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रूस-यूक्रेन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ था, तो पश्चिमी देशों ने कसम खा ली थी कि वे रूस को दुनिया में बिल्कुल अकेला कर देंगे. उस पर पाबंदियों की ऐसी झड़ी लगाई गई कि लगा रूस की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी. लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलट चुकी है. रूस को अलग-थलग करने चले देश आज खुद बंटे हुए नजर आ रहे हैं और रूस की तो मानो चांदी हो गई है.
इस पूरी कहानी में गेमचेंजर बना है भारत. भारत ने जिस तरह पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, उसने दुनिया के कई अन्य देशों को भी हिम्मत दी है. अब भारत की तरह ही कई और देश रूस के साथ डटकर खड़े हो गए हैं. स्थिति यह आ गई है कि जो देश कल तक रूस के पक्के दुश्मन बने हुए थे और हर दिन नई पाबंदियां लगाने की वकालत करते थे, वे भी अब पीछे हटते दिख रहे हैं.
भारत का दांव- हम वहीं से खरीदेंगे, जहां फायदा होगा
रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआत से ही अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर भारी दबाव बनाया था कि वह रूस से तेल न खरीदे. उनका तर्क था कि रूस से तेल खरीदकर भारत एक तरह से इस युद्ध को फंड कर रहा है. लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को बिल्कुल साफ रखा. भारत सरकार का सीधा सा स्टैंड था, हमारे लिए हमारे देश की 140 करोड़ की आबादी सबसे पहले है. अगर हमें कहीं से सस्ता तेल मिलेगा, जिससे हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम काबू में रहें और महंगाई न बढ़े, तो हम वहीं से तेल खरीदेंगे.
आज भी यही खबर आ रही कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर रहा है. भारत के इस नेशन फर्स्ट वाले रवैये ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया. दुनिया को समझ आ गया कि एनर्जी सिक्योरिटी किसी भी देश का पहला अधिकार है और इसके लिए किसी महाशक्ति के आगे झुकने की जरूरत नहीं है. भारत का यही स्टैंड अब दुनिया के कई देशों के लिए रोल मॉडल बन गया है.
अब हंगरी बोला- दबाव के आगे नहीं झुकेंगे
भारत ने जो रास्ता दिखाया, अब यूरोपीय देश हंगरी भी उसी पर पूरी ताकत से चल पड़ा है. हंगरी ने यूरोपीय यूनियन की आंखों में आंखें डालकर साफ कह दिया है कि वह रूस से तेल खरीदने के मामले में किसी के दबाव में नहीं आएगा. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने दो टूक कहा, हम मौजूदा विकल्पों से ज्यादा महंगे और कम भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत खरीदने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनका सीधा सा मतलब था कि जब रूस हमें सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस दे रहा है, तो हम सिर्फ यूरोप की राजनीति के चक्कर में कहीं और से महंगा तेल क्यों खरीदें?
सिज्जार्टो ने इसे देश का अधिकार बताया. यानी यह हंगरी का अपना फैसला है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करे, इसमें कोई दूसरा देश दखल नहीं दे सकता. हंगरी के इस रुख ने यूरोप के उन देशों की नींद उड़ा दी है जो रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना चाहते थे. हंगरी यह बात अच्छे से जानता है कि अगर उसने रूस से तेल और गैस लेना बंद कर दिया, तो उसके देश में हाहाकार मच जाएगा, महंगाई आसमान छूने लगेगी और इंडस्ट्रीज बंद होने की कगार पर आ जाएंगी. इसलिए उसने कूटनीति से ज्यादा अपने देश की अर्थव्यवस्था को चुना है.
यूरोपीय यूनियन में फूट: पाबंदियों पर नहीं बन पा रही बात
एक समय था जब यूरोपीय यूनियन रूस के खिलाफ पाबंदियों का नया पैकेज लाने के लिए बस एक इशारे का इंतजार करता था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. खुद यूरोपीय यूनियन ने मान लिया है कि फिलहाल रूस पर नई पाबंदियां लगाने के मामले में कोई फैसला नहीं हो पाएगा.
ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने सोमवार को ब्रसेल्स में अपनी बेबसी जाहिर की. उन्होंने कहा, यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस के खिलाफ प्रस्तावित नए पाबंदियों के पैकेज पर सहमति नहीं बन पाएगी. इसका सबसे बड़ा कारण हंगरी का लगातार विरोध है. नियम के मुताबिक, यूरोपीय यूनियन में कोई भी बड़ा फैसला तभी लागू होता है जब सभी सदस्य देश उस पर सहमत हों. हंगरी ने वीटो पावर का इस्तेमाल करके ईयू के मंसूबों पर पानी फेर दिया है.
जर्मनी की छटपटाहट: ‘हंगरी को मनाएंगे’
हंगरी के इस कड़े रुख से जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश काफी नाराज और परेशान हैं. जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि वे हंगरी से अपनी जिद छोड़ने की अपील करेंगे. वाडेफुल ने कहा, मुझे नहीं लगता कि हंगरी के लिए अपनी आजादी और यूरोपीय संप्रभुता के संघर्ष को धोखा देना सही है. हम एक बार फिर से बुडापेस्ट और ब्रसेल्स में हंगरी के सामने अपनी दलीलें रखेंगे और उनसे अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहेंगे. लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं कि जर्मनी की यह अपील शायद ही कोई असर दिखाए. यूरोप के कई देश अब अंदर ही अंदर यह समझ चुके हैं कि बिना रूसी ऊर्जा के उनका गुजारा मुश्किल है. ऊपर से वे आदर्शवाद की बातें करते हैं, लेकिन अंदर से उनकी अर्थव्यवस्थाएं भी सस्ते ईंधन के लिए तरस रही हैं.
ट्रंप फैक्टर ने यूरोप को भारत के करीब ला दिया
इस पूरी कहानी में एक और बहुत बड़ा और दिलचस्प एंगल है, और वो है अमेरिका का ट्रंप फैक्टर. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हमेशा से अमेरिका फर्स्ट की रही हैं. उनका अंदाज मनमानी भरा रहा है. वे कब किस देश से कैसा व्यवहार करेंगे, यह कोई नहीं जानता. ट्रंप कई बार यूरोपीय देशों को धमका चुके हैं कि वे अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाएं, अमेरिका हमेशा उनका बिल नहीं भरेगा. ट्रंप की इसी मनमानी और अनिश्चितता ने यूरोपीय देशों को डरा दिया है. यूरोप को अब लगने लगा है कि अमेरिका के भरोसे बैठकर रूस से पूरी तरह दुश्मनी मोल लेना अक्लमंदी नहीं है. अगर कल को अमेरिका ने हाथ खींच लिया, तो यूरोप बीच मझधार में फंस जाएगा. यही वजह है कि अब कई यूरोपीय देश ‘भारत के रास्ते’ पर चलने की सोचने लगे हैं.
अगर आज के ग्लोबल सिचएशन को देखा जाए, तो रूस बहुत ही फायदे की स्थिति में है. भारत और चीन जैसे बड़े देश उसका तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए हुए हैं. वहीं, यूरोप जो उसका सबसे बड़ा विरोधी था, वह अब खुद दो फाड़ हो चुका है. हंगरी जैसे देश खुलकर रूस के साथ व्यापार करने की वकालत कर रहे हैं और यूरोपीय यूनियन बेबस नजर आ रहा है.
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रूस-यूक्रेन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ था, तो पश्चिमी देशों ने कसम खा ली थी कि वे रूस को दुनिया में बिल्कुल अकेला कर देंगे. उस पर पाबंदियों की ऐसी झड़ी लगाई गई कि लगा रूस की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी. लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलट चुकी है. रूस को अलग-थलग करने चले देश आज खुद बंटे हुए नजर आ रहे हैं और रूस की तो मानो चांदी हो गई है.
इस पूरी कहानी में गेमचेंजर बना है भारत. भारत ने जिस तरह पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, उसने दुनिया के कई अन्य देशों को भी हिम्मत दी है. अब भारत की तरह ही कई और देश रूस के साथ डटकर खड़े हो गए हैं. स्थिति यह आ गई है कि जो देश कल तक रूस के पक्के दुश्मन बने हुए थे और हर दिन नई पाबंदियां लगाने की वकालत करते थे, वे भी अब पीछे हटते दिख रहे हैं.
भारत का दांव- हम वहीं से खरीदेंगे, जहां फायदा होगा
रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआत से ही अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर भारी दबाव बनाया था कि वह रूस से तेल न खरीदे. उनका तर्क था कि रूस से तेल खरीदकर भारत एक तरह से इस युद्ध को फंड कर रहा है. लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को बिल्कुल साफ रखा. भारत सरकार का सीधा सा स्टैंड था, हमारे लिए हमारे देश की 140 करोड़ की आबादी सबसे पहले है. अगर हमें कहीं से सस्ता तेल मिलेगा, जिससे हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम काबू में रहें और महंगाई न बढ़े, तो हम वहीं से तेल खरीदेंगे.
आज भी यही खबर आ रही कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर रहा है. भारत के इस नेशन फर्स्ट वाले रवैये ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया. दुनिया को समझ आ गया कि एनर्जी सिक्योरिटी किसी भी देश का पहला अधिकार है और इसके लिए किसी महाशक्ति के आगे झुकने की जरूरत नहीं है. भारत का यही स्टैंड अब दुनिया के कई देशों के लिए रोल मॉडल बन गया है.
अब हंगरी बोला- दबाव के आगे नहीं झुकेंगे
भारत ने जो रास्ता दिखाया, अब यूरोपीय देश हंगरी भी उसी पर पूरी ताकत से चल पड़ा है. हंगरी ने यूरोपीय यूनियन की आंखों में आंखें डालकर साफ कह दिया है कि वह रूस से तेल खरीदने के मामले में किसी के दबाव में नहीं आएगा. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने दो टूक कहा, हम मौजूदा विकल्पों से ज्यादा महंगे और कम भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत खरीदने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनका सीधा सा मतलब था कि जब रूस हमें सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस दे रहा है, तो हम सिर्फ यूरोप की राजनीति के चक्कर में कहीं और से महंगा तेल क्यों खरीदें?
सिज्जार्टो ने इसे देश का अधिकार बताया. यानी यह हंगरी का अपना फैसला है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करे, इसमें कोई दूसरा देश दखल नहीं दे सकता. हंगरी के इस रुख ने यूरोप के उन देशों की नींद उड़ा दी है जो रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना चाहते थे. हंगरी यह बात अच्छे से जानता है कि अगर उसने रूस से तेल और गैस लेना बंद कर दिया, तो उसके देश में हाहाकार मच जाएगा, महंगाई आसमान छूने लगेगी और इंडस्ट्रीज बंद होने की कगार पर आ जाएंगी. इसलिए उसने कूटनीति से ज्यादा अपने देश की अर्थव्यवस्था को चुना है.
यूरोपीय यूनियन में फूट: पाबंदियों पर नहीं बन पा रही बात
एक समय था जब यूरोपीय यूनियन रूस के खिलाफ पाबंदियों का नया पैकेज लाने के लिए बस एक इशारे का इंतजार करता था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. खुद यूरोपीय यूनियन ने मान लिया है कि फिलहाल रूस पर नई पाबंदियां लगाने के मामले में कोई फैसला नहीं हो पाएगा.
ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने सोमवार को ब्रसेल्स में अपनी बेबसी जाहिर की. उन्होंने कहा, यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस के खिलाफ प्रस्तावित नए पाबंदियों के पैकेज पर सहमति नहीं बन पाएगी. इसका सबसे बड़ा कारण हंगरी का लगातार विरोध है. नियम के मुताबिक, यूरोपीय यूनियन में कोई भी बड़ा फैसला तभी लागू होता है जब सभी सदस्य देश उस पर सहमत हों. हंगरी ने वीटो पावर का इस्तेमाल करके ईयू के मंसूबों पर पानी फेर दिया है.
जर्मनी की छटपटाहट: ‘हंगरी को मनाएंगे’
हंगरी के इस कड़े रुख से जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश काफी नाराज और परेशान हैं. जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि वे हंगरी से अपनी जिद छोड़ने की अपील करेंगे. वाडेफुल ने कहा, मुझे नहीं लगता कि हंगरी के लिए अपनी आजादी और यूरोपीय संप्रभुता के संघर्ष को धोखा देना सही है. हम एक बार फिर से बुडापेस्ट और ब्रसेल्स में हंगरी के सामने अपनी दलीलें रखेंगे और उनसे अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहेंगे. लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं कि जर्मनी की यह अपील शायद ही कोई असर दिखाए. यूरोप के कई देश अब अंदर ही अंदर यह समझ चुके हैं कि बिना रूसी ऊर्जा के उनका गुजारा मुश्किल है. ऊपर से वे आदर्शवाद की बातें करते हैं, लेकिन अंदर से उनकी अर्थव्यवस्थाएं भी सस्ते ईंधन के लिए तरस रही हैं.
ट्रंप फैक्टर ने यूरोप को भारत के करीब ला दिया
इस पूरी कहानी में एक और बहुत बड़ा और दिलचस्प एंगल है, और वो है अमेरिका का ट्रंप फैक्टर. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हमेशा से अमेरिका फर्स्ट की रही हैं. उनका अंदाज मनमानी भरा रहा है. वे कब किस देश से कैसा व्यवहार करेंगे, यह कोई नहीं जानता. ट्रंप कई बार यूरोपीय देशों को धमका चुके हैं कि वे अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाएं, अमेरिका हमेशा उनका बिल नहीं भरेगा. ट्रंप की इसी मनमानी और अनिश्चितता ने यूरोपीय देशों को डरा दिया है. यूरोप को अब लगने लगा है कि अमेरिका के भरोसे बैठकर रूस से पूरी तरह दुश्मनी मोल लेना अक्लमंदी नहीं है. अगर कल को अमेरिका ने हाथ खींच लिया, तो यूरोप बीच मझधार में फंस जाएगा. यही वजह है कि अब कई यूरोपीय देश ‘भारत के रास्ते’ पर चलने की सोचने लगे हैं.
अगर आज के ग्लोबल सिचएशन को देखा जाए, तो रूस बहुत ही फायदे की स्थिति में है. भारत और चीन जैसे बड़े देश उसका तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए हुए हैं. वहीं, यूरोप जो उसका सबसे बड़ा विरोधी था, वह अब खुद दो फाड़ हो चुका है. हंगरी जैसे देश खुलकर रूस के साथ व्यापार करने की वकालत कर रहे हैं और यूरोपीय यूनियन बेबस नजर आ रहा है.
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मध्य यूरोपीय देश पोलैंड ने कई रूसी ड्रोन्स को अपने हवाई क्षेत्र में मार गिराने का दावा किया है। इससे पहले बुधवार की अहले सुबह पोलैंड ने NATO देशों के साथ मिलकर अपने F-16 लड़ाकू विमानों को उतार दिया और राजधानी वारसॉ स्थित अपने मुख्य हवाई अड्डे समेत कुल चार एयरपोर्ट्स बंद कर दिए। यूक्रेन के पश्चिम में स्थित इस देश ने यह कदम तब उठाया है, जब रूस से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन की वायु सेना ने पोलैंड को चेतावनी दी थी कि रूसी ड्रोन्स अब यूक्रेन की सीमा पार कर पोलैंड में घुसने जा रही है। इस सूचना पर पोलैंड की वायु सेना ने आननफानन में अपने लड़ाकू विमानों की तैनाती कर दी और कुछ ही देर बाद रूसी ड्रोन मार गिराए। पोलिश वायु सेना ने कहा है कि बार-बार उसके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया जा रहा था। इसके बाद यह कदम उठाया गया है। इससे इस क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है।
पोलैंड की ऑपरेशनल कमांड ने कहा, "पोलिश और NATO सहयोगियों के लड़ाकू विमान हमारे हवाई क्षेत्र में उड़ान भर रहे हैं, जबकि जमीनी वायु रक्षा और रडार टोही प्रणालियों को उच्चतम स्तर पर तैयार रखा गया है।" CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी वायु सेना ने शुरुआत में कहा था कि रूसी ड्रोन पोलिश क्षेत्र में घुस आए हैं, जिससे ज़मोस्क शहर को खतरा पैदा हो गया है। यूक्रेनी मीडिया ने भी बताया कि एक ड्रोन पश्चिमी पोलिश शहर रेज़्ज़ो की ओर बढ़ रहा है, और कहा कि हवाई अड्डों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है।
ईरान निर्मित शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल?
इस बीच, अमेरिकी प्रतिनिधि जो विल्सन ने आरोप लगाया है कि रूस ने पोलैंड पर हमला करने के लिए ईरान निर्मित शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल किया था। विल्सन ने एक्स पर लिखा, “राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा वाइट हाउस में पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नॉरोकी की मेज़बानी के एक हफ़्ते से भी कम समय बाद रूस ईरानी शाहेद ड्रोन से नाटो सहयोगी पोलैंड पर हमला कर रहा है। यह युद्ध जैसा कृत्य है।” उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से कड़ा जवाब देने का आग्रह करते हुए लिखा, "मैं राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह करता हूँ कि वे रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाएं ताकि युद्ध मशीन बना रूस दिवालिया हो जाए।" विल्सन ने आगे कहा कि मॉस्को अब नाटो के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।
बेलारूस के साथ लगी सीमा बंद करेगा पोलैंड
पिछले साढ़े तीन साल से रूस-यूक्रेन के बीच जारी जंग की वजह से पड़ोसी देश भी परेशान हैं। इसी क्रम में पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अब घोषणा की है कि एक दिन बाद यानी गुरुवार को पोलैंड बेलारूस के साथ लगी पूर्वी सीमा को बंद करने जा रहा है। दरअसल, पोलिश ससरकार बेलारूस में चल रहे रूसी सेना के आक्रामक सैन्य अभ्यास से चिंतित है। द गार्डियन के मुताबिक, पोलिश प्रधानमंत्री ने कहा कि यह रूस और बेलारूस की ओर से बढ़ती उकसावे की कार्रवाई का जवाब है।
पोलैंड ने मार गिराए रशियन ड्रोन
पोलैंड की सशस्त्र सेनाओं ने तत्काल जवाबी कार्रवाई करते हुए अपने और NATO सहयोगी देशों के विमान तैनात किए. इसके साथ ही भूमि आधारित वायु रक्षा और राडार प्रणाली को हाई अलर्ट पर रखा गया. देश के ऑपरेशनल कमांड ने घोषणा की – ‘पोलैंड की वायु सीमा में अब हमारे और सहयोगियों के विमान सक्रिय हैं और वायु रक्षा और रडार चौकसी अब हाई अलर्ट पर है.’ इसके साथ ही कुछ प्रमुख हवाई अड्डों को भी अस्थायी रूप से बंद भी कर दिया गया. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पोलिश आर्मी ने कहा है कि रूसी ड्रोन को मार गिराया गया है. ये पहली बार हुआ है कि नाटो देश किसी रूसी एसेट के साथ सीधे-सीधे उलझा हो.
सुरक्षा में तैनात हुए अमेरिकी फाइटर जेट
पोलैंड के एयरस्पेस में रशियन ड्रोन के पहुंचने के बाद नाटो देश सतर्क हो गए हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच नाटो देश और रूस की ये पहली भिड़ंत हैं, ऐसे में पोलैंड की सुरक्षा के लिए नाटो एयरक्राफ्ट सक्रिय हो चुके हैं. उन्होंने पोलिश एयरस्पेस की सुरक्षा के लिए अमेरिका का एडवांस फाइटर जेट F-35 तैनात कर दिया है. इसी बीच प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने घोषणा की है कि बेलारूस के साथ सभी बॉर्डर क्रॉसिंग बंद की जाएगी, जिसमें रेलमार्ग भी शामिल है. पोलैंड का मानना है कि रूस और बेलारूस की ओर से Zapad‑2025 नाम की बेहद आक्रामक मिलिट्री एक्सरसाइज की वजह से ये हालात पैदा हुए हैं. ऐसे में बॉर्डर क्रॉस करने पर तब तक रोक रहेगी, जब तक खतरा टल नहीं जाता. वहीं पड़ोसी नाटो देशों- लिथुआनिया और लातविया ने भी अपनी सीमाओं की सुरक्षा बढ़ा दी है.
पुतिन के इरादे खतरनाक
पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवरोकी ने भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुकिन के इरादों को भांपकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, "हमें व्लादिमीर पुतिन के अच्छे इरादों पर भरोसा नहीं है।" नवरोकी ने आगे कहा, “बेशक, हम दीर्घकालिक शांति, स्थायी शांति की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो हमारे क्षेत्रों के लिए जरूरी है, लेकिन हमारा मानना है कि व्लादिमीर पुतिन अन्य देशों पर भी आक्रमण करने के लिए तैयार हैं।”
बफर स्टेट के रूप में काम कर रहा पोलैंड
बता दें कि पोलैंड में अमेरिका और नाटो देशों के प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठान हैं, जो लंबे समय से रूस और शेष पश्चिमी यूरोप के बीच एक बफर स्टेट के रूप में काम करता रहा है। लेकिन अब यह देश भी रूस से खतरा महसूस कर रहा है। यह खतरा तब पैदा हुआ जब रूस ने रातोंरात यूक्रेन पर ड्रोन और मिसाइल हमले तेज कर दिए। यूक्रेन की वायु सेना ने बताया कि वोलिन और ल्वीव जैसे पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों सहित देश के अधिकांश हिस्से में कई घंटों तक हवाई हमले की चेतावनी जारी रही।
]]>भारत ने अमेरिका की टैरिफ वाली कार्रवाईयों को नजरअंदाज करते हुए अपने पुराने और भरोसेमंद सहयोगी रूस से तेल की खरीद जारी रखने का फैसला किया है। न्यूज एजेंसी एएनआई ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि भारत की तेल रिफाइनरियां रूसी कंपनियों से तेल प्राप्त करना जारी रखे हुए हैं। उनके आपूर्ति संबंधी निर्णय कीमत, कच्चे तेल की गुणवत्ता, भंडार, रसद और अन्य आर्थिक कारकों पर निर्भर होते हैं।
सूत्रों के अनुसार, रूसी तेल पर कभी कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। इसके बजाय, G7 और यूरोपीय संघ (EU) द्वारा एक मूल्य सीमा व्यवस्था लागू की गई थी ताकि रूस की आय को सीमित करते हुए वैश्विक आपूर्ति को जारी रखा जा सके। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने इस फ्रेमवर्क के तहत 60 डॉलर प्रति बैरल की अधिकतम सीमा का सख्ती से पालन किया है। अब EU ने इसे घटाकर 47.6 डॉलर प्रति बैरल करने की सिफारिश की है, जिसे सितंबर से लागू किया जाएगा।
भारत ने वैश्विक तेल संकट को टाला
मार्च 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में अफरातफरी मची थी, तब ब्रेंट क्रूड की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। इसी दौरान भारत ने रणनीतिक निर्णय लेते हुए रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद शुरू की, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में संतुलन बना रहा और महंगाई को काबू में रखने में मदद मिली। सूत्रों के अनुसार, अगर भारत ने रूसी तेल न खरीदा होता और OPEC+ देशों की उत्पादन कटौती (5.86 mb/d) भी जारी रहती, तो तेल की कीमतें 137 डॉलर से भी ऊपर जा सकती थीं। इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई और ऊर्जा संकट और गहरा जाता।
भारत ने सिर्फ अपने ऊर्जा हितों की रक्षा नहीं की बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाई। इस दौरान भारत ने ईरान और वेनेज़ुएला जैसे उन देशों से तेल नहीं खरीदा, जिन पर वास्तव में अमेरिका के प्रतिबंध लागू हैं।
]]>यूक्रेनी सेना के जनरल स्टाफ के मुताबिक, रूस ने अब तक कुल 10,07,160 सैनिक खो दिए हैं. सिर्फ पिछले 24 घंटे में ही 1,040 रूसी सैनिक मारे गए. इसके अलावा रूस के 10,947 टैंक, 22,845 बख्तरबंद वाहन, 52,312 सैन्य वाहन और ईंधन टैंकर, 29,265 तोप प्रणाली, 1,420 रॉकेट लॉन्चर, 1,187 एयर डिफेंस सिस्टम, 416 विमान, 337 हेलीकॉप्टर, 41,165 ड्रोन, 3,369 क्रूज मिसाइलें, 28 नौकाएं और एक पनडुब्बी भी तबाह हो चुकी है.
उत्तर कोरिया भेजेगा 5,000 सैनिक
रूसी समाचार एजेंसियों के मुताबिक, उत्तर कोरिया रूस के कुर्स्क क्षेत्र में अपने 5,000 सैनिक और 1,000 माइंस हटाने वाले विशेषज्ञ भेजने वाला है. इससे पहले भी उत्तर कोरिया के करीब 10,000 सैनिक रूस भेजे गए थे, जिनमें से 6,000 की जान जा चुकी है. यह जानकारी ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने इस सप्ताह दी है.
G-7 में पुतिन पर निशाना
G-7 सम्मेलन के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि ‘अंतरराष्ट्रीय माहौल का फायदा उठाकर पुतिन निर्दोष नागरिकों पर हमला कर रहे हैं.’ इस हमले में एक अमेरिकी नागरिक की भी मौत हुई है.
कीव में मिसाइल हमला, 18 की मौत
रूस के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने कीव शहर में तबाही मचा दी. अधिकारियों के मुताबिक, इस हमले में 18 लोगों की मौत और 151 लोग घायल हो गए. कीव के सोलोमियन्स्की जिले में नौ मंजिला बिल्डिंग को मिसाइल ने निशाना बनाया. घटनास्थल पर मौजूद 57 वर्षीय विक्टोरिया वोवचेंको ने कहा, ‘ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा… यह आम लोगों को लगातार प्रताड़ित करने जैसा है.’
]]>रूस और उसके पड़ोसी देश पोलैंड के बीच फिर से तनाव गहरा गया है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि पोलैंड ने उत्तरी सीमा पर फाइटर जेट और मिसाइलों को तैनात कर दिया है ताकि किसी भी रूसी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। पोलैंड के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि उसने यूक्रेन पर रूस के बड़े पैमाने पर मिसाइल हमलों को देखते हुए और आसन्न खतरों के जवाब में अपने लड़ाकू विमानों को तैनात कर दिया है। पोलैंड की सेना इस बात से चिंतित है कि रूसी मिसाइलें उसके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन कर रही हैं। लिहाजा, पोलैंड ने अपनी सैन्य सतर्कता बढ़ा दी है और लड़ाकू जेट तैनात कर दिए हैं।
दरअसल, यूक्रेन के पश्चिमी क्षेत्रों को निशाना बनाकर किए गए रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने कभी-कभी पोलैंड और रोमानिया जैसे छोटे और नाटो सदस्य देशों के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है। इससे पोलैंड खतरा महसूस कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रूस ने पश्चिमी इलाकों में मिसाइल हमले तेज कर दिये हैं और इस बात की भी आशंका जताई गई है कि रूसी मिसाइल यूक्रेन को निशाना बनाने के साथ ही पोलैंड में भी हवाई हमले कर सकते हैं।
यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार, रूसी आक्रमण में Tu-95MS बमवर्षकों से लॉन्च की गई Kh-101 मिसाइलें शामिल हैं। इसके अलावा रूसी सेना Kalibr मिसाइलें दाग रही हैं, जो काले सागर से खेरसॉन ओब्लास्ट के माध्यम से यूक्रेन में प्रवेश कर रही हैं। यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मिसाइल हमलों के अलावा, रूस ने विभिन्न स्थानों पर किंजल मिसाइलें, बैलिस्टिक हथियार और 74 ड्रोन तैनात कर रखे हैं। इससे पोलैंड की परेशानी बढ़ गई है।
पोलैंड के रक्षा मंत्रालय ने सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान में कहा है कि पश्चिमी यूक्रेन के कई ठिकानों पर किए गए लक्षित हमलों के दौरान कई रूसी सैन्य विमान हमारे हवाई क्षेत्र में मंडरा रहे हैं। इस हालात ने पोलैंड की चिंता बढ़ा दी है और युद्ध के लिए तैयारी करने पर पोलैंड मजबूर हुआ है। एक दिन पहले ही पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने रूस पर दुनिया भर में गड़बड़ी करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है, जिसमें एयरलाइन के खिलाफ "हवाई आतंक की गतिविधियां" भी शामिल हैं।
टस्क ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ वारसॉ में संवाददाता सम्मेलन में यह टिप्पणी की। टस्क ने कहा, “मैं विस्तार में नहीं जाऊंगा, मैं केवल इस आशंका की पुष्टि कर सकता हूं कि रूस न केवल पोलैंड के खिलाफ, बल्कि दुनिया भर की एयरलाइन के खिलाफ हवाई आतंक की कार्रवाई की साजिश रच रहा है।" रूस ने पश्चिमी देशों के उन पूर्व दावों को खारिज कर दिया है कि रूस ने यूरोप में गड़बड़ी और हमलों को प्रायोजित किया था।
इस बीच, पोलिश ऑपरेशनल कमांड ने अपने सभी युद्ध संसाधनों को एकजुट करते हुए ना सिर्फ उन्हें अलर्ट मोड में रखा है बल्कि फाइटर जेट को तैनात कर दिया है। इसके अलावा सतह से हवा में मार करने वाली एंटी मिसाइल सिस्टम को भी तैयार रहने को कहा है। दुश्मन देश के हमले को रोकने के लिए रडार प्रणाली को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। पोलैंड के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि जोखिम वाले सीमा क्षेत्रों को सुरक्षित करने के लिए ऐसे एहतियाती उपाय लागू किए गए हैं। बयान में कहा गया है, "सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल कमांड मौजूदा स्थिति पर नजर रख रही है और इसके अधीनस्थ बल और संसाधन तत्काल प्रतिक्रिया के लिए पूरी तरह तैयार हैं।"
]]>योनहाप समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आरवीवीओईएनकेओआर_बोओटी, नामक ब्लॉगर द्वारा शेयर की गई तस्वीर में पोक्रोव्स्क में एक खदान के ऊपर दो झंडे एक साथ लहराते हुए दिखाई दे रहे हैं। पोक्रोव्स्क यूक्रेन के पूर्वी मोर्चे पर स्थित गढ़ों में से एक है।
ब्लॉगर ने कहा कि हाल ही में शहर के पास खदान में एक पहाड़ी पर उत्तर कोरियाई झंडा फहराया गया, जो उन संदिग्ध जगहों में से एक है जहां उत्तर कोरियाई सैनिकों के तैनात होने की आशंका है।
दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय खुफिया सर्विस ने घोषणा की कि उत्तर कोरिया ने यूक्रेन के साथ अपने लंबे युद्ध में रूस का समर्थन करने के लिए लगभग 12,000 सैनिक भेजने का फैसला किया, जिनमें से लगभग 1,500 पहले से ही रूस के सुदूर पूर्व में तैनात हैं।
अगर यह दावा सच है कि तो यह पहली बार होगा जब उत्तर कोरिया ने इतने बड़े पैमाने पर जमीनी सैनिकों को भेजा है। हालांकि इससे पहले उसने विदेशी मुद्रा कमाने के लिए सैनिकों के छोटे समूहों को विदेशों में भेजा था।
अभी तक उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया ने रूस में अपनी सेना की तैनाती के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।
संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया के एक दूत ने दक्षिण कोरिया और यूक्रेन के उन आरोपों को खारिज कर दिया कि वह यूक्रेन में युद्ध में रूस के साथ लड़ने के लिए अपने सैनिकों को भेज रहा है। उसने इन आरोपों को ‘निराधार अफवाह’ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि मॉस्को के साथ उसके संबंध ‘वैध और सहयोगात्मक’ हैं।
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रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी रेलवे ने सोमवार को अपने टेलीग्राम चैनल पर कहा कि भारत के लिए ये ट्रेनें केमेरोवो क्षेत्र से रवाना हुईं हैं। ये ट्रेन कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से होते हुए आईएनएसटीसी की पूर्वी शाखा के साथ ईरानी बंदरगाह बंदर अब्बास तक पहुंच गई हैं। ये ट्रेन जल्दी ही भारत आ जाएंगी।
भारत के व्यापार में क्रांति ला सकता है आईएनएसटीसी
आईएनएसटीसी ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से रूस को भारत से जोड़ता है। ये भारत के व्यापार के लिए बहुत मायने रखता है। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस को समुद्री व्यापार पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में इस गलियारे का आर्थिक और रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है। वहीं भारत के लिए इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि भारत इसे चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में देखता है।
पिछले महीने भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह का प्रबंधन 10 साल की शुरुआती अवधि के लिए अपने हाथ में ले लिया। यह सौदा आईएनएसटीसी के लिए एक बढ़ावा है क्योंकि बंदरगाह आईएनएसटीसी में एक प्रमुख नोड के रूप में काम करेगा। यह क्षेत्रीय संपर्क, मध्य एशिया और अफ़गानिस्तान के भूमि से घिरे देशों के साथ व्यापार की सूरत बदल देगा और एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करेगा जो इस क्षेत्र को रूस और फिर यूरोप से जोड़ता है। आईएनएसटीसी भारतीय व्यापारियों को मध्य एशिया तक अधिक आसानी से और अधिक लागत प्रभावी तरीके से पहुंचने में सक्षम बनाएगा। एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे भारत की ईरान, रूस, अज़रबैजान और बाल्टिक और नॉर्डिक जैसे देशों तक पहुंच बढ़ेगी।
स्वेज नहर रूट का विकल्प बनेगा ये कॉरिडोर
आईएनएसटीसी को स्वेज नहर व्यापार मार्ग के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक व्यापार का लगभग 12 प्रतिशत, एक मिलियन बैरल तेल और 8 तरलीकृत प्राकृतिक गैस हर दिन नहर से होकर गुजरती है। इजरायल-हमास संघर्ष ने इस रूट को असुरक्षित बना दिया है। ऐसे में आईएनएसटीसी कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक उपकरण हो सकता है, जिसकी भारत को मध्य एशिया में अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए आवश्यकता है। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद की प्रोफेसर निशा तनेजा का कहना है कि भारत आईएनएसटीसी मार्ग के लिए चाबहार बंदरगाह का लाभ उठाना शुरू कर देता है, तो ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, कपड़ा और रत्न और आभूषण को बहुत लाभ होगा।
एक अन्य विश्लेषक ने कहा कि आईएनएसटीसी भारत को पश्चिम एशियाई देशों से ऊर्जा स्रोत प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के व्यापारिक अवरोध बिंदुओं के माध्यम से मध्य एशियाई देशों से भारत के विशाल ऊर्जा आयात का हवाला देते हुए, एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग के उप प्रमुख राजन सुदेश रत्न ने कहा कि आईएनएसटीसी एक प्रमुख आर्थिक अर्थ ऊर्जा कनेक्टिविटी के इर्द-गिर्द है। रत्ना ने कहा कि अगर आप आईएनएसटीसी के माध्यम से सस्ते में आयात कर सकते हैं, तो आप देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं और इसके बाद जो भी उत्पादन होगा वह अधिक लागत प्रभावी भी होगा।
]]>रूस के दागिस्तान में रविवार को उस वक्त चीख-पुकार मच गई, जब वहां के एक प्रार्थनाघर, एक रूढ़िवादी चर्च और एक पुलिस चौकी पर बंदूकधारियों ने हमला बोल दिया, जिसमें कम से कम 7 पुलिस अधिकारी मारे गए. दागिस्तान में आंतरिक मामलों के मंत्रालय ने यह जानकारी दी. पुलिस इस घटना को अलगाववादी हिंसा के तौर पर देख रही है. पुलिस ने हमले में शामिल दो आतंकवादियों को गिरफ्तार भी कर लिया है.
रॉयटर्स से मिली जानकारी के अनुसार, प्रार्थना घर और चर्च दोनों ही दागिस्तान के डर्बेंट शहर में स्थित हैं. यह मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल उत्तरी काकेशस का इलाका है, जहां प्राचीन यहूदी समुदाय के लोग रहते हैं. आतंकियों ने दागिस्तान की राजधानी माखचकाला में पुलिस चौकी पर भी हमला बोला, जो यहां से लगभग 125 किलोमीटर (75 मील) दूर है. स्थानीय लोगों ने बताया कि हमले के बाद प्रार्थना घर में आग लग गई और चर्च से भी धुआं उठता हुआ दिखाई दिया.
डर्बेंट में चर्च पर हुए हमले में 66 वर्षीय एक ऑर्थोडॉक्स पादरी की मौत हो गई. इससे पहले, एक स्थानीय सरकारी अधिकारी ने दावा किया था कि हमलावरों ने उनका गला काट दिया था. डर्बेंट में पुलिस अधिकारियों पर हमला वीडियो में कैद हो गया और सोशल मीडिया पर साझा किया गया. क्लिप में तेज़ गोलियों की आवाज़ सुनी जा सकती है, जिसमें कई पुलिस कारें सड़क पर खड़ी देखी जा सकती हैं. अधिकारी हमलावरों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सेंट्रल डर्बेंट में अभी भी गोलियों की आवाज़ सुनी जा सकती है. स्थानीय अधिकारी कथित तौर पर अभी भी ऑर्थोडॉक्स चर्च के पास हमलावरों के खिलाफ लड़ाई में लगे हुए हैं.
रूसी समाचार एजेंसियों के अनुसार देश के आंतरिक मामलों के मंत्रालय ने बताया कि दो हमलावरों को गोली मार दी गई है. डर्बेंट में हमलावरों को पहले एक कार में भागते हुए देखा गया था. दागिस्तान के प्रमुख सर्गेई मेलिकोव ने कहा, ‘रविवार रात डर्बेंट और माखचकाला में अज्ञात लोगों ने सार्वजनिक स्थिति को अस्थिर करने का प्रयास किया. दागिस्तान के पुलिस अधिकारी उनके रास्ते में खड़े थे. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनमें से कुछ हताहत हुए हैं. सभी सेवाएं निर्देशों के अनुसार काम कर रही हैं… हमलावरों की पहचान की जा रही है.’
सूत्रों ने बताया कि दागिस्तान हाल के वर्षों में हिंसा कम हो गई थी. इस क्षेत्र में कभी भी उस तरह का संघर्ष नहीं हुआ जैसा कि पड़ोसी रूसी गणराज्य चेचन्या में हुआ, जहां रूसी सेना और अलगाववादियों ने एक ही समय दो क्रूर युद्ध लड़े थे. बताया जा रहा है कि यह हमला धर्म की आड़
]]>भारत और रूस की दोस्ती को लेकर चाहे जो भी आशंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं, लेकिन चीन के पास भारत-रूस के गहरे संबंधों को स्वीकार करने के सिवाय ज्यादा विकल्प नहीं है। चीन या तो रूस को खो सकता है या फिर भारत को पश्चिमी खेमे में जाने का जोखिम उठा सकता है जो उसके लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है। असल बात तो यह है कि चीन खुद भारत और रूस की दोस्ती से घबराया रहता है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक लेख में चीन और रूस मामलों की जानकारी अंतरा घोसाल सिंह ने बीते कुछ सालों के दौरान हुई कुछ घटनाओं से इसे समझाया है।
जब रूस ने भारत के लिए किया चीन को दरकिनार
ताजा मामला पिछले साल जून का है जब भारत ने जी-20 सदस्य देशों को पर्यटन शिखर सम्मेलन कश्मीर में आयोजित करने का फैसला किया। चीन और कुछ अन्य देशों ने कश्मीर में होने वाली इस बैठक का बहिष्कार किया तो रूस ने इसे नजरअंदाज करते हुए अपना एक उच्च प्रोफाइल प्रतिनिधिमंडल इसमें भेजा। इस घटनाक्रम को चीन में बहुत प्रमुखता से लिया गया था। 2023 में ही अगस्त के दौरान जब भारत और चीन ने कमांडर स्तरीय वार्ता का अपना नया दौर शुरू किया तो रिपोर्ट सामने आई कि रूस समय पर भारत को एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली सौंप देगा। इसे लेकर चीन में सार्वजनिक रूप से विरोध देखा गया। सोशल मीडिया फैसले पर चीन-रूस की मित्रता पर सवाल उठाए जाने लगे।
भारत और चीन के बीच किसका साथ देगा रूस?
चीनी मीडिया के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि रूस-भारत के मजबूत संबंधों को लेकर चीन में गहरी नाराजगी है। सोशल मीडिया पर ऑनलाइन प्रतिक्रिया में अक्सर रूस को निशाने पर लिया जाता है कि वह भारत को सैन्य सहायता देकर चीन की पीठ में छुरा घोंप रहा है। रूस द्वारा भारत को चौथी पीढ़ी के टैंक की पेशकश हो या फिर शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत को शामिल करना, चीन में रूस के इरादों पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। कुछ चीनी पर्यवेक्षक तो भी सवाल उठाते हैं कि भारत और चीन के बीच बड़े युद्ध की स्थिति में रूस किसका पक्ष लेगा?
चीन का भारत को लेकर सबसे बड़ा डर
चीन के रणनीतिक समुदाय में एक वर्ग अनिच्छा से स्वीकार करता है कि चीन-रूस और भारत के त्रिकोण में रूस-भारत का संबंध कुछ हद तक भारी हो सकता है। रूस और चीन के बीच बढ़े संबंधों के पीछे अमेरिका और पश्चिम की चुनौतियां वजह हैं, जबकि भारत और रूस के संबंधों में कोई सीमा नहीं है, कोई नफरत नहीं है, कोई शिकायत नहीं है। ये एक दूसरे के लिए स्वाभाविक सहयोगी हैं। चीन समझता है कि अगर बीजिंग के हस्तक्षेप रूस-भारत संबंध वास्तव में खराब होते हैं, तो वह अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों से और अधिक हथियार खरीदेगा। चीन के लिए इससे ज्यादा हानिकारक और क्या हो सकता है?
आखिरकार चीन अपने दो सबसे बड़े विरोधियों भारत और अमेरिका को एक साथ नहीं देखना चाहेगा। चीन को पता है कि अकेले अमेरिका उसके लिए उतना बड़ा खतरा नहीं है, जितना वह भारत के साथ आने पर बनेगा। चीन ये भी जानता है कि इस समय रूस से संबंध वह कारक है, जो भारत-अमेरिकी संबंधों में कुछ हद तक बाधा बनता है।
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