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क्या है PCC1 कंपाउंड?
PCC1 यानी Procyanidin C1 एक पॉलीफेनोल कंपाउंड है, जिसे वैज्ञानिक senolytic compound कहते हैं। इसका काम शरीर में जमा Senescent cells को हटाना है—यानी वे कोशिकाएं जो बूढ़ी हो चुकी हैं और शरीर के लिए सिर्फ जंक बन जाती हैं। यही कोशिकाएं उम्र बढ़ने, सूजन, कमजोरी और कई आयु-संबंधी बीमारियों की बड़ी वजह होती हैं। PCC1 शरीर की ‘जंक सेल्स’ को साफ करके नई कोशिकाओं को बेहतर काम करने में मदद करता है।
अब तक की रिसर्च क्या कहती है?
Lonvi Biosciences ने PCC1 दवा को अभी इंसानों पर टेस्ट नहीं किया है, लेकिन चूहों पर किए गए प्रयोगों में इसके उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले हैं। रिसर्च में पाया गया कि इस कंपाउंड के इस्तेमाल से चूहों में बूढ़ी और बेकार कोशिकाओं की संख्या कम हुई, जिससे शरीर में होने वाली लगातार सूजन में भी कमी आई। इसके साथ ही उनका मेटाबॉलिज्म बेहतर हुआ और एजिंग प्रोसेस की रफ्तार धीमी पाई गई। दिलचस्प बात यह रही कि जिन चूहों को PCC1 दिया गया, उनकी मांसपेशियों की ताकत उम्र बढ़ने के बाद भी बनी रही, यानी उम्र बढ़ने के बावजूद कमजोरी कम दिखी। कुछ प्रयोगों में तो चूहों की आयु 30% से अधिक बढ़ने के संकेत मिले—जो वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण खोज है।
क्या इंसानों पर भी असर होगा?
फिलहाल ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है कि PCC1 इंसानों पर भी वैसा ही असर दिखाएगा जैसा चूहों पर देखा गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जानवरों पर मिले परिणाम इंसानों में बिल्कुल वैसे दोहराए जाएं, यह ज़रूरी नहीं है, क्योंकि मानव शरीर कहीं ज्यादा जटिल होता है। इसके अलावा, दवा मानव शरीर में सुरक्षित होगी या नहीं, कितनी प्रभावी होगी, क्या साइड इफेक्ट होंगे। इन सभी सवालों के जवाब के लिए लंबे क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत पड़ती है। इसलिए यह कहना कि इंसान 150 साल तक जी सकेंगे, अभी सिर्फ थ्योरी और लैब-लेवल का उत्साह है।
क्यों लग सकता है इस दवा को अभी कई साल?
इस दवा के बाजार में आने में अभी कई साल इसलिए लग सकते हैं क्योंकि इसके सामने कई बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी चुनौतियां हैं। सबसे पहले, इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल बेहद लंबे, महंगे और जटिल होते हैं, जिसमें किसी भी दवा की सुरक्षा और उसके प्रभाव को साबित करने में वर्षों लग जाते हैं। इसके बाद दवा को मंजूरी दिलाने के लिए FDA और WHO जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की कठोर प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जो अपने आप में काफी समय लेने वाला चरण है।
इसके अलावा वैज्ञानिक बताते हैं कि उम्र बढ़ना एक अकेला कारण नहीं, बल्कि हजारों जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम है। इसलिए सिर्फ जंक सेल्स हटाने से बुढ़ापा पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। साथ ही, PCC1 के लंबे समय तक इस्तेमाल से होने वाले साइड इफेक्ट्स के बारे में भी कोई डेटा मौजूद नहीं है, जिसे समझने और टेस्ट करने में बहुत समय लगेगा।
PCC1 क्यों है चर्चा में?
इसके बावजूद PCC1 चर्चा में इसलिए है क्योंकि यह उन शुरुआती दवाओं में से एक है जिसका सीधा लक्ष्य शरीर से बूढ़ी और खराब कोशिकाओं को हटाना है।यानी उम्र बढ़ने की जड़ पर काम करना। यह न सिर्फ इन जंक कोशिकाओं को कम करती है बल्कि शरीर की नई कोशिकाओं के कामकाज को भी बेहतर बनाती है, जिससे एजिंग प्रोसेस पर सकारात्मक असर देखने की उम्मीद बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यह कंपाउंड इंसानों में भी असर दिखाता है, तो यह Future of Longevity Science यानी लंबी उम्र की विज्ञान यात्रा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।
चीन का बड़ा प्लान
चीन एंटी-एजिंग और Life-Extension Technology में भारी निवेश कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वहां “Immortality Islands” जैसे बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं,
जहां- बायोटेक, जेनेटिक इंजीनियरिंग, एंटी-एजिंग रिसर्च और लंबी उम्र की दवाएं सब पर तेज़ी से काम हो रहा है। PCC1 उसी बड़े “Longevity Mission” का हिस्सा है।
क्या 150 साल जीना संभव होगा?
वर्तमान वैज्ञानिक स्थिति में 150 साल तक जी पाना संभव नहीं है। अभी तक कोई भी दवा या तकनीक इंसानों की उम्र को इतनी बड़ी मात्रा में बढ़ाने में सफल नहीं हुई है। लेकिन भविष्य में क्या हो सकता है: अगर PCC1 जैसे कंपाउंड इंसानों पर भी उतना ही प्रभाव दिखाते हैं जितना चूहों पर दिखा है, तो एंटी-एजिंग दवाओं का एक नया दौर शुरू हो सकता है। इससे उम्र बढ़ने की रफ्तार कम करना या जीवनकाल कुछ हद तक बढ़ाना संभव हो सकता है। फिलहाल यह रिसर्च उत्साह और उम्मीद तो जगाती है, लेकिन हकीकत बनने में अभी समय है।
]]>मंगल ग्रह पर इंसानों को बसाने की योजना पर काम शुरू हो गया है। अगर सब कुछ सही रहा तो अगले सात साल यानी 2030 तक वहां पर इंसानों को भेजा जाएगा। मंगल ग्रह पर इंसान कैसे रह पाएंगे, इसी को लेकर एक ट्रायल किया गया था। इसके लिए नासा ने चार लोगों को चुना था, जिसमें कनाडाई जीवविज्ञानी केली हेस्टन भी शामिल थीं। अब एक साल बाद नासा के अंतरिक्ष यात्री एक अनोखा अनुभव करके वापस आ चुके हैं।
नासा के एक अंतरिक्ष यात्री ने एक दरवाजे के पीछे से तीन बार जोर से पूछा कि क्या आप बाहर आने के लिए तैयार हैं? उनका उत्तर तब साफ सुनाई देता है, जब दरवाजा खुलता है। दरअसल, नासा के चार वैज्ञानिक एक साल तक इंसानी संपर्क से दूर रहकर वापस लौट आए हैं। उनके आते ही तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूंज उठता है।
मंगल ग्रह जैसा घर
बता दें, नासा मंगल ग्रह पर मानव अन्वेषण की तैयारी कर रहा है। इसी के लिए एक खास कमरा बनाया गया था। ह्यूस्टन के जॉनसन स्पेस सेंटर में एक घर तैयार किया गया था। इसमें चार लोगों के रहने की व्यवस्था है। इस घर को मंगल ग्रह के हालात जैसा बनाया गया था। एंका सेलारियू, रॉस ब्रॉकवेल, नाथन जोन्स और टीम लीडर केली हेस्टन ने इस घर में करीब 378 दिन बिताए। इस दौरान इन लोगों ने सब्जियां उगाईं। वहीं मार्सवॉक भी किया। इस एक साल में सबसे ज्यादा इन लोगों के लिए कठिन था अपने परिवार से इतने दिन दूर रहना। यह एक तरह से ऐसा अनुभव था, जब महामारी के तरह लॉकडाउन लगा था।
बिखरे बाल और फिर…
चारों लोग जब शनिवार को इस घर से बाहर निकले तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। उनके बाल थोड़े अधिक बिखरे हुए थे। मगर उनकी खुशी साफ देखी जा सकती थी। केली हेस्टन ने हंसते हुए कहा, 'हेलो, आप लोगों से फिर हेलो करना वाकई शानदार है।' वहीं, डॉक्टर जोन्स ने कहा, 'मैं आशा करता हूं कि आप सभी के सामने यहां खड़े होकर रोऊंगा नहीं।' उन्होंने भीड़ में अपनी पत्नी को देखा और वैसे ही उनको रोना आ गया। क्रू हेल्थ एंड परफॉर्मेंस एक्सप्लोरेशन एनालॉग (CHAPEA) का मार्स ड्यून अल्फा ह्यूस्टन एक 3डी प्रिंटेड 1,700 वर्ग फुट का कक्ष है। इसका उद्देश्य मंगल ग्रह की सतह पर उनके आवास का अनुकरण करना है।इसमें चार बेडरूम हैं। इसके अलावा जिम, किचन, रिसर्च सेंटर बनाया गया है। इस घर को एयरलॉक द्वारा अलग किया गया। यहां पर चारों ने मार्स वॉक की भी प्रैक्टिस की। नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर के उप निदेशक स्टीव कोर्नर ने लोगों से कहा, 'हम लोगों को मंगल ग्रह पर भेजने की तैयारी कर रहे हैं।'