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पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी के बाद ग्रेच्युटी रोकने के मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट Gwalior Highcourt ने अहम फैसला सुनाया है। सिंगल बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति या बर्खास्तगी मात्र से उसकी ग्रेच्युटी नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि ग्रेच्युटी कोई खैरात नहीं, बल्कि कर्मचारी की वर्षों की सेवा से अर्जित संपत्ति है। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की बेंच ने कंपनी को निर्देश दिए कि मृत कर्मी की पत्नी को सेवा समाप्ति की तारीख से वास्तविक भुगतान तक ब्याज सहित ग्रेच्युटी Gratuity राशि तीन माह के भीतर दी जाए। आदेश का पालन नहीं करने पर कंपनी को एक लाख रुपए हर्जाना भी देना होगा।
न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी भुगतान रोकने स्पष्ट कानूनी प्रावधान जरूरी
कोर्ट ने कंपनी की दलील खारिज कर कहा, कंपनी कार्यालय ग्वालियर और इंदौर दोनों स्थानों पर हैं। साथ ही याची 55 वर्षीय विधवा हैं। आठ वर्ष से न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसे में सिर्फ तकनीकी आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी Gratuity भुगतान रोकने स्पष्ट कानूनी प्रावधान जरूरी है। सेवा समाप्ति के आधार पर कर्मी, आश्रितों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
विभागीय जांच के बाद 27 मार्च 2014 को सेवाएं समाप्त कर दी
याची मुबीना खान के पति शाजापुर में बिजली कंपनी में भृत्य थे। नियुक्ति 1995 में आकस्मिक कर्मचारी के रूप में हुई थी। 1997 में सेवाएं नियमित कर दी गईं। 2009 में अस्वस्थ होने के कारण वे बिना सूचना ड्यूटी से अनुपस्थित हो गए। विभागीय जांच के बाद 27 मार्च 2014 को सेवाएं समाप्त कर दी गईं। दिसंबर 2016 में कर्मी का निधन हो गया। इस पर मुबीना ने फंड और अन्य सेवा लाभों के लिए विभाग को नोटिस भेजा।
यह कहते हुए ग्रेच्युटी देने से इनकार कर दिया कि कर्मी को बर्खास्त किया जा चुका
कंपनी ने यह कहते हुए ग्रेच्युटी Gratuity देने से इनकार कर दिया कि कर्मी को बर्खास्त किया जा चुका था। 2018 में उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कंपनी की ओर से दलील दी गई कि विभागीय जांच में कर्मचारी दोषी पाए गए थे, इसलिए वे ग्रेच्युटी के पात्र नहीं हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि कर्मचारी शाजापुर में पदस्थ थे और कंपनी का मुख्यालय इंदौर में है, इसलिए ग्वालियर खंडपीठ में याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
14 साल बाद लागू हुआ नियम
वन विभाग में काम करने वाले सभी स्थायी और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी इस नए नियम के दायरे में आएंगे। पहले, 1972 के ग्रेच्युटी अधिनियम के तहत, उन्हें केवल 3.5 लाख रुपये ही मिलते थे। लेकिन अब, केंद्र सरकार के 2010 के नए अधिनियम के अनुसार, उन्हें अधिकतम 10 लाख रुपये तक ग्रेच्युटी मिल सकेगी। मध्य प्रदेश में 14 साल बाद यह नियम लागू हुआ है।
कर्मचारी मंच के पदाधिकारियों ने जताई खुशी
मध्य प्रदेश कर्मचारी मंच के प्रांताध्यक्ष अशोक पांडे ने बताया कि वे लंबे समय से इस बदलाव की मांग कर रहे थे। वन विभाग में ग्रेच्युटी अधिनियम 1972 के तहत स्थाई कर्मियों एवं दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति एवं मृत्यु होने पर अभी तक तीन लाख 50 हजार रुपये ग्रेजुएटी भुगतान की जा रही थी। यह नया नियम वन विभाग में लागू होने के बाद, अब उम्मीद है कि जल्द ही अन्य सरकारी विभागों में भी इसे लागू कर दिया जाएगा।
अशोक पांडे ने आगे कहा, 'केंद्र सरकार ने ग्रेच्युटी अधिनियम 1972 के स्थान पर नए ग्रेजुएटी अधिनियम 2010 प्रतिस्थापित कर दिए हैं। जिसके तहत कर्मचारियों को ग्रेजुएटी साढे़ तीन लाख के स्थान पर अधिकतम 10 लाख रुपए भुगतान किए जाने की निर्देश है लेकिन मध्य प्रदेश में 14 साल बाद भी नए ग्रेजुएटी अधिनियम लागू नहीं किए गए हैं।'
क्या होता है ग्रेच्युटी
यह फैसला कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की बात है। इससे उन्हें अपने भविष्य के लिए बेहतर वित्तीय सुरक्षा मिलेगी। ग्रेच्युटी एक तरह का बोनस होता है जो कर्मचारी को लंबी सेवा के बाद मिलता है। यह रिटायरमेंट के बाद जीवन-यापन में मदद करता है या फिर परिवार के सदस्यों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है अगर कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है।
केंद्र सरकार लाई थी 2010 का ग्रेच्युटी अधिनियम
यह 2010 का ग्रेच्युटी अधिनियम केंद्र सरकार द्वारा लाया गया था। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को बेहतर ग्रेच्युटी लाभ प्रदान करना था। इस अधिनियम के तहत, ग्रेच्युटी की गणना कर्मचारी के अंतिम वेतन और सेवा के वर्षों के आधार पर की जाती है। अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये तय की गई है।
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