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पाकिस्तान में जियो न्यूज चैनल ने हाल ही में एक इंटरव्यू चलाया, जिसमें ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस के दौरान फतह-1 मिसाइलें दागने वाले लॉन्च टीम के सदस्यों से बात की गई. इस इंटरव्यू में पाकिस्तानी अधिकारियों ने दावा किया कि उनकी मिसाइलों ने भारत के दो सैन्य ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया. लेकिन इस दावे पर सवाल उठ गए हैं, क्योंकि उन्होंने जिन एयरबेसों का जिक्र किया है, वो भारत में हैं हीं नहीं।
जियो न्यूज ने उन व्यक्तियों का इंटरव्यू दिखाया जिन्हें फतह-1 मिसाइल लॉन्च टीम का हिस्सा बताया गया. एंकर ने उनसे सीधा सवाल किया कि क्या फतह-1 मिसाइलें अपने तय टारगेट पर सही से गिरीं या नहीं. इसपर कैप्टन मुनीब जमाल ने जवाब दिया- एग्जेटली. हमें दो टारगेट सौंपे गए थे – राजौरी एयरबेस और मामून एयरबेस. हमने दोनों को सफलतापूर्वक एंगेज किया।
यह इंटरव्यू पाकिस्तान में काफी दिखाया गया, जिसमें दावा किया गया कि मिसाइलें सटीक रूप से अपने टारगेट पर पहुंचीं और मिशन सफल रहा. लेकिन जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया पर फैली, लोगों ने इन टारगेट्स की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए।
राजौरी और मामून एयरबेस – जो भारत में हैं ही नहीं
पाकिस्तानी अधिकारी द्वारा बताए गए दोनों नामों पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में राजौरी एयरबेस और मामून एयरबेस नाम से कोई भारतीय वायुसेना का एयरबेस मौजूद ही नहीं है. राजौरी जम्मू-कश्मीर का एक जिला है, जहां भारतीय सेना की कुछ यूनिट्स तैनात हैं, लेकिन वहां कोई ऑपरेशनल एयरफोर्स बेस नहीं हैं।
इसी तरह मामून पठानकोट के पास एक सैन्य कैंटोनमेंट इलाका है, जहां मुख्य रूप से आर्मी की ब्रिगेड और अन्य यूनिट्स रहती हैं. वहां भी कोई एयरबेस नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी टीम ने शायद स्थानीय सैन्य ठिकानों के नामों को गलत तरीके से एयरबेस बता दिया या जानबूझकर प्रचार के लिए गलत नाम इस्तेमाल किया।
दावे पर उठे सवाल
यह दावा सामने आने के बाद सोशल मीडिया और डिफेंस एनालिस्ट्स ने इसे फेक टारगेट वाला दावा करार दिया. भारत में कई असली एयरबेस जैसे पठानकोट, जम्मू, श्रीनगर, उधमपुर आदि मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी उनमें से किसी का भी सही नाम नहीं ले पाए।
इस घटना ने पाकिस्तानी मीडिया और सेना के दावों की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं. कई लोग इसे युद्ध के दौरान अपने लोगों को मनोबल बढ़ाने के लिए किया गया प्रचार मान रहे हैं।
फतह-1 मिसाइल और ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस
फतह-1 पाकिस्तान की सतह से सतह पर मार करने वाली गाइडेड मिसाइल है, जिसे हाल के वर्षों में विकसित किया गया है. ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस के दौरान पाकिस्तान ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल भारत के ठिकानों पर करने का दावा किया था।
लेकिन जब टारगेट के नाम ही गलत या अस्तित्वहीन निकलते हैं, तो मिसाइल की सटीकता और मिशन की सफलता पर शंका होती है. भारतीय अधिकारियों ने अब तक इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन डिफेंस सर्किल में इसे पाकिस्तानी प्रोपगैंडा का हिस्सा माना जा रहा है।
जियो न्यूज का यह इंटरव्यू एक बार फिर दिखाता है कि युद्ध या तनाव के समय दोनों तरफ से सूचना युद्ध भी जोरों पर होता है. पाकिस्तान ने फतह-1 मिसाइलों की सफलता का दावा तो किया, लेकिन जिन एयरबेस का जिक्र किया गया, वे भारत में हैं ही नहीं।
]]>यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) की लो-कॉस्ट एयरलाइन फ्लाईदुबई (Flydubai) ने पाकिस्तान को एक बड़ा झटका दिया है। एयरलाइन ने 'ऑपरेशनल कारणों' का हवाला देते हुए पाकिस्तान के तीन प्रमुख शहरों के लिए अपनी उड़ानें 26 अक्टूबर तक के लिए सस्पेंड कर दी हैं। इनमें राजधानी इस्लामाबाद, लाहौर और पेशावर शामिल हैं। हालांकि, एयरलाइन ने यह साफ किया है कि कराची से आने-जाने वाली उड़ानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा और वे पहले की तरह ही जारी रहेंगी।
इन रूट्स पर कैंसिल हुईं उड़ानें
एविएशन मॉनिटर 'फ्लाइटरडार24' के मुताबिक, कम से कम 7 मई से ही इन तीन शहरों के लिए फ्लाईदुबई की उड़ानें कैंसिल चल रही हैं। प्रभावित होने वाली उड़ानों की डिटेल इस प्रकार है:
इस्लामाबाद-दुबई: फ्लाइट नंबर FZ353 और FZ354
लाहौर-दुबई: फ्लाइट नंबर FZ359 और FZ360
पेशावर-दुबई: फ्लाइट नंबर FZ375 और FZ376
आपको बता दें कि फ्लाईदुबई ने जुलाई 2024 में इस्लामाबाद और लाहौर में अपना ऑपरेशन शुरू किया था, जबकि पेशावर के लिए बीते साल मई में उड़ानें शुरू की गई थीं।
एयरलाइन ने यात्रियों को दी ये सलाह
ईरान युद्ध शुरू होने के कुछ दिन बाद, 31 मार्च को फ्लाईदुबई की वेबसाइट पर एक बयान जारी किया गया था। इसमें बताया गया था कि एयरलाइन "फिलहाल अपने नेटवर्क पर घटे हुए शेड्यूल के साथ उड़ानें संचालित कर रही है।"
एयरलाइन ने यात्रियों को सलाह दी है कि एयरपोर्ट के लिए निकलने से पहले वे लेटेस्ट अपडेट्स और अपनी फ्लाइट का स्टेटस जरूर चेक कर लें। कंपनी ने अपने बयान में 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों से भड़के मध्य पूर्व संघर्ष का सीधा जिक्र तो नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा: हम स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए हैं और उसी के मुताबिक अपने फ्लाइट शेड्यूल को अपडेट कर रहे हैं। यात्रियों और क्रू मेंबर्स की सुरक्षा हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
ईंधन संकट: हवाई यात्रा पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जेट फ्यूल (विमान ईंधन) की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। इसके कारण एविएशन सेक्टर में बीते कई सालों का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) ने भी पिछले महीने चेतावनी दी थी कि ईरान युद्ध से उपजे जेट फ्यूल संकट की सबसे बड़ी मार सबसे पहले एशिया पर पड़ सकती है। IATA के प्रमुख विली वॉल्श ने कहा, "मुझे लगता है कि ईंधन की संभावित कमी को देखते हुए, गर्मियों के पीक सीजन में एयरलाइंस अपनी उड़ानों के शेड्यूल में कटौती करना शुरू कर देंगी।"
कर्ज वापसी के बाद अब टेलीकॉम सेक्टर से भी UAE का किनारा
एविएशन सेक्टर में मिले इस झटके से ठीक पहले यूएई आर्थिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा चुका है। बीते दिनों यूएई ने पाकिस्तान से अपने 3.5 अरब डॉलर के भारी-भरकम कर्ज की अचानक वापसी करा ली थी। यह वही कर्ज था जिसे यूएई पिछले कई सालों से रोल-ओवर कर रहा था ताकि पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार दिवालिया होने से बचा रहे।
कर्ज वापसी के झटके से पाकिस्तान उबर भी नहीं पाया था कि अब यूएई की दिग्गज टेलीकॉम कंपनी ईएंड (e& जिसे पहले एतिसलात के नाम से जाना जाता था) ने भी पाकिस्तान से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी शुरू कर दी है। एतिसलात के पास पाकिस्तान की सरकारी टेलीकॉम कंपनी पीटीसीएल (PTCL) में 26 फीसदी हिस्सेदारी और मैनेजमेंट कंट्रोल है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी अपनी निवेश रणनीति की समीक्षा कर रही है और अपने शेयर बेचकर पाकिस्तान के टेलीकॉम मार्केट से बाहर निकलने की योजना बना रही है।
दरअसल, पाकिस्तान सरकार और एतिसलात के बीच 2005 से 800 मिलियन डॉलर (करीब 6.6 खरब पाकिस्तानी रुपये) का एक बड़ा वित्तीय विवाद अनसुलझा है। इसके अलावा यूएई अपनी नई ग्लोबल 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' के तहत भी पाकिस्तान से अपने निवेश वापस खींच रहा है।
]]>पाकिस्तान के कटोरे में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भीख का पैसा डाल दिया है. इसके लिए पाकिस्तान को अपने ही लोगों का खून चूसना पड़ा. महंगाई बढ़ानी पड़ी और जब उसने आईएमएफ के सभी जरूरी मानक पूरे कर दिए तो अब 1.21 अरब डॉलर यानी करीब 11 हजार करोड़ रुपये का कर्ज उसे दिया गया है. आईएमएफ ने दो अलग-अलग चल रहे फाइनेंसिंग अरेंजमेंट्स के तहत पाकिस्तान के लिए यह कर्ज मंजूर किया है और माना जा रहा है कि अगले सप्ताह पैसे मिल जाएंगे।
आईएमएफ ने सितंबर 2024 में एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF) के तहत 37 महीनों में 7 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई थी. इसके अलावा रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (RSF) के तहत 1.4 अरब डॉलर देने का फैसला किया था. IMF के कार्यकारी बोर्ड ने EFF के तहत पाकिस्तान को लगभग 1 अरब डॉलर और RSF के तहत लगभग 21 करोड़ डॉलर देने पर सहमति दी है. इस तरह, कुल मिलाकर उसे 1.20 अरब डॉलर का कर्ज दिया गया है।
पाकिस्तान को कुल कितना पैकेज
पाकिस्तान अब तक IMF से दो कर्ज पैकेजों के तहत कुल 8.4 अरब डॉलर में से 4.5 अरब डॉलर (करीब 40 हजार करोड़ रुपये) का कर्ज ले चुका है. एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक, यह पैसा अगले हफ्ते की शुरुआत में जारी किया जाएगा, जिससे पाकिस्तान के सेंट्रल बैंक का रिजर्व बढ़कर 17 अरब डॉलर हो जाएगा. हालांकि, यह भारत के 700 अरब डॉलर के रिजर्व के मुकाबले बहुत छोटा हिस्सा है।
कर्ज पाने के लिए जनता पर जुल्म
पाकिस्तान को भले ही आईएमएफ से 1.20 अरब डॉलर का कर्ज मिल गया हो, लेकिन इस कर्ज को पाने के बाद भी पाक सरकार को पुराने वित्तीय और मौद्रिक लक्ष्यों पर टिके रहना पड़ा और स्थिरता के रास्ते पर बने रहने की प्रतिबद्धता का पालन करना होगा. भले ही इन नीतियों के खिलाफ जनता लगातार आवाज उठा रही है, क्योंकि इससे बेरोजगारी, गरीबी और आर्थिक असमानता बढ़ रही है. IMF की मंजूरी तब मिली जब सरकार ने वित्तीय और मौद्रिक लक्ष्यों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन दिखाया, लेकिन इस वित्तवर्ष की दूसरी छमाही में सरकार के इस रवैये को लेकर अलग-अलग स्वर उठ रहे हैं।
आईएमएफ के पैमाने पर खरा उतरा देश
IMF मिशन ने जुलाई-दिसंबर 2025 की अवधि में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन की समीक्षा की थी, जिसमें 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की तीसरी समीक्षा शामिल थी. पाकिस्तान ने दिसंबर 2025 के अंत तक सभी क्वांटिटेटिव परफॉर्मेंस क्राइटेरिया पूरे किए और नेट इंटरनेशनल रिजर्व्स के फ्लोर पर भी बेहतर प्रदर्शन किया. साथ ही जनरल गवर्नमेंट का प्राइमरी बैलेंस टारगेट भी आसानी से हासिल किया. सरकार ने दिसंबर 2025 के अंत तक आठ में से छह इंडिकेटिव टारगेट्स पूरे किए, लेकिन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू सबसे कमजोर कड़ी रहा. FBR द्वारा जुटाए गए नेट टैक्स रेवेन्यू और रिटेलर्स से इनकम टैक्स रेवेन्यू IMF के लक्ष्यों से कम रहे।
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में छिपे आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. अब इस ऑपरेशन के एक साल बाद पाकिस्तान से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के एक नेता ने खुलेआम स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों के लिए लड़ाई लड़ी थी. यह बयान आतंकियों की एक बैठक में दिया गया, जिसने पाकिस्तान की असली नीति को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
क्या कहा पाक नेता ने?
लश्कर-ए-तैयबा के एक कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता शाहीर सियालवी ने कहा…
पहली बार पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर के लिए लड़ाई लड़ी. उन्होंने यह भी माना कि भारत ने 10 मई को मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय) और बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद का केंद्र) में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था. इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए थे।
पाकिस्तान ने बदली रणनीति
सियालवी के अनुसार, हमलों के बाद पाकिस्तान ने दुनिया को गुमराह करने के लिए अपनी रणनीति बदल दी. आतंकियों के जनाजे की नमाज, मौलवी या मुफ्ती से नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के धार्मिक अधिकारी ने पढ़ाए. पाकिस्तानी सैनिक वर्दी पहनकर इन आतंकियों के शव लेकर निकले. इसका मकसद था दुनिया को यह दिखाना कि मारे गए आतंकी नहीं, बल्कि आजादी के लड़ाके थे।
आतंकियों की महफिल में खुलासा
यह बयान लश्कर-ए-तैयबा के कार्यक्रम में दिया गया, जिसमें अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी मुजम्मिल इकबाल हाशमी भी मौजूद था. इस बैठक में पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के बीच गहरे संबंध साफ दिखाई दिए।
पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के अंदर लश्कर और जैश के मुख्य ठिकानों पर सटीक हमले किए थे. भारत का कहना था कि आतंकियों को सबक सिखाने के लिए जरूरी था।
इस खुलासे का मतलब
यह बयान साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ दिखावा करता है. हकीकत में उसकी सेना कुछ खास आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं की खुलेआम मदद कर रही है. हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को पाकिस्तान अपनी सुरक्षा समझता है।
पाकिस्तान की यह नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके लिए शर्मनाक है. दुनिया के सामने उसकी दोहरी नीति को फिर से उजागर करती है. ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद पाकिस्तान के नेता का यह बयान भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन दुनिया के लिए यह सबूत है कि पाकिस्तान आतंकवाद को राज्य नीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
भारत लगातार कहता रहा है कि पाकिस्तान आतंकियों का समर्थन करता है. अब खुद पाकिस्तान के लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं।
]]>अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पाकिस्तान पर बड़ा असर दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कैबिनेट बैठक में खुद ये बात कही है और चेतावनी दी है कि महंगे होते तेल और क्षेत्रीय अस्थिरता ने देश की आर्थिक हालत पतली कर दी है. कैबिनेट बैठक में उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल बिल करीब 300 मिलियन डॉलर था, जो अब बढ़कर 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. ऐसे में हालात पर नजर रखने के लिए सरकार ने एक टास्क फोर्स भी बनाई है. आपको बता दें कि पाकिस्तान इस वक्त महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर देख रहा है और तेल-गैस के लिए यहां त्राहिमाम मचा हुआ है।
शहबाज शरीफ ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.पाकिस्तान महंगाई की मार तो झेल ही रहा है, लेकिन शांति बनाने में भी वो सक्रिय है. शहबाज शरीफ ने बताया कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराई गई, जो 21 घंटे तक चली. इसके बाद दूसरे दौर की वार्ता हो ही नहीं पाई. फिलहाल संघर्ष विराम बना हुआ है और पाकिस्तान किसी भी तरह से वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है।
तेल के बढ़ते दाम ने रुलाया
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि इस समय कच्चे तेल की कीमतें फिर आसमान छू रही हैं, इसलिए नए दाम तय करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सामूहिक प्रयासों से हालात पर काबू पाने की कोशिश जारी है. इस बीच उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री के काम की सराहना करते हुए कहा कि उनकी ओर से उठाए गए कदमों के कारण पाकिस्तान में स्थिति अन्य देशों की तुलना में संतोषजनक है और कहीं भी लंबी कतारें नहीं हैं. हालांकि युद्ध से पहले और बाद की तुलना में 500 मिलियन डॉलर का उछाल आया है, जो अर्थव्यवस्था को की रीढ़ तोड़ रहा है. सरकार मितव्ययिता और बचत के जरिए हालात संभालने की कोशिश कर रही है, इसके लिए एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है. सरकारी उपायों के चलते ईंधन की खपत में काफी कमी आई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी, लेकिन युद्ध के कारण प्रगति को नुकसान पहुंचा है।
ईरान-अमेरिका युद्ध में पाकिस्तान कर रहा मध्यस्थता
पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और तेल संकट के बीच इस पहल को काफी अहम माना जा रहा है, हालांकि ये कुछ खास परिणाम नहीं दे पाई है।
पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू कराने की कोशिश की है. जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिसमें युद्धविराम और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की गई. फिलहाल एक अस्थायी संघर्ष विराम बना हुआ है, जिसे बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था से परेशान है और शांति चाहता है और दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने के लिए खूब उठापटक कर रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के विदेश मंत्री के साथ संपर्क में रहकर आगे की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
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वैश्विक मंचों पर खुद को 'मध्यस्थ' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के सामने अब एक गंभीर घरेलू संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के ऊर्जा और वित्त मंत्रालय की ओर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने पूरे देश में खलबली मचा दी है। सरकार ने यह स्वीकार किया है कि देश के पास कच्चे तेल का रिजर्व केवल 5-7 दिनों का ही बचा है, जबकि डीजल और एलपीजी जैसे अन्य ईंधनों का स्टॉक भी कुछ ही हफ्तों में खत्म हो सकता है।
संकट की जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना
पाकिस्तान के इस अचानक उपजे ऊर्जा संकट का सीधा तार मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों से जुड़ा है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने होर्मुज को व्यापारिक जहाजों के लिए लगभग बंद कर दिया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मुख्य रूप से खाड़ी देशों (सऊदी अरब, कुवैत आदि) से होने वाले आयात पर निर्भर है। रास्ता बंद होने और जहाजों की कमी से सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है।
पेट्रोलियम मंत्री का कुबूलनामा और वर्तमान हालात
पाकिस्तान के केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने ईरान-अमेरिका संघर्ष से जुड़ी मौजूदा भू-राजनीतिक चिंताओं के बीच देश के ईंधन भंडार को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। समा टीवी के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यह युद्ध जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा हो रही है।
मंत्री ने कार्यक्रम के दौरान एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि पाकिस्तान का ऊर्जा तंत्र इस समय बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि देश के पास वर्तमान में केवल 5 से 7 दिनों का कच्चा तेल मौजूद है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के पास एक दिन का भी पेट्रोल रिजर्व (भंडार) नहीं है। वहीं डीजल का स्टॉक 26-28 दिन और LPG का स्टॉक केवल 15 दिनों के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने आधिकारिक तौर पर एयरलाइंस के लिए ईंधन की कमी की चेतावनी (NOTAM) जारी कर दी है।
अली परवेज मलिक ने वैश्विक बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता की ओर इशारा करते हुए बताया कि इतिहास में दुबई क्रूड की कीमतें कभी भी 170 डॉलर के उच्च स्तर तक नहीं पहुंची थीं। इस अस्थिरता को देखते हुए देश की ऊर्जा भंडारण क्षमता को मजबूत करना अब एक तत्काल आवश्यकता बन गई है।
'कोविड काल' जैसी पाबंदियों की वापसी की तैयारी
ईंधन बचाने के लिए शाहबाज शरीफ सरकार बेहद सख्त कदम उठाने पर विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए देश में लॉकडाउन जैसे नियम लागू किए जा सकते हैं। कॉरपोरेट और सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों को घर से काम करने का निर्देश दिया जा सकता है, ताकि सड़कों पर गाड़ियां कम चलें। स्कूलों और कॉलेजों को बंद करके शिक्षा को फिर से ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने की योजना है। लोगों से निजी वाहनों का इस्तेमाल कम करने और कार शेयर करने की अपील की जा रही है।
आसमान छूती महंगाई और चरमराती अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान पहले से ही भयंकर आर्थिक संकट और महंगाई से जूझ रहा है। इस ऊर्जा संकट के कारण सरकार अब पेट्रोल-डीजल की कीमतों की समीक्षा 15 दिनों की जगह हर हफ्ते कर सकती है। युद्ध क्षेत्र से तेल लाने वाले जहाजों का बीमा 30,000 डॉलर से बढ़कर 4,00,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होने से फल, सब्जियां, राशन और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
'मध्यस्थ' पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी विडंबना?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान अक्सर खुद को इस्लामी देशों और पश्चिमी ताकतों के बीच एक 'मध्यस्थ' के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है। लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि जो देश दूसरों के विवाद सुलझाने का दावा करता है, वह अपनी बुनियादी जरूरतों (ऊर्जा सुरक्षा) को सुरक्षित रखने में बुरी तरह विफल साबित हो रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और आईएमएफ (IMF) के कड़े नियमों के बीच यह तेल संकट पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए 'ताबूत में आखिरी कील' साबित हो सकता है।
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वैश्विक मंचों पर खुद को 'मध्यस्थ' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के सामने अब एक गंभीर घरेलू संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के ऊर्जा और वित्त मंत्रालय की ओर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने पूरे देश में खलबली मचा दी है। सरकार ने यह स्वीकार किया है कि देश के पास कच्चे तेल का रिजर्व केवल 5-7 दिनों का ही बचा है, जबकि डीजल और एलपीजी जैसे अन्य ईंधनों का स्टॉक भी कुछ ही हफ्तों में खत्म हो सकता है।
संकट की जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना
पाकिस्तान के इस अचानक उपजे ऊर्जा संकट का सीधा तार मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों से जुड़ा है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने होर्मुज को व्यापारिक जहाजों के लिए लगभग बंद कर दिया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मुख्य रूप से खाड़ी देशों (सऊदी अरब, कुवैत आदि) से होने वाले आयात पर निर्भर है। रास्ता बंद होने और जहाजों की कमी से सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है।
पेट्रोलियम मंत्री का कुबूलनामा और वर्तमान हालात
पाकिस्तान के केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने ईरान-अमेरिका संघर्ष से जुड़ी मौजूदा भू-राजनीतिक चिंताओं के बीच देश के ईंधन भंडार को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। समा टीवी के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यह युद्ध जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा हो रही है।
मंत्री ने कार्यक्रम के दौरान एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि पाकिस्तान का ऊर्जा तंत्र इस समय बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि देश के पास वर्तमान में केवल 5 से 7 दिनों का कच्चा तेल मौजूद है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के पास एक दिन का भी पेट्रोल रिजर्व (भंडार) नहीं है। वहीं डीजल का स्टॉक 26-28 दिन और LPG का स्टॉक केवल 15 दिनों के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने आधिकारिक तौर पर एयरलाइंस के लिए ईंधन की कमी की चेतावनी (NOTAM) जारी कर दी है।
अली परवेज मलिक ने वैश्विक बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता की ओर इशारा करते हुए बताया कि इतिहास में दुबई क्रूड की कीमतें कभी भी 170 डॉलर के उच्च स्तर तक नहीं पहुंची थीं। इस अस्थिरता को देखते हुए देश की ऊर्जा भंडारण क्षमता को मजबूत करना अब एक तत्काल आवश्यकता बन गई है।
'कोविड काल' जैसी पाबंदियों की वापसी की तैयारी
ईंधन बचाने के लिए शाहबाज शरीफ सरकार बेहद सख्त कदम उठाने पर विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए देश में लॉकडाउन जैसे नियम लागू किए जा सकते हैं। कॉरपोरेट और सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों को घर से काम करने का निर्देश दिया जा सकता है, ताकि सड़कों पर गाड़ियां कम चलें। स्कूलों और कॉलेजों को बंद करके शिक्षा को फिर से ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने की योजना है। लोगों से निजी वाहनों का इस्तेमाल कम करने और कार शेयर करने की अपील की जा रही है।
आसमान छूती महंगाई और चरमराती अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान पहले से ही भयंकर आर्थिक संकट और महंगाई से जूझ रहा है। इस ऊर्जा संकट के कारण सरकार अब पेट्रोल-डीजल की कीमतों की समीक्षा 15 दिनों की जगह हर हफ्ते कर सकती है। युद्ध क्षेत्र से तेल लाने वाले जहाजों का बीमा 30,000 डॉलर से बढ़कर 4,00,000 डॉलर तक पहुंच गया है। इसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होने से फल, सब्जियां, राशन और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
'मध्यस्थ' पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी विडंबना?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान अक्सर खुद को इस्लामी देशों और पश्चिमी ताकतों के बीच एक 'मध्यस्थ' के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है। लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि जो देश दूसरों के विवाद सुलझाने का दावा करता है, वह अपनी बुनियादी जरूरतों (ऊर्जा सुरक्षा) को सुरक्षित रखने में बुरी तरह विफल साबित हो रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और आईएमएफ (IMF) के कड़े नियमों के बीच यह तेल संकट पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए 'ताबूत में आखिरी कील' साबित हो सकता है।
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पाकिस्तानी ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता हिना बलूच का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने पाकिस्तान में बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। वीडियो में हिना ने दावा किया है कि पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' (विषमलैंगिक) नहीं है और देश की पूरी आबादी या तो समलैंगिक (Gay) है या बायसेक्सुअल (Bisexual)। उनका तर्क है कि सामाजिक दबाव, धर्म और पारिवारिक सम्मान की आड़ में पाकिस्तान में लोग अपनी कामुकता को छिपाकर रखते हैं।
पाकिस्तानी समाज का 'खुला रहस्य'
'क्वीर ग्लोबल' को दिए एक हालिया इंटरव्यू में हिना बलूच ने पाकिस्तानी समाज की इस स्थिति को एक 'खुला रहस्य' बताया। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि पाकिस्तान की आधे से अधिक आबादी वास्तव में गे है। वे बस इसे खुलकर कहना नहीं चाहते हैं। मुझे लगता है कि पाकिस्तान की 80 प्रतिशत आबादी गे है और बाकी 20 प्रतिशत बायसेक्सुअल है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कामुकता के मामले में पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' है।'
धर्म और संस्कृति की आड़
बलूच ने तर्क दिया कि कई लोग अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) को दबाते हैं या उससे इनकार करते हैं। अपने बचपन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'लोग इससे इनकार करेंगे, वे इसके बीच में धर्म को लाएंगे, वे संस्कृति का हवाला देंगे, लेकिन यह एक खुला रहस्य है।'
हिना बलूच ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि उनका निजी संघर्ष कामुकता को लेकर कम, बल्कि अपनी जेंडर एक्सप्रेशन (लिंग अभिव्यक्ति) को लेकर ज्यादा था। उन्होंने बताया, 'मुझे हमेशा इस बात की चिंता सताती थी कि मैं कैसे लिपस्टिक लगाऊं ताकि परिवार से गालियां न सुननी पड़ें। मैं कैसे महिलाओं वाले कपड़े और गहने पहनूं जिससे मुझे मार न खानी पड़े?'
समुदाय का शोषण
उन्होंने पाकिस्तान के 'ख्वाजा सरा' (ट्रांसजेंडर) समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली प्रणालीगत और सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस समुदाय के कई लोगों को मजबूरन भीख मांगने, शादियों में नाचने या सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) जैसे सीमित और शोषणकारी कामों में धकेल दिया जाता है।
इन सामाजिक बंधनों और शोषण को अस्वीकार करते हुए, बलूच ने जेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। वह 'सिंध मूरत मार्च' की सह-संस्थापक बनीं और पाकिस्तान के प्रसिद्ध 'औरत मार्च' में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने खुद को ट्रांसजेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों की एक मुखर पैरोकार के रूप में स्थापित किया।
हिंसा और देश छोड़ना
बलूच ने बताया कि एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'प्राइड फ्लैग' फहराने के बाद उन्हें भारी हिंसक प्रतिशोध का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा, उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कथित अपहरण और दुर्व्यवहार का भी सामना किया। इन जानलेवा और खौफनाक अनुभवों ने अंततः उन्हें पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बाद में, उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित 'SOAS विश्वविद्यालय' में स्कॉलरशिप हासिल की और अपनी सुरक्षा के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) में शरणार्थी का दर्जा मांगा।
पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराने के प्रयास पूरी तरह विफल हो गए हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने शुक्रवार को मध्यस्थों का हवाला देते हुए यह जानकारी दी। ईरान ने पाकिस्तान सहित मध्यस्थता करा रहे देशों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह आने वाले दिनों में इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात करने को तैयार नहीं है और अमेरिका की मांगों को पूरी तरह अस्वीकार्य मानता है। कुल मिलाकर ये बातचीत अब 'डेड एंड' पर पहुंच गई है।
ईरान का इनकार और अमेरिका की मांगें
सूत्रों के अनुसार, ईरान ने युद्धविराम के लिए अपनी शर्तें दोहराई हैं। शुरुआती दौर में ईरान ने कहा था कि वह तभी युद्ध समाप्त करेगा जब अमेरिका युद्ध मुआवजा दे, मध्य पूर्व के अपने सभी सैन्य ठिकानों से वापसी करे और भविष्य में किसी भी हमले से सुरक्षा की गारंटी दे। इन मांगों पर कोई समझौता नहीं होने के कारण बातचीत अटक गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के नेतृत्व में बातचीत को आगे बढ़ाने की यह कोशिश कोई सफलता हासिल नहीं कर सकी। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसे अमेरिका की मांगें 'अस्वीकार्य' लगती हैं। वह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक के लिए अपने कोई अधिकारी को नहीं भेजेगा। इस कड़े रुख ने बातचीत की मौजूदा रूपरेखा के दरवाजे प्रभावी रूप से बंद कर दिए हैं।
पाकिस्तान की निकल गई हवा!
पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान बैकडोर कूटनीति के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार ने सार्वजनिक तौर पर इस्लामाबाद में सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी करने की पेशकश की थी। इसी दिशा में पाकिस्तान ने अमेरिका की ओर से एक 15-सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव ईरान को सौंपा था। इससे पहले, चीन और पाकिस्तान ने भी संयुक्त रूप से एक 5-सूत्रीय शांति योजना पेश की थी।
हालांकि, अमेरिका की कुछ कठोर रणनीतिक मांगों और जमीनी स्तर पर लगातार हो रहे सैन्य हमलों के कारण, ईरान ने इस बातचीत से अपने कदम पीछे खींच लिए। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि पाकिस्तान के लिए दोनों पक्षों को एक मेज पर लाना कूटनीतिक रूप से एक बेहद जटिल काम था, जो अंततः विफल साबित हुआ।
शांति प्रयासों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ईरान ने अपने हवाई क्षेत्र में एक अमेरिकी युद्धक विमान (F-15E) को मार गिराने का दावा किया। पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी विशेष बलों ने एक पायलट का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर लिया है, जबकि दूसरे की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है।
तुर्की और मिस्र तलाश रहे नए विकल्प
इस कूटनीतिक गतिरोध के कारण शांति प्रयास अधर में लटक गए हैं। इसे देखते हुए तुर्की और मिस्र अब इस समस्या का समाधान इस्लामाबाद से बाहर तलाश रहे हैं। दोनों देश युद्धविराम की बची-खुची उम्मीदों को बचाने के लिए नए स्थानों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें दोहा (कतर) और इस्तांबुल (तुर्की) बातचीत की मेजबानी के लिए प्रमुख विकल्पों के रूप में उभरे हैं।
विवाद की मुख्य जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का समुद्री रास्ता
एक्सियोस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच एक संभावित समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी। इस समझौते के तहत यह प्रस्ताव था कि अगर तेहरान 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के समुद्री रास्ते को वैश्विक व्यापार के लिए फिर से खोल देता है, तो इसके बदले में युद्धविराम लागू किया जा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख और धमकियां
रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ फोन पर बातचीत के दौरान संभावित युद्धविराम को लेकर चर्चा की थी।
उसी दिन, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि ईरान के राष्ट्रपति युद्धविराम चाहते हैं। हालांकि, ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि युद्धविराम तभी होगा जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से 'खुला और स्वतंत्र' होगा।
ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा: हम तभी विचार करेंगे जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुला होगा। तब तक, हम ईरान पर विनाश की हद तक बमबारी कर रहे हैं। उन्हें वापस पाषाण युग में भेज देंगे!!!"
ईरान की प्रतिक्रिया
ट्रंप के इन दावों और बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने युद्धविराम चाहने वाले ट्रंप के दावे को पूरी तरह से झूठा और निराधार करार दिया है। इस युद्ध की आंच अब अन्य देशों तक फैल रही है। इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी दूतावास ने हाई-अलर्ट जारी करते हुए अमेरिकी नागरिकों को तुरंत इराक छोड़ने को कहा है, क्योंकि ईरान समर्थित मिलिशिया गुटों द्वारा हमले की आशंका है। बहरीन से लेकर दुबई तक ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. इस्लामाबाद में आयोजित विदेश मंत्रियों की अहम बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के समय से पहले ही समाप्त हो गई. यह बैठक 29–30 मार्च को दो दिनों तक चलने वाली थी, लेकिन यह एक ही दिन में खत्म हो गई. इस सम्मेलन में तु्र्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया. इस बैठक का मुख्य उद्देश्य यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान के बीच संभावित बातचीत के लिए एक मध्यस्थता ढांचा तैयार करना था।
हालांकि कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में किसी ठोस रोडमैप या कार्ययोजना पर सहमति नहीं बन सकी. इसकी सबसे बड़ी बाधा ईरान की सख्त शर्तें रहीं, जिसमें उसने सुरक्षा की गारंटी और बातचीत के लिए भरोसेमंद आश्वासन की मांग की थी. इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई. सूत्रों का कहना है कि बैठक में शामिल किसी भी देश ने ईरान की मुख्य चिंताओं को दूर करने को लेकर ठोस भरोसा नहीं जताया. जिस बैठक का उद्देश्य इस युद्ध को खत्म कराने के लिए समझौता कराना था, वो वक्त से पहले खत्म हो गई।
बिना तैयारी पाकिस्तान ने बुला ली पंचायत
इसका असर यह हुआ कि सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्री 29 मार्च को ही बैठक छोड़कर रवाना हो गए, जिससे सम्मेलन तय समय से पहले ही खत्म हो गया. बैठक के दौरान देशों के बीच मतभेद भी साफ नजर आए. पाकिस्तान और तुर्की, जहां मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे, वहीं सऊदी अरब और मिस्र ने ज्यादा सतर्क रुख अपनाया. इन देशों का मानना था कि किसी भी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले सीधे अमेरिका से चर्चा जरूरी है. खासतौर पर सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के इस दावे का पूरी तरह समर्थन करने में हिचक दिखाई कि वे अमेरिका और ईरान के बीच सफल मध्यस्थता कर सकते हैं. इससे बैठक में एकजुटता की कमी साफ नजर आई।
जिस काम के लिए आए, वो हुआ ही नहीं
बैठक का एक अहम निष्कर्ष यह भी रहा कि पाकिस्तान और तुर्की अब ईरान से संपर्क कर उसे अपनी शर्तों में नरमी लाने के लिए राजी करने की कोशिश कर सकते हैं. ईरान अब तक अपने पिछले अनुभवों को देखते हुए ठोस गारंटी की मांग पर अड़ा हुआ है. हालांकि कोई ठोस नतीजा नहीं निकलने के बावजूद सभी देशों ने बातचीत जारी रखने और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई है, ताकि क्षेत्र में तनाव को कम किया जा सके. कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक अगर यूनाइटेड स्टेट्स और ईरान इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, तो इस सप्ताह ही एक नई बैठक आयोजित की जा सकती है. फिलहाल तो क्षेत्रीय देशों के बीच भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं बन पा रहा है।
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