मध्यप्रदेश

बहुचर्चित सौरभ शर्मा कांड की जांच पांच महीने बीत जाने के बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई

 ग्वालियर
 मध्य प्रदेश के बहुचर्चित सौरभ शर्मा कांड को पांच माह पूरे हो गए हैं। इन पांच महीनों में सबसे बड़ा सवाल पुलिस हल नहीं कर पाई है कि सोना और कैश किसका था। वह माना तो सौरभ का ही गया है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है।

सौरभ और उसके करीबी पकड़े गए, लेकिन इसे शह देने वाले, जिनकी सूची बड़ी लंबी है, उन लोगों को बचाया गया है। फिर वह चाहे परिवहन विभाग के अफसर हों या अलग-अलग विभाग के वे जिम्मेदार अफसर या कर्मचारी, जिन्होंने आन रिकॉर्ड या ऑफ द रिकॉर्ड सौरभ शर्मा की मदद की।

करोड़ों के हिसाब की डायरी भी सामने आई थी

ग्वालियर के सिरोल थाने में अनुकंपा नियुक्ति के मामले में शपथ पत्र में झूठी जानकारी देने पर सौरभ और उसकी मां पर मामला दर्ज किया गया, लेकिन यह भी दिखावे की कवायद रही। करोड़ों के हिसाब की चेक पोस्टों की डायरी तक सामने आई, लेकिन सब दबा दिया गया। राजनीतिक मैदान से लेकर विभागीय हर मोर्चे पर सौरभ के पकड़े जाने के बाद सख्ती बढ़ी नहीं बल्कि घटती गई।

कैश, सोना और चांदी भी बरामद किया गया था

बता दें कि 19 दिसंबर 2024 को सौरभ शर्मा के भोपाल स्थित निवास पर लोकायुक्त की टीम ने छापा मारा था। इस छापेमारी में कैश, सोना व चांदी बरामद किया गया था। इसी दिन रात में भोपाल के ही मेंडोरी के जंगल में आयकर विभाग की टीम ने 11 करोड़ कैश व 54 किलो सोने से लदी लग्जरी गाड़ी पकड़ी थी।
54 किलो सोना एक साथ मिला था

इसी गाड़ी के पकड़े जाने की खबर के बाद प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश में हड़कंप मच गया था। पहली बार ऐसा मौका था जब 54 किलो सोना एक साथ मिला। इसके बाद सौरभ गायब हो गया। लोकायुक्त और आयकर के साथ इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय की एंट्री हुई और प्रदेश के कई शहरों में छापेमारी भी हुई।

सौरभ के नजदीकी चेतन और शरद से लेकर कई करीबियों पर शिकंजा कसा गया। ईडी ने इस मामले में कुछ समय पहले चालान पेश किया, जिसमें सौरभ सहित उसकी मां, पत्नी व सहयोगियों को मिलाकर कुल 12 को आरोपित बनाया गया है।

इस पूरे सौरभ शर्मा कांड में सबसे खास बात यह है कि सौरभ शर्मा की विभाग में एंट्री से लेकर नौकरी में भ्रष्टाचार कराने में उसका साथ देने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। सौरभ शर्मा की अनुकंपा नियुक्ति में बड़े भाई की नौकरी को छिपाया गया।

इसे सौरभ व उसकी मां उमा शर्मा ने तो छिपाया ही, साथ ही जहां जहां प्रस्ताव चला वह विभाग भी छिपाते गए। तत्कालीन परिवहन आयुक्त शैलेंद्र श्रीवास्तव के समय में सौरभ शर्मा की नियुक्ति हुई थी। फाइल चलती रही और अधिकारी सौरभ की झूठी जानकारी को नजरअंदाज करते गए।

खास बात यह कि दूसरे विभागों में जगह होने के बाद भी सौरभ को 2014 के नए नियमों को दरकिनार कर 2008 के नियमों के आधार पर नियुक्ति दे दी गई। इसके बाद चेकपोस्टों पर सौरभ शर्मा के ठेके लेने से लेकर साथियों की जानकारी सामने आई, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

लोकायुक्त ने दिए हैं साथियों व अफसरों को नोटिस

सौरभ शर्मा कांड में लोकायुक्त की जो जांच चल रही है, उसमें सौरभ के साथ काम करने वाले धनंजय चौबे, हेमंत जाटव, नरेंद्र सिंह भदौरिया और गौरव पाराशर की पूरे परिवहन विभाग में धाक थी। जैसा ये चाहते थे वैसा हो जाता था। इन्हें लोकायुक्त ने नोटिस दिया है। इसके साथ ही दशरथ पटेल सहित अन्य को भी नोटिस जारी किया है।

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