मध्यप्रदेश

राज्यरानी एक्सप्रेस के टाॅयलेट में मिला नवजात, नवजात को ट्रेन से निकाला और उपचार के लिए सागर मेडिकल कॉलेज भेजा

बीना
राज्यरानी एक्सप्रेस के टायलेट में दो दिन का नवजात लाल कपड़े में रोता मिला। सागर के पास जनरल कोच के यात्रियों ने देखा और रेलवे को सूचित किया। यहां बीना जंक्शन पर जीआरपी और आवाज संस्था की महिला सदस्य रेस्क्यू करने तैनात हुईं। जैसे ही ट्रेन आई तो नवजात को ट्रेन से निकाला गया और तत्काल उपचार के लिए सिविल अस्पताल ले गए। जहां शिशुरोग विशेषज्ञ और अन्य सुविधाएं नहीं होने के कारण बच्चे को सागर रेफर कर दिया गया है। प्राथमिक जांच में नवजात स्वस्थ है और दो दिन का प्रतीत हो रहा है। अब नवजात के जैविक माता-पिता का पता लगाया जा रहा है। इस बीच कई लोगों ने अडॉप्शन के लिए भी इच्छा जताई है।
 
ट्रेन के टॉयलेट में रो रहा था बच्चा
जिनके लिए कई लोग मन्नते मांगते हैं वही ईश्वरीय वरदान किस अवस्था में जीवन के आने वाले संघर्षों के लिए कठिन यात्रा में छोड़ दिया गया। छोड़ने वाले निष्ठुरों को सबने जी भरकर कोसा होगा। दमोह से भोपाल जा रही ट्रेन में सवार एक यात्री ने सागर स्टेशन के पास बच्चे को जनरल कोच के टॉयलेट में देखकर हेल्पलाइन नंबर पर तत्काल सूचना दी, लेकिन यह व्यवस्था और नियमों देखते हुए बीना जंक्शन पर रेलवे ने बच्चों को सुरक्षित करना सुनिश्चित किया और रेस्क्यू किया गया। डाक्टरों की जांच में वह पूरी तरह स्वस्थ पाया गया है।

नवजात को सागर रेफर किया गया
लेकिन यहां सिविल अस्पताल में बच्चे की देखरेख के लिए और अन्य गहन जांचों के लिए न तो शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और न ही संसाधन, इसलिए नवजात को सागर रेफर कर दिया गया है। एएसआई सुभाष मिश्रा, जीआरपी बीना ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है और बच्चे की पहचान तथा उसकी मां के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। बीना में जीआरपी और आरपीएफ ने सजगता और संवेदनशीलता दिखाई। साथ ही 'आवाज' संस्था की महिला सदस्य की मदद से नवजात को बाहर निकाला गया था।

शिशु गृह शेल्टर होम में होती है व्यवस्था
ओमकार सिंह सदस्य राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बताया कि बच्चों को कई लोग असुरक्षित छोड़ जाता है जो अमानवीय लगता है। जानकारी के अभाव में जब को बच्चे को नहीं रखने की स्थिति में हो तो वह उसे बाल गृह, बालिका गृह और शिशु गृह शेल्टर होम में बच्चों को छोड़ सकते हैं। वहां बाहर पालना लगा होता है। रात के समय यहां लगी घंटी बजाकर बच्चों को छोड़ा जा सकता है। जहां उनकी परवरिश की जाती है। छोटे बच्चे जल्दी अडॉप्शन में चले जाते हैं।इसके बाद शेल्टर होम वाले बाल कल्याण समिति को सूचित करेंगे, इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के जरिये उनके जैविक माता-पिता से अलग कर देते हैं। रजिस्टर्ड हो जाने के बाद उन्हें अडॉप्शन में दे दिया जाता है। शेल्टर होम्स जो रजिस्टर्ड हैं, उनमें पालना लगाने की प्रथा है। वहीं 6 साल से ऊपर वाले होम्स में जाते हैं। जिला मुख्यालय पर ही यह है लेकिन टोल फ्री नंबर 1098 पर सूचित कर सकते हैं।

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