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भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में नदियों को मात्र जल स्रोत नहीं, बल्कि देवी के रूप में पूजा जाता है। इनमें गंगा का स्थान सर्वोपरि है। गंगा दशहरा या गंगावतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला प्रमुख त्यौहार है। इस दिन को गंगा दशहरा, गंगा दशमी या दशहरा के नाम से जाना जाता है। यह पर्व गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। दरअसल, गंगा दशहरा जल के प्रति कृतज्ञता का पर्व है.
गंगा यानी पवित्र-साफ जल के इसी महत्व को समझते हुए यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने जल संरक्षण को एक राष्ट्रीय जन आंदोलन का रूप दिया है। उन्होंने जल को विकास का प्रमुख पैरामीटर बनाते हुए हर घर जल और जल है तो कल है के संकल्प को साकार किया। उनके नेतृत्व में जल शक्ति मंत्रालय का गठन, जल जीवन मिशन, नमामी गंगे, अमृत सरोवर मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी ऐतिहासिक पहल हुईं, जिन्होंने देश की जल सुरक्षा को नई दिशा दी है।
अमृत सरोवर योजना ने जल संरक्षण को नया आयाम दिया। प्रत्येक जिले में 75 जलाशयों के निर्माण या पुनरुद्धार का लक्ष्य रखा गया। अब तक 70 हजार से अधिक अमृत सरोवर तैयार हो चुके हैं। इनसे वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज और सिंचाई सुविधा बढ़ी है। यह मिशन आजादी का अमृत महोत्सव का हिस्सा है और सामुदायिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। नमामी गंगे परियोजना, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, नदी फ्रंट विकास और जैव विविधता संरक्षण के कार्य भी हो रहे हैं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजनाके तहत प्रति बूंद अधिक फसल का मंत्र दिया गया, जिसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा मिला। कैच द रेन अभियान ने वर्षा जल संचयन को जन आंदोलन बनाया। प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा कि पानी बचाना स्वच्छ भारत मिशन की तरह सामूहिक दायित्व है। उनके मार्गदर्शन में लाखों जल संरचनाएं बनीं, चेकडैम, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार हुआ।
इन प्रयासों का परिणाम साफ दिखता है। भूजल रिचार्ज बढ़ा है, ओवर-एक्सप्लॉइटेड इकाइयों की संख्या घटी है और कई जिलों में जल संकट कम हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी का विजन केवल बुनियादी ढांचा निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि जल संरक्षण को संस्कृति और आदत बनाने का है। वे बच्चों को वाटर वॉरियर्स बनाने और समाज को जिम्मेदार बनाने पर जोर देते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जल संरक्षण भारत की विकास यात्रा का अभिन्न अंग बन गया है। ये प्रयास न केवल वर्तमान की जरूरतें पूरी कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल-समृद्ध भारत का आधार तैयार कर रहे हैं। जल संरक्षण अब मात्र नीति नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बन चुका है।
मध्यप्रदेश भी, जिसे प्राकृतिक जल संसाधनों से समृद्ध माना जाता है, जल संरक्षण की दिशा में अनुकरणीय पहल कर रहा है। जल गंगा संवर्धन अभियान एक राज्य स्तरीय जन आंदोलन है। वर्ष 2025 में यह अभियान 19 मार्च से 30 जून तक चलाया गया। चालू वर्ष-2026 में भी यह अभियान पूरे जोर-शोर से चल रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य जल स्रोतों का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन करना है, ताकि प्रदेश जल संकट से मुक्त हो सके।अभियान के तहत नदियों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों, चेकडैम और अन्य जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार, गहरीकरण, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। नए जल स्रोतों का निर्माण, वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज और पुरानी जल संरचनाओं का पुनरुद्धार अभियान के प्रमुख स्तंभ हैं। प्रदेश में 10 हजार से अधिक चेकडैम और स्टॉपडैम के संधारण, हजारों तालाबों के गहरीकरण, नई जल संरचनाओं का निर्माण और लगभग 2,500 करोड़ रुपये की लागत से बड़े पैमाने पर कार्य किए जा रहे हैं। ग्राम पंचायतों, नगरीय निकायों, जनप्रतिनिधियों, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
मध्यप्रदेश कृषि प्रधान राज्य है। यहां की अर्थव्यवस्था और किसानों की समृद्धि जल पर निर्भर है। बढ़ती जनसंख्या, अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट और जल प्रदूषण ने जल संकट को गहरा दिया है। इस अभियान का महत्व इन्हीं चुनौतियों के समाधान में निहित है।
अभियान से वर्षा जल का अधिकतम संचयन होता है, जिससे सिंचाई सुविधा बढ़ती है। भूजल स्तर में वृद्धि से सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भी फसल उत्पादन संभव होता है। खेत तालाबों, रिज-टू-वैली मॉडल और जल संरक्षण संरचनाओं से किसानों की आय बढ़ रही है।
मध्यप्रदेश में प्राचीन बावड़ियां, तालाब और जल संरचनाएं सांस्कृतिक धरोहर हैं। उनका जीर्णोद्धार सांस्कृतिक गौरव बढ़ाता है और पर्यटन को बढ़ावा देता है।अभियान जनभागीदारी पर आधारित है। पानी चौपाल जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलें, ड्रिप सिंचाई और आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। इससे जल संरक्षण की संस्कृति विकसित हो रही है। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी से सामुदायिक जिम्मेदारी बढ़ रही है।
इस अभियान से मध्यप्रदेश जल संरक्षण में देश का अग्रणी राज्य बन रहा है। अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में भारी वृद्धि, नदियों का पुनःप्रवाह और लाखों जल संरचनाओं का निर्माण राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
यह अभियान केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प है।यशस्वी प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में यह जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने में सफल हो रहा है।यह मध्यप्रदेश के भविष्य की नींव है। यह हमें सिखाता है कि जल ही जीवन है और उसकी रक्षा हमारा दायित्व है। यदि हम आज जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां समृद्ध जल संसाधनों का उपयोग कर सकेंगी। प्रदेशवासियों को इस अभियान से जुड़कर जल संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए। स्वच्छ, समृद्ध और जल-सम्पन्न मध्यप्रदेश का सपना तभी साकार होगा जब हर नागरिक इसमें अपना योगदान देगा।
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कब है गंगा दशहरा 2026?
इस साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 25 मई 2026 को सुबह 04 बजकर 30 मिनट पर हो रही है. वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 26 मई 2026 को सुबह 05 बजकर 10 मिनट पर होगा. शास्त्रों के अनुसार, उदया तिथि और 25 मई को पूरे दिन रवि योग होने के कारण गंगा दशहरा का महापर्व 25 मई 2026 (सोमवार) को ही मनाया जाएगा.
गंगा स्नान और पूजा के शुभ मुहूर्त
गंगा दशहरा पर पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है. इस दिन के विशेष शुभ मुहूर्त कुछ इस तरह हैं.
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:04 बजे से 04:45 बजे तक (स्नान के लिए सर्वोत्तम)
प्रातः सन्ध्या मुहूर्त: सुबह 04:24 बजे से 05:26 बजे तक
हस्त नक्षत्र का प्रारंभ: 26 मई को सुबह 04:08 बजे से
रवि योग: 25 मई को पूरे दिन रहेगा.
क्यों मनाया जाता है यह पर्व?
धार्मिक कथाओं के अनुसार, धरती पर अवतरित होने से पहले मां गंगा ब्रह्मा जी के कमंडल में निवास करती थीं. राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उद्धार के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ने पृथ्वी पर आना स्वीकार किया. राजा भगीरथ के भगीरथ प्रयासों के कारण ही इस पावन दिन को गंगा दशहरा या भगीरथी जयंती के रूप में भी जाना जाता है.
दस प्रकार के पापों से मिलती है मुक्ति
दशहरा शब्द का अर्थ है दस पापों को हरने वाला. माना जाता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के 10 प्रकार के पाप (3 कायिक यानी शारीरिक, 4 वाचिक यानी वाणी के और 3 मानसिक पाप) पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं. यदि आप गंगा नदी नहीं जा सकते, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं.
गंगा दशहरा पूजा विधि और दान का महत्व
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और मां गंगा का ध्यान करते हुए 'ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः' मंत्र का जाप करें. इसके बाद मां गंगा को धूप, दीप, फूल और नैवेद्य अर्पित करें. गंगा दशहरा के दिन दान करने का विशेष महत्व है. इस दिन राहगीरों को ठंडा पानी या शरबत पिलाना, सत्तू, मटका (घड़ा), पंखा, कपड़े और अन्न का दान करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है.
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि जल ही जीवन है और जल संरक्षण ही सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रेरक मार्गदर्शन में जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत पानी को सहेजने के कार्य में जन-जन को जोड़ा जा रहा है। मध्यप्रदेश में जनभागीदारी आधारित जल संचय अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंक नहीं बल्कि प्रदेशवासियों की जागरूकता, सहभागिता और भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। जल संरक्षण और प्रकृति अनुरूप रहन-सहन की व्यवस्था भारतीय जीवनशैली और परम्पराओं में सदियों से रची-बसी है। हमारे यहां नदी-तालाब-कुंओं की साफ-सफाई को पुण्य कार्य माना गया है। इन गतिविधियों के धार्मिक महत्व को देखते हुए गंगा दशहरा 25 मई को जल स्त्रोतों के आस-पास साफ-सफाई और पौधरोपण के लिए श्रमदान तथा अन्य गतिविधियां संचालित की जाएंगी। इन गतिविधियों का पुण्य प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक नागरिक गंगा दशहरा पर अपने आस-पास के जल स्त्रोतों और जल संरचनाओं की साफ-सफाई तथा रखरखाव के कार्य से जुड़ें। जनसामान्य की यह पहल मध्यप्रदेश को जल संरक्षण में एक आदर्श व अनुकरणीय राज्य के रूप में देश में प्रस्तुत करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शनिवार यह विचार कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में व्यक्त किए।
जल स्त्रोतों की बेहतरी के लिए पारिवारिक और व्यक्तिगत स्तर पर भी पहल करना जरूरी
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल संचय भागीदारी अभियान में मध्यप्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम रहा है। अभियान के अंतर्गत प्रदेश में 5 लाख 64 हजार 119 कार्य पूर्ण हुए हैं। जिला स्तर पर डिण्डौरी और खण्डवा जिले देश में क्रमश: प्रथम और द्वितीय रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को बेहतर, सुरक्षित और सस्टेनेबल धरती सौंपना हमारा दायित्व है, जो बिना पर्याप्त जल की उपलब्धता के संभव नहीं है। अत: जल संरक्षण के कार्य में जन-जन को जोड़ना जरूरी है। उन्होंने पंचायतों, नगरीय निकायों, सामाजिक-धार्मिक संगठनों, स्वंयसेवी संस्थाओं, स्व-सहायता समूहों, व्यापारिक संगठनों तथा अन्य सभी संस्थाओं से पानी बचाने की गतिविधियों में जुड़ने का आहवान किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पानी बचाने और जल स्त्रोतों की बेहतरी के लिए पारिवारिक और व्यक्तिगत स्तर पर पहल करने के लिए भी लोग आगे आएं।
जल संरक्षण के लिए स्कूल, कॉलेज और संस्थाएं कर रही हैं जन-जन को प्रेरित
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत राज्य सरकार, नगरीय और ग्राम स्तर पर अनेक गतिविधियां संचालित कर रही है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने 2 लाख 43 हजार 887 कार्यों के लिए 6 हजार 232 करोड़ रूपए की स्वीकृति प्रदान की है। प्रदेश में 45 हजार 132 खेत-तालाब, 68 अमृत सरोवर, 77 हजार 975 डगवेल रिचार्ज औ वॉटर शेड से संबंधित 3 हजार 346 कार्य पूर्ण किए जा चुके हैं। नगरीय क्षेत्र में भी तालाबों, कुंओं, बावड़ियों को अतिक्रमण मुक्त करने, नाले-नालियों की साफ-सफाई आदि का कार्य जारी है। नगरीय निकायों द्वारा 3 हजार 40 रेन वॉटर हार्वेस्टिंग इकाईयां स्थापित की गई हैं। जन सहयोग से बड़े पैमाने पर प्याऊ सेवा संचालित की जा रही हैं। स्कूल, कॉलेजों और जन अभियान परिषद से जुड़ी संस्थाओं के माध्यम से जन-जन को अभियान से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
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