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हिंद महासागर में अमेरिकी हमले का शिकार बने ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. श्रीलंका ने इस हमले में मारे गए 84 ईरानी नाविकों के शव स्वदेश वापस भेज दिए हैं. ये शव श्रीलंका के दक्षिणी तट पर गाले के पास युद्धपोत डूबने के बाद बरामद किए गए थे. बताया गया है कि ये शव शुक्रवार को तुर्किये की एक निजी एयरलाइन के विमान से ईरान रवाना किए गए. यह ईरानी पोत भारत के विशाखापत्तनम से ईरान लौट रहा था, जहां उसने इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में हिस्सा लिया था.
अमेरिका ने डुबो दिया था जहाज
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 मार्च को श्रीलंका के गाले तट के पास हिंद महासागर में इस युद्धपोत पर अमेरिकी टॉरपीडो हमला हुआ, जिसके बाद यह डूब गया. हमले के बाद 84 नाविकों के शव बरामद किए गए थे, जबकि 32 लोग जिंदा बच गए, जिनका इलाज श्रीलंका के अस्पताल में किया गया. श्रीलंका के मुख्य मजिस्ट्रेट ने 11 मार्च को करापितिया नेशनल हॉस्पिटल के निदेशक को आदेश दिया था कि वे इन शवों को ईरान के दूतावास को सौंप दें. इससे पहले श्रीलंका सरकार ने कहा था कि हालात सामान्य होने तक शवों को वहीं रखा जाएगा, ताकि उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस भेजा जा सके. हमले में बचे 32 नाविकों को रविवार को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई थी.
ईरान ने शहीदों के बदले की खाई कसम
इस बीच, ईरान ने इस हमले को लेकर कड़ा रुख दिखाया है. न्यूज एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी सेना के कमांडर इन चीफ अमीर हातमी ने कहा है कि ईरान अपने युद्धपोत पर हुए हमले का जवाब जरूर देगा. उन्होंने कहा कि डेना जहाज और उसके जवानों की कुर्बानी ईरानी नौसेना के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी और देश अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए नौसेना को और मजबूत बनाएगा. ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA के मुताबिक, यह जहाज किसी युद्ध में शामिल नहीं था और सैन्य अभ्यास पूरा करके वापस लौट रहा था, तभी उस पर हमला हुआ. ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे ‘समुद्र में की गई बर्बरता’ बताया.
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इन निवेशों का विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली जैसे राज्यों तक है। मेट्रो रेल, सुरंग निर्माण, और एयरपोर्ट सेवाओं से लेकर शिक्षा, मीडिया और सांस्कृतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में कई समझौते और साझेदारियां की गई थीं। उदाहरण के तौर पर, 2020 में अटल टनल के इलेक्ट्रोमैकेनिकल हिस्से का कार्य एक तुर्की कंपनी को सौंपा गया था, जबकि 2024 में रेलवे विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने मेट्रो परियोजना के लिए एक तुर्की कंपनी के साथ समझौता किया।
तुर्की के ऑपरेटरों ने की पाकिस्तान की मदद
लेकिन 'ऑपरेशन सिंदूर' और उसके बाद की घटनाओं ने भारत सरकार को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। तुर्की ने न केवल पाकिस्तान को सैन्य ड्रोन उपलब्ध कराए, बल्कि यह भी सामने आया कि तुर्की के ऑपरेटरों ने पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाइयों में सहायता की। यह प्रमुख वजह है कि अब सभी तुर्की कंपनियों से जुड़े प्रोजेक्ट्स की गहन समीक्षा की जा रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "सरकार सभी तुर्की परियोजनाओं और समझौतों को फिर से जांच रही है, भले ही वे समाप्त हो चुके हों। हर सौदे और परियोजना का पूरा डेटा इकट्ठा किया जा रहा है।"
सरकार के इस कदम के पीछे एक बड़ा कारण तुर्की का लगातार कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करना और पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती नजदीकियां हैं। भले ही अब तक किसी भी परियोजना को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया गया है, लेकिन संकेत साफ हैं- भारत अपनी विदेश नीति में 'जरूरी बदलाव' की ओर बढ़ रहा है। वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने बताया, "कुछ दीर्घकालिक समझौते तत्काल प्रभाव से प्रभावित नहीं हो सकते, लेकिन ताजा परिस्थितियां और तुर्की का रवैया भविष्य के निवेश और साझेदारियों को प्रभावित कर सकता है।"
कई परियोजनाओं में तुर्की की कंपनियां भागीदार
भारत में तुर्की की मौजूदगी को केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। लखनऊ, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो परियोजनाओं में तुर्की की कंपनियां भागीदार हैं। गुजरात में एक संयुक्त उद्यम के तहत मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी स्थापित की गई है। इसके अलावा, एक प्रमुख तुर्की विमानन कंपनी भारतीय हवाई अड्डों पर सेवाएं प्रदान कर रही है।
तुर्की की कंपनी सलेबी एविएशन भारत के आठ प्रमुख हवाई अड्डों पर कार्गो हैंडलिंग जैसे हाई-सिक्योरिटी कार्यों में शामिल है। इनमें हवाई अड्डों में दिल्ली, मुंबई और चेन्नई शामिल हैं। इस लिहाज से पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में तुर्की ऑपरेटरों के शामिल होने के खुलासे ने भारत में सुरक्षा चिंताएं बढ़ी दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन संवेदनशील क्षेत्रों में तुर्की की भागीदारी को देखते हुए, भारत सरकार इन सौदों की गहन जांच कर सकती है ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
कम शोर, सख्त संदेश
2017 में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच मीडिया, शिक्षा और कूटनीतिक प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग के लिए कई समझौते हुए थे। लेकिन आठ साल बाद अब ये समझौते कागजों पर ही सिमटते नजर आ रहे हैं। सरकार की मौजूदा रणनीति कम शोर, सख्त संदेश वाली प्रतीत हो रही है। फिलहाल किसी परियोजना को आधिकारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया है, लेकिन अंदरखाने एक ठोस बदलाव की तैयारी चल रही है। भारत अब अपने रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखते हुए ऐसे व्यापारिक रिश्तों पर पुनर्विचार कर रहा है जो देश की विदेश नीति और सुरक्षा नीतियों से मेल नहीं खाते।
तुर्की का हर मोर्चे पर बहिष्कार जारी
अखिल भारतीय सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने फिल्म शूटिंग और सांस्कृतिक सहयोग के लिए तुर्की का "पूर्ण बहिष्कार" करने की घोषणा की है। AICWA ने X पर कहा, "तुर्की में तत्काल प्रभाव से कोई भी बॉलीवुड या भारतीय फिल्म प्रोजेक्ट शूट नहीं किया जाएगा। किसी भी भारतीय निर्माता, प्रोडक्शन हाउस, निर्देशक या फाइनेंसर को तुर्की में कोई भी फिल्म, टेलीविजन या डिजिटल कंटेंट प्रोजेक्ट ले जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।"
तुर्की का बयान ऐसे समय में आया है, जब इजरायल ने सीरिया में अपने हमले तेज कर दिए हैं। इजरायली अधिकारियों ने तुर्की को सीरिया से दूर रहने को कहा है। इजरायल ने तुर्की पर सीरिया को अंकारा संरक्षित क्षेत्र में बदलने की कोशिश का आरोप लगाया है। इजरायली वायु सेना ने सीरिया में हवाई ठिकानों पर हमले किए थे, जिन्हें मध्य सीरिया का हवाई क्षेत्र भी शामिल है। तुर्की की नजर इस हवाई अड्डे पर थी।
इजरायली हमलों ने बढ़ाई तुर्की की मुश्किल
इजरायली हमलों से अंकारा के लिए सैनिकों, हवाई सुरक्षा और अन्य उपकरणों को सीरिया में पहुंचाना और सामान्य रूप से सुविधाओं को संचालित करना कठिन हो जाएगा। रिपोर्ट बताती हैं कि सीरिया के टी4 हवाई क्षेत्र में सेट अप स्थापित कर रहा है। यह इजरायली हवाई संचालन के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
आईडीएफ ने टेलीग्राम पर बताया कि पिछले कुछ घंटों में इसने सीरियाई ठिकानों हमा और टी4 पर बची हुई सैन्य क्षमता के साथ ही दमिश्क में सैन्य संरचना स्थलों पर हमला किया। आईडीएफ इजरायली नागरिकों के लिए किसी भी खतरे को दूर करने का काम जारी रखेगा।
एस-400 की तैनाती की योजना
यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की का इरादा T4 बेस को ड्रोन सुविधा में बदलने का है। मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के अनुसार, सीरिया में पुनर्निर्माण प्रयासों के दौरान 'हवाई क्षेत्र को सुरक्षित के लिए टी4 या पाल्मेरा में एस-400 वायु रक्षा प्रणालियों की अस्थायी तैनाती पर विचार हो रहा है।' हालांकि, इस पर अंतिम फैसला नहीं लिया गया है और तुर्की को इसके लिए रूस से मंजूरी लेनी होगी।
]]>तुर्किए (तुर्की) दुनिया का सबसे बड़ा हमलावर ड्रोन सप्लायर बन चुका है. उसने इस मामले में अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ दिया है. अगर दुनिया में 100 ड्रोन बिक रहे हैं, तो उसमें से 65 अकेले तुर्की बेंच रहा है. यह खुलासा किया है सेंटर फॉर न्यू अमेरिका सिक्योरिटी (CNAS) ने. आइए जानते हैं कितने का हो रहा है इंटरनेशनल डिफेंस डील?
पिछले तीन दशक में तुर्की हमलावर ड्रोन यानी यूसीएवी (Unmanned Combat Aerial Vehicle) को बेंचन वाला बेताज बादशाह बन चुका है. मार्केट पर इसका सबसे ज्यादा कब्जा है. 1995 से 2023 के बीच तुर्की ने अपनी ड्रोन तकनीक, बिक्री में काफी ज्यादा बढ़ोतरी की है. इसमें आत्मघाती ड्रोन्स यानी कामीकेज भी शामिल हैं.
असल में इस रिपोर्ट को लिखने वाले लोग यानी स्टेशी पेटीजॉन, हन्नाह डेनिस और मोली कैंपबेल ने जून में ही एक लेख लिखा था. जिसमें तुर्की के बढ़ते ड्रोन व्यापार का पूरी डिटेल थी. इसमें अमेरिका और चीन उससे काफी ज्यादा पीछे हो चुके थे. ड्रोन ट्रांसफर यानी प्रोलीफिरेशन को लेकर तुर्की के पास कई आसान नियम हैं. इसलिए लोग उसके पास जा रहे हैं.
कभी इजरायल और अमेरिका का जलवा होता था
एक समय था जब ड्रोन के मार्केट में इजरायल और अमेरिका का करिश्मा था. लेकिन उसे अब चीन, तुर्की और ईरान ने तोड़ दिया है. ये तीनों देश सस्ते दामों में मिलिट्री ड्रोन्स प्रदान कर रहे हैं. जिसकी वजह से अलग-अलग देश और सरकारें इन्हें खरीद रही हैं. तुर्की का जलवा उसके बेरक्तार टीबी2 ड्रोन्स (Bayraktar TB2) ने बनाया.
इनका इस्तेमाल लीबिया, नागोरनो-काराबख और यूक्रेन में हमले के दौरान सफलतापूर्वक किया गया. 2022 में छह देशों ने तुर्की से बेरक्तार मिलिट्री ड्रोन्स खरीदे. चीन की ड्रोन बिक्री 2014 में थी. लेकिन 2021 आते-आते तुर्की ने चीन को पीछे छोड़ दिया. वजह है सस्ते ड्रोन्स, जल्दी डिलिवरी और जंग के मैदान में तगड़ी मारक क्षमता.
स्थानीय इलाकों में ड्रोन का ट्रांसफर हुआ आसान
1995 से 2023 तक 633 ड्रोन ट्रांसफर हुए हैं. 40 फीसदी ड्रोन यूरोप गए. मिडिल ईस्ट में भी ड्रोन गतिविधियां बढ़ी हैं. यहां पर 134 ड्रोन ट्रांसफर हुए हैं. इसके बाद अफ्रीका में भी ड्रोन्स गए हैं. साल 2020 के बाद हर साल दो ड्रोन ट्रांसफर हो रहे हैं. पूरी दुनिया में हमलावर ड्रोन्स की जितनी भी बिक्री होती है, उसका 65 फीसदी हिस्सा तुर्की बेंच रहा है. चीन 26 फीसदी और अमेरिका के हिस्से में ये कारोबार सिर्फ 8 फीसदी ही बचा है.
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