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एक देश एक चुनाव (वन नेशन-वन इलेक्शन) को भाजपा देशभर में जन आंदोलन बनाएगी। इसको लेकर मध्य प्रदेश में भाजपा जागरूकता अभियान भी चलाएगी। पार्टी के प्रदेश कार्यालय में एक देश एक चुनाव की बैठक हुई।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद की उपस्थिति में भाजपा प्रदेश कार्यालय में गुरुवार को एक देश-एक चुनाव को लेकर पार्टी द्वारा गठित प्रदेश स्तरीय टोली की बैठक आयोजित की गई।
रिटायर्ड जज रोहित आर्य और पुष्यमित्र भार्गव उपस्थित रहे
इस अवसर पर टोली के संयोजक एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश रोहित आर्य एवं सह संयोजक व इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी उपस्थित रहे। बैठक में जागरूकता अभियान को लेकर लेकर चर्चा हुई। बैठक के बाद पत्रकारवार्ता में प्रदेश संयोजक रोहित आर्य ने कहा कि एक देश एक चुनाव के परिप्रेक्ष्य में मंथन होना चाहिए।
एक देश एक चुनाव हमारे संविधान के मूल संरचना का रूप है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजनरी स्टेप है। संविधान की प्रस्तावना में राजनीतिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मुहिम चलाने का निर्णय लिया गया है।
वन नेशन वन इलेक्शन के कई फायदे
आर्य ने कहा कि आज तक पालिटिकल जस्टिस के परिपेक्ष्य में ज्यादा काम नहीं हुआ था। वन नेशन वन इलेक्शन के बहुआयामी फायदे होंगे। वोटर का मूल्य क्या है और प्रजातंत्र के महत्व क्या है इसे जनता तक पहुंचाना है। इससे व्यय कम होंगे, सामाजिक ढांचा सुधरेगा।
समाज के सभी वर्गों के लिए मील का पत्थर
प्रशासनिक अमला जो साल भर चुनाव में लगा रहता है, वह नहीं होगा। इसमें एक राजनीतिक स्थिरता आएगी। चुनी सरकार पांच साल काम करेगी। जनता चुनेगी कि पांच साल बाद किसको लाना है कौन सी सरकार चुनकर आएगी। यह समाज के सभी वर्गों के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
2034 तक वन नेशन-वन इलेक्शन का क्रियान्वयन शुरू होगा
सेवानिवृत्त न्यायाधीश रोहित आर्य ने कहा कि एक देश एक चुनाव का एक प्रारूप बनेगा और इसके बहुआयामी परिणाम आएंगे। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद की रिपोर्ट के आधार पर 2034 तक इसका क्रियान्वयन शुरू कर दिया जाएगा।
इस पर डिबेट होना चाहिए
अभी जनता को बताना है कि इसके क्या फायदे हैं और इसके न हो होने से देश कितना पीछे जा रहा है। यह किसी पार्टी का एजेंडा नहीं है, यह नेशनल एजेंडा है। इसमें जनता का साथ जरूरी है।
वन नेशन वन इलेक्शन पर डिबेट होना चाहिए। मैं अपनी 29 साल की वकालत और 11 साल की जस्टिस के आधार पर कह सकता हूं कि ये कानून के आधार पर है।
इसमें किसी कानून का उल्लंघन नहीं
संविधान के मूलभूत भावनाओं के अनुरूप है। इसमें किसी कानून का उल्लंघन नहीं है। वन नेशन वन इलेक्शन को हम जन आंदोलन बनाएंगे। वन नेशन वन इलेक्शन पर कांग्रेस के सवाल पर आर्य ने कहा कि कांग्रेस की भ्रांति और मिथ्या प्रचार है, इसका न तथ्यात्मक आधार है। कांग्रेस का ये परसेप्शन है, जो मिस गाइड है।
]]>इस तरह हुआ गठन
प्रदेश महामंत्री बीजेपी भगवानदास सबनानी द्वारा इस गठन का पत्र जारी किया गया है। यह पत्रव राष्ट्रीय महामंत्री बीजेपी सुनील बंसल को संबोधित है। यह गठन प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा द्वारा किया गया है। इसमें रिटायर जस्टिस आर्य को संयोजक और महापौर भार्गव को सह संयोजक का दायित्व दिया गया है।
यह काम करेगी प्रदेश टोली
बीजेपी इस मामले में गंभीर है कि देश में वन नेशन वन इलेक्शन लागू हो। अभी यह मामला जेपीसी के पास है। इस मामले में देश में जागरूकता लाने के साथ ही लोगों के सुझाव लेने और सभी कानून पहलुओं को समझने इन सभी कामों के लिए बीजेपी प्रदेश स्तर पर यह टोलियां गठन कर रही है। इसके लिए कानून के जानकारों को आगे लाया गया है, जिससे कानून पक्ष मजबूत रहे। महापौर भार्गव को इस मामले में लंबा अनुभव रहा है और कई चुनाव याचिकाओं को भी उन्होंने हैंडल किया है। इन सभी के चलते उनका अनुभव प्रदेश टोली में काफी अहम होगा। इसे देखते हुए ही उन्हें सह संयोजक बनाया गया है। महापौर ने कहा कि प्रदेश टोली का गठन हुआ है, आगे इसमें बैठक होगी और फिर तय होगा कि किस तरह से आगे काम करना है लेकिन प्रदेश स्तर पर जागरूकता लाना और लोगों से सुझाव लेना अहम रहेगा।
बीजेपी में आ चुके हैं रिटायर जस्टिस
प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस रोहित आर्य ने अपने रिटायरमेंट के कुछ ही दिनों बाद जुलाई 2024 में बीजेपी का दामन थाम लिया था। हाई कोर्ट में 29 साल तक वकील के तौर पर प्रैक्टिस भी की है। सिविल कानून, वाणिज्यिक (कॉर्पोरेट फिड्युसरी, आदि), मध्यस्थता (अंतर्राष्ट्रीय/घरेलू), प्रशासनिक, सेवा, श्रम कानून मामलों की विशेषज्ञ माना जाता है। उन्हें 16 सितंबर, 2013 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और 26 मार्च, 2015 को स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था।
]]>दो दिन पहले ही कैबिनेट ने दी थी हरी झंडी
रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी समिति ने मोदी कैबिनेट को सिफारिश भेजी थी जिसके बाद इसपर मुहर लगा दी गई। अब केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल इस बिल को संसद में पेश करेंगे। इससे पहले केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रैली में भी इसकी जरूरत को बताया था। र्व राष्ट्रपति कोविंद ने इस पहल को भारत के लोकतंत्र के लिए "गेम-चेंजर" बताया था। मेघवाल संविधान (129वां संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक पेश करेंगे। इन मसौदा कानूनों का उद्देश्य देश भर में एक साथ चुनाव कराना है।
विपक्ष इस बिल के खिलाफ
एनडीए के घटक दल इसके समर्थन में हैं तो वहीं कांग्रेस, आप और तृणमूल कांग्रेस सहित भारत गुट के तहत विपक्षी दलों ने क्षेत्रीय स्वायत्तता और चुनावी निष्पक्षता पर एक साथ चुनावों के प्रभाव के बारे में चिंता जताई है। उनका तर्क है कि यह कदम सत्ता को केंद्रीकृत कर सकता है और संघीय सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है। कोविंद के नेतृत्व वाले पैनल ने जर्मनी,इंडोनेशिया और जापान जैसे देशों में चुनावी प्रणालियों की समीक्षा की थी। उनका कहा था कि एक साथ चुनाव प्रशासनिक स्थिरता ला सकते हैं,मतदाताओं की भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकते हैं और संभावित रूप से जीडीपी को 1.5% तक बढ़ा सकते हैं।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का 2 सितंबर 2023 को गठन किया गया था. इसका मकसद एक साथ चुनाव कराने के लिए सिफारिशें करना. कोविंद समिति ने 14 मार्च 2024 को राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें सौंपी थी, जिसमें लोकसभा और सभी विधायिकाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की गई थी.
कोविंद कमिटी ने पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव कराने की सिफारिश थी. उसके 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकाय के चुनाव कराने की सिफारिश की थी. इस समिति में रामनाथ कोविंद समेत आठ सदस्य थे.
]]>समिति ने 18,626 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी दी गई। वन नेशन-वन इलेक्शन के लागू होने के लिए संविधान संशोधन और कानून में बदलाव करना होगा। इसके लिए राज्यों की सहमति भी जरूरी है। केंद्र सरकार को इस प्रक्रिया में राज्यसभा और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना होगा। लोकसभा में 543 में से 362 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा, जबकि राज्यसभा में 245 में से 164 सांसदों की जरूरत होगी।
वर्तमान में, भाजपा और एनडीए के सहयोगी दल इस प्रस्ताव के समर्थन में हैं। इनमें आजसू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास पासवान), जनता दल (यूनाइटेड), नेशनल पीपुल्स पार्टी, शिवसेना, और कई अन्य दल शामिल हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप), माकपा, बसपा, और अन्य विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यह प्रस्ताव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी ला सकता है।
सरकार के लिए इस प्रस्ताव को दोनों सदनों से पास कराना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। विपक्ष को मनाने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू को जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये मंत्री विपक्षी दलों से चर्चा कर सर्वसम्मति बनाने का प्रयास करेंगे। वन नेशन-वन इलेक्शन के प्रस्ताव के समर्थन में जिन दलों ने सहमति जताई है, उनमें बीजेडी, एआईएडीएमके, अकाली दल, मिजो नेशनल फ्रंट, और अन्य शामिल हैं। वहीं, सरकार को विपक्ष की चिंताओं और विरोध को भी ध्यान में रखते हुए कदम उठाने होंगे। इस प्रस्ताव को लेकर सरकार का कहना है कि इससे चुनावी खर्चों में कमी आएगी और प्रशासनिक कामकाज में भी सुधार होगा।
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'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लेकर पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी ने 62 सियासी दलों से सलाह मशविरा किया था। इनमें से 32 दलों ने इसका समर्थन किया था, जबकि 15 राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया था। केंद्र सरकार की तरफ से संसद में अगर यह विधेयक लाया जाता है तो यह उनके लिए अग्निपरीक्षा से कम कुछ भी नहीं होगा। क्योंकि कई राज्यों में तो भाजपा की सरकार है और साथ ही जिन राज्यों में विपक्ष की सरकार है, वहां सरकार को विचार-विमर्श की भी जरूरत पड़ेगी। राज्यसभा और लोकसभा में सरकार के पास सांसदों की संख्या अभी पर्याप्त नहीं है, क्योंकि किसी भी संविधान संशोधन के लिए सरकार के पक्ष में दो-तिहाई मत चाहिए। यानी कि जिस दिन सरकार इस विधेयक को सदन में पेश करेगी और इस पर मतदान होगा, उस दिन अगर लोकसभा में 543 सदस्य मौजूद रहते हैं, तो इस संशोधन को पास कराने के लिए 362 सांसदों का समर्थन होना चाहिए।
दूसरी तरफ राज्यसभा में इंडी गठबंधन के 85 सदस्य हैं और सरकार के पक्ष में 113 और 6 नामित सदस्यों समेत यह संख्या 119 हो जाती है। ऐसे में मतदान के दिन अगर राज्यसभा में सभी सदस्य मौजूद रहेंं, तो सरकार को इस विधेयक को पास कराने के लिए 164 सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। अब सरकार की एक चिंता यह भी है कि देश की छह राष्ट्रीय पार्टियाें में से 'वन नेशन-वन इलेक्शन' के प्रस्ताव के पक्ष में केवल दो भाजपा और नेशनल पीपुल्स पार्टी है, जबकि बाकी के चार दल आप, कांग्रेस, माकपा और बसपा इसका विरोध कर रही है। ऐसे में सरकार को एनडीए के साथियों के साथ विपक्ष के कई दलों को भी इसके पक्ष में मतदान के लिए साथ लाना होगा। ऐसे में सरकार के लिए इस मुद्दे पर आम सहमति बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। अब कई राज्यों में हाल में चुनाव भी होने हैं, ऐसे में इन चुनावों का असर भी इस पर देखने को मिलेगा। इसके साथ ही सरकार के पास एक रास्ता यह भी है कि इस संविधान संशोधन विधेयक को चर्चा के लिए वह संसदीय समिति के पास भेज दे, जहां इस पर चर्चा के बाद आम सहमति बनाई जा सके। क्योंकि इस संसदीय समिति में विपक्षी पार्टी के सदस्य भी होते हैं।
बता दें कि सरकार को इस प्रस्ताव के पक्ष में जिन दलों का समर्थन मिल रहा है, उनमें भाजपा के साथ एनडीए के अन्य सहयोगी दलों में आजसू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास पासवान), जनता दल (यूनाइटेड), नेशनल पीपुल्स पार्टी, शिवसेना, टी़डीपी, अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), बीजेडी जो एनडीए का हिस्सा नहीं है, असम गण परिषद, एआईएडीएमके, अकाली दल मिजो नेशनल फ्रंट, सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल ऑफ असम, राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक प्रगतिशील पार्टी, युवजन श्रमिका रायथू कांग्रेस पार्टी जैसी कई अन्य पार्टियां हैं।
वहीं कांग्रेस, बसपा, कम्युनिस्ट पार्टी (एम), आप, टीएमसी, एआईएमआईएम, नागा पीपुल्स फ्रंट, डीएमके, आरजेडी, मरुमलारची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार), अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा जैसी पार्टियां सरकार के इस फैसले के विरोध में खड़ी हैं। विपक्ष के विरोध को देखते हुए इस प्रस्ताव को दोनों सदनों से पास कराना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी। ऐसे में विपक्ष को साधने के लिए सरकार ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू को जिम्मेदारी सौंपी है। ये तीनों नेता इस प्रस्ताव से जुड़े तमाम बिंदुओं पर विपक्षी दलों से चर्चा कर सर्वसम्मति बनाने का काम करेंगे।
'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति ने 14 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। समिति का गठन 2 सितंबर 2023 को किया गया था। समिति ने 191 दिन तक राजनीतिक दलों तथा विभिन्न हितधारकों के साथ चर्चा के बाद 18,626 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की थी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में कोविंद समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी गई।
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