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मध्य प्रदेश में इस बार गिद्धों की संख्या 14 हजार के पार पहुंच गई है। वन विभाग द्वारा तीन दिन तक किए गए सर्वे में यह आंकड़े सामने आए हैं। अंतिम रिपोर्ट जारी होने के बाद संख्या में और बढ़ोतरी संभव है। पिछली गणना में प्रदेश में 12,981 गिद्ध दर्ज किए गए थे। पन्ना क्षेत्र में लाल सिर वाले गिद्ध और भोपाल स्थित वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्ध पाए गए हैं। पिछले 10 वर्षों में प्रदेश में गिद्धों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है।
मध्य प्रदेश पहले से ‘चीता, टाइगर और तेंदुआ स्टेट’ के रूप में पहचाना जाता है। अब गिद्धों की बढ़ती संख्या ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में राज्य की उपलब्धि को और मजबूत किया है। 20 से 22 फरवरी के बीच हुए सर्वे में करीब 7 प्रजातियों की पहचान हुई है। इनमें भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध (व्हाइट स्कैवेंजर) और हिमालयन ग्रिफॉन प्रमुख हैं। 23 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र में लुप्तप्राय प्रजाति के 5 गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा था। इन पक्षियों पर अत्याधुनिक जीपीएस ट्रैकर लगाए गए हैं, जिससे वन विभाग उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रख रहा है।
2016 से लगातार बढ़ रहे आंकड़े
प्रदेश में गिद्धों की गणना वर्ष 2016 से शुरू हुई थी। तब 7,028 गिद्ध दर्ज किए गए थे। इसके बाद संख्या लगातार बढ़ती रही—
2019: 8,397
2021: 9,446
2024: 10,845
2025: 12,981
अब 2026 में यह आंकड़ा 14 हजार से अधिक पहुंचने की संभावना है।
प्रदेश में कुल 7 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें 4 स्थानीय और 3 प्रवासी हैं। शीत ऋतु के अंतिम चरण में गणना करना सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस समय स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रजातियां एक साथ मिल जाती हैं।
इंदौर और भोपाल में भी इजाफा
इंदौर वन मंडल में पिछली बार 86 गिद्ध गिने गए थे, जो इस बार बढ़कर 156 हो गए हैं। वहीं, Van Vihar National Park के गिद्ध संरक्षण केंद्र में सफेद पीठ वाले गिद्धों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है।
कभी विलुप्ति की कगार पर थे
विशेषज्ञों के अनुसार, गिद्ध स्वभाव से संवेदनशील और कम प्रजनन दर वाले पक्षी होते हैं। एक समय प्रदेश समेत देशभर में इनकी संख्या तेजी से घट रही थी और ये विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए थे। लेकिन संरक्षण प्रयासों के चलते अब स्थिति में सुधार हो रहा है।
प्रदेश में ऐसे बढ़ी गिद्धों की संख्या जानकारी के अनुसार, प्रदेश में गिद्धों की गणना की शुरुआत वर्ष 2016 से की गई थी। प्रदेश में गिद्धों की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें से 4 प्रजातियां स्थानीय एवं 3 प्रजाति प्रवासी हैं। गिद्धों की गणना करने के लिए शीत ऋतु का अंतिम समय सही रहता है। इस दौरान स्थानीय एवं प्रवासी गिद्धों की गणना आसानी से हो जाती है। वर्ष 2019 की गणना में गिद्धों की संख्या 8 हजार 397, वर्ष 2021 में 9 हजार 446, वर्ष 2024 में 10 हजार 845 और 2025 में 12 हजार 981 हो गई थी। इस बार हुई गणना में यह संख्या 14 हजार से ज्यादा पहुंच सकती है।
इंदौर में भी बढ़ी संख्या इंदौर वन मंडल में पिछली बार 86 गिद्ध मिले थे, जो इस बार 156 काउंट किए गए हैं। वन विहार के गिद्ध संरक्षण केंद्र में सफेद पीठ वाले गिद्धों की संख्या में इजाफा हुआ है।
कभी विलुप्त होने की कगार पर थे गिद्ध एक्सपर्ट के मुताबिक, गिद्ध जल्दी अपना साथी या मैटिंग पेयर नहीं बनाते हैं। यह पक्षी असल में नर्वस किस्म का जीव है। इस मामले में शर्मिला कहा जा सकता है। गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। मप्र सहित देशभर में 'धरती के सफाई दूत' की संख्या बुरी तरह घटती जा रही थी, लेकिन अब प्रदेश में इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
वन विहार में 3 साल पहले हरियाणा से लाए गए थे गिद्ध भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे। 1100 किलोमीटर की यात्रा करके यह भोपाल पहुंचे थे। वर्तमान में यह गिद्ध संरक्षण एवं संवर्धन केंद्र की एवरी में है। 20 व्हाइट रम वल्चर (सफेद पीठ वाले गिद्ध) में 5 नर और 5 मादा, 10 सब एडल्ट गिद्ध थे।
अंडे से जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% गिद्ध साल में एक ही बार अंडे देते हैं। साइज में यह मुर्गी के अंडे से तीन गुना बड़े होते हैं। मई-जून से अक्टूबर के दौरान मैटिंग सीजन और अंडे देने का समय होता है। अंडे से बच्चे जीवित निकलने का सक्सेस रेट 50% माना जाता है। यही वजह है कि आधे अंडे विकसित नहीं होते हैं। अंडे से 55 दिन में बच्चा निकलता है। चार महीने बच्चा घोंसले में रहता है। फिर वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता है।
संरक्षण प्रयासों का असर
भोपाल के केरवा डैम में 2014 में गिद्ध प्रजनन केंद्र की स्थापना के साथ संरक्षण अभियान शुरू हुआ। मार्च 2017 में यहां सफेद पीठ वाले गिद्ध का पहला सफल प्रजनन दर्ज किया गया। इसके अलावा पन्ना, रायसेन (हलाली डैम), शिवपुरी और गांधीसागर अभयारण्य (मंदसौर) में भी विशेष संरक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। वन विभाग गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने से पहले उन पर जीपीएस ट्रैकर लगाता है, ताकि उनकी सुरक्षा और गतिविधियों की निरंतर निगरानी की जा सके। प्रदेश में गिद्धों की बढ़ती संख्या वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
2014 में शुरू हुए थे संरक्षण के प्रयास
भोपाल के केरवा डैम में गिद्ध प्रजनन केंद्र की स्थापना के साथ वर्ष 2014 में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास शुरू हुए थे। मार्च 2017 में यहां पहले सफल प्रजनन के रूप में सफेद पीठ वाले गिद्ध का चूजा पैदा हुआ था। यहां सफेद पीठ वाले (Oriental White-backed) और लंबी चोंच वाले (Long-billed) गिद्धों का प्रजनन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, गिद्धों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास के लिए पन्ना (पवई), रायसेन (हलाली डैम), शिवपुरी और गांधीसागर अभयारण्य (मंदसौर) में भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
2016 में पहली बार हुई थी गणना
मध्य प्रदेश में 2016 में पहली बार गिद्धों की गणना हुई थी। तब 7028 गिद्ध गिने गए थे। इसके बाद से लगातार गिनती की जा रही है। गिद्धों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़े जाने से पहले GPS ट्रैकर लगाए जाते हैं ताकि उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके।
]]>मध्य प्रदेश वन विभाग के निर्देशानुसार वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में 20 से 22 फरवरी 2026 तक गिद्धों की त्रिदिवसीय गणना सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य टाइगर रिजर्व क्षेत्र में गिद्धों की वास्तविक संख्या, उनकी प्रजातियों और आवास की स्थिति का आकलन करना था।
वन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 20 फरवरी को 951, 21 फरवरी को 741 तथा 22 फरवरी को 844 गिद्ध दर्ज किए गए। तीन दिनों के दौरान अलग-अलग स्थलों पर की गई इस गणना में गिद्धों की उल्लेखनीय उपस्थिति सामने आई, जो क्षेत्र में अनुकूल पर्यावरण और संरक्षण प्रयासों की सकारात्मक स्थिति को दर्शाती है।
वर्ष 2026 के सर्वेक्षण में कुल सात प्रजातियों की पहचान की गई। इनमें सबसे अधिक संख्या भारतीय गिद्ध (लॉन्ग-बिल्ड वल्चर) की पाई गई, जबकि व्हाइट रंप्ड गिद्ध भी बड़ी संख्या में दर्ज किए गए। इजिप्शियन गिद्ध की संख्या मध्यम स्तर पर रही, वहीं रेड-हेडेड वल्चर अपेक्षाकृत कम संख्या में मिले।
इसके अलावा यूरेशियन ग्रिफॉन, हिमालयन ग्रिफॉन और सिनेरियस गिद्ध जैसी प्रवासी प्रजातियों की उपस्थिति भी दर्ज की गई। इन दुर्लभ एवं प्रवासी प्रजातियों की मौजूदगी टाइगर रिजर्व की समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, गिद्धों की नियमित मॉनिटरिंग और संरक्षण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से उनकी संख्या में स्थिरता और वृद्धि की उम्मीद है। भविष्य में भी इस तरह की वैज्ञानिक गणना जारी रखी जाएगी, ताकि गिद्धों के संरक्षण के लिए ठोस रणनीति बनाई जा सके।
]]>वल्चर स्टेट की उपाधि रखने वाले मध्य प्रदेश में इस बार फिर गिद्धों की गणना का काम शुरु होने वाला है। खास बात ये है कि, इस बार मोबाइल एप की मदद से गिद्धों की गिनती की जाएगी। प्रदेश के शहडोल, अनूपपुर, उमरिया और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के करीब 50 से अधिक अधिकारी – कर्मचारियों को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। ये प्रदेशव्यापी शीतकालीन गिद्ध गणना साल 2025-26 के लिए आयोजित की गई है। इस नई तकनीक से गिद्धों की गणना में पारदर्शिता आएगी और समय की बचत होगी।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के ईको सेंटर ताला में आयोजित इस कार्यशाला में वन वृत्त शहडोल के उत्तर शहडोल, दक्षिण शहडोल, उमरिया, अनूपपुर और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उमरिया के सभी उप वन मण्डलाधिकारी और परिक्षेत्र अधिकारी शामिल हुए। वल्चर कमेटी के सदस्य और मास्टर ट्रेनर दिलशेर खान ने मध्य प्रदेश में पाए जाने वाले गिद्धों की प्रजातियों और उनके रहवास के बारे में जानकारी दी। मोहन नागवानी ने गिद्ध गणना में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल एप्लीकेशन Epicollect5 Data के संचालन का प्रशिक्षण दिया।
20 से 22 फरवरी के बीच होगी गणना
क्षेत्र संचालक बांधवगढ टाईगर रिजर्व, डॉक्टर अनुपम सहाय ने गिद्ध संरक्षण में प्रदेशव्यापी गिद्ध गणना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि, वो मैदानी अमले को भी इस नई तकनीक का प्रशिक्षण दें। मध्य प्रदेश में 20 फरवरी से 22 फरवरी तक मोबाइल एप्लीकेशन का उपयोग करके गिद्धों की गिनती की जाएगी। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय अधिकारियों और वन कर्मचारियों को गणना की नई पद्धतियों से परिचित कराना था।
कर्मचारियों को दी गई विशेष ट्रेनिंग
प्रशिक्षण के दौरान, विशेषज्ञों ने एसडीओ, रेंजर और वन कर्मचारियों को ऐप के संचालन, डेटा अपलोड करने और फोटो के माध्यम से जानकारी दर्ज करने की विस्तृत जानकारी दी। अधिकारियों को बताया गया कि गणना के समय कर्मचारी मौके पर ही गिद्धों की फोटो खींचकर ऐप में जरूरी जानकारी भरेंगे। इससे काम में और भी ज्यादा पारदर्शिता आएगी और समय भी बचेगा।
बांधवगढ़ में चार तरह के गिद्ध
बता दें कि, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में चार तरह के गिद्ध पाए जाते हैं। भारतीय गिद्ध (लॉन्ग बिल्ड वल्चर), सफेद पूंछ वाला गिद्ध (व्हाइट बेक्ड वल्चर), राज गिद्ध (रेड हेडेड वल्चर) और इजिप्शियन वल्चर। इस बार तीन और प्रजातियों के गिद्धों के दिखने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन और सिनेरियस गिद्ध भी इस बार देखे जा सकते हैं।
गिद्धों की प्रकृति में अहम भूमिका
क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय ने बताया कि सभी को ऐप आधारित गणना का प्रशिक्षण मिल चुका है और अब यह पूरा काम डिजिटल तरीके से होगा। उन्होंने यह भी बताया कि गिद्ध हमारे पर्यावरण को साफ रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे मरे हुए जानवरों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं। इस बार गिद्धों की गिनती के लिए 150 कर्मचारी फील्ड में काम करेंगे और लगभग 100 अधिकारी और कर्मचारी उन पर नजर रखेंगे। इस तरह कुल मिलाकर करीब 250 लोग इस गणना कार्य में शामिल होंगे। डिजिटल ऐप के इस्तेमाल से यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाएगी।
]]>इंदौर के आकाश से लगभग गायब हो चुकी इजिप्शियन वल्चर यानी सफेद गिद्धों की प्रजाति एक बार फिर शहर के बाहरी इलाकों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। नेचर एंड वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड अवेयरनेस सोसायटी द्वारा हाल ही में किए गए एक विस्तृत सर्वे में यह सुखद जानकारी सामने आई है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ये दुर्लभ सफेद गिद्ध विशेष रूप से देवगुराड़िया ट्रेंचिंग ग्राउंड और कंपेल के आसपास के क्षेत्रों में उड़ान भरते देखे गए हैं।
सर्वे के आंकड़ों में हुआ सुधार
देवगुराड़िया पहाड़ी का क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से इन गिद्धों का प्राकृतिक वास स्थल रहा है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में इनकी आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। एनजीओ एनडब्ल्यूसीएस द्वारा हर साल दिसंबर और जनवरी के महीनों में गिद्धों की गणना के लिए सर्वे किया जाता है। इस वर्ष के सर्वे में उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। करीब डेढ़ महीने तक चली इस प्रक्रिया के बाद क्षेत्र में 15 सफेद गिद्धों की पहचान की गई है। यदि पिछले साल के आंकड़ों से तुलना करें तो यह संख्या 7 अधिक है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह सुधार अभी शुरुआती है क्योंकि 9 साल पहले इसी क्षेत्र में गिद्धों की संख्या 83 हुआ करती थी।
नगर निगम आयुक्त को सौंपा जाएगा प्रस्ताव
गिद्धों के संरक्षण को लेकर संस्था अब ठोस कदम उठाने की तैयारी में है। एनडब्ल्यूसीएस के अध्यक्ष रवि शर्मा ने जानकारी दी कि वे लंबे समय से इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। संस्था की योजना है कि इंदौर नगर निगम मौजूदा डंपिंग यार्ड के अलावा शहर से लगभग 15 से 20 किलोमीटर दूर एक ऐसा स्थान चिन्हित करे, जहां कचरे की प्रोसेसिंग खुले में की जा सके। इससे गिद्धों को कचरे में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म करने और भोजन प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इस प्रस्ताव को लेकर जल्द ही निगमायुक्त को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।
कचरा प्रबंधन और आबादी का गहरा संबंध
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में गिद्धों की संख्या कम होने का मुख्य कारण खुले क्षेत्रों में कचरा डंपिंग का बंद होना था। चूंकि सफेद गिद्ध कचरे से अपना भोजन खोजने में सक्षम होते हैं, इसलिए भोजन की कमी ने इन्हें पलायन के लिए मजबूर किया। अब पिछले दो वर्षों में भोजन की उपलब्धता में मामूली सुधार होने से इनकी संख्या फिर बढ़ने लगी है। हालांकि, वन्यजीव प्रेमियों ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में कचरे की प्रोसेसिंग पूरी तरह से बंद और कवर्ड प्लांट्स में होने लगी, तो इन गिद्धों के अस्तित्व पर एक बार फिर संकट के बादल मंडरा सकते हैं।
छोड़ने से पहले लगाया गया था ट्रैकर
गिद्ध के शरीर पर जीपीएस ट्रैकर लगाया गया था। इससे पता चला कि वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान होते हुए किर्गिस्तान पहुंच गया है। मध्य प्रदेश सरकार गिद्धों को बचाने के लिए कई काम कर रही है, जिससे इनकी संख्या भी बढ़ रही है।
जनवरी में मिला था घायल
जनवरी महीने में सतना जिले के एक खेत में घायल गिद्ध की सूचना वन विभाग को मिली थी। वन विभाग ने इलाज देने के बाद गिद्ध को बचा लिया। फिर उसे भोपाल के वन विहार के वल्चर कंजर्वेशन सेंटर में भेजा गया। यहां दो महीने तक उसका इलाज और प्रशिक्षण हुआ। 29 मार्च को उसे हलाली डैम क्षेत्र में खुले आकाश में उड़ने के लिए छोड़ दिया गया।
गिद्ध ने बना दिया उड़ने का रिकॉर्ड
इस गिद्ध ने उड़ते ही एक नया रिकॉर्ड बना दिया। यह विदिशा की पहाड़ियों से राजस्थान होते हुए पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ तक पहुंच गया। जीपीएस ट्रैकर से पता चला कि फिलहाल यह गिद्ध किर्गिस्तान में सुरक्षित है। वन्यजीव चिकित्सक डॉ. श्रवण मिश्रा ने बताया कि गिद्ध थोड़ा परेशान था और रास्ता भटक गया था। इलाज के बाद जीपीएस टैगिंग की गई थी। अब उसकी लोकेशन किर्गिस्तान में ट्रैक हो रही है।
वल्चर स्टेट बन रहा मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश को अब 'वल्चर स्टेट' भी कहा जाने लगा है। यहां पन्ना टाइगर रिजर्व से लेकर गांधी सागर तक गिद्धों के लिए अच्छा वातावरण बनाया गया है। केरवा डैम में गिद्ध प्रजनन केंद्र बनाया गया है। यहां से अब तक सैकड़ों गिद्धों को खुले वातावरण में छोड़ा जा चुका है। हाल ही में भोपाल के हलाली जंगल क्षेत्र से छह गिद्धों को छोड़ा गया था। इन पर सौर ऊर्जा से चलने वाले जीपीएस ट्रैकर लगाए गए हैं। इन गिद्धों का जन्म केरवा के गिद्ध संवर्धन और प्रजनन केंद्र में हुआ था।
एमपी में अब कितने गिद्ध हैं
2019 में राज्य में 8397 गिद्ध थे। 2024 में इनकी संख्या बढ़कर 10,845 हो गई है। पन्ना क्षेत्र में सबसे ज्यादा गिद्ध हैं। यहां 900 से ज्यादा गिद्ध पाए गए हैं। राज्य में गिद्धों की सात प्रजातियां देखी गई हैं। इनमें चार स्थानीय और तीन प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं। 16 सर्कल के 64 डिवीजन में जो गिनती हुई, उसके मुताबिक आज की तारीख में प्रदेश में 12,981 गिद्ध हैं।
गिद्ध बचाने के लिए सावधानी जरूरी
गिद्धों को बचाने के लिए सावधानी बरतना भी जरूरी है। जानवरों में इस्तेमाल होने वाली 'डायक्लोफेनाक' दवा गिद्धों के लिए खतरनाक है। इस दवा पर रोक लगा दी गई है लेकिन जहरीले भोजन का खतरा अभी भी बना हुआ है। पर्यावरणविद रशीद नूर ने चेतावनी दी है कि 'गौशालाओं और खुले मैदानों में जहरीले इंजेक्शन लगे मृत जानवर अब भी मौजूद हैं। इनके सेवन से गिद्धों की मौत हो सकती है. इसलिए लगातार निगरानी रखना बहुत जरूरी है।'
धरती के सफाई कर्मी कहलाते हैं गिद्ध
गिद्धों को धरती का सफाई कर्मी कहा जाता है। इनका संरक्षण करना बहुत जरूरी है। इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है। जब गिद्ध उड़ते हैं, तो उनके साथ जीवन का चक्र भी चलता रहता है। सतना से उठी एक छोटी सी उम्मीद आज किर्गिस्तान तक पहुंच गई है। पन्ना के जंगलों में, सतना के खेतों में, हलाली के आसमान में, हर जगह गिद्ध दिखाई दे रहे हैं।
]]>बीजापुर और तेलंगाना सीमा से लगे एक गांव में काम कर रहे ग्रामीणों को अचानक से एक गिद्ध को दिखा। इतने पास गिद्ध को देख उसे देखने लोगों की हुजूम लग गया। वहीं, गिद्ध भी उड़ना छोड़ ग्रामीणों तक पहुंच गया। ग्रामीणों ने गिद्ध को भूखा समझ बकरे का मांस खिलाना शुरू किया तो गिद्ध खाने लगा।
लोगों ने उसका वीडियो भी बनाना शुरू कर दिया। गिद्ध के जाने से पहले ग्रामीणों ने उसके पैर में जीपीएस सिस्टम के साथ ही कैमरा को भी देखा। जिससे कुछ अनहोनी की शंका जाहिर किया गया है।
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