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राज्यपाल रमेन डेका से आज यहां लोकभवन में जगदलपुर के ट्री मैन संपत झा ने सौजन्य मुलाकात की। इस अवसर पर झा ने राज्यपाल कोे दुनिया की सबसे मंहगी आम प्रजातियों में शामिल मियाजाकी आम भेंट की।
राज्यपाल ने मियाजाकी आम की खेती को बस्तर क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने मे सहायक सिद्ध हो सकती है बल्कि छत्तीसगढ़ को अंतरर्राष्ट्रीय फल बाजार में नई पहचान भी दिला सकती है। उन्होंने इस विशेष प्रजाति की खेती को बढ़ावा देने, इसकी पैदावार मे वृद्धि करने तथा राष्ट्रीय एवं अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी मार्केटिंग के प्रयास करने हेतु प्रोत्साहित किया।
]]>यूपी के पूर्वांचल की धरती पर अब दुनिया का सबसे महंगा आम उगेगा। आजमगढ़ में जापान के प्रसिद्ध मियाजाकी आम का मदर प्लांट तैयार हो रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र लैदौरा इस आम के पेड़ से कलम तैयार करने में जुटा है। ऐसे में दो लाख रुपये किलो वाला मियाजाकी आम जिले की पहचान बनेगा। वहीं सोनभद्र में भी एक व्यक्ति ने अपने बाग में मियाजाकी आम का पौधा लगाया है।
जापान का प्रसिद्ध मियाजाकी आम दुनिया का सबसे महंगा आम है। स्वाद और खुशबू में लाजवाब होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जापानी मियाजाकी आम की कीमत दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम है। स्थानीय बाजार में भी इसकी कीमत 70 हजार रुपये से दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक रहती है। कृषि विज्ञान केंद्र लैदौरा में मियाजाकी आम के पौधे तैयार किए गए हैं। इनका प्रयोग मदर प्लांट के रूप में किया जा रहा है। उद्यान वैज्ञानिक मदर प्लांट के पौधों से कलम तैयार कर मियाजाकी आम के पौधे लोगों को मुहैया कराएंगे। कलम से तैयार पौधे तीन से पांच साल में फल देने लगेंगे जबकि बीज वाले पौधे लगाने पर फल आने में करीब 10 साल का समय लग जाता है।
लाल-जामुनी और हरे रंग का मिश्रण है खासियत
मियाजाकी की पैदावार सोनभद्र के छपका गांव में भी हो रही है। गहरा लाल-जामुनी और हरे रंग का मिश्रण इस आम की खासियत होती है। वरिष्ठ अधिवक्ता उमेशधर दुबे ने पिछले साल 15 अगस्त को इसका पौधा लगाया था। इसका छिलका चमकदार होता है और स्वाद में बहुत मीठा होता है।
कब लगा सकते हैं पौधे
लैदौरा के प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. एलसी वर्मा ने बताया कि दुनिया के सबसे महंगे आम जापानी मियाजाकी का पौधा तैयार किया गया है। पुणे की नर्सरी से लाकर इसे लगाया गया है। इसका प्रयोग मदर प्लांट के तौर पर किया जाएगा। कलम से तैयार पौधों को लगाने का सही समय जुलाई से सितंबर तक होता है।
पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में है नर्सरी
अभी तक पश्चिम बंगाल के कोलकाता की एग्रो नर्सरी, ग्रीनरी नर्सरी ठाकुरनगर और महाराष्ट्र के पुणे स्थित नर्सरी ही इस जापानी मियाजाकी आम के पौधे उपलब्ध कराती हैं। जापानी मियाजाकी आम का एक पौधा 1500 से 5000 रुपये तक में मिलता है। मध्य प्रदेश के जबलपुर और ओडिशा में भी इसकी खेती होने लगी है। आजमगढ़ के चार ब्लॉकों रानी की सराय, मिर्जापुर, अहरौला और पवई में प्रमुखता से आम की खेती होती है। इन चार ब्लॉकों के करीब 12 प्रतिशत क्षेत्रफल में आम के बाग मौजूद हैं।
भारत के साथ तल्खी के बीच नेपाल ने एक और बड़ा फैसला लिया है। खबर है कि पड़ोसी मुल्क ने भारतीय आमों की देश में एंट्री पर रोक लगा दी है। हालांकि, कहा जा रहा है कि इसकी वजह कीटनाशक हैं। वहीं, एक और कारण स्थानीय फलों को प्रोत्साहित करना भी माना जा रहा है। नेपाल सरकार के इस फैसले से बाजार में व्यापारी सप्लाई में आ रही परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
क्यों लगा दी रोक
पीटीआई भाषा के अनुसार, कथित रूप से अत्यधिक कीटनाशक पाए जाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में 'क्वारंटीन' सुविधाओं के अभाव का हवाला देते हुए भारत से किए जाने वाले आम के आयात पर रोक लगाई गई है। अधिकारियों ने बताया कि सरकार ने ऐसे आमों के आयात पर अंकुश लगाया है जिनमें कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई और इसके साथ ही सीमावर्ती इलाकों में पर्याप्त 'क्वारंटीन' सुविधाओं की कमी भी इस फैसले का एक प्रमुख कारण है।
नेपाल के बाजार की हालत टाइट
राइजिंग नेपाल की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आमों पर रोक के बाद जनकपुरधाम के बाजारों में घरेलू स्तर पर उगाए गए आमों से भरे हुए हैं। वहीं, कई फल विक्रेताओं का कहना है कि इस फैसले के चलते वह सप्लाई और बिजनेस को लेकर काफी परेशान हैं। इस रोक के चलते नेपाल के स्थानीय बाजारों में घरेलू स्तर पर उत्पादित आम की उपलब्धता बढ़ गई है। गर्मी के मौसम में आम की मांग आमतौर पर काफी अधिक रहती है।
क्या बोले व्यापारी
नेपाल की वेबसाइट से बातचीत में व्यापारियों ने बताया है कि घरेलू उत्पाद को बढ़ाना देना सही है, लेकिन लंबी रणनीति के बगैर रोक लगाने के चलते व्यापार में मुश्किलें खड़ी हो गईं हैं। खास बात है कि नेपाली आमों का उत्पादन सिर्फ करीब दो महीनों तक रहता है, जिसके चलते भारतीय आयात मुल्क की आम की जरूरतों को पूरा करने के लिए अहम है।
बाजार में हो सकती है कमी
जनकपुरधाम के फल और सब्जी व्यापारी संघ के महासचिव भुवनेश्वर पुर्बे ने वेबसाइट को बताया कि गर्मियों में आम की मांग बहुत बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय आयात पर रोक से बाजार में कमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि सप्तरी, सिराहा, महोत्तरी, धनुषा और सर्लाही जैसे जिलों से रोजाना 50 टन से ज्यादा आम जनकपुरधाम पहुंच रहा है, लेकिन सिर्फ स्थानीय पैदावार से पूरे बाजार की मांग को पूरा करना मुश्किल होगा।
उन्होंने कहा है कि आयात पर पूरी तरह बैन लगाने के बजाए सरकार को क्वारंटीन सिस्टम को मजबूत करना चाहिए। साथ ही सुझाव दिया कि भारतीय फलों को क्वालिटी टेस्टिंग के बाद भारतीय फलों को आने की अनुमति देनी चाहिए।
केले के मामले में लग चुकी है चोट
उन्होंने बताया कि भारतीय केले सस्ते होते हैं, लेकिन सप्लाई में रोक आने के बाद कीमतें बढ़ गईं हैं। अब जब सर्दियों में घरेलू उत्पादन कम हो जाता है, तो व्यापारी भारतीय केले के आयात पर निर्भर होते हैं। व्यापारियों ने चेतावनी भी दी है कि अगर रोक लंबे समय तक जारी रहती है, तो ग्राहकों को ज्यादा दाम चुकाने होंगे और कारोबारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा।
जापान ने भी लगाई है रोक
जापान सरकार ने कीट नियंत्रण में कमी और 'वेपर हीट ट्रीटमेंट' (VHT) मानकों पर खरा न उतरने का हवाला देते हुए 25 मार्च 2026 के बाद जारी सर्टिफिकेट वाली खेप पर रोक लगा दी है। करीब दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद जापान ने ये कदम उठाया है। भारत के अमरोहा जिले से लगभग 12 हजार हेक्टेयर में फैले आम के बागों से हर साल भारी मात्रा में फल खाड़ी देशों, अमेरिका, जापान और यूरोप को निर्यात किया जाता है।
स्थानीय निर्यातकों का कहना है कि जापान की यह कार्रवाई एक चेतावनी की तरह है, जिससे निपटने के लिए अब कीट नियंत्रण और पैकेजिंग के वैश्विक मानकों पर और अधिक गंभीरता से ध्यान देना होगा।
]]>भारत दुनिया में आम का सबसे बड़ा उत्पादक है. यहां हर साल लगभग 24 मिलियन मीट्रिक टन आम की पैदावार होती है और इसकी बेहतरीन किस्म दुनिया भर के देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. हालांकि जापान ने अब भारतीय आमों के आयात पर अस्थायी रोक लगा दी है. इसके बाद अल्फोंसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी मशहूर किस्मों के निर्यातकों को झटका लगा है. इसी बीच अब कई लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि जापान में असल में आम की कौन सी किस्म सबसे ज्यादा खाई जाती है? आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब।
जापान का भारतीय आमों पर प्रतिबंध
जापान ने भारतीय आमों के आयात पर कड़े क्वॉरेंटाइन नियमों के कारण रोक लगाई।
यह रोक आम की गुणवत्ता या स्वाद की चिंता से नहीं, बल्कि पैकेजिंग में तकनीकी कमी से है।
जापान में घरेलू 'इरविन' किस्म के आम लोकप्रिय हैं, जिन्हें लग्जरी उत्पाद माना जाता है।
रोक से पहले भारतीय आमों की विदेशी फलों की चाहत रखने वाले ग्राहकों में काफी मांग थी।
जापान का यह फैसला स्वाद या फिर गुणवत्ता से जुड़ी चिंता की वजह से नहीं बल्कि कड़े कृषि क्वॉरेंटाइन नियम की वजह से लिया गया है. मार्च 2026 में जापान के क्वॉरेंटाइन अधिकारियों ने भारत में आमों के उपचार और पैकेजिंग सुविधाओं का निरीक्षण किया और कथित तौर पर एक्सपोर्ट से पहले इस्तेमाल की जाने वाली फ्यूमिगेशन और साफ सफाई प्रक्रिया में तकनीकी कमियां पाई।
जापान आयातित फलों में कीटों और फ्रूट फ्लाइज के संबंध में काफी कड़ी जीरो टॉलरेंस नीति का पालन करता है. निरीक्षण के बाद जापान ने 25 मार्च 2026 के बाद जारी किए गए प्रमाण पत्रों के साथ आने वाली आमों की खेपों को स्वीकार करना बंद कर दिया।
जापान में आम की कौन सी किस्म सबसे ज्यादा मशहूर?
जापान में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली आम की किस्म इरविन है. इसे आमतौर पर एप्पल मैंगो के नाम से जाना जाता है. भारत के उलट जहां आम को एक मौसमी फल माना जाता है जापान में आमों को विलासिता की वस्तु माना जाता है और अक्सर इन्हें काफी बेहतरीन उपहार के तौर पर खरीदा जाता है. इरविन किस्म की खेती मुख्य रूप से जापान के ओकिनावा और मिजायाकी प्रति में ग्रीन हाउस के अंदर काफी कंट्रोल्ड परिस्थितियों में की जाती है. ये आम अपने गहरे लाल रंग, मलाईदार बनावट, जबरदस्त मिठास और पूरी तरह से रेशे रहित गूदे के लिए जाने जाते हैं।
वहीं अगर भारत की बात करें तो भारत के केसर, अल्फांसो, लंगड़ा और बंगनपल्ली आम जापान में सबसे ज्यादा भेजी जाती हैं और पसंद की जाती हैं।
जापान में कौन से इंपोर्टेड आम लोकप्रिय हैं?
घरेलू तौर पर लग्जरी आमों का उत्पादन करने के बावजूद जापान अपनी कुल मांगों को पूरा करने के लिए अभी भी इंपोर्ट पर ही निर्भर है. रोक लगने से पहले भारतीय आम उन ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय थे जो विदेशी इंपोर्टेड फलों की तलाश में रहते थे. भारत के अलावा जापान थाईलैंड, मेक्सिको और फिलिपींस जैसे देशों से भी आम इंपोर्ट करता है।
आम को फलों का राजा यूं ही नहीं कहा जाता। इसका गाढ़ा रस और मिठास हर किसी को लुभाता है। आमों के मामले में भी मध्यप्रदेश देश के प्रमुख राज्यों में हैं। प्रदेश की जलवायु, उपजाऊ मिट्टी और विविध भौगोलिक परिस्थितियां आम उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। यही कारण है कि यहां दशहरी, लंगड़ा, चौसा, केसर, आम्रपाली, अल्फांसो और तोतापरी जैसी अनेक प्रसिद्ध किस्में मिलती हैं। एमपी की एक किस्म तो इतनी प्रसिद्ध है कि विदेशों में इसकी सबसे ज्यादा डिमांड है। यह विशेष किस्म है "नूरजहां'' आम। इसे "किंग ऑफ मैंगो" भी कहा जाता है। प्रदेश के जनजातीय बहुल आलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में पैदा होने वाला नूरजहां आम अपने विशाल आकार, अद्वितीय स्वाद और आकर्षक स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है। इसे दुनिया के सबसे बड़े आमों में गिना जाता है। सामान्यतः एक नूरजहां आम का वजन लगभग 2 से 5 किलोग्राम तक होता है। यह 3 हजार रुपए प्रति नग के रेट में बेचा जाता है। खूब महंगा होने के बाद भी लजीज नूरजहां को खरीदने के लिए विदेशों में लोग टूट पड़ते हैं।
"नूरजहां'' आम केवल अपने आकार के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी दुर्लभता के कारण भी विशेष माना जाता है। इसके पेड़ों पर सीमित संख्या में फल आते हैं, इसलिए इसकी कीमत सामान्य आमों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। एक ही फल ही हजारों रुपए में बिकता है। यही कारण है कि यह आम किसानों के लिए लाभकारी फसल के रूप में उभर रहा है। कट्ठीवाड़ा का मौसम और वातावरण नूरजहां आम के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है, जिससे यहां पैदा होने वाले फल विशेष गुणवत्ता वाले होते हैं।
माना जाता है कि नूरजहां आम की यह प्रजाति वर्षों पहले अफगानिस्तान से भारत पहुंची और बाद में पांचवें – छठवें दशक में मध्यप्रदेश के मालवा तथा आदिवासी अंचल झाबुआ में विकसित हुई।
आलीराजपुर जिले के ग्राम जूना कट्टीवाड़ा स्थित शिव (बावड़ी) आम फार्म के किसान भरतराजसिंह जादव बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय रणवीरसिंह जादव लगभग 55 से 60 वर्ष पूर्व गुजरात के बनमाह क्षेत्र से नूरजहां आम का पौधा लेकर आए थे। उन्होंने अपने खेत में इस पौधे को लगाया और वर्षों की मेहनत से इसे संरक्षित किया। यही पौधा आगे चलकर पूरे क्षेत्र की पहचान बन गया। जादव के अनुसार उनके पिता ने ग्राफ्टिंग तकनीक से एक विशेष पौधा तैयार किया था, जिसकी वर्तमान आयु लगभग 20 से 25 वर्ष है। इसके साथ ही स्वयं भरतराजसिंह जादव द्वारा तैयार किए गए 11 ग्राफ्टेड पौधे आज 3 से 5 वर्ष की अवस्था में विकसित हो रहे हैं।
नूरजहां आम अब मध्यप्रदेश की विशेष पहचान बन चुकी है। इसकी विशिष्टता को देखते हुए वर्ष 1999 तथा 2010 में इसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। इन पुरस्कारों ने न केवल किसानों का उत्साह बढ़ाया बल्कि आलीराजपुर जिले को भी राष्ट्रीय पहचान दिलाई। धीरे-धीरे यह आम मध्यप्रदेश की उद्यानिकी पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
नूरजहां आम का इतिहास मालवा और पश्चिमी भारत की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि मुगलकाल में बड़े आकार और विशेष स्वाद वाले आमों को शाही बागों में विशेष महत्व दिया जाता था। इसी परंपरा से जुड़ी यह किस्म समय के साथ गुजरात और झाबुआ-आलीराजपुर अंचल तक पहुंची। आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और तापमान नूरजहाँ के लिए अनुकूल सिद्ध हुए, जिसके कारण यह किस्म यहां अच्छी तरह विकसित हुई। झाबुआ और आलीराजपुर के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसका संरक्षण किसानों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी किया जाता रहा है।
नूरजहां आम की मांग विशेष रूप से बड़े शहरों और विदेशों में अधिक है। यहां के बाजारों में एक आम की कीमत 1500 से शुरु होकर 3000 तक होती है। नूरजहां का आकार इतना बड़ा होता है कि एक ही आम पूरे परिवार के लिए पर्याप्त माना जाता है। इसका रंग, सुगंध और मिठास लोगों को पहली नजर में आकर्षित कर लेते हैं।
संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में भारतीय प्रीमियम आमों के रूप में इसकी अच्छी मांग
विदेशों में नूरजहां आम की विशेष मांग है। खासतौर पर संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में भारतीय प्रीमियम आमों के रूप में इसकी अच्छी मांग रहती है। वहां बड़े आकार और आकर्षक स्वरूप वाले फलों को विशेष पसंद किया जाता है। इसके अलावा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा तथा यूनाइटेड किंगडम में बसे भारतीय समुदाय के बीच भी नूरजहां आम अत्यंत लोकप्रिय हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों में भी इसकी विशेष पहचान बन रही है।
हालांकि नूरजहां आम का उत्पादन सीमित मात्रा में होता है, इसलिए इसका निर्यात बड़े पैमाने पर नहीं हो पाता, लेकिन इसकी विशिष्टता और दुर्लभता इसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में “लक्ज़री मैंगो” की पहचान दिला रही है। विदेशी बाजारों में यह आम आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।
]]>शहडोल में दो दिन से आंधी बारिश
शहडोल जिले के किसान भोलू गुप्ता बताते हैं, '' पिछले दो दिन से तेज गर्मी से राहत मिली हुई है, जिस तरह से सूर्य देव का पारा चढ़ा हुआ था, उससे हालत खराब थी लेकिन पिछले दो दिन से मौसम ऐसा बदला है, कि शाम को ठंडक महसूस हो रही है. आंधी और बारिश से मौसम ठंडा हो गया है पर कई फसलों पर इसका असर पड़ सकता है।
बदलते मौसम से आम को बड़ा नुकसान
मौसम के इस बदलते मिजाज से किस तरह का नुकसान हो सकता है? इसे लेकर कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं, '' जो आंधी तूफान आया है इससे जो पेड़ वर्गीय फसल है जैसे आम, केला आदि तो इनके गिरने से तो निश्चित ही नुकसान होता है लेकिन अन्य कई वजहों से भी फल प्रभावित होते हैं. तूफान में आम की कमजोर डगालें व फूल टूटने से आने वाले आमों की संख्या कम हो जाती है, इससे सबसे ज्यागदा नुकसान होता है।
सब्जी व अन्य फसलों का क्या होगा?
कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं, '' इसके अलावा सब्जी वर्गीय फसलों की बात करें या गर्मी की फसल मूंग-उड़द की बात करें तो जब तक ओले नहीं गिरेंगे तब तक ज्यादा नुकसान नहीं है. बारिश हो रही है, मौसम ठंडा है तो इसका फायदा ही इन फसलों को मिलेगा. बस जिस तरह से तेज आंधी चल रही है उसका असर आम की फसल पर जरुर पड़ सकता है क्योंकि आम की फसल वक्त से पहले ही झड़ रही है।
तूफानी आंधी न मचाई तबाही
तेज आंधी ने शहडोल में कई स्थानों पर जमकर नुकसान किया, कहीं शादी का टैंट उड़ा दिया, तो कहीं बिजली के खंबे और पेड़. बिजली की तारों पर पेड़ गिरने से कई इलाकों में ब्लैक आउट हो गया और बिजली कर्मचारी बिजली दुरुस्त करने में लगे रहे. इसके अलावा कई गांव में कई घंटे तक ब्लैकआउट रहा, शुक्रवार को पूरे दिन लाइट अप एंड डाउन चलती रही, क्योंकि लगातार मेंटेनेंस का कार्य चलता रहा।
शहडोल में दो दिन से आंधी बारिश
शहडोल जिले के किसान भोलू गुप्ता बताते हैं, '' पिछले दो दिन से तेज गर्मी से राहत मिली हुई है, जिस तरह से सूर्य देव का पारा चढ़ा हुआ था, उससे हालत खराब थी लेकिन पिछले दो दिन से मौसम ऐसा बदला है, कि शाम को ठंडक महसूस हो रही है. आंधी और बारिश से मौसम ठंडा हो गया है पर कई फसलों पर इसका असर पड़ सकता है।
बदलते मौसम से आम को बड़ा नुकसान
मौसम के इस बदलते मिजाज से किस तरह का नुकसान हो सकता है? इसे लेकर कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं, '' जो आंधी तूफान आया है इससे जो पेड़ वर्गीय फसल है जैसे आम, केला आदि तो इनके गिरने से तो निश्चित ही नुकसान होता है लेकिन अन्य कई वजहों से भी फल प्रभावित होते हैं. तूफान में आम की कमजोर डगालें व फूल टूटने से आने वाले आमों की संख्या कम हो जाती है, इससे सबसे ज्यागदा नुकसान होता है।
सब्जी व अन्य फसलों का क्या होगा?
कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं, '' इसके अलावा सब्जी वर्गीय फसलों की बात करें या गर्मी की फसल मूंग-उड़द की बात करें तो जब तक ओले नहीं गिरेंगे तब तक ज्यादा नुकसान नहीं है. बारिश हो रही है, मौसम ठंडा है तो इसका फायदा ही इन फसलों को मिलेगा. बस जिस तरह से तेज आंधी चल रही है उसका असर आम की फसल पर जरुर पड़ सकता है क्योंकि आम की फसल वक्त से पहले ही झड़ रही है।
तूफानी आंधी न मचाई तबाही
तेज आंधी ने शहडोल में कई स्थानों पर जमकर नुकसान किया, कहीं शादी का टैंट उड़ा दिया, तो कहीं बिजली के खंबे और पेड़. बिजली की तारों पर पेड़ गिरने से कई इलाकों में ब्लैक आउट हो गया और बिजली कर्मचारी बिजली दुरुस्त करने में लगे रहे. इसके अलावा कई गांव में कई घंटे तक ब्लैकआउट रहा, शुक्रवार को पूरे दिन लाइट अप एंड डाउन चलती रही, क्योंकि लगातार मेंटेनेंस का कार्य चलता रहा।
इस बार आम 7 से 3 फीसदी सस्ता (Mango prices) बिक रहा है। बेहतर उत्पादन और भरपूर आवक की वजह से आम सस्ता मिल रहा है। लगड़ा, दशहरी, चौसा, सफेदा की आवक ज्यादा है जबकि, बादाम और तोतापरी की आवक कम हो गई है। केसर भी नहीं मिल रहा है। व्यापारिक जानकारों के मुताबिक इस बार यूपी और महाराष्ट्र में आम की रिकॉर्ड तोड़ पैदावार हुई है। यूपी के मलीहाबाद, सहारनपुर में दशहरी और लंगड़ा महाराष्ट्र में हाप्स (अल्फांसो) की इस बार बेहतर पैदावार हुई है।
केसर ने हलकी की थी जेब
मेहमान के रूप में आया केसर इस साल गुजरात के आम ‘केसर’ ने ग्राहकों की जेब हल्की की। गुजरात में फसल सीजन में आए आंधी-तूफान ने फसल को कम कर दिया। भोपाल की स्थानीय थोक मंडी में केसर बिकने आया लेकिन जल्द ही आवक बंद हो गई। थोक फल कारोबारी संतोष गुप्ता ने बताया कि केसर को छोड़कर दूसरी वैरायटी के आम गत वर्ष से सस्ते बिके हैं। केसर महंगा बिककर खत्म भी हो गया।
अमेरिका बना कारण
यूएस में इंडियन मैंगो का कंसाइंमेंट रिजेक्ट होने से इस बार आम के निर्यात पर असर देखने को मिला। इससे मप्र, उप्र, गुजरात और साउथ में पैदा होने वाले आम की प्रमुख वैरायटी इंडियन मार्केट में ही ज्यादा बिक रही हैं। पेस्टीसाइड और केमिकल को लेकर विशेष सतर्कता बरती जाती है। सुविध शाह, निर्यात विशेषज्ञ
आम भी एपिड़ा के माध्यम से विदेश भेजा जाता है।
विदेशों में एमआरएल के तहत देखा जाता है कि फल में कितना पेस्टीसाइड, केमिकल आदि का प्रयोग किया गया है। ज्यादा मात्रा में इनका उपयोग होने पर माल को रिजेक्ट कर दिया जाता है।
डॉ. विजय अग्रवाल, वैज्ञानिक, उद्यानिकी
स्थानीय थोक फल मंडी में भाव (रुपए प्रति किलो)
आम – गत वर्ष – इस वर्ष – आवक
– लगड़ा 35/40 30/32 यूपी
– दशहरी 40/50 35/40 यूपी
– चौसा 60/65 50/60 यूपी
– सफेदा 30/35 25/30 यूपी
– बादाम 100/110 50/60 साउथ
– तोतापरी 40/45 30/35 साउथ
– केसर 50/60 90/100 गुजरात
आम की प्रमुख प्रजातियां
हापुस : मलाईदार गूदा, रेशा-रहित बनावट और मिठास केसर तेज़ खुशबू और सुनहरे रंग इसकी पहचान। दशहरी : मध्यम मिठास और रसीलेपन के लिए मशहूर। बंगनपल्ली : दक्षिण भारत का बड़ा और रेशा-रहित आम। लंगड़ा: खट्टे-मीठे स्वाद से ग्राहकों की पसंद
राजधानी भोपाल में एक बार फिर आम महोत्सव का आगाज होने वाला है। शुक्रवार, 14 जून से शुरू होने वाले इस आम महोत्सव में आम की कई किस्में मिलेंगी। यहां से आप आम खरीद भी सकते हैं। इसमें शहडोल का आम्रपाली और मल्लिका के अलावा सतना का सुंदरजा आम भी मौजूद रहेगा। यह पांच दिवसीय आम महोत्सव 18 जून तक चलेगा। यह आम प्रदर्शनी व सेल बिट्टन मार्केट स्थित नाबार्ड कार्यालय में रहेगी। बता दें कि राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) देश में कृषि और ग्रामीण विकास मैं निरत राष्ट्रीय स्तर का संस्थान है।
नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक सुनील कुमार ने बताया कि इस आम महोत्सव का उद्देश्य यही है कि आदिवासियों को हम बाजार उपलब्ध कराएं। इस वर्ष आम महोत्सव का आठवां संस्करण है। इस बार महोत्सव 11 जिलों से विक्रेता आएंगे, इसमें नर्मदापुरम, अलीराजपुर, रीवा, छिंदवाड़ा और झाबुआ शामिल है। पिछले बार इन जिलों से करीब 10 टन आम लाए गए थे वहीं इस सीजन करीब 18 टन आम आने की संभावना है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष आम महोत्सव में खास नूर जहां और सुंदरजा आम रहेंगे। सुंदरजा आम की बात की जाए तो यह एक जीआई टैग आम है। इसमें फाइबर्स नहीं होते हैं, इसकी अपनी कई तरह की खूबियां होती हैं, यह आम शुगर मरीजों के लिए भी सुरक्षित माना जाता है। इसके अलावा हर बार की तरह इस बार भी नूर जहां प्रदर्शनी के लिए आएगा, इस आम की खासियत यह है कि यह आम दो से तीन किलो का होता है, इसका छिलका काफी पतला होता है वहीं इसकी गुठली भी बहुत छोटी होती है।
नाबार्ड के अधिकारियों के अनुसार इस आम महोत्सव में जो आम आएंगे उनकी कीमत सामान्य बाजार में बिकने वाले आमों से 10 से 20 प्रतिशत ज्यादा होगी। इसके कारण यह है कि इन्हें किसी भी प्रकार के केमिकल से नहीं पकाते। इन्हें पकाने के लिए भूसे के अलावा कागज का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, कई वैराइटी ऐसी भी हैं, जो कि प्राकृतिक तौर पर पेड़ पर ही पकाई जाती हैं। बता दें कि इस मेले में विभिन्न किस्मों जैसे सुंदरजा, केसर, चौंसा, लंगड़ा व दशहरी आम उपलब्ध रहेगा।
गौरतलब है कि देश-विदेश में विंध्य को पहचान दिलाने वाले सुंदरजा आम को जीआई टैग मिल गया है। रीवा में 237 वैरायटी वाले आम के बागान है, पर सबसे खास गोविंदगढ़ का सुंदरजा आम है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जबलपुर के अधीन कृषि महाविद्यालय का फल अनुसंधान केंद्र कुठुलिया 32 हेक्टेयर में फैला है।
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