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आदिवासी संस्कृति का प्रसिद्ध भगोरिया पर्व आज मंगलवार से शुरू गया है। पहले दिन जिले के आम्बुआ और बखतगढ़ में मेले लगे। यह उत्सव सात दिनों तक चलेगा, जिसमें आदिवासी समाज पूरी मस्ती और उल्लास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाएगा।युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर इन मेलों में पहुंच रहे हैं। ढोल-मांदल और बांसुरी की धुन पर समूह में नाचते-गाते हुए आदिवासी अपनी खुशी व्यक्त कर रहे हैं। इस अनूठे पर्व को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक भी पहुंच रहे हैं।
देश के कोने कोने से लौटते आदिवासी
होली से सात दिन पहले मनाए जाने वाले इस उत्सव के दौरान आदिवासी समाज के लोग खुलकर अपनी जिंदगी जीते हैं। ऐसी मान्यता है कि देश के किसी भी कोने में काम करने गए आदिवासी भगोरिया पर अपने गांव लौट रहे हैं। घर पहुंचने के बाद वे हर दिन परिवार के साथ भगोरिया मेले में शामिल होते हैं।
मांदल की थाप पर हैं थिरकते
भगोरिया मेलों में आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिलती है। अलग-अलग टोलियां बांसुरी, ढोल और मांदल बजाती नजर आती हैं। इस दौरान आदिवासी युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में सजकर आती हैं और हाथों पर टैटू भी गुदवाती हैं।
राजा भोज के समय से चल रही परंपरा
भगोरिया की शुरुआत को लेकर एक मान्यता है कि यह राजा भोज के समय से चला आ रहा है। उस समय दो भील राजाओं, कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी में भगोर मेले का आयोजन शुरू किया था। बाद में अन्य भील राजाओं ने भी इसका अनुसरण किया। तब इसे 'भगोर' कहा जाता था, जो स्थानीय हाट और मेलों में 'भगोरिया' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
क्या है इतिहास
जनजातीय समाज की साहित्यकार डॉ. अनु भाभर कहती हैं कि भगोरिया आनंद उत्सव है, जो प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। इसे लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। पहले इसे गुललिया हाट कहा जाता था क्योंकि होली के पूर्व के इन हाट बाजारों में गुलाल खेला जाता था।
कोई इसे भगोर से जोड़ता है। कोई इसे भगू राजा से जोड़ता है। जनजातीय समाज में वर्षों से होली और दशहरे पर खुशियां मनाई जाती रही हैं। जिसे दोनों फसलों से भी जोड़कर देखा जा सकता है।
कब, कहां लगेंगे भगोरिया मेले
24 फरवरी : पिटोल, खरडूबड़ी, थांदला, तारखेडी, बरवेट और अंधरवाड।
25 फरवरी : उमरकोट, माछलिया, करवड़, बोडायता, कल्याणपुरा, मदरानी और ढेकल
26 फरवरी : पारा, सारंगी, हरीनगर, समाई व चैनपुरा
27 फरवरी : मांडली, भगोर और बेकल्दा
28 फरवरी : रानापुर, मेघनगर, बामनिया, झकनावदा व बलेडी
1 मार्च : झाबुआ, डोलियावाड, रायपुरिया और काकनवानी
2 मार्च : पेटलावद, कुंदनपुर, रंभापुर, मोहनकोट और रजला
आदिवासी संस्कृति का प्रसिद्ध भगोरिया पर्व आज मंगलवार से शुरू गया है। पहले दिन जिले के आम्बुआ और बखतगढ़ में मेले लगे। यह उत्सव सात दिनों तक चलेगा, जिसमें आदिवासी समाज पूरी मस्ती और उल्लास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाएगा।युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर इन मेलों में पहुंच रहे हैं। ढोल-मांदल और बांसुरी की धुन पर समूह में नाचते-गाते हुए आदिवासी अपनी खुशी व्यक्त कर रहे हैं। इस अनूठे पर्व को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक भी पहुंच रहे हैं।
देश के कोने कोने से लौटते आदिवासी
होली से सात दिन पहले मनाए जाने वाले इस उत्सव के दौरान आदिवासी समाज के लोग खुलकर अपनी जिंदगी जीते हैं। ऐसी मान्यता है कि देश के किसी भी कोने में काम करने गए आदिवासी भगोरिया पर अपने गांव लौट रहे हैं। घर पहुंचने के बाद वे हर दिन परिवार के साथ भगोरिया मेले में शामिल होते हैं।
मांदल की थाप पर हैं थिरकते
भगोरिया मेलों में आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिलती है। अलग-अलग टोलियां बांसुरी, ढोल और मांदल बजाती नजर आती हैं। इस दौरान आदिवासी युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में सजकर आती हैं और हाथों पर टैटू भी गुदवाती हैं।
राजा भोज के समय से चल रही परंपरा
भगोरिया की शुरुआत को लेकर एक मान्यता है कि यह राजा भोज के समय से चला आ रहा है। उस समय दो भील राजाओं, कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी में भगोर मेले का आयोजन शुरू किया था। बाद में अन्य भील राजाओं ने भी इसका अनुसरण किया। तब इसे 'भगोर' कहा जाता था, जो स्थानीय हाट और मेलों में 'भगोरिया' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
क्या है इतिहास
जनजातीय समाज की साहित्यकार डॉ. अनु भाभर कहती हैं कि भगोरिया आनंद उत्सव है, जो प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। इसे लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। पहले इसे गुललिया हाट कहा जाता था क्योंकि होली के पूर्व के इन हाट बाजारों में गुलाल खेला जाता था।
कोई इसे भगोर से जोड़ता है। कोई इसे भगू राजा से जोड़ता है। जनजातीय समाज में वर्षों से होली और दशहरे पर खुशियां मनाई जाती रही हैं। जिसे दोनों फसलों से भी जोड़कर देखा जा सकता है।
कब, कहां लगेंगे भगोरिया मेले
24 फरवरी : पिटोल, खरडूबड़ी, थांदला, तारखेडी, बरवेट और अंधरवाड।
25 फरवरी : उमरकोट, माछलिया, करवड़, बोडायता, कल्याणपुरा, मदरानी और ढेकल
26 फरवरी : पारा, सारंगी, हरीनगर, समाई व चैनपुरा
27 फरवरी : मांडली, भगोर और बेकल्दा
28 फरवरी : रानापुर, मेघनगर, बामनिया, झकनावदा व बलेडी
1 मार्च : झाबुआ, डोलियावाड, रायपुरिया और काकनवानी
2 मार्च : पेटलावद, कुंदनपुर, रंभापुर, मोहनकोट और रजला
विज्ञान और समाज के बीच सेतु निर्माण आवश्यक है। विज्ञान को व्यवहारिक जीवन के साथ सामंजस्य स्थापित कर कैसे आगे बढ़ सकते है, इस बात को सभी वैज्ञानिक एवं अकादमिक संस्थानों को समझना चाहिए। विज्ञान भारती के राष्ट्रीय सह संगठन सचिव प्रवीण रामदास 11 वें भोपाल विज्ञान मेला के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अन्य महान वैज्ञानिकों के योगदान को हमेशा याद रखते हुए देश हित में विज्ञान से विकास के बारे में कार्य करना चाहिए। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद और विज्ञान भारती के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित 11वें भोपाल विज्ञान मेले का शुभारंभ शुक्रवार को जंबूरी मैदान में किया गया।
मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक डॉ. अनिल कोठारी ने 'विज्ञान की बात, जन-जन के साथ' की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि विज्ञान को मातृभाषा में समझाना आवश्यक है। उन्होंने छात्रों को मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी। विज्ञान भारती मध्य भारत के अध्यक्ष डॉ. अमोध गुप्ता ने 'स्वदेशी विज्ञान आंदोलन' पर प्रकाश डालते हुए स्वदेशी विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. सुधीर भदौरिया, विज्ञान भारती ने विज्ञान मेले को 'एक उत्सव' की संज्ञा देते हुए कहा कि विज्ञान को समाज में एक सशक्त माध्यम के रूप में अपनाना चाहिए।
भोपाल विज्ञान मेले का पहला दिन नवाचार और स्वदेशी विज्ञान के संगम पर आधारित रहा। विद्यालयीन और महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर अपने वैज्ञानिक मॉडल का प्रेजेंटेशन दिया। मेले में 150 से अधिक वैज्ञानिक मॉडल प्रस्तुत किए गए हैं। इस अवसर पर विज्ञान प्रतिभा पुरस्कार से सम्बंधित सत्र आयोजित किया गया जो कि विद्यालयीन छात्र-छात्राओं के लिए था। इसमें एम्प्री के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एन. सतीश ने छात्रों के रोचक प्रश्नों के उत्तर दिए।
मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना पर भी एक व्याख्यान सत्र हुआ। इसमें विज्ञान के क्षेत्र में युवाओं के लिए कैरियर निर्माण के बारे में भी बात की गयी। 18 से 29 वर्ष के मध्यप्रदेश के युवाओं को विज्ञान एवं कौशल-आधारित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से यह योजना शुरू की गई है। 12वीं या आईटीआई उत्तीर्ण युवा 46 क्षेत्रों और 1,134 पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। प्रबंधन, मीडिया, विधिक सेवाएं, पर्यटन और वित्त जैसे क्षेत्र शामिल हैं। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के साथ किया गया।
शनिवार के प्रमुख आकर्षण
विज्ञान मेले के दूसरे दिन 28 दिसंबर को विज्ञान के छात्रों के लिए विद्यार्थी विज्ञान संवाद, विज्ञान शिक्षक कार्यशाला, अगरिया जनजाति द्वारा लोहा बनाने की भट्टी का प्रदर्शन, बेल मेटल निर्माण का प्रदर्शन भी किया जायेगा। विद्यार्थियों की मॉडल प्रदर्शनी, कारीगर विज्ञान के प्रदर्शन, क्रिएटिव लर्निंग सेंटर, प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी पेवेलियन, हस्तशिल्प पेवेलियन, औषधीय पौधों का पेवेलियन, कृषि-प्रौद्योगिकी पेवेलियन, प्रमुख वैज्ञानिकों की जीवनी पर पेवेलियन, विभिन्न सरकारी योजनाओं पर पेवेलियन आदि भी होंगे। विभिन्न राष्ट्रीय और राज्य स्तर के संगठन/संस्थाएँ जैसे डीएई, इसरो, डीआरडीओ, ब्रह्मोस, एनटीपीसी, एनएचडीसी, सीआईएल, सीएसआईआर प्रयोगशालाएँ और कृषि परिषदें अपने सफलतापूर्वक किए गए कार्यों और नवाचारों को प्रदर्शित किया जायेगा।
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अंतर्राष्ट्रीय वन मेले में भोपाल बल्कि आस पास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लगभग 30 हज़ार लोगों ने मेले में उत्सुकता से भाग लिया और मेले का लुत्फ़ उठाया। आज तीसरे दिन तक लगभग 20 लाख रूपए के वनोपज हर्बल उत्पाद से निर्मित औषधियों की बिक्री हो चुकी है। मेले में स्थापित ओपीडी में लगभग 200 से अधिक आगंतुको ने नि:शुल्क चिकित्सीय परामर्श प्राप्त किया। शिविर में सुबह 45 एवं शाम 45 आयुर्वेद चिकित्सकों तथा अनुभवी वैद्य ने अपनी सेवाएँ प्रदान की। ओ.पी.डी. में आयुर्वेदिक चिकित्सकों और अनुभवी वैद्य द्वारा नि:शुल्क परामर्श मेले के अंतिम दिन तक जारी रहेगा। लोग लेमन ग्रास, जंगली अदरक, एलोवेरा और आंवला, जंगली अदरक, एवं अन्य वनोपज से बने उत्पादों को जानने एवं खरीदने में काफी रूचि ले रहे है। इस बार मेले में आये आर्गेनिक उत्पाद लोगों का आकर्षण अपने और खींच रहे है इससे आर्गेनिक क्षेत्रों में शामिल हमारे वनांचलों में निवासरत समुदाय भी प्रोत्साहित हो रहे है।
प्रधानमंत्री वन धन केन्द्रों के द्वारा माहुल एवं अन्य पत्तों से बनाए जा रहे दोना-पत्तल जो की सिंगल यूज़ प्लास्टिक का एक अचूक विकल्प है भी लोगों में अपनी विशेष छाप छोड़ रहे है। लोगों का दोना-पत्तल के प्रति उत्साह एवं लगाव को देखते हुए पर्यावरण के प्रति हो रहे दुष्प्रभाव को रोकने कि दिशा में अनूठा प्रयास है। मेले में उज़बेकिस्तान एवं ईथोयोपिया देश के प्रतिनिधियों द्वारा मेले का भ्रमण किया गया एवं इस आयोजन की प्रशंसा की गयी। "लघु वनोपज से महिला सशक्तिकरण" विषय पर 2 दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन अपरमुख्य सचिव, वन अशोक बर्णवाल ने किया। इस अवसर पर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों भी उपस्थिति थे।
कार्यशाला में ऑस्ट्रेलिया केविषय-विशेषज्ञ ने भी भाग लिया। मध्यप्रदेश के अलावा देश के अन्य राज्यों में उत्तराखण्ड, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ एवं कर्नाटक के विषय-विशेषज्ञ, एकेडेमिक एवं इंडस्ट्री एक्सपर्ट शामिल हुए। अपर मुख्य सचिव वन अशोक बर्णवाल ने कहा कि म.प्र. राज्य लघु वनोपज संघ द्वारा आयोजित यह मेला वनवासियों, ग्रामीणों एवं विशेष तौर पर महिलाओं के आर्थिक विकास का अद्भुत समायोजन है। प्रदेश में लघु वनोपज संग्रहण कार्य में लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है। आज की कार्यशाला से प्राप्त होने वाले निष्कर्ष पर विशेष ज़ोर देते हुए कहा की मैदानी स्तर पर वन संरक्षण, आयुर्वेदिक दवाइयों के निर्माण एवं उसमे महिलाओं के योगदान से उनके आर्थिक रूप से सशक्त करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि वन धन केन्द्रों में किये जा रहे मूल्य संवर्धन के कार्य एवं उनके उत्पादों की पैकेजिंग को आकर्षक रूप देकर विपणन को बढ़ावा दिया जा रहा है। वनोउपज संघ के एमडी बिभाष कुमार ठाकुर ने कहा कि दो दिवसीय कार्यशाला में लघु वनोपज के विनाश विहीन विदोहन के माध्यम से प्रदेश के ग्रामीण आंचलों में जनजातीय महिलाओं द्वारा उनके योगदान पर देश-विदेश में हुए विभिन्न अनुसंधानों की जानकारी मिलेगी एवं हम सभी निश्चित ही इससे लाभान्वित होंगे। कार्यशाला से इस क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं के सशक्तिकरण में सहयोग प्राप्त होगा।
मेला प्रांगण में आज सुबह 11 बजे से रात्रि 10 बजे तक रंगारंग कार्यक्रम चलते रहे। मेले में आयोजित इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक प्रतियोगिता में लगभग 7विद्यालयों से 25से भी अधिक छात्र छात्राओं ने अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र – छात्राओं को पुरस्कृत किया गया एवं उनकी विलक्षण प्रतिभा को सराहा गया। मेले में दिनेश कुमार धौलपुरे (कबीर भजन गायक) एवं आर्केस्ट्रा (तिरुपा इंडस्ट्रीज) की प्रस्तुति कालोगों नेभरपूर आनंद लिया। सायंकाल में मशहूर हास्य कलाकार एहसान कुरैशी ने प्रस्तुति से उपस्थित श्रोताओं का मन मोह लिया।
शुक्रवार 20 दिसम्बर के कार्यक्रम
प्रातः 11:00 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक सोलो और ग्रुप में गायन का कार्यक्रम आयोजित होगा इस आयोजन में कक्षा 1 से 4 तक, 5 से 8 एवं 9 से 12 तक तीन ग्रुप में आयोजित है। इसका पंजीयन प्रथम आवे प्रथम पावे के आधार पर होगा। सायं 5:00 बजे से असलम इब्राहीम शेख़ द्वारा आर्केस्ट्रा की प्रस्तुति दी जाएगी। सायं 7:30 बजे से एल. एन. आयुर्वेद कॉलेज द्वारा प्रायोजित सूफ़ी बैंड (जेर्री एंड क्लेक्टिव्स) कार्यक्रम होगा।
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ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण के सचिव से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऑनलाइन निविदाएँ 11 नवम्बर को दोपहर 12 बजे तक प्रस्तुत की जा सकती हैं। पोर्टल पर प्राप्त निविदाएँ 12 नवम्बर को दोपहर 12 बजे खोली जायेंगीं। मेला की व्यवस्थाओं से संबंधित कार्यों के ठेके लेने के इच्छुक व्यक्ति एवं संस्थायें निर्धारित तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। पोर्टल पर निविदा की शर्तें उपलब्ध हैं।
ग्वालियर व्यापार मेला में टीनशेड, बेरीकेटिंग, माइक, टेंट, टैक्सी, अस्थायी विद्युत फिटिंग, सजावट कार्य व सुरक्षा गार्ड व्यवस्था इत्यादि के ठेके के लिये पोर्टल पर निविदाएँ अपलोड कर दी गई हैं। इसके अलावा फ्लैक्स प्रिंटिंग कार्य, अस्थायी सीसीटीव्ही कैमरा, मंच पर प्रकाश व्यवस्था, सम्पूर्ण मेला परिसर की साफ-सफाई शिल्प बाजार की दुकानें तैयार करने, सीवर संधारण, होर्डिंग, दुपहिया व चार पहिया वाहन पार्किंग, पब्लिक एनाउंसमेंट सिस्टम, स्वच्छता परिसरों की साफ-सफाई, पानी की लाइन बिछाने इत्यादि व्यवस्थाओं के संबंध में भी निविदाएँ पोर्टल पर अपलोड की गई हैं। साथ ही विधिवत विज्ञापन भी प्रकाशित कराया गया है।
ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण के सचिव से मिली जानकारी के अनुसार ऑनलाइन निविदाएं 11 नवंबर को दोपहर 12 बजे तक प्रस्तुत की जा सकती हैं। पोर्टल पर मिली निविदाएं 12 नवम्बर को दोपहर 12 बजे खोली जाएंगी। मेला की व्यवस्थाओं से संबंधित कार्यों के ठेके लेने के इच्छुक व्यक्ति एवं संस्थाएं निर्धारित तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। पोर्टल पर निविदा की शर्तें उपलब्ध हैं। मेला संबंधी इन व्यवस्थाओं की निविदाएं मांगी ग्वालियर व्यापार मेला में टीन शेड, बैरिकेडिंग, माइक, टेंट, टैक्सी, अस्थायी बिजली फ़िटिंग, सजावट कार्य व सुरक्षा गार्ड व्यवस्था के ठेके के लिए पोर्टल पर निविदाएं अपलोड कर दी गई हैं। इसके अलावा फ्लैक्स प्रिंटिंग कार्य, अस्थायी सीसीटीवी कैमरा, मंच पर प्रकाश व्यवस्था, सम्पूर्ण मेला परिसर की साफ-सफाई, शिल्प बाजार की दुकानें तैयार करने, सीवर संधारण, होर्डिंग, दोपहिया व चार पहिया वाहन पार्किंग, पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम, परिसरों की साफ-सफाई, पानी की लाइन बिछाने के संबंध में भी निविदाएं पोर्टल पर अपलोड की गई हैं। साथ ही विधिवत विज्ञापन भी प्रकाशित कराया गया है।
104 एकड़ में लगता है व्यापार मेला
ग्वालियर व्यापार मेला की खासियत है कि यह 104 एकड़ में लगता है। यह मेला पहले सागर ताल के पास मैदान में लगता था। पर एक सदी पहले यह वर्तमान मेला मैदान में आया। इस मेला की एक और विशेषता है। यहां मध्य प्रदेश शासन द्वारा वाहन की खरीद पर 50 प्रतिशत की रोड टैक्स छूट मिलती है। इसके चलते मेले में लगने वाला ऑटो मोबाइल सेक्टर अपने आप में खास होता है।
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