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असम विधानसभा में लंबे साल से चले आ रहे ‘नमाज ब्रेक’ को खत्म किए जाने पर भड़के मुस्लिम विधायक

असम
असम विधानसभा में लंबे साल से चले आ रहे 'नमाज ब्रेक' को खत्म किए जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए AIUDF महासचिव रफीकुल इस्लाम ने बीजेपी पर धार्मिक मामलों के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है। इस्लाम ने कहा कि विधानसभा में 126 विधायकों में से 31 मुसलमान हैं। ऐसे में उन्हें ब्रेक देना कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन बीजेपी धर्म के साथ खिलवाड़ कर रही है।

इस्लाम ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, हमें शुक्रवार को 1 से डेढ़ घंटे का ब्रेक दिया जाता था। इससे पहले भी बीजेपी, एजीपी और जनता दल की सरकार रह चुकी है लेकिन तब किसी को कई समस्या नहीं थी। पिछले सत्र में बीजेपी ने ही नियमों में परिवर्तन कर दिया। तब भी हमने इसका विरोध किया था।

उन्होंने कहा, अगर किसी विधानसभा में 31 विधायक मुसलमान हैं तो इस तरह का अवकाश कोई बड़ी बात नहीं है। लंच के समय वैसे भी दो घंटे का ब्रेक होता है। बिजनस अजवाइजरी कमेटी की बैठक के दौरान ब्रेक को लेकर फैसला किया जाता है। लेकिन बीजेपी को धर्म के साथ खिलवाड़ करना अच्छा लगता है। AIUDF नेता ने कहा कि पिछले शुक्रवार को मुस्लिम विधायक सदन में अनुपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि बीजेपी और आरएसएस मिलकर अपने धर्म को ही सब पर थोपना चाहते हैं।

उन्होंने कहा, यह बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा है कि अपने धर्म को सब पर थोप दिया जाए। शुक्रवार को हम नमाज के लिए चले गए। तब भी कार्यवाही चलती रही और हम महत्वपूर्ण बहस का हिस्सा नहीं बन पाए। हम भी विधानसभा के सदस्य हैं और अहम चर्चाओं में शामिल होना चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नमाज पढ़ना भी जरूरी है। हमें बहस से ही वंचित किया जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। हमने स्पीकर से भी अपनी मांगें की थीं लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी।

AIUDF नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम आने वाले हैं। लेकिन पीएम मोदी पूर्वोत्तर की केवल बात करते हैं, वह कुछ भी करते नहीं हैं। असम के मुख्यमंत्री कई देश गए। अगर विदेश से कोई निवेश हुआ तो हमने विरोध नहीं किया। असम में बहुत ज्यादा उद्योग अब भी नहीं हैं। सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री शुरू हुई है जो कि अच्छा है। लेकिन दूसरी तरफ बहुत सारे उद्योग बंद हो गए। यहां बहुत बेरजोगरी है। आपको बता दें कि 1937 से ही असम विधानसभा में नमाज के लिए दो घंटे की छुट्टी दी जाती थी। हिमंत बिस्वा सरमा ने इस परंपरा को औपनिवेशिक बोझ बताते हुए खत्म कर दिया।

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