खेल

ओबैदुल्लाह ख़ान गोल्ड कप की विरासत को बचाने के लिए आगे आए असलम शेर ख़ान, की भावुक अपील

नई दिल्ली
भारतीय हॉकी के स्वर्णिम अतीत में कुछ टूर्नामेंट केवल खेल आयोजन नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक थे। ओबैदुल्लाह ख़ान गोल्ड कप ऐसा ही एक टूर्नामेंट था, जिसकी शुरुआत 1931 में भोपाल के नवाब की पहल पर हुई थी। यह टूर्नामेंट न केवल भारतीय हॉकी का गौरव था, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब का ज़िंदा उदाहरण भी। लेकिन आज, यह गौरवशाली आयोजन खामोशी से इतिहास के अंधेरों में खो गया है। इस चुप्पी को असलम शेर ख़ान जैसे दिग्गज खिलाड़ी ने तोड़ा है। 

ओलंपियन और भारतीय हॉकी के गौरव असलम शेर ख़ान ने एक भावुक अपील करते हुए ओबैदुल्लाह ख़ान गोल्ड कप को पुनर्जीवित करने की मुहिम शुरू की है। उन्होंने कहा, “मैंने भारत के लिए हॉकी के मैदान पर लड़ाई लड़ी है। लेकिन आज मैं एक और ज़्यादा निजी लड़ाई लड़ रहा हूँ — हमारी हॉकी विरासत को बचाने की लड़ाई।”

असलम शेर ख़ान का यह बयान न सिर्फ एक टूर्नामेंट के लिए चिंता है, बल्कि एक पूरे युग के लिए शोकगीत भी है। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि जिन्हें इस टूर्नामेंट का संरक्षक होना चाहिए था, वही आज इसकी अनदेखी कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह टूर्नामेंट सिर्फ हॉकी नहीं था, यह उस साझी विरासत का प्रतीक था जो धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे था।

ओबैदुल्लाह ख़ान गोल्ड कप में भोपाल की गलियों से निकले दर्जनों खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते थे। ऐशबाग स्टेडियम में हज़ारों की भीड़, गूंजते नारे, और जश्न के वे पल — सबकुछ अब एक बीते हुए कल की तरह लगने लगा है। लेकिन असलम शेर ख़ान इस बीते हुए कल को फिर से वर्तमान में लाना चाहते हैं। उन्होंने अपील की है कि खेलप्रेमी, पूर्व खिलाड़ी, और आम नागरिक एकजुट होकर इस टूर्नामेंट को दोबारा शुरू करें — सरकार के इंतज़ार के बिना। उन्होंने कहा, “अगर इस खेल ने कभी आपके दिल को छुआ है — तो आज मेरे साथ खड़े हों। आइए ओबैदुल्लाह ख़ान गोल्ड कप को वापस लाएं।”

उनकी इस पहल का उद्देश्य केवल एक टूर्नामेंट को दोबारा शुरू करना नहीं, बल्कि एक पूरी खेल परंपरा को फिर से जीवंत करना है। उनका मानना है कि जब तक इस टूर्नामेंट की वापसी नहीं होती, तब तक भोपाल की हॉकी विरासत अधूरी है। असलम शेर ख़ान का यह कदम सिर्फ अतीत की ओर देखना नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा देना है। यह एक आह्वान है — उस विरासत को बचाने का, जो पीढ़ियों को जोड़ती थी, प्रेरणा देती थी और भारत की आत्मा में एकता का संचार करती थी।

 

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