई व्यवस्था की जा रही है. यदि हाथी गांव की तरफ जाते हैं तो उन्हें मैनेज कर जंगल की तरफ हांका जाएगा.
सैटेलाइट कॉलर लगाने के लिए कर्नाटक वाइल्ड लाइफ मुख्यालय ने स्वीकृति दे दी है. बताया जा रहा है कि कर्नाटक में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में लगभग 160 हाथी हैं. आंकड़ों के मुताबिक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 70 हाथी हैं. वहीं, संजय डुबरी नेशनल पार्क में 25 हाथियों का डेरा है. हाथियों को मैनेज करने का गुर सीखने अधिकारियों का दो दल मैसूर और कोयम्बटूर जाएगा.
अब हाथियों को लगाये जायेंगे सैटेलाइट कॉलर
दोनों दलों में कान्हा, संजय दुबरी, बांधवगढ़, उमरिया, मंडला, सीधी, शहडोल, अनूपपुर, मंडला सहित अन्य हाथी कॉरिडोर और प्रभावित इलाकों के डीएफओ शामिल हैं. सैटेलाइट कॉलर लगाने से जंगल के पास रहने वाली आबादी को बड़ी राहत मिलेगी. जंगली हाथी के गांव की तरफ जाने पर मैनेज कर जंगल की तरफ हांक दिया जाएगा. वन विभाग की तरफ से लोगों को भी जागरूक करने का काम किया जाएगा. बता दें कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 10 हाथियों की रहस्मयी मौत के बाद मध्य प्रदेश सरकार भी गंभीर है. हाथियों की मौत ने मध्य प्रदेश के वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के 10 हाथियों की मौत मामले फॉरेंसिक रिपोर्ट आ गयी है.
]]>मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में मरे दस हाथियों के नमूनों की फोरेंसिक लैब रिपोर्ट जल्द ही आएगी. इससे मौत के कारणों की साफ वजह सामने आ जाएगी.
अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एल कृष्णमूर्ति ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि नमूने सागर स्थित राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और जबलपुर व नागपुर की प्रयोगशालाओं में भेजे गए हैं.
एपीसीसीएफ ने कहा, "हमें भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), बरेली की रिपोर्ट पहले ही मिल चुकी है. एफएसएल सागर, जबलपुर और नागपुर की रिपोर्ट भी जल्द ही आ जाएगी और इससे मौत के कारणों के बारे में और जानकारी मिलेगी."
कृष्णमूर्ति हाथियों की मौत की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित पैनल के प्रमुख हैं.
बता दें कि 29 अक्टूबर को उमरिया जिले के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में चार हाथी मृत पाए गए थे. बाद में मरने वालों की संख्या बढ़कर दस हो गई थी.
आईवीआरआई की रिपोर्ट के अनुसार, विसरा में न्यूरोटॉक्सिन साइक्लोपियाज़ोनिक एसिड पाया गया था, लेकिन कोई कीटनाशक या कीटनाशक नहीं था. इससे साफ पता चलता है कि कोई जहर नहीं था, बल्कि जहर बड़ी मात्रा में खराब हो चुके कोदो बाजरे के पौधों के खाने से हुआ था.
रिजर्व में बचे हुए तीन हाथियों के बारे में पूछे जाने पर कृष्णमूर्ति ने कहा कि वन विभाग की टीमें उनकी गतिविधियों पर नज़र रख रही हैं. एक बच्चा हाथी कटनी की ओर बढ़ गया था और उस पर नज़र रखी जा रही थी.
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कोरबा जिले में कटघोरा से चोटिया नेशनल हाईवे के बीच ग्राम मड़ई के पास का दृश्य लोगों की सांस थाम कर रखने वाला रहा। बच्चों सहित दंतैल और हाथियों का दल इस पार से सड़क पार कर उस पार के जंगल को जाने निकला था। जानकारी होने पर दोनों तरफ से आवागमन रुकवाया गया। दोपहिया से लेकर चार पहिया और भारी वाहनों के पहिये थमे रहे।
इतनी संख्या में हाथियों को नजदीक से देखने का रोमांच के साथ भय भी रहा कि जरा से कोई गड़बड़ी हुई और हाथी बिदक गए तो भगदड़ के हालात बन कर जान जोखिम में पड़ना तय था। लोगों ने सूझबूझ का परिचय दिया और बिना उग्र हुए, बिना धैर्य खोए हाथियों को छेड़छाड़ किए बगैर सड़क पार करने दिया। हालांकि थोड़ा बहुत शोर होता रहा लेकिन सभी हाथी बिना नुकसान पहुंचाए जंगल के भीतर चले गए। स्थानीय लोगों की माने तो कई बार सड़क पर करते हुए हाथीयो का झुंड नजर आता है लेकिन इस बार इतने हाथियों को एक साथ समूह में सड़क पार करते हुए पहली बार देखा गया है। जहां इस घटना के बाद सड़क के दोनों तरफ वाहनों की लंबी कतार लग गई। वहीं, लोग इस दृश्य को अपने मोबाइल में भी कैद करते नजर आए। अगर हाथियों का झुंड मुख्य सड़क पर आता या किसी तरह का उत्पादत मचाता तो बड़ी घटना घट सकती थी।
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