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अमेरिका और इजरायल के खिलाफ छिड़ी भीषण जंग के बीच ईरान ने अपना सर्वोच्च नेता चुन लिया है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद अब उनके बेटे मोजतबा खामेनेई यह जिम्मेदारी संभालेंगे। सोमवार को ईरान की तरफ से यह ऐलान होते ही पूरी दुनिया में कोहराम मच गया है। अब इस बात को लेकर चर्चाएं तेज हैं कि आखिर इस युद्ध को लेकर मोजतबा का रुख क्या होगा और वह अमेरिका और इजरायल के साथ-साथ देश के लोगों में उठे असंतोष की भावना का जवाब कैसे देंगे।
इससे पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की रमजान के महीने में मौत होने के बाद देश की सत्ता की बागडोर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में सबसे प्रमुख नाम उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का ही था, जिन्हें लंबे समय से ईरान की सत्ता व्यवस्था के भीतर प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है।
कौन हैं मोजतबा खामेनेई?
मोजतबा खामेनेई को अपेक्षाकृत मध्य-स्तरीय धर्मगुरु माना जाता है और उन्हें 2022 में ही अयातुल्ला की उपाधि दी गई थी, जो सर्वोच्च नेता बनने के लिए आवश्यक मानी जाती है। इसीलिए कई विश्लेषकों ने इसे उन्हें अली खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किए जाने का संकेत माना था। मोजतबा ने अपने अधिकतर राजनीतिक जीवन में कोई औपचारिक सरकारी पद नहीं संभाला, लेकिन वह सर्वोच्च नेता के कार्यालय के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें अक्सर सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली 'पावर ब्रोकर' और 'गेटकीपर' के रूप में देखा जाता रहा है।
बताया जाता है कि 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने ईरान-इराक युद्ध में संक्षिप्त रूप से हिस्सा लिया था। हालांकि उन्हें व्यापक सार्वजनिक पहचान 1990 के दशक के आखिर में मिली, जब उनके पिता अली खामेनेई की सर्वोच्च नेता के रूप में स्थिति मजबूत हो चुकी थी। 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध लगाए थे और आरोप लगाया था कि वे बिना किसी औपचारिक सरकारी पद के भी सर्वोच्च नेता की ओर से प्रभावी भूमिका निभा रहे थे।
आईआरजीसी से करीबी
समय के साथ उनकी पहचान दो प्रमुख पहलुओं से जुड़ी रही है। पहला, ईरान की सुरक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और उससे जुड़े कट्टरपंथी नेटवर्क के साथ उनके करीबी संबंध। दूसरा, सुधारवादी राजनीति और पश्चिमी देशों के साथ करीबी संबंधों के प्रति उनका कड़ा विरोध। आलोचक उन्हें 2009 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दमन से भी जोड़ते हैं। माना जाता है कि उन्होंने ईरान के सरकारी प्रसारण संगठन पर भी गहरा प्रभाव बनाए रखा, जिससे उन्हें देश के सूचना तंत्र और सरकारी विमर्श के एक हिस्से पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण मिला।
कैसे होगी ईरान की नीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा खामेनेई के सर्वोच्च नेता बनने पर ईरान की नीतियों में बड़े बदलाव की संभावना कम है। माना जाता है कि उनके नेतृत्व में देश की राजनीति में सुरक्षा संस्थानों, खासकर आईआरजीसी का प्रभाव और मजबूत हो सकता है। विश्लेषकों के अनुसार घरेलू स्तर पर विरोध प्रदर्शनों के प्रति सख्त रुख अपनाया जा सकता है, जबकि विदेश नीति में पश्चिमी देशों के साथ बातचीत मुख्य रूप से रणनीतिक जरूरतों के आधार पर ही की जा सकती है। कुल मिलाकर, उनके नेतृत्व में ईरान की नीति रणनीतिक रूप से व्यावहारिक रह सकती है। खामेनेई की नियुक्ति इस बात का भी इशारा है कि ईरान किसी भी हाल में अमेरिकी मांगों के आगे नहीं झुकेगा और वह अपने पिता के सख्त रवैये को जारी रखेंगे, यानी इस्लाम और अमेरिका विरोधी विदेश नीति को सबसे ऊपर रखना। वहीं 28 फरवरी के हमलों में अपने पिता, मां और पत्नी को खोने वाले मोजतबा बदला लेने की कोशिशें भी कर सकते हैं। युद्ध फिलहाल जारी रहेगा।