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पासपोर्ट ही तय करते हैं कि आप दुनिया के कितनों हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। आपके पासपोर्ट तय करते हैं कि आपको किन देशों में वीजा फ्री एंट्री मिल सकती है या आपको किसी और देश में पहुंचने के लिए कितनी मशक्कत का सामना करना पड़ता है। हेनली पासपोर्ट इंडेक्स अलग अलग डेटा के आधार दुनिया भर के पासपोर्ट की ताकत को रैंक करता है। यह रैंकिंग इस आधार पर तय की जाती है कि किसी देश के नागरिक बिना वीजा के कितने देशों में जा सकते हैं। हेनली पासपोर्ट इंडेक्स-2026 की रिपोर्ट आ गई है जिसमें भारत के पासपोर्ट ने छलांग लगाई है जबकि अमीर देश इस लिस्ट में फिसलते नजर आ रहे हैं।
सिंगापुर के लोग अपने पासपोर्ट से 192 देशों में पहुंच सकते हैं इसलिए इस लिस्ट में इसे सबसे ऊपर रखा गया है। पासपोर्ट की रैंकिंग जियो-पॉलिटिक्स, अर्थव्यवस्था, भौगोलिक स्थिति, राजनीतिक स्थिरता समेत कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। हेनली पासपोर्ट इंडेक्स से पता चलता है कि भारतीय पासपोर्ट की स्थिति मजबूत हुई है। भारत अब 85वें स्थान से लंबी छलांग लगाकर 75वें पायदान पर पहुंच गया है।
एशिया और यूरोप के सबसे 'ताकतवर' पासपोर्ट
सिंगापुर पहले नंबर पर है और उसके बाद दूसरे सबसे मजबूत पासपोर्ट के लिए तीन देशों के बीच बराबरी है। जापान, दक्षिण कोरिया और संयुक्त अरब अमीरात। इन तीनों देशों के लोग बिना वीजा के 187 देशों की यात्रा कर सकते हैं। पूर्वी या दक्षिण-पूर्वी एशिया के बाहर UAE का पासपोर्ट सबसे मजबूत है। हालांकि इसमें एक खास बात ध्यान रखने लायक है। सिंगापुर, जापान या दक्षिण कोरिया के लोगों के विपरीत UAE के नागरिकों को अमेरिका में बिना वीजा के जाने की सुविधा नहीं मिलती है।
टॉप-10 शक्तिशाली पासपोर्ट वाले देश
1- सिंगापुर
2- जापान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात
5- नॉर्वे, स्विट्जरलैंड
7- यूरोपीय यूनियन, मलेशिया, यूनाइटेड किंगडम
10- ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड
अंतरराष्ट्रीय यात्रा के शौकीनों के लिए एक अच्छी और एक थोड़ी चौंकाने वाली खबर है। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पासपोर्ट पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली हो गया है। भारत ने वैश्विक रैंकिंग में 10 अंकों का सुधार किया है और अब वह 75वें स्थान पर काबिज है लेकिन इस बढ़ती ताकत के बीच दो देशों ईरान और बोलीविया ने भारतीयों के लिए एंट्री के नियम कड़े कर दिए हैं।
रैंकिंग में सुधार, पर दो रास्तों पर लगा ब्रेक
भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग सुधरने का मतलब है कि दुनिया के देशों के बीच भारत की साख बढ़ी है। हालांकि रैंकिंग में ऊपर चढ़ने के बावजूद यात्रियों के लिए एक झटका भी लगा है। भारत ने ईरान और बोलीविया में मिलने वाली वीजा-फ्री (बिना वीजा एंट्री) की सुविधा खो दी है।
ईरान: सुरक्षा और मानव तस्करी बनी वजह
ईरान ने नवंबर 2025 में भारतीयों के लिए वीजा-फ्री एंट्री की सुविधा को खत्म कर दिया था। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार ईरान में मानव तस्करी और धोखाधड़ी के मामले बढ़ रहे थे। कई भारतीयों को फर्जी नौकरी के बहाने ईरान बुलाया जा रहा था। अब भारतीयों को ईरान जाने से पहले अनिवार्य रूप से वीजा लेना होगा।
बोलीविया: ई-वीजा का नया चक्कर
दक्षिण अमेरिकी देश बोलीविया ने भी अपने नियमों में बदलाव किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश के पासपोर्ट की स्थिति कई छोटे देशों से खराब है। उदाहरण के लिए, रवांडा (78वां), घाना (74वां) और अजरबैजान (72वां) – ये सभी भारत से आगे हैं, जबकि भारत विश्व की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। पिछले एक दशक में भारत की रैंक अक्सर 80 के आसपास ही रही है और 2021 में तो यह 90वें स्थान तक फिसल गई थी। वहीं एशियाई देश जैसे जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर लगातार शीर्ष स्थानों पर बने हुए हैं।
सिंगापुर फिर शीर्ष पर, भारत 57 वीजा-फ्री देशों तक सीमित
इस साल भी सिंगापुर शीर्ष स्थान पर है, जिसके नागरिक 193 देशों में बिना वीजा यात्रा कर सकते हैं। दक्षिण कोरिया 190 देशों और जापान 189 देशों में वीज़ा-फ्री पहुंच रखते हैं। इसके मुकाबले भारतीय पासपोर्ट धारक केवल 57 देशों में बिना वीजा यात्रा कर सकते हैं – जो अफ्रीकी देश मॉरिटानिया के बराबर है। दोनों देशों को 85वां स्थान मिला है।
पासपोर्ट ताकत का मतलब क्या है
पासपोर्ट रैंकिंग का मतलब सिर्फ यात्रा की सुविधा नहीं, बल्कि एक देश की सॉफ्ट पावर का आईना है। हेनली एंड पार्टनर्स द्वारा जारी यह इंडेक्स इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के आंकड़ों पर आधारित है, जो 199 देशों के 227 गंतव्यों तक वीजा-मुक्त पहुंच मापता है। पासपोर्ट की ताकत किसी देश की सॉफ्ट पावर, कूटनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान को दर्शाती है। एक मजबूत पासपोर्ट का अर्थ है कि उसके नागरिकों को अधिक यात्रा स्वतंत्रता, बेहतर व्यापारिक अवसर और आसान वैश्विक गतिशीलता मिलती है। कमजोर पासपोर्ट का सीधा मतलब है ज्यादा कागजी प्रक्रिया, ऊंचे वीजा शुल्क, कम यात्रा सुविधाएं और लंबा इंतजार।
देश बढ़ा रहे हैं आपसी वीजा साझेदारी
दिलचस्प बात यह है कि भारत की रैंक गिरने के बावजूद वीजा-फ्री देशों की संख्या बढ़ी है। 2014 में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी, भारत के लिए 52 देश वीजा-फ्री थे। 2023 तक यह संख्या बढ़कर 60 और 2024 में 62 हो गई थी। हालांकि 2025 में यह घटकर फिर 57 रह गई। फिर भी, 2015 और 2025 दोनों में भारत की रैंक समान (85वीं) है। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया भर में वैश्विक गतिशीलता तेजी से बढ़ रही है। हेनली एंड पार्टनर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 में औसत यात्री 58 देशों में बिना वीजा जा सकता था, जबकि 2025 में यह औसत 109 देशों तक पहुंच गया है।
दुनिया के देश अब अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए द्विपक्षीय यात्रा समझौतों पर जोर दे रहे हैं। चीन इसका बेहतरीन उदाहरण है- 2015 में 94वें स्थान से 2025 में 60वें पर पहुंचा, क्योंकि उसने 50 से 85 देशों तक वीजा-मुक्त पहुंच बढ़ाई। भारत ने 2015 के 52 देशों से 2025 तक 57 तक पहुंच बढ़ाई, लेकिन अन्य देशों की तेज प्रगति ने रैंकिंग को नीचे धकेल दिया।
भारत की रैंकिंग में गिरावट के कारण
भारत की रैंक जुलाई 2025 में 77वीं थी, जब भारतीय नागरिकों को 59 देशों में वीजा-फ्री एंट्री मिल रही थी। लेकिन अक्टूबर तक दो देशों ने यह सुविधा वापस ले ली, जिससे रैंक गिरकर 85वीं पर पहुंच गई। बीबीसी के मुताबिक, भारत के पूर्व राजदूत अचल मल्होत्रा ने कहा कि पासपोर्ट की ताकत पर कई अन्य कारक भी असर डालते हैं- जैसे आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता, और देश की प्रवासन नीति।
उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में भारतीयों को कई पश्चिमी देशों में बिना वीजा यात्रा की अनुमति थी, लेकिन 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन और आंतरिक उथल-पुथल के बाद स्थिति बदल गई। अब कई देश आव्रजन (इमिग्रेशन) को लेकर अधिक सतर्क हैं। भारत से बड़ी संख्या में लोग विदेश जाकर बस जाते हैं या वीजा अवधि से अधिक रुकते हैं, जिससे देश की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
वीजा नीतियों में सख्ती भी एक कारण है। पश्चिमी देशों जैसे यूएस, यूके और कनाडा ने अवैध प्रवास, ओवरस्टे और फर्जी आवेदनों के डर से भारतीय यात्रियों पर कड़े नियम थोपे हैं। रेडिट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर चर्चाओं में कई यूजर्स का कहना है कि भारतीय पर्यटक अक्सर स्थानीय संस्कृति का सम्मान नहीं करते या बारगेनिंग की आदतें साथ ले जाते हैं, जिससे देश वीजा छूट देने से हिचकते हैं।
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