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उत्तर प्रदेश के एक नगर निगम में हाउस, वाटर और सीवर टैक्स को लेकर बहुत बड़ा फैसला लिया है। अब यहां पर दिव्यांग और दृष्टिबाधित यानी जिन्हें दिखाई नहीं देता है, ऐसे लोगों से किसी प्रकार का टैक्स नहीं लेना का फैसला किया गया है। नगर निगम कार्यकारिणी ने अबकी पहली बार दृष्टिबाधित और 80 प्रतिशत तक दिव्यांग भवनस्वामियों को सभी कर से छूट दे दी है। इसमें गृह, जल और सीवरकर शामिल है। वहीं सामान्य लोगों को 15 मई से 15 जुलाई तक गृहकर और सीवरकर जमा करने पर 10 फीसदी की छूट दी जाएगी। यदि कर ऑनलाइन जमा करते हैं तो यह छूट 12 प्रतिशत मिलेगी। वहीं लाइसेंस शुल्क में व्यापारियों को 10 प्रतिशत की राहत दी गई है। यह छूट वाराणसी के नगर निगम ने दी है।
महापौर अशोक कुमार तिवारी की अध्यक्षता में सोमवार को निगम मुख्यालय में कार्यकारिणी की बैठक में यह निर्णय लिया गया। करीब तीन घंटे चली बैठक में दृष्टिहीन और 80% दिव्यांग भवन स्वामियों के लिए कर में पूरी तरह छूट का निर्णय हुआ। लेकिन संबंधित भवनस्वामी को दिव्यांगता प्रमाण पत्र निगम कार्यालय में प्रस्तुत करना होगा।
जिन भवन स्वामियों ने इस वित्तीय वर्ष का गृहकर, सीवरकर जमा कर दिया है, उनका अगले वित्तीय वर्ष में समायोजन होगा। उपसभापति नरसिंह दास ने सभी पूर्व महापौर और नगर प्रमुख के आवास तक जाने वाले मार्गों एवं गलियों की मरम्मत का मुद्दा उठाया। पार्षद प्रवीण राय ने पंचक्रोशी परिक्रमा मार्ग की बदहाली का मुद्दा उठाया।
कार्यकारिणी ने नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल को परिक्रमा पथ पर सड़कों की मरम्मत, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, शौचालय सुविधा का निर्देश दिया। मदन मोहन तिवारी ने वर्ष 2023 से 2026 तक हुए कार्यों का ब्योरा एक सप्ताह में प्रस्तुत करने को कहा। प्रमोद राय ने ठेकेदारों को हो रहे भुगतान के संबंध में सवाल उठाए।
सुशील गुप्ता ने कहा कि सड़क की खोदाई के लिए एनओसी में कड़ी शर्तें रखी जाएं। अशोक मौर्या ने कांशीराम आवास योजना की बदहाली पर सवाल उठाए। बैठक में अमरदेव यादव, हनुमान प्रसाद, माधुरी सिंह, सुशीला देवी रहीं।
रेलवे की जमीन लेकर सुविधाएं दी जाएं
शहर में बुनियादी सुविधाओं के लिए नगर निगम ने रक्षा संपदा विभाग और रेलवे की कुछ जमीनों को लेने के संबंध में प्रस्ताव दिया है। रक्षा संपदा विभाग से कैंटोंमेंट स्थित गुडशेड बाजार में 1.2286 हेक्टेयर, फुलवरिया फ्लाईओवर के नीचे 3.8121 हेक्टेयर, डोमरी और सूजाबाद में 19.6690 हेक्टेयर, 160 एकड़ क्षेत्र में 34.259 हेक्टेयर शामिल है। इसी तरह रेलवे से घौसाबाद में 2830 वर्ग मीटर, लहरतारा से मंडुवाडीह मार्ग पर 2029.30 वर्ग मीटर, गुडशेड बाजार में लगभग 4100 वर्ग मीटर जमीन शामिल है। प्रस्ताव के अनुसार नगर निगम रक्षा संपदा और रेलवे को इस कीमत की अपनी जमीन देगा।
पुलिस के साथ मिलकर नगर निगम की टीम आगामी दिनों में कार्रवाई शुरू करेगी। यह निर्णय सोमवार को कलेक्टर कार्यालय में आयोजित सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में हुआ। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि चार जोन में बांटे गए ई-रिक्शाओं के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाएगा।
वर्तमान में शहर में अभी तक तीन हजार ई-रिक्शाओं के रजिस्ट्रेशन हुए हैं और एक आकलन के मुताबिक फिलहाल शहर में 11 हजार ई-रिक्शा चल रहे हैं। ऐसे में जो ई-रिक्शा चालक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाएंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी।
ई-रिक्शाओं को कलर कोड से रंगा जाएगा
आठ एसीपी जोन के माध्यम से चार सेक्टर में बांटे गए ई-रिक्शाओं को उस क्षेत्र के विशेष कलर कोड से रंगा जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी। इसके अलावा इंदौर में निर्धारित 16 ब्लैक स्पाट पर आईडीए, एनएचएआई, एमपीआईडीसी और नगर निगम सहित अन्य एजेंसियों सुधार के लिए जल्द से जल्द काम करेगी।
शहर के कई रहवासी व व्यावसायिक इलाकों से सड़कों में स्पीड ब्रेकर के लिए मांग के प्रस्ताव समिति के पास पहुंचे हैं। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस उस क्षेत्र का निरीक्षण कर वहां के ट्रैफिक स्थिति का आकलन कर स्पीड ब्रेकर निर्माण के लिए अनुमति देगी।
बैठक में नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल, एसपी ग्रामीण यांगचेन भूटिया, डीसीपी ट्रैफिक राजेश त्रिपाठी, अपर आयुक्त आकाश सिंह, स्मार्ट सिटी के सीईओ अर्थ जैन, अपर कलेक्टर रोशन राय सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।
बसों के रूट में परिवर्तन किया गया
बैठक में कलेक्टर शिवम वर्मा ने कहा कि प्रशासन का मुख्य उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना और जनहानि को रोकना है। इसके लिए इंजीनियरिंग सुधारों के साथ-साथ सतत मानिटरिंग की जा रही है। संबंधित विभागों को दिए गए निर्देशों के पालन की नियमित समीक्षा भी की जा रही है तथा आवश्यकतानुसार कार्रवाई भी की जा रही है।
उन्होंने बताया कि पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को दिए गए निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ है, जिससे सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। कलेक्टर शिवम वर्मा ने बताया राजवाड़ा क्षेत्र में सिटी बसों के खड़े होने से यातायात बाधित हो रहा था।
इसलिए बसों के रूट में परिवर्तन किया गया है, जिससे ट्रैफिक में सुधार देखने को मिला है। हालांकि यात्रियों को हो रही असुविधा को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
आठ मार्गों पर किया जा रहा सुधार
यातायात व्यवस्था सुधार के लिए शहर के आठ प्रमुख मार्गों को चिन्हित किया गया है, जहां अतिक्रमण और अव्यवस्थित संरचना के कारण जाम की स्थिति बनती थी। इन मार्गों पर अतिक्रमण हटाने, लेफ्ट टर्न व्यवस्थित करने तथा विद्युत खंभों एवं डीपी शिफ्टिंग की कार्रवाई जारी है, जिससे यातायात सुगम बनाया जा सके।
ट्रैफिक सुधार के लिए दिए गए ये निर्देश
सड़क किनारे खड़े वाहनों पर चालानी कार्रवाई होगी, वाहनों पर लाक लगाया जाएगा।
एयरपोर्ट के सामने बन रहे मेट्रो स्टेशन व बिजासन माता मंदिर के बीच रिक्त भूमि पर एयरपोर्ट टर्मिनल के सामने से सर्विस रोड बनाई जाएगी।
बायपास एवं अन्य प्रमुख मार्गों जहां पर दुर्घटनाएं संभावित रहती हैं उन क्षेत्रों के चिह्नित रहवासियों को सीपीआर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे आवश्यकता पड़ने पर वे पीड़ितों को तुरंत सीपीआर दे सकेंगे।
निर्माणाधीन पुल-पुलियाओं और सड़कों के वैकल्पिक मार्गों की मरम्मत जल्द की जाए।
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पुलिस के साथ मिलकर नगर निगम की टीम आगामी दिनों में कार्रवाई शुरू करेगी। यह निर्णय सोमवार को कलेक्टर कार्यालय में आयोजित सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में हुआ। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि चार जोन में बांटे गए ई-रिक्शाओं के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाएगा।
वर्तमान में शहर में अभी तक तीन हजार ई-रिक्शाओं के रजिस्ट्रेशन हुए हैं और एक आकलन के मुताबिक फिलहाल शहर में 11 हजार ई-रिक्शा चल रहे हैं। ऐसे में जो ई-रिक्शा चालक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाएंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी।
ई-रिक्शाओं को कलर कोड से रंगा जाएगा
आठ एसीपी जोन के माध्यम से चार सेक्टर में बांटे गए ई-रिक्शाओं को उस क्षेत्र के विशेष कलर कोड से रंगा जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी। इसके अलावा इंदौर में निर्धारित 16 ब्लैक स्पाट पर आईडीए, एनएचएआई, एमपीआईडीसी और नगर निगम सहित अन्य एजेंसियों सुधार के लिए जल्द से जल्द काम करेगी।
शहर के कई रहवासी व व्यावसायिक इलाकों से सड़कों में स्पीड ब्रेकर के लिए मांग के प्रस्ताव समिति के पास पहुंचे हैं। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस उस क्षेत्र का निरीक्षण कर वहां के ट्रैफिक स्थिति का आकलन कर स्पीड ब्रेकर निर्माण के लिए अनुमति देगी।
बैठक में नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल, एसपी ग्रामीण यांगचेन भूटिया, डीसीपी ट्रैफिक राजेश त्रिपाठी, अपर आयुक्त आकाश सिंह, स्मार्ट सिटी के सीईओ अर्थ जैन, अपर कलेक्टर रोशन राय सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।
बसों के रूट में परिवर्तन किया गया
बैठक में कलेक्टर शिवम वर्मा ने कहा कि प्रशासन का मुख्य उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना और जनहानि को रोकना है। इसके लिए इंजीनियरिंग सुधारों के साथ-साथ सतत मानिटरिंग की जा रही है। संबंधित विभागों को दिए गए निर्देशों के पालन की नियमित समीक्षा भी की जा रही है तथा आवश्यकतानुसार कार्रवाई भी की जा रही है।
उन्होंने बताया कि पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को दिए गए निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ है, जिससे सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। कलेक्टर शिवम वर्मा ने बताया राजवाड़ा क्षेत्र में सिटी बसों के खड़े होने से यातायात बाधित हो रहा था।
इसलिए बसों के रूट में परिवर्तन किया गया है, जिससे ट्रैफिक में सुधार देखने को मिला है। हालांकि यात्रियों को हो रही असुविधा को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
आठ मार्गों पर किया जा रहा सुधार
यातायात व्यवस्था सुधार के लिए शहर के आठ प्रमुख मार्गों को चिन्हित किया गया है, जहां अतिक्रमण और अव्यवस्थित संरचना के कारण जाम की स्थिति बनती थी। इन मार्गों पर अतिक्रमण हटाने, लेफ्ट टर्न व्यवस्थित करने तथा विद्युत खंभों एवं डीपी शिफ्टिंग की कार्रवाई जारी है, जिससे यातायात सुगम बनाया जा सके।
ट्रैफिक सुधार के लिए दिए गए ये निर्देश
सड़क किनारे खड़े वाहनों पर चालानी कार्रवाई होगी, वाहनों पर लाक लगाया जाएगा।
एयरपोर्ट के सामने बन रहे मेट्रो स्टेशन व बिजासन माता मंदिर के बीच रिक्त भूमि पर एयरपोर्ट टर्मिनल के सामने से सर्विस रोड बनाई जाएगी।
बायपास एवं अन्य प्रमुख मार्गों जहां पर दुर्घटनाएं संभावित रहती हैं उन क्षेत्रों के चिह्नित रहवासियों को सीपीआर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे आवश्यकता पड़ने पर वे पीड़ितों को तुरंत सीपीआर दे सकेंगे।
निर्माणाधीन पुल-पुलियाओं और सड़कों के वैकल्पिक मार्गों की मरम्मत जल्द की जाए।
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लोकायुक्त की छापेमारी और FIR का असर
इससे ठीक पहले करोड़ों रुपये के फर्जी बिल भुगतान मामले में निगम के डाटा सेंटर सहित कई शाखाओं में छापेमारी कर लोकायुक्त ने पिछले करीब दस साल के दस्तावेज और सर्वर डाटा जब्त किया है। शिकायत के आधार पर की गई प्रारंभिक जांच में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद शुक्रवार को तत्कालीन वित्त एवं लेखा शाखा की जिम्मेदारी देख रहे अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी की धाराओं में एफआइआर दर्ज की गई थी। इसके बाद निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने उन्हें इस शाखा से हटा दिया गया है। ऐन वक्त पर वित्त विभाग के प्रमुख को हटाए जाने से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप है। अब मुकेश शर्मा पर बजट को अंतिम रूप देने और निगम की वित्तीय साख सुधारने की दोहरी चुनौती होगी।
बता दें कि नगर निगम में बिना काम कराए फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपए निकालने के मामले में लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई की थी। टीम ने निगम के डाटा सेंटर समेत कई शाखाओं में छापेमारी कर पिछले करीब 10 साल के दस्तावेज और सर्वर डाटा जब्त कर लिया था। इस मामले में सेवतकर समेत अन्य पर विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया था। एफआईआर के बाद शनिवार को कमिश्नर जैन ने सेवतकर को हटाने की कार्रवाई की।
कोर्ट से सर्च वारंट लेकर की थी छापेमारी निगम में फर्जी भुगतान की शिकायत नवंबर 2025 में लोकायुक्त को मिली थी। प्रारंभिक जांच में तथ्य सही पाए जाने पर 9 मार्च को आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी की धाराओं में FIR दर्ज की गई है। इसके बाद कोर्ट से सर्च वारंट लेकर छापेमारी की गई थी।
लोकायुक्त पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई नवंबर 2025 में मिली एक शिकायत के आधार पर की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नगर निगम में कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी बिल बनाकर सरकारी राशि का भुगतान कराया गया। प्रारंभिक जांच में आरोपों के समर्थन में पर्याप्त तथ्य मिलने के बाद 9 मार्च को अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ी धाराओं में FIR दर्ज की गई।
जांच एजेंसी के मुताबिक फर्जी भुगतान के लिए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर ई-बिल तैयार किए गए। आरोप है कि कई मामलों में नगर निगम के जलकार्य विभाग, सामान्य प्रशासन विभाग और केंद्रीय वर्कशॉप के नाम पर वाहनों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए, जबकि वास्तव में ऐसे काम हुए ही नहीं। इसके बावजूद सिस्टम में बिल दर्ज कर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
लोकायुक्त टीम ने शुक्रवार सुबह करीब साढ़े दस बजे नगर निगम के अलग-अलग विभागों में एक साथ कार्रवाई की। लेखा शाखा, कंप्यूटर शाखा, डेटा सेंटर, लिंक रोड-2 स्थित मुख्य कार्यालय और फतेहगढ़ स्थित पुराने कार्यालय में छापेमारी कर दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड को अपने कब्जे में लिया गया। जांच अधिकारियों ने भुगतान से जुड़े SAP सॉफ्टवेयर का डेटा भी जब्त किया है, जिसकी विस्तृत जांच की जा रही है।
लोकायुक्त अधिकारियों का कहना है कि सर्वर डेटा की पड़ताल के बाद यह स्पष्ट किया जाएगा कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में उन कार्यों का निष्पादन हुआ या नहीं। जांच के दौरान अन्य अधिकारियों और निजी फर्मों की भूमिका भी सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
इस बीच अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि नगर निगम में बिल सीधे लेखा शाखा से तैयार या स्वीकृत नहीं किए जाते। संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद ही बिल आते हैं और फंड की उपलब्धता के आधार पर आयुक्त से चर्चा के बाद भुगतान किया जाता है।
फिलहाल लोकायुक्त की जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला सरकारी संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिस पर प्रशासन और आम जनता दोनों की नजर बनी हुई है।
ये गड़बड़ी आई थी सामने आरोप है कि नगर निगम के जलकार्य, सामान्य प्रशासन और केंद्रीय वर्कशॉप जैसे विभागों के नाम पर वाहनों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए। कई मामलों में वास्तव में काम हुआ ही नहीं, लेकिन सिस्टम में ई-बिल तैयार कर दिए गए। कुछ मामलों में जिस विभाग के नाम से बिल बनाए गए, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं थी।
इन जगहों पर हुई थी छापेमारी लोकायुक्त पुलिस ने निगम के लेखा शाखा, कंप्यूटर शाखा, डाटा सेंटर, लिंक रोड-2 स्थित मुख्य कार्यालय और फतेहगढ़ स्थित पुराने कार्यालय में एक साथ छापेमारी की। लोकायुक्त का कहना है कि डिजिटल डाटा और दस्तावेजों की जांच के बाद मामले में अन्य कर्मचारियों और फर्मों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
SAP सॉफ्टवेयर का डाटा जब्त किया प्रारंभिक जांच में मोटर वर्क शाखा, जल कार्य विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़े कुछ कार्यों में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। जांच टीम ने भुगतान से जुड़े SAP सॉफ्टवेयर का डिजिटल डाटा भी कब्जे में लिया है। अब इसकी जांच कर यह पता लगाया जाएगा कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में काम हुआ भी था या नहीं।
इस मामले में अपर आयुक्त ने कहा- कमिश्नर से चर्चा के बाद भुगतान इस मामले में अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने कहा था कि लेखा शाखा में बिल सीधे तैयार या पास नहीं किए जाते। बिल संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद आते हैं और फंड की उपलब्धता के अनुसार नगर निगम आयुक्त से चर्चा के बाद भुगतान किया जाता है।
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लोकायुक्त की छापेमारी और FIR का असर
इससे ठीक पहले करोड़ों रुपये के फर्जी बिल भुगतान मामले में निगम के डाटा सेंटर सहित कई शाखाओं में छापेमारी कर लोकायुक्त ने पिछले करीब दस साल के दस्तावेज और सर्वर डाटा जब्त किया है। शिकायत के आधार पर की गई प्रारंभिक जांच में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद शुक्रवार को तत्कालीन वित्त एवं लेखा शाखा की जिम्मेदारी देख रहे अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी की धाराओं में एफआइआर दर्ज की गई थी। इसके बाद निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने उन्हें इस शाखा से हटा दिया गया है। ऐन वक्त पर वित्त विभाग के प्रमुख को हटाए जाने से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप है। अब मुकेश शर्मा पर बजट को अंतिम रूप देने और निगम की वित्तीय साख सुधारने की दोहरी चुनौती होगी।
बता दें कि नगर निगम में बिना काम कराए फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपए निकालने के मामले में लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई की थी। टीम ने निगम के डाटा सेंटर समेत कई शाखाओं में छापेमारी कर पिछले करीब 10 साल के दस्तावेज और सर्वर डाटा जब्त कर लिया था। इस मामले में सेवतकर समेत अन्य पर विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया था। एफआईआर के बाद शनिवार को कमिश्नर जैन ने सेवतकर को हटाने की कार्रवाई की।
कोर्ट से सर्च वारंट लेकर की थी छापेमारी निगम में फर्जी भुगतान की शिकायत नवंबर 2025 में लोकायुक्त को मिली थी। प्रारंभिक जांच में तथ्य सही पाए जाने पर 9 मार्च को आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी की धाराओं में FIR दर्ज की गई है। इसके बाद कोर्ट से सर्च वारंट लेकर छापेमारी की गई थी।
लोकायुक्त पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई नवंबर 2025 में मिली एक शिकायत के आधार पर की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नगर निगम में कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी बिल बनाकर सरकारी राशि का भुगतान कराया गया। प्रारंभिक जांच में आरोपों के समर्थन में पर्याप्त तथ्य मिलने के बाद 9 मार्च को अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ी धाराओं में FIR दर्ज की गई।
जांच एजेंसी के मुताबिक फर्जी भुगतान के लिए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर ई-बिल तैयार किए गए। आरोप है कि कई मामलों में नगर निगम के जलकार्य विभाग, सामान्य प्रशासन विभाग और केंद्रीय वर्कशॉप के नाम पर वाहनों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए, जबकि वास्तव में ऐसे काम हुए ही नहीं। इसके बावजूद सिस्टम में बिल दर्ज कर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
लोकायुक्त टीम ने शुक्रवार सुबह करीब साढ़े दस बजे नगर निगम के अलग-अलग विभागों में एक साथ कार्रवाई की। लेखा शाखा, कंप्यूटर शाखा, डेटा सेंटर, लिंक रोड-2 स्थित मुख्य कार्यालय और फतेहगढ़ स्थित पुराने कार्यालय में छापेमारी कर दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड को अपने कब्जे में लिया गया। जांच अधिकारियों ने भुगतान से जुड़े SAP सॉफ्टवेयर का डेटा भी जब्त किया है, जिसकी विस्तृत जांच की जा रही है।
लोकायुक्त अधिकारियों का कहना है कि सर्वर डेटा की पड़ताल के बाद यह स्पष्ट किया जाएगा कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में उन कार्यों का निष्पादन हुआ या नहीं। जांच के दौरान अन्य अधिकारियों और निजी फर्मों की भूमिका भी सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
इस बीच अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि नगर निगम में बिल सीधे लेखा शाखा से तैयार या स्वीकृत नहीं किए जाते। संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद ही बिल आते हैं और फंड की उपलब्धता के आधार पर आयुक्त से चर्चा के बाद भुगतान किया जाता है।
फिलहाल लोकायुक्त की जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला सरकारी संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिस पर प्रशासन और आम जनता दोनों की नजर बनी हुई है।
ये गड़बड़ी आई थी सामने आरोप है कि नगर निगम के जलकार्य, सामान्य प्रशासन और केंद्रीय वर्कशॉप जैसे विभागों के नाम पर वाहनों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए। कई मामलों में वास्तव में काम हुआ ही नहीं, लेकिन सिस्टम में ई-बिल तैयार कर दिए गए। कुछ मामलों में जिस विभाग के नाम से बिल बनाए गए, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं थी।
इन जगहों पर हुई थी छापेमारी लोकायुक्त पुलिस ने निगम के लेखा शाखा, कंप्यूटर शाखा, डाटा सेंटर, लिंक रोड-2 स्थित मुख्य कार्यालय और फतेहगढ़ स्थित पुराने कार्यालय में एक साथ छापेमारी की। लोकायुक्त का कहना है कि डिजिटल डाटा और दस्तावेजों की जांच के बाद मामले में अन्य कर्मचारियों और फर्मों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
SAP सॉफ्टवेयर का डाटा जब्त किया प्रारंभिक जांच में मोटर वर्क शाखा, जल कार्य विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़े कुछ कार्यों में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। जांच टीम ने भुगतान से जुड़े SAP सॉफ्टवेयर का डिजिटल डाटा भी कब्जे में लिया है। अब इसकी जांच कर यह पता लगाया जाएगा कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में काम हुआ भी था या नहीं।
इस मामले में अपर आयुक्त ने कहा- कमिश्नर से चर्चा के बाद भुगतान इस मामले में अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने कहा था कि लेखा शाखा में बिल सीधे तैयार या पास नहीं किए जाते। बिल संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद आते हैं और फंड की उपलब्धता के अनुसार नगर निगम आयुक्त से चर्चा के बाद भुगतान किया जाता है।
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राज्य शासन के आदेश व नियमावली के अनुसार नगर निगम द्वारा आरडीए और हाउसिंग बोर्ड के कॉलोनियों के हैंडओवर की कार्यवाही की जाएगी। राज्य शासन द्वारा रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) और छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड की 9 आवासीय कॉलोनियों को नगर निगम को सौंपने का निर्णय लिया गया है। इस पर आगे की प्रक्रिया और कार्यवाही के लिए शासन स्तर से जारी होने वाली विस्तृत नियमावली का इंतजार है। इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने पर तीनों एजेंसियां संयुक्त सर्वे कर वास्तविक स्थिति का आंकलन करेंगी।
रायपुर नगर निगम के नगर निवेशक ने बताया कि सर्वे में पेयजल आपूर्ति तंत्र, सीवरेज नेटवर्क, आंतरिक सड़कों, स्ट्रीट लाइट, उद्यानों और सफाई व्यवस्था की मौजूदा हालत का तकनीकी परीक्षण किया जाएगा। कई कालोनियों में 15 से 20 वर्ष पुरानी पाइपलाइन, जर्जर नालियां और खराब सड़कें हैं। हैंडओवर लेने के पहले इनका सही आंकलन जरूरी है। हैंडओवर से पहले वित्तीय भार, अतिरिक्त स्टॉफ और रखरखाव की रूपरेखा तय करना निगम के लिए अत्यावश्यक है। अधिकांश कालोनियों में जलापूर्ति की पाइपलाइन डेढ़ दशक से अधिक पुरानी है, जिनकी उपयोग अवधि लगभग समाप्ति पर है।
हैंडओवर के लिए शासन से आदेश व नियमावली प्राप्त होने पर कॉलोनियों की वास्तविक स्थितियों का सर्वे किया जाएगा। इसके अनुसार ही सभी कार्यवाहियां की जाएगी। अद्यतन किसी भी प्रकार का निर्देश निगम को प्राप्त नहीं हुआ है।
]]>दूसरी ओर, इन पदों की जानकारी बिना एमआईसी यानी, मेयर इन कौंसिल के भेजी गई थी। इसलिए जानकारी देने वाले सेवानिवृत्त अपर आयुक्त एमके सिंह के विरुद्ध भी कार्रवाई हो सकती है।
इस मामले का खुलासा 30 अक्टूबर को हुई नगर निगम परिषद की बैठक में हुआ। बीजेपी पार्षद देवेंद्र भार्गव ने कहा कि पीईबी को सहायक यंत्री की भर्ती के अधिकार ही नहीं है। वहीं, निगम के संकल्प के बिना कोई भर्ती नहीं की जा सकती। यह मध्यप्रदेश शासन के गजट में है। कोरोना काल में जब परिषद में संभागायुक्त प्रशासक थे, तब लिस्ट तैयार की गई थी। जिसे वर्ष 2023 में तत्कालीन अपर आयुक्त एमपी सिंह ने पीईबी को भेज दी, जबकि साल 2022 से परिषद में है।
यदि जरूरी भी था कि लिस्ट एमआईसी या कमिश्नर के संज्ञान में लाने के बाद भेजी जानी थी। पुराने पत्र के आधार पर एमआईसी को जानकारी दी गई। इसलिए भर्ती को विलोपित करने को कहा गया है।
निगम अध्यक्ष बोले- परीक्षा हुई तो इंजीनियर इधर-उधर भटकेंगे मुद्दा सामने आने के बाद निगम अध्यक्ष सूर्यवंशी ने भी कमिश्नर संस्कृति जैन को पीईबी को जल्द ही पत्र लिखने को कहा। ताकि, परीक्षा से सहायक यंत्री के पदों को हटा दिया जाए। उन्होंने बताया, पार्षद भार्गव ने यह विषय उठाया था। इस पर पक्ष-विपक्ष सभी ने सहमति जताई थी। गलत और नियम विरुद्ध तरीके से सेकंड क्लॉस भर्ती के लिए पीईबी को पत्र लिखा गया, जबकि उस समय परिषद निर्वाचित होकर अपने स्वरुप में आ गई थी।
नियम कहता है कि एमआईसी को नियुक्ति के अधिकार है। एमआईसी की मंजूरी के बिना कोई प्रस्ताव पीईबी को गया, यह नीतिगत सही नहीं था। दूसरी ओर, पीईबी को द्वितीय श्रेणी की भर्ती की पात्रता ही नहीं है। शासन ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की भर्ती के लिए पीईबी को बनाया गया है। द्वितीय श्रेणी की एग्जॉम MPPSC करा सकता है। बावजूद यदि पीईबी यह परीक्षा करा देती है तो जिनकी नियुक्ति होगी, वे भी इधर-उधर भटकते रहेंगे। इसलिए निगम कमिश्नर से कहा है कि जल्द ही पीईबी को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करें।
इन कैटेगिरी के लिए भर्ती भोपाल नगर निगम में सहायक यंत्री सिविल के कुल 15 पद है, जबकि एक मैकेनिकल और एक सहायक यंत्री विद्युत के लिए पद है। इस तरह कुल पद 17 है। इनमें श्रेणी के हिसाब से भर्ती की जा रही है। जिसमें अनारक्षित, ईडब्ल्यूएस, एससी, एसटी और ओबीसी शामिल हैं। इनमें भी महिला, भूतपूर्व सैनिक, दिव्यांग के लिए पद आरक्षित किए गए हैं। मैकेनिकल और सहायक यंत्री के 2 पदों पर सीधी भर्ती होगी। सभी पद कार्यपालिक है।
अपर आयुक्त ने 36 पदों की भेजी थी जानकारी तत्कालीन अपर आयुक्त सिंह ने 11 जुलाई-23 को कुल 36 पदों पर भर्ती के लिए जानकारी पीईओ को भेजी थी। इसमें सहायक आयुक्त के 11 पद, सहायक यंत्री (सिविल) के 15 पद, सहायक यंत्री (विद्युत) का 1 पद, सहायक यंत्री (मैकेनिकल) का 1 पद और सहायक ई-गवर्नेंस अधिकारी के 8 पद शामिल हैं। पत्र में बताया गया था कि ये सभी पद द्वितीय श्रेणी के है। इस संबंध में सिंह ने बताया कि सेवानिवृत्त हुए दो साल हो गए हैं। मेरे संज्ञान में मामला नहीं है। प्रक्रिया के हिसाब से ही पत्र भेजा गया होगा।
]]>हरियाणा की कंपनी से नगर निगम का अनुबंध
नगर निगम आयुक्त शिवम वर्मा ने बताया, ''इस स्थिति को समाप्त करने के लिए इंदौर नगर निगम ने जानवरों का अंतिम संस्कार करने का प्लांट लगाने और उसका संचालन करने के लिए निजी क्षेत्र को आमंत्रित किया था. निगम के समक्ष पांच कंपनियों ने इस काम को करने की पेशकश की. इसमें से हरियाणा की कंपनी माइक्रोटेक को इस काम को करने के लिए चुना गया है. यह कंपनी 5 साल तक प्लांट का निर्माण कर उसका संचालन का कार्य करेगी. इसके एवज में नगर निगम को इस कंपनी को 3 करोड रुपए देना होंगे. यह कार्य शुरू होने के साथ ही मध्य प्रदेश में इंदौर पहला ऐसा शहर हो जाएगा जहां पर की जानवरों का अंतिम संस्कार होगा.
नाम मात्र के शुल्क पर होगा अंतिम संस्कार
इंदौर नगर निगम के अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा ने बताया कि, ''इस केंद्र के शुरू हो जाने के बाद नई सेवा भी शुरू की जा सकती है. इसके तहत लोगों के द्वारा घर पर पाले जाने वाले पालतू जानवर की मौत होने पर उस जानवर का भी अंतिम संस्कार इस केंद्र पर एक निश्चित शुल्क लेकर किया जा सकेगा. इस व्यवस्था को आने वाले समय में शुरू करने के लिए भी तैयारी करने के निर्देश दिए गए हैं. इसके लिए 311 एप पर भी केटगरी का निर्धारण किया गया है. जहां से ऑनलाइन बुकिंग पर भी पशुपालक इस सुविधा का लाभ ले सकेंगे.
निगम अधिकारी पोर्टल को फिर से चालू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है। 10 मई को राष्ट्रीय लोक अदालत है और पोर्टल बंद होने से निगम को राजस्व मिलने में दिक्कत हो सकती है।
दफ्तरों के चक्कर काट रहे लोग
पोर्टल बंद होने से शहर में अफरा-तफरी मची हुई है। लोग टैक्स भरने के लिए नगर निगम के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। पोर्टल 1 अप्रैल से बंद है। इसे नए वित्तीय वर्ष के लिए डेटा अपडेट करने के लिए बंद किया गया था। निगम ने कहा था कि एक हफ्ते में पोर्टल फिर से शुरू हो जाएगा लेकिन मई का पहला हफ्ता बीत चुका है, और पोर्टल अभी भी बंद है।
निगम को भारी नुकसान
ऑनलाइन टैक्स वसूली पूरी तरह से ठप हो गई है। इसका सीधा असर निगम की आय पर पड़ रहा है। लोग टैक्स भरने के लिए जोनल ऑफिस और निगम मुख्यालय जा रहे हैं लेकिन वहां उन्हें बताया जा रहा है कि रसीद कट्टे उपलब्ध नहीं हैं। इस वजह से लोग संपत्ति कर, जल कर और किराया जमा नहीं कर पा रहे हैं। लोगों को न तो रसीद मिल रही है और न ही उनका रिकॉर्ड अपडेट हो पा रहा है। नए खाते खुलवाने के लिए भी लोग परेशान हैं। जोनल ऑफिस और मुख्यालय पर संपत्ति कर और जल कर के नए खाते खुलवाने वाले लोग चक्कर लगा रहे हैं लेकिन पोर्टल बंद होने से नए खाते नहीं खुल पा रहे हैं।
भोपाल तक लगा चुके गुहार
निगम के अधिकारी पोर्टल को लेकर भोपाल तक गुहार लगा चुके हैं लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। अधिकारी यह भी नहीं बता पा रहे हैं कि पोर्टल कब तक चालू होगा। एक तरफ नगर निगम आर्थिक संकट से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ लोग टैक्स जमा करने के लिए परेशान हो रहे हैं।
]]>हिसार नगर निगम की एक महिला कर्मचारी के साथ शुक्रवार सुबह हुई मारपीट और फर्जी मेडिकल बिल मामले को लेकर सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने नगर निगम कार्यालय में धरना भी दे दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि महिला कर्मचारी के साथ मारपीट करने वाले पर कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके अलावा मेडिकल बिल मामले की सही तरीके से जांच की जाए।
शुक्रवार सुबह करीब 10:00 महिला कर्मचारी सरजमुखी आजाद नगर एरिया में सफाई कर रही थी। महिला कर्मचारी का कहना है कि इस दौरान वहां एक रेहडी लगाने वाले ने उसके साथ गाली गलौज और मारपीट की।
मेडिकल बिल मामले में सफाई कर्मचारी बेकसूर
इस दौरान नगर पालिका कर्मचारी संघ के नेताओं ने कहां कि सफाई कर्मचारियों को गलत फंसाया जा रहा है। अधिकारियों ने डरा धमका कर सफाई कर्मचारियों उनके दस्तावेज लेकर फर्जी मेडिकल बिल तैयार किए।
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