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मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की युगलपीठ न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति आरके वाणी के समक्ष जबलपुर निवासी अब्दुल रज्जाक से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने स्पष्ट किया कि याचिका दायर किए जाने की तारीख तक रज्जाक के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एचएस रूपराह ने अदालत को बताया कि रज्जाक की पत्नी सुबीना बेगम पहले अपनी याचिका वापस ले चुकी हैं। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता वर्तमान में जिस आपराधिक मामले में जेल में है, उसमें उसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए। साथ ही, वह चाहें तो संबंधित आपराधिक कार्रवाई को निरस्त करने की मांग भी कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता की दलील
रज्जाक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने राज्य सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के लिए अदालत से समय मांगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को निर्धारित कर दी।
विधायक पर लगाए गए आरोप
मामले में अब्दुल रज्जाक ने विधायक संजय पाठक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराई जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके विरुद्ध दर्ज कई मामलों में अभी तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं हुई है।
गिरफ्तारी को बताया प्रक्रिया का दुरुपयोग
रज्जाक का आरोप है कि एक मामले में जमानत मिलते ही दूसरे प्रकरण में गिरफ्तारी दिखा दी जाती है। उन्होंने इसे न्यायिक प्रक्रिया के साथ छल बताया है।
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मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की युगलपीठ न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति आरके वाणी के समक्ष जबलपुर निवासी अब्दुल रज्जाक से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने स्पष्ट किया कि याचिका दायर किए जाने की तारीख तक रज्जाक के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एचएस रूपराह ने अदालत को बताया कि रज्जाक की पत्नी सुबीना बेगम पहले अपनी याचिका वापस ले चुकी हैं। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता वर्तमान में जिस आपराधिक मामले में जेल में है, उसमें उसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए। साथ ही, वह चाहें तो संबंधित आपराधिक कार्रवाई को निरस्त करने की मांग भी कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता की दलील
रज्जाक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने राज्य सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के लिए अदालत से समय मांगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को निर्धारित कर दी।
विधायक पर लगाए गए आरोप
मामले में अब्दुल रज्जाक ने विधायक संजय पाठक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराई जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके विरुद्ध दर्ज कई मामलों में अभी तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं हुई है।
गिरफ्तारी को बताया प्रक्रिया का दुरुपयोग
रज्जाक का आरोप है कि एक मामले में जमानत मिलते ही दूसरे प्रकरण में गिरफ्तारी दिखा दी जाती है। उन्होंने इसे न्यायिक प्रक्रिया के साथ छल बताया है।
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मामले की सुनवाई के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि गर्भ जारी रहने से बच्ची पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके बाद अदालत ने मानवीय आधार पर गर्भ समापन की अनुमति प्रदान की। यह निर्णय राज्य में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
]]>इन बातों पर हुआ समझौता
पति के खिलाफ दायर सभी आपराधिक और दीवानी प्रकरण पत्नी 15 दिनों में वापस लेंगी।
पति द्वारा दी गई स्थायी भरण-पोषण राशि पत्नी लौटाएंगी।
दोनों एक-दूसरे के प्रति सम्मान और शांति के साथ साथ रहेंगे।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या उत्पीड़न नहीं करेंगे।
साथ रहने के दिए निर्देश
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने दंपती को 30 दिन साथ रहने का निर्देश दिया, ताकि वे आपसी मतभेद सुलझा सकें। एक माह बाद दोनों दोबारा कोर्ट में उपस्थित हुए और बताया कि वे अब साथ रहना चाहते हैं। पत्नी ने कुछ मामूली शिकायतें रखीं, जिन पर न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक जीवन में ऐसे मुद्दे समझदारी और सहनशीलता से सुलझाए जा सकते हैं।अदालत ने शासकीय अधिवक्ता अंजलि ग्यानानी को मामले में ‘शौर्या दीदी’ नियुक्त किया है। वे अगले 6 माह तक पत्नी का मार्गदर्शन और सहयोग करती रहेंगी, ताकि दाम्पत्य जीवन में स्थायी शांति और विश्वास बना रहे।
यह आदेश हाई कोर्ट की एकलपीठ के न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी ने आजाद चौक, कटनी निवासी इलियास अहमद की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शंकर प्रसाद सिंह और पद्मावती जायसवाल ने पक्ष रखा।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता इलियास अहमद की नियुक्ति उर्दू विषय के शिक्षक के रूप में शासकीय माध्यमिक शाला, खमरिया नंबर-दो में हुई थी। लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी, कटनी ने उनका ट्रांसफर शासकीय प्राथमिक शाला कोठी, ढीमरखेड़ा में कर दिया। यहीं विवाद शुरू हुआ क्योंकि जहां उनका स्थानांतरण हुआ वहां उर्दू विषय का न तो कोई पद स्वीकृत है और न ही छात्र हैं।
इलियास अहमद ने इस अन्याय के खिलाफ डीईओ कटनी, कलेक्टर कटनी और लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल को अभ्यावेदन दिया, जिसमें स्थानांतरण रद्द करने की मांग की गई। साथ ही, यह भी कहा गया कि मप्र शासन के सर्कुलर के अनुसार मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी होने के नाते उन्हें स्थानांतरण में छूट मिलनी चाहिए। लेकिन, लगातार आवेदन देने के बावजूद उनकी बात नहीं सुनी गई, जिससे विवश होकर उन्हें हाई कोर्ट का रुख करना पड़ा।
हाई कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने माना कि शिक्षक की नियुक्ति विशिष्ट विषय उर्दू के लिए हुई थी। ऐसे में उस स्कूल में भेजना जहां न तो उर्दू पढ़ने वाले छात्र हैं और न ही पद स्वीकृत है, न केवल व्यावहारिक रूप से गलत है बल्कि यह शैक्षिक हितों के भी खिलाफ है। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को उसी मौजूदा स्कूल में कार्य करने दिया जाए, जहां उर्दू के विद्यार्थी और पद दोनों मौजूद हैं। स्थानांतरण के विरुद्ध प्रस्तुत अभ्यावेदन का निराकरण 30 दिन के भीतर किया जाए।
]]>टीआई को पौधों के फोटो और उनकी जीपीएस लोकेशन की जानकारी कोर्ट में पेश करनी होगी। इस मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को निर्धारित है। उससे पहले सतना पुलिस अधीक्षक को निर्देशित किया गया है कि वे पौधों का निरीक्षण कर रिपोर्ट कोर्ट में जमा करें।
नोटिस तामीली में चूक बनी वजह
यह मामला एक नाबालिग से दुराचार के प्रकरण से जुड़ा है। सतना की जिला अदालत ने 10 अक्टूबर 2021 को रामअवतार चौधरी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2024 को पीडि़ता को नोटिस भेजा, जिसे सतना कोतवाली पुलिस के माध्यम से तामील कराना था। लेकिन पुलिस की ओर से यह प्रक्रिया समय पर नहीं की गई, जिसे कोर्ट ने गंभीरता से लिया।
क्या है पूरा मामला
सतना जिले के निवासी रामअवतार चौधरी को नाबालिग पीड़िता से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। जिला कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ रामअवतार चौधरी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी। इसमें बीते साल 30 सितंबर 2024 को हाईकोर्ट ने पीडि़ता को नोटिस जारी करने का आदेश दिया था, लेकिन कोतवाली थाना प्रभारी रविंद्र द्विवेदी द्वारा यह नोटिस समय पर तामील नहीं कराया गया। जिस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। थाना प्रभारी ने माफी मांगी तो कोर्ट से कहा कि वह पुलिस महानिरीक्षक द्वारा लगाई गई पांच हजार की जुर्माना राशि का भुगतान करेंगे और स्वयं 1000 पौधे लगाएंगे।
टीआई को एक साल में लगाने होंगे फलदार पौधे
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के द्वारा निर्देश दिए गए कि पौधे आम, जामुन, महुआ, अमरूद जैसे फलदार किस्मों के हों। ये पौधे सतना जिले के चित्रकूट में 1 जुलाई 2025 से 31 अगस्त 2026 तक लगाए जाएंगे। कोर्ट के द्वारा साफतौर पर स्पष्ट किया गया है कि लगाए हुए पौधों की देखभाल स्वयं थाना प्रभारी को ही करनी होगी। ताकि पौधे अच्छे तरह स्थापित हो पाएं। इसमें सतना एसपी को टीआई के द्वारा लगाए गए पौधों का निरीक्षण करना होगा।
टीआई ने सजा को बताया सौभाग्य
इस आदेश के बाद टीआई रावेंद्र द्विवेदी ने प्रतिक्रिया दी और कहा, हाईकोर्ट का जो भी आदेश है उसका पालन करूंगा। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं। फलदार पौधे लगाना पुण्य का कार्य है, जिसे मैं पूरे मन से निभाऊंगा।
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मेडिकल रिपोर्ट में गर्भावस्था 30 सप्ताह की
मामले के अनुसार दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति के लिए माता-पिता के सहमति पत्र के साथ छिंदवाड़ा जिला न्यायालय के न्यायाधीश ने हाई कोर्ट को पत्र भेजा था. पत्र की सुनवाई याचिका के रूप में करते हुए हाई कोर्ट ने पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत करने निर्देश जारी किये थे. हाई कोर्ट में पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया था "गर्भावस्था 30 सप्ताह की है. वर्तमान स्थिति में भ्रूण के जीवित पैदा होने की अधिक संभावना है. गर्भपात के दौरान पीड़िता को जान का खतरा हो सकता है."
पीड़िता के साथ ही पैरेंट्स को सभी पहलुओं की जानकारी नहीं
इस मामले में सरकार की तरफ से बताया गया "माता-पिता की सहमति में यह साफ नहीं है कि पीड़िता तथा भ्रूण के जीवन को होने वाले खतरे की जानकारी होने के बावजूद वे गर्भपात कराना चाहते हैं. माता-पिता दूरदराज के गांव से हैं और अशिक्षित होने के कारण सभी पहलुओं से अवगत नहीं हैं. सक्षम अधिकारियों द्वारा माता-पिता और पीड़िता की पुनः काउंसलिंग करवाई जाए."
पैरेंट्स बच्चे को नहीं रखना चाहते तो सरकार करे देखरेख
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है "गर्भावस्था लगभग 30 सप्ताह की है और तथ्य को देखते हुए कि जिला न्यायाधीश छिंदवाड़ा को यह आदेश देना उचित होगा कि एक महिला न्यायिक अधिकारी के साथ डॉक्टरों की टीम और सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य आज या कल पीड़िता के माता-पिता और पीड़िता की काउंसलिंग करें. उन्हें बच्चे को जन्म देने तथा गर्भपात करवाने के स्थिति में फायदे व नुकसान से अवगत करवाएं. अगर जन्म देने के बाद वे बच्चे को नहीं रखना चाहते हैं, तो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्य सरकार की होगी. याचिका पर अगली सुनवाई 25 जून को होगी."
]]>नीट यूजी यानी राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (स्नातक) संबंध में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही याचिकाओं पर सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई पर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने रिपोर्ट पेश कर कहा था कि परीक्षा दोबारा आयोजित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सिर्फ 75 अभ्यर्थियों ने ही परीक्षा के दौरान हुई अव्यवस्था को लेकर याचिका दायर की है।
प्रभावित केंद्रों पर 8790 परीक्षार्थियों ने परीक्षा दी थी
इस संबंध में चल रही 50 से ज्यादा याचिकाओं पर मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई थी, तब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि इंदौर-उज्जैन के प्रभावित केंद्रों पर 8790 परीक्षार्थियों ने परीक्षा दी थी। इसके साथ ही एनटीए ने नीट यूजी के संपूर्ण परीक्षा परिणाम को घोषित करने की अनुमति देने की मांग की थी। नीट यूजी के लिए इंदौर में 49 केंद्र बनाए गए थे। चार मई को परीक्षा के दिन इंदौर में मौसम बदला और जोरदार वर्षा के चलते पूरे शहर में बिजली गुल हो गई थी। परीक्षा केंद्रों पर बिजली गुल होने पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी। कई परीक्षा केंद्र में अंधेरा छा गया था और परीक्षार्थियों को मोमबत्ती की रोशनी में परीक्षा देनी पड़ी थी।
कोर्ट ने पहले रिजल्ट जारी करने पर लगाई थी रोक
याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 15 मई को कोर्ट ने नीट यूजी का परीक्षा परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी थी। हालांकि एक दिन बाद ही 16 मई को कोर्ट ने इस आदेश में संशोधन करते हुए एनटीए को इंदौर के प्रभावित सेंटरों के परीक्षा परीणाम छोड़कर शेष का परीक्षा परिणाम घोषित करने की अनुमति दे दी थी। अब कोर्ट ने केवल 75 अभ्यर्थियों के रिजल्ट को छोड़कर बाकी सभी का रिजल्ट जारी करने के आदेश दिया है।
]]>मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर की सबसे बड़ी ट्रैफिक समस्याओं में से एक अंबेडकर चौक से अब्दुल हमीद चौक तक के मार्ग पर फ्लाईओवर निर्माण की योजना, जो वर्ष 2019 में स्वीकृत हुई थी, अब तक शुरू नहीं हो पाई है। इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने कड़ा रुख अपनाया है।
जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने प्रमुख सचिव पीडब्ल्यूडी, शहरी विकास विभाग के सचिव और जबलपुर कलेक्टर समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
2019 में मिली थी मंजूरी, 2024 तक सिर्फ बढ़ती गई लागत
फ्लाईओवर की शुरुआती योजना 3.2 किलोमीटर लंबी थी, जिसकी लागत 186 करोड़ रुपए तय की गई थी। हालांकि, 2024 में इसकी लंबाई बढ़ाकर 5.1 किलोमीटर कर दी गई और बजट भी तीन गुना तक बढ़ाया गया, लेकिन धरातल पर अब तक कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया। हाईकोर्ट ने इस देरी पर नाराजगी जताते हुए पूछा है कि जब स्वीकृति और बजट दोनों पहले ही तय हो चुके हैं, तो आखिर निर्माण कार्य शुरू क्यों नहीं हुआ?
सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक इलाके में स्वीकृत है फ्लावर
आपको बता दे की अंबेडकर चौक से लेकर अब्दुल हमीद चौक तक स्वीकृत यह फ्लाईओवर शहर के सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक है। अंबेडकर चौक से लेकर घमापुर चौक तक हर वक्त जाम की स्थिति लगी रहती है। उसके बावजूद यहां फ्लाईओवर ना बनना अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है। जबकि यहां पर स्थानीय प्रतिनिधि से लेकर आम लोगों ने कई बार फ्लाईओवर की मांग की है।
घंटों जाम में फंसते हैं लोग
अंबेडकर चौक से घमापुर और अब्दुल हमीद चौक तक का इलाका जबलपुर का सबसे व्यस्त मार्ग माना जाता है, जहां दिनभर जाम की स्थिति बनी रहती है। ट्रैफिक की परेशानी से जूझ रहे स्थानीय लोगों ने कई बार फ्लाईओवर की मांग उठाई है। इसके बावजूद शासन और प्रशासन की उदासीनता से यह परियोजना केवल कागज़ों में ही सिमटी रह गई है।
हाईकोर्ट की सख्ती से जागेगा सिस्टम?
हाईकोर्ट (MP High Court) द्वारा अधिकारियों को नोटिस जारी किए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस फ्लाईओवर प्रोजेक्ट पर कुछ ठोस कार्रवाई देखने को मिलेगी। यह मामला ना केवल एक शहरी विकास परियोजना से जुड़ा है, बल्कि यह जनता की रोजमर्रा की परेशानियों और शासन की जवाबदेही से भी सीधा संबंध रखता है। सात साल पुरानी मंजूरी के बावजूद अगर एक जरूरी फ्लाईओवर का काम शुरू नहीं हो पाया है, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल खड़े होना लाजिम है।
]]>मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर की सबसे बड़ी ट्रैफिक समस्याओं में से एक अंबेडकर चौक से अब्दुल हमीद चौक तक के मार्ग पर फ्लाईओवर निर्माण की योजना, जो वर्ष 2019 में स्वीकृत हुई थी, अब तक शुरू नहीं हो पाई है। इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने कड़ा रुख अपनाया है।
जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने प्रमुख सचिव पीडब्ल्यूडी, शहरी विकास विभाग के सचिव और जबलपुर कलेक्टर समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
2019 में मिली थी मंजूरी, 2024 तक सिर्फ बढ़ती गई लागत
फ्लाईओवर की शुरुआती योजना 3.2 किलोमीटर लंबी थी, जिसकी लागत 186 करोड़ रुपए तय की गई थी। हालांकि, 2024 में इसकी लंबाई बढ़ाकर 5.1 किलोमीटर कर दी गई और बजट भी तीन गुना तक बढ़ाया गया, लेकिन धरातल पर अब तक कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया। हाईकोर्ट ने इस देरी पर नाराजगी जताते हुए पूछा है कि जब स्वीकृति और बजट दोनों पहले ही तय हो चुके हैं, तो आखिर निर्माण कार्य शुरू क्यों नहीं हुआ?
सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक इलाके में स्वीकृत है फ्लावर
आपको बता दे की अंबेडकर चौक से लेकर अब्दुल हमीद चौक तक स्वीकृत यह फ्लाईओवर शहर के सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक है। अंबेडकर चौक से लेकर घमापुर चौक तक हर वक्त जाम की स्थिति लगी रहती है। उसके बावजूद यहां फ्लाईओवर ना बनना अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है। जबकि यहां पर स्थानीय प्रतिनिधि से लेकर आम लोगों ने कई बार फ्लाईओवर की मांग की है।
घंटों जाम में फंसते हैं लोग
अंबेडकर चौक से घमापुर और अब्दुल हमीद चौक तक का इलाका जबलपुर का सबसे व्यस्त मार्ग माना जाता है, जहां दिनभर जाम की स्थिति बनी रहती है। ट्रैफिक की परेशानी से जूझ रहे स्थानीय लोगों ने कई बार फ्लाईओवर की मांग उठाई है। इसके बावजूद शासन और प्रशासन की उदासीनता से यह परियोजना केवल कागज़ों में ही सिमटी रह गई है।
हाईकोर्ट की सख्ती से जागेगा सिस्टम?
हाईकोर्ट (MP High Court) द्वारा अधिकारियों को नोटिस जारी किए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस फ्लाईओवर प्रोजेक्ट पर कुछ ठोस कार्रवाई देखने को मिलेगी। यह मामला ना केवल एक शहरी विकास परियोजना से जुड़ा है, बल्कि यह जनता की रोजमर्रा की परेशानियों और शासन की जवाबदेही से भी सीधा संबंध रखता है। सात साल पुरानी मंजूरी के बावजूद अगर एक जरूरी फ्लाईओवर का काम शुरू नहीं हो पाया है, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल खड़े होना लाजिम है।
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