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कैश कांड मामले में नाम आने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी। इसी बीच जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को ये फैसला लिया है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर नकदी मिली थी। इसे लेकर विवाद गहरा गया और उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी।
जस्टिस वर्मा ने क्यों लिया ये फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। इससे पहले, उनके आवास पर कथित तौर पर कैश मिलने को लेकर हुए विवाद के बाद, उनका दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद तबादला कर दिया गया था। उन्होंने 5 अप्रैल, 2025 को शपथ ली थी, और फिलहाल उनके खिलाफ आरोपों के संबंध में एक आंतरिक जांच चल रही है, जिसके चलते उन्हें संसद की ओर से पद से हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने की भी संभावना है।
कैश कांड में कब आया था जस्टिस वर्मा का नाम
जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से 15 मार्च 2025 को 500 रुपए के जले और अधजले नोट मिले थे। इसका एक वीडियो भी खूब वायरल हुआ था। इसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उन्होंने आरोपों से इनकार किया और उसे साजिश बताया था। हालांकि, मामले ने तूल पकड़ा, विवाद संसद तक पहुंच गया था।
जब संसद तक पहुंच गया जस्टिस वर्मा का मामला
बीते साल संसद के मानसून सत्र में 145 लोकसभा सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लेकर आए।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही खेमे के सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव को लेकर लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा।
इन सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत यह कदम उठाया।
इस ज्ञापन को कांग्रेस, टीडीपी, जेडीयू, जेडीएस, जनसेना पार्टी, एजीपी, शिवसेना (शिंदे), एलजेएसपी, एसकेपी, सीपीएम सहित विभिन्न दलों का समर्थन प्राप्त था।
जिन 145 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, उनमें अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी, राजीव प्रताप रूडी, पीपी चौधरी, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल शामिल थे।
145 सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए फैसला लिया गया कि संसद इन आरोपों की जांच करेगी।
महाभियोग प्रस्ताव के तहत आगे की प्रक्रिया संसद में विचार-विमर्श और जांच के बाद तय की जाएगी।
सीजेआई के नेतृत्व में शुरू हुई थी इंटरनल जांच
वहीं इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच शुरू की थी। जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए हाई कोर्ट के तीन न्यायाधीशों का पैनल भी बनाया था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस यशवंत वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट करने की सिफारिश की थी।
जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुआ था ट्रांसफर
इसके बाद सरकार ने इस सिफारिश पर अपनी मुहर लगाई और वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यभार संभालने के लिए कहा गया था। 5 अप्रैल 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी जस्टिस वर्मा के ट्रांसफर को लेकर सवाल उठाए गए। इस मुद्दे पर घमासान लगातार जारी था इसी बीच शुक्रवार को जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में बढ़ा विवाद, अब जस्टिस वर्मा का इस्तीफा
कैश कांड मामले में नाम आने के बाद दिल्ली से जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कर दिया गया। विधि मंत्रालय ने एक अधिसूचना में उनके ट्रांसफर की घोषणा की गई थी। इसके बाद जज यशवंत वर्मा इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए थे। उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम ने जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी। उस समय कहा गया था कि यह कदम होली की रात उक्त न्यायाधीश के आधिकारिक आवास में आग और कथित तौर पर नकदी मिलने के मामले में आंतरिक जांच के आदेश से अलग है
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कैश कांड मामले में नाम आने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी। इसी बीच जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को ये फैसला लिया है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर नकदी मिली थी। इसे लेकर विवाद गहरा गया और उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी।
जस्टिस वर्मा ने क्यों लिया ये फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। इससे पहले, उनके आवास पर कथित तौर पर कैश मिलने को लेकर हुए विवाद के बाद, उनका दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद तबादला कर दिया गया था। उन्होंने 5 अप्रैल, 2025 को शपथ ली थी, और फिलहाल उनके खिलाफ आरोपों के संबंध में एक आंतरिक जांच चल रही है, जिसके चलते उन्हें संसद की ओर से पद से हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने की भी संभावना है।
कैश कांड में कब आया था जस्टिस वर्मा का नाम
जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से 15 मार्च 2025 को 500 रुपए के जले और अधजले नोट मिले थे। इसका एक वीडियो भी खूब वायरल हुआ था। इसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उन्होंने आरोपों से इनकार किया और उसे साजिश बताया था। हालांकि, मामले ने तूल पकड़ा, विवाद संसद तक पहुंच गया था।
जब संसद तक पहुंच गया जस्टिस वर्मा का मामला
बीते साल संसद के मानसून सत्र में 145 लोकसभा सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लेकर आए।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही खेमे के सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव को लेकर लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा।
इन सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत यह कदम उठाया।
इस ज्ञापन को कांग्रेस, टीडीपी, जेडीयू, जेडीएस, जनसेना पार्टी, एजीपी, शिवसेना (शिंदे), एलजेएसपी, एसकेपी, सीपीएम सहित विभिन्न दलों का समर्थन प्राप्त था।
जिन 145 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, उनमें अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी, राजीव प्रताप रूडी, पीपी चौधरी, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल शामिल थे।
145 सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए फैसला लिया गया कि संसद इन आरोपों की जांच करेगी।
महाभियोग प्रस्ताव के तहत आगे की प्रक्रिया संसद में विचार-विमर्श और जांच के बाद तय की जाएगी।
सीजेआई के नेतृत्व में शुरू हुई थी इंटरनल जांच
वहीं इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच शुरू की थी। जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए हाई कोर्ट के तीन न्यायाधीशों का पैनल भी बनाया था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस यशवंत वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट करने की सिफारिश की थी।
जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुआ था ट्रांसफर
इसके बाद सरकार ने इस सिफारिश पर अपनी मुहर लगाई और वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में कार्यभार संभालने के लिए कहा गया था। 5 अप्रैल 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी जस्टिस वर्मा के ट्रांसफर को लेकर सवाल उठाए गए। इस मुद्दे पर घमासान लगातार जारी था इसी बीच शुक्रवार को जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में बढ़ा विवाद, अब जस्टिस वर्मा का इस्तीफा
कैश कांड मामले में नाम आने के बाद दिल्ली से जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कर दिया गया। विधि मंत्रालय ने एक अधिसूचना में उनके ट्रांसफर की घोषणा की गई थी। इसके बाद जज यशवंत वर्मा इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए थे। उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम ने जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी। उस समय कहा गया था कि यह कदम होली की रात उक्त न्यायाधीश के आधिकारिक आवास में आग और कथित तौर पर नकदी मिलने के मामले में आंतरिक जांच के आदेश से अलग है
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जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश कांड में बड़ा एक्शन हो गया है. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. यह प्रस्ताव 146 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ पेश किया गया था. स्पीकर ओम बिरला ने इसके साथ ही जस्टिस वर्मा के खिलाफ शिकायत को गंभीर प्रकृति का मानते हुए इस मामले की जांच के लिए 3 सदस्यीय कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया.
स्पीकर ओम बिरला ने बताया कि भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की राय में इस मामले पर गहन जांच जरूरी है. साथ ही, शिकायत की प्रकृति को देखते हुए पद से हटाने की प्रक्रिया नियमों के अनुसार शुरू करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा, ‘इस प्रस्ताव को उचित पाते हुए मैंने इसकी स्वीकृति प्रदान की है और पद से हटाने के अनुरोध पर जांच समिति बनाई है.’
जांच समिति में कौन-कौन?
इस समिति में तीन वरिष्ठ सदस्यों सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ कानूनविद बी. वी. आचार्य को शामिल किया गया है.
स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि इस समिति की जांच रिपोर्ट के बाद ही जस्टिस वर्मा के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी.
क्या है जस्टिस वर्मा का पूरा मामला?
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगाले पर इसी साल होली के दिन आग लग गई थी. खबर मिलते ही आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों और पुलिस को वहां भारी मात्रा में अधजली नकदी मिली थी. इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को शिकायत की, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में सूचित किया. सुप्रीम कोर्ट ने फिर जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने के साथ उनके खिलाफ आतंरिक जांच बैठा दी.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की इस जांच कमेटी ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों को सही पाया. इस बीच उन्हें न्यायाधीश के पद से हटाने के लिए संसद में भी महाभियोग की तैयारी शुरू हो गई. हालांकि जस्टिस वर्मा ने खुद को निर्दोष बताते हुए इन तमाम आरोपों को साजिश करार दिया है.
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लोकसभा में प्रस्ताव के लिए कम से कम सौ सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी है. विपक्षी दलों ने सरकार को समर्थन का भरोसा दिया है. प्रस्ताव पर सांसदों के हस्ताक्षर कराे शुरू कर दिए हैं. विपक्ष के सांसद भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करेंगे. प्रस्ताव आने के बाद जांच समिति गठित की जाएगी.
बता दें कि इस साल मार्च में जस्टिस वर्मा के घर से 15 करोड़ नकदी बरामद हुई थी. सुप्रीम कोर्ट की इंटरनल इन्क्वायरी कमेटी ने उन्हें दोषी माना था. जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से मना कर दिया है.
संसद का मॉनसून सत्र 21 जुलाई से 12 अगस्त तक चलेगा. इस दौरान जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा सकता है. अगर महाभियोग प्रस्ताव पास होता है तो संसद के नए भवन में महाभियोग की यह पहली कार्यवाही होगी.
जस्टिस वर्मा के खिलाफ एकजुट होंगे सत्ता और विपक्ष?
सत्तापक्ष संसद के आगामी मॉनसून सत्र में इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश बरामदगी मामले में महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है। इसको लेकर कांग्रेस ने भी सोमवार को अपनी आंतरिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने लोकसभा में कांग्रेस के सदन नेताओं को निर्देश दिया है कि वे उन सांसदों की पहचान करें जो इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करेंगे।
नियमों के अनुसार, लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, जबकि राज्यसभा में यह संख्या 50 है। प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष की जांच के बाद जजेज (इंक्वायरी) एक्ट के तहत समिति के पास भेजा जाता है।
एक साथ आ सकते हैं सत्तापक्ष और विपक्ष
इकॉनोमिक टाइम्स ने कांग्रेस सूत्रों के हवाले से लिखा कि एआईसीसी संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस संबंध में कांग्रेस के सदन नेताओं को पत्र भेजा है। यह पत्र ऐसे समय में भेजा गया है जब सत्तापक्ष बीजेपी और विपक्ष दोनों के सांसदों को प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए आगे लाने की योजना बना रहा है।
उधर, विपक्ष का एक धड़ा राज्यसभा में पहले से लंबित महाभियोग प्रस्ताव पर भी तेजी से कार्रवाई की मांग कर रहा है, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव के खिलाफ कथित रूप से दिए गए 'नफरती भाषण' को लेकर दायर किया गया था। माना जा रहा है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाने की तैयारी में है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि हाल ही में कुछ कांग्रेस नेताओं ने न्यायमूर्ति वर्मा से अनुरोध किया था कि वे महाभियोग प्रस्ताव लाने से पहले खुद ही इस्तीफा दे दें। हालांकि, अभी तक न्यायपालिका की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। संसद के आगामी मॉनसून सत्र में यह मुद्दा विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच बड़े राजनीतिक टकराव का कारण बन सकता है।
धनखड़ ने न्यायाधीश के आवास से नकदी मिलने के मामले की आपराधिक जांच शुरू करने की उम्मीद जतायी
इससे पहले सभापति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की आपराधिक जांच शुरू की जाएगी। धनखड़ ने इस घटना की तुलना शेक्सपीयर के नाटक जूलियस सीजर के एक संदर्भ ‘‘इडस ऑफ मार्च’’ से की, जिसे आने वाले संकट का प्रतीक माना जाता है। रोमन कलैंडर में इडस का अर्थ होता है, किसी महीने की बीच की तारीख। मार्च, मई, जुलाई और अक्टूबर में इडस 15 तारीख को पड़ता है।
उपराष्ट्रपति ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि अब मुद्दा यह है कि यदि नकदी बरामद हुई थी तो शासन व्यवस्था को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए थी और पहली प्रक्रिया यह होनी चाहिए थी कि इससे आपराधिक कृत्य के रूप में निपटा जाता, दोषी लोगों का पता लगाया जाता और उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाता।
महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में कांग्रेस, सांसदों को दिए खास निर्देश
कांग्रेस पार्टी, जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही। पार्टी ने अपने सांसदों से इस नोटिस पर हस्ताक्षर करने को कहा है। साथ ही, कांग्रेस राज्यसभा के सभापति से जस्टिस यादव के मामले में भी आगे बढ़ने का आग्रह कर रही है। यह सब तब हो रहा है जब बीजेपी और अन्य विपक्षी दल मिलकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने लोकसभा में पार्टी के फ्लोर मैनेजरों को उन सांसदों की लिस्ट बनाने की सलाह दी है जो जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर करेंगे।
जस्टिस शेखर यादव को लेकर भी की बड़ी डिमांड
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल राज्यसभा में जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ लंबित नोटिस पर भी जल्द कार्रवाई की मांग कर सकता है। जस्टिस यादव पर कथित तौर पर नफरत फैलाने वाले भाषण देने का आरोप है। पार्टी लोकसभा में भी ऐसे नोटिस की मांग कर सकती है।
कांग्रेस का प्लान क्या है
कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि AICC महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल का यह निर्देश ऐसे समय पर आया है जब बीजेपी और विपक्षी दल मिलकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ नोटिस लाने की तैयारी कर रहे हैं। नियमों के अनुसार, लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए (राज्यसभा में 50)। इसके बाद स्पीकर इसकी जांच करेंगे और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के अनुसार एक समिति द्वारा जांच की जाएगी।
जस्टिस वर्मा की बढ़ेंगी मुश्किलें
कुछ समय पहले, कुछ कांग्रेस नेताओं ने जस्टिस वर्मा से महाभियोग प्रस्ताव पेश होने से पहले इस्तीफा देने का आग्रह किया था। विपक्ष का एक वर्ग राज्यसभा के सभापति से जस्टिस यादव के खिलाफ लंबित महाभियोग प्रस्ताव पर भी आगे बढ़ने की मांग कर रहा है।
महाभियोग प्रक्रिया के लिए क्या हैं नियम
महाभियोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए हाईकोर्ट या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उनके पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया संसद में शुरू होती है। महाभियोग प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना होता है। कांग्रेस पार्टी का यह कदम न्यायपालिका और विधायिका के बीच एक टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है।
केसी वेणुगोपाल का पार्टी सांसदों को निर्देश
यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह मामला कैसे आगे बढ़ता है। कांग्रेस के सूत्रों ने बताया कि AICC महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल का यह निर्देश ऐसे समय पर आया है जब बीजेपी और विपक्षी दल मिलकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ नोटिस लाने की तैयारी कर रहे हैं। इसका मतलब है कि केसी वेणुगोपाल ने पार्टी के लोगों को इस मामले में सक्रिय रहने के लिए कहा है।
कुछ कांग्रेस नेताओं ने जस्टिस वर्मा से महाभियोग प्रस्ताव पेश होने से पहले इस्तीफा देने का आग्रह किया था। इसका मतलब है कि कुछ नेता चाहते थे कि जस्टिस वर्मा खुद ही पद छोड़ दें ताकि महाभियोग की नौबत न आए। यह पूरा मामला अब संसद में जाएगा और वहां इस पर बहस होगी। देखना होगा कि अंत में क्या फैसला होता है।
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दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई जल्दी ही शुरू करने की तैयारी है। इस कार्रवाई के लिए सरकार चाहती है कि विपक्ष को भी साध लिया जाए। सरकार चाहती है कि महाभियोग के लिए राजनीतिक सहमति बन जाए। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू सहमति बनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि यह राजनीतिक मामला नहीं है। ऐसे में किसी भी तरह के मतभेद की जरूरत नहीं है। न्यायपालिका से जुड़ा यह एक गंभीर मसला है, जिस पर सभी को एकजुट होकर फैसला करना चाहिए। दरअसल करीब एक महीने पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आई रिपोर्ट को सौंपा था।
यह रिपोर्ट पीएम और राष्ट्रपति के पास भेजी गई थी। तीन जजों की एक टीम ने जांच की थी और उसमें जस्टिस वर्मा को दोषी पाया गया था। इसके आधार पर ही रिपोर्ट पीएम और राष्ट्रपति को भेजी गई है। 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। इस दौरान बड़े पैमाने पर नोट पाए गए थे और कुछ जल भी गए थे। कैश का इतना बड़ा भंडार मिलने पर सवाल उठे थे तो फिर चीफ जस्टिस ने उनके खिलाफ जांच कराई। इसके अलावा जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया।
इस मामले में ऐक्शन से पहले होम मिनिस्टर अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पीएम नरेंद्र मोदी से मंगलवार को मुलाकात की थी। इस मीटिंग में तय होना था कि आखिर कैसे महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके अलावा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से भी भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और अमित शाह ने मुलाकात की थी। इन बैठकों के बाद ही रिजिजू ने विपक्ष के नेताओं से बात की है। दरअसल राज्यसभा और लोकसभा में एनडीए का बहुमत है, लेकिन सरकार चाहती है कि इस मामले में सर्वसम्मति से ही फैसला किया जाए।
बता दें कि सरकार मॉनसून सेशन में ही महाभियोग प्रस्ताव लाना चाहती है। मॉनसून सेशन जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू हो सकता है। यही नहीं कुछ नेताओं की राय तो यह भी है कि विशेष सत्र बुलाया जाए। इस सत्र के दौरान ही महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा हो और वोटिंग करा ली जाए। लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसके अलावा 50 राज्यसभा सांसदों का समर्थन होना चाहिए।
वकीलों ने सीजेआई को लिख चिट्ठी, जज यशवंत वर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी गई है। आरोप है कि जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे, तब उनके सरकारी आवास से बहुत सारा कैश मिला था। इस विवाद के चलते उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया गया। पहले तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखा था। उन्होंने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट भी भेजी थी। साथ ही, जस्टिस वर्मा ने इस रिपोर्ट पर जो जवाब दिया था, उसे भी साझा किया था।
जस्टिस वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन (BLA) ने 2 जून को लिखे अपने पत्र में जस्टिस वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी है। पत्र पर एसोसिएशन के अध्यक्ष अहमद एम अब्दी और सचिव एकनाथ आर ढोकले के हस्ताक्षर हैं। पत्र में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई को इस मामले पर दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने PIL को 'समय से पहले' बताते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वे एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए उचित अधिकारियों से संपर्क करें।
आपराधिक मुकदमा शुरू करने की अनुमति मांगी गई
वकीलों के संगठन ने कहा, 'यह ध्यान रखना जरूरी है कि मुकदमे लड़ने वाले और आम लोग कानूनी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं।' एसोसिएशन ने आगे कहा, 'आवेदक जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत आपराधिक मुकदमा शुरू करने की अनुमति मांग रहा है। जस्टिस वर्मा इलाहाबाद हाई कोर्ट के मौजूदा जज हैं। उन पर आरोप है कि उनके सरकारी आवास से बेहिसाब कैश बरामद हुआ था।'
1991 के वीरस्वामी फैसले का भी किया गया जिक्र
पत्र में सुप्रीम कोर्ट के 1991 के के वीरस्वामी मामले के फैसले का भी जिक्र किया गया है। इस फैसले में कहा गया है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी मौजूदा जज के खिलाफ CJI की अनुमति के बिना कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। पत्र में कहा गया है कि 1991 के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत 'लोक सेवक' हैं। इसलिए, उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने जैसे अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है। फैसले में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति देने के लिए सक्षम प्राधिकारी हैं, लेकिन ऐसी अनुमति CJI की सलाह पर ही दी जानी चाहिए।
इन-हाउस जांच कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी भी मांगी
पत्र में कहा गया है, 'दिल्ली पुलिस कमिश्नर की ओर से साझा किए गए फोटो और वीडियो सबूतों से न्यायिक ईमानदारी और न्यायपालिका में जनता के विश्वास पर गंभीर सवाल उठते हैं। जांच कमेटी की रिपोर्ट के बावजूद FIR दर्ज नहीं करना कानून के समक्ष समानता और न्यायिक संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करने का जोखिम उठाता है।' पत्र में जज के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने के साथ-साथ अधिकारियों को सभी प्रासंगिक सबूतों को सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें आंशिक रूप से जले हुए नोट, तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल हैं। बार बॉडी ने इन-हाउस जांच कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी भी मांगी है, ताकि वह शिकायत दर्ज करा सके।
घटना के वक्त दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे जस्टिस वर्मा
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त पैनल ने सबूतों का विश्लेषण किया और 50 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए। इनमें दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा और दिल्ली फायर सर्विसेज के प्रमुख भी शामिल थे। ये लोग 14 मार्च को रात करीब 11:35 बजे जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद सबसे पहले मौके पर पहुंचे थे। जस्टिस यशवंत वर्मा उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में जज थे। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और पैनल को दिए अपने जवाबों में आरोपों से बार-बार इनकार किया। इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार, CJI जज को इस्तीफा देने की सलाह देते हैं। अगर जज इस्तीफा नहीं देते हैं, तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को महाभियोग चलाने के लिए लिखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को कहा था, 'भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री को 3 मई की तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट और जस्टिस यशवंत वर्मा से 6 मई को प्राप्त पत्र/जवाब की कॉपी भेजी है।' सूत्रों ने पहले कहा था कि कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ कैश मिलने के आरोपों की पुष्टि की है। तीन सदस्यीय पैनल में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं। सूत्रों ने यह भी कहा कि पूर्व CJI खन्ना ने जस्टिस वर्मा को रिपोर्ट में पाए गए निष्कर्षों को देखते हुए इस्तीफा देने के लिए कहा था।
]]>दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई जल्दी ही शुरू करने की तैयारी है। इस कार्रवाई के लिए सरकार चाहती है कि विपक्ष को भी साध लिया जाए। सरकार चाहती है कि महाभियोग के लिए राजनीतिक सहमति बन जाए। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू सहमति बनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि यह राजनीतिक मामला नहीं है। ऐसे में किसी भी तरह के मतभेद की जरूरत नहीं है। न्यायपालिका से जुड़ा यह एक गंभीर मसला है, जिस पर सभी को एकजुट होकर फैसला करना चाहिए। दरअसल करीब एक महीने पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आई रिपोर्ट को सौंपा था।
यह रिपोर्ट पीएम और राष्ट्रपति के पास भेजी गई थी। तीन जजों की एक टीम ने जांच की थी और उसमें जस्टिस वर्मा को दोषी पाया गया था। इसके आधार पर ही रिपोर्ट पीएम और राष्ट्रपति को भेजी गई है। 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। इस दौरान बड़े पैमाने पर नोट पाए गए थे और कुछ जल भी गए थे। कैश का इतना बड़ा भंडार मिलने पर सवाल उठे थे तो फिर चीफ जस्टिस ने उनके खिलाफ जांच कराई। इसके अलावा जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया।
इस मामले में ऐक्शन से पहले होम मिनिस्टर अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पीएम नरेंद्र मोदी से मंगलवार को मुलाकात की थी। इस मीटिंग में तय होना था कि आखिर कैसे महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके अलावा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से भी भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और अमित शाह ने मुलाकात की थी। इन बैठकों के बाद ही रिजिजू ने विपक्ष के नेताओं से बात की है। दरअसल राज्यसभा और लोकसभा में एनडीए का बहुमत है, लेकिन सरकार चाहती है कि इस मामले में सर्वसम्मति से ही फैसला किया जाए।
बता दें कि सरकार मॉनसून सेशन में ही महाभियोग प्रस्ताव लाना चाहती है। मॉनसून सेशन जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू हो सकता है। यही नहीं कुछ नेताओं की राय तो यह भी है कि विशेष सत्र बुलाया जाए। इस सत्र के दौरान ही महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा हो और वोटिंग करा ली जाए। लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसके अलावा 50 राज्यसभा सांसदों का समर्थन होना चाहिए।
वकीलों ने सीजेआई को लिख चिट्ठी, जज यशवंत वर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी गई है। आरोप है कि जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे, तब उनके सरकारी आवास से बहुत सारा कैश मिला था। इस विवाद के चलते उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया गया। पहले तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखा था। उन्होंने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट भी भेजी थी। साथ ही, जस्टिस वर्मा ने इस रिपोर्ट पर जो जवाब दिया था, उसे भी साझा किया था।
जस्टिस वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन (BLA) ने 2 जून को लिखे अपने पत्र में जस्टिस वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी है। पत्र पर एसोसिएशन के अध्यक्ष अहमद एम अब्दी और सचिव एकनाथ आर ढोकले के हस्ताक्षर हैं। पत्र में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई को इस मामले पर दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने PIL को 'समय से पहले' बताते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वे एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए उचित अधिकारियों से संपर्क करें।
आपराधिक मुकदमा शुरू करने की अनुमति मांगी गई
वकीलों के संगठन ने कहा, 'यह ध्यान रखना जरूरी है कि मुकदमे लड़ने वाले और आम लोग कानूनी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं।' एसोसिएशन ने आगे कहा, 'आवेदक जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत आपराधिक मुकदमा शुरू करने की अनुमति मांग रहा है। जस्टिस वर्मा इलाहाबाद हाई कोर्ट के मौजूदा जज हैं। उन पर आरोप है कि उनके सरकारी आवास से बेहिसाब कैश बरामद हुआ था।'
1991 के वीरस्वामी फैसले का भी किया गया जिक्र
पत्र में सुप्रीम कोर्ट के 1991 के के वीरस्वामी मामले के फैसले का भी जिक्र किया गया है। इस फैसले में कहा गया है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी मौजूदा जज के खिलाफ CJI की अनुमति के बिना कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। पत्र में कहा गया है कि 1991 के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत 'लोक सेवक' हैं। इसलिए, उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने जैसे अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है। फैसले में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति देने के लिए सक्षम प्राधिकारी हैं, लेकिन ऐसी अनुमति CJI की सलाह पर ही दी जानी चाहिए।
इन-हाउस जांच कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी भी मांगी
पत्र में कहा गया है, 'दिल्ली पुलिस कमिश्नर की ओर से साझा किए गए फोटो और वीडियो सबूतों से न्यायिक ईमानदारी और न्यायपालिका में जनता के विश्वास पर गंभीर सवाल उठते हैं। जांच कमेटी की रिपोर्ट के बावजूद FIR दर्ज नहीं करना कानून के समक्ष समानता और न्यायिक संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करने का जोखिम उठाता है।' पत्र में जज के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने के साथ-साथ अधिकारियों को सभी प्रासंगिक सबूतों को सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें आंशिक रूप से जले हुए नोट, तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग शामिल हैं। बार बॉडी ने इन-हाउस जांच कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी भी मांगी है, ताकि वह शिकायत दर्ज करा सके।
घटना के वक्त दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे जस्टिस वर्मा
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त पैनल ने सबूतों का विश्लेषण किया और 50 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए। इनमें दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा और दिल्ली फायर सर्विसेज के प्रमुख भी शामिल थे। ये लोग 14 मार्च को रात करीब 11:35 बजे जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद सबसे पहले मौके पर पहुंचे थे। जस्टिस यशवंत वर्मा उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में जज थे। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और पैनल को दिए अपने जवाबों में आरोपों से बार-बार इनकार किया। इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार, CJI जज को इस्तीफा देने की सलाह देते हैं। अगर जज इस्तीफा नहीं देते हैं, तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को महाभियोग चलाने के लिए लिखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को कहा था, 'भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री को 3 मई की तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट और जस्टिस यशवंत वर्मा से 6 मई को प्राप्त पत्र/जवाब की कॉपी भेजी है।' सूत्रों ने पहले कहा था कि कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ कैश मिलने के आरोपों की पुष्टि की है। तीन सदस्यीय पैनल में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं। सूत्रों ने यह भी कहा कि पूर्व CJI खन्ना ने जस्टिस वर्मा को रिपोर्ट में पाए गए निष्कर्षों को देखते हुए इस्तीफा देने के लिए कहा था।
]]>कैश कांड में बुरी तरह फंसे दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति द्वारा लगाए गए आरोपों को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार आगामी मॉनसून सत्र में महाभियोग ला सकती है। 3 मई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद वहां नकदी की बड़ी मात्रा में गड्डियां मिलीं। इन आरोपों में प्रथम दृष्टया सच्चाई पाई गई है।
यह समिति 22 मार्च को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा गठित की गई थी। जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी एस संधवालया और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस अनु सिवरमन शामिल थीं। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा है भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जांच रिपोर्ट की एक प्रति राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश के साथ भेजी थी।
इस्तीफे से इनकार
रिपोर्ट के बाद जस्टिस वर्मा से इस्तीफा मांगा गया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया है। उन्हें 20 मार्च को ट्रांसफर करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया था। उन्होंने 5 अप्रैल को शपथ तो ली लेकिन अब तक उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।
सरकार मॉनसून सत्र में ला सकती है प्रस्ताव
सरकारी सूत्रों के अनुसार, “सरकार मॉनसून सत्र में यह प्रस्ताव लाएगी। दोनों सदनों के अध्यक्षों से अनुरोध किया जाएगा और विपक्ष से भी इस मामले पर सहमति ली जा सकती है।”
आपको बता दें कि संसदीय कानून के मुताबिक, महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के द्वारा प्रस्ताव को समर्थन मिलनी चाहिए। इसके बाद दोनों सदनों में कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।
वहीं, कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि अभी तक उन्हें सरकार की ओर से कोई औपचारिक संपर्क नहीं किया गया है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि सभापति जगदीप धनखड़ और अध्यक्ष ओम बिरला विपक्षी नेताओं से संपर्क कर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश करेंगे।
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