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अमेरिका की चेतावनी का असर? भारत ने रोकी रूसी तेल की सरकारी खरीद

नई दिल्ली 
रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है। अब अमेरिकी दबाव के बीच भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने फिलहाल रूसी कच्चे तेल की स्पॉट खरीद को रोकने का फैसला लिया है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) जैसी कंपनियों ने अक्टूबर लोडिंग के लिए रूस के उरल्स ग्रेड तेल की खरीद से फिलहाल दूरी बना ली है। यह फैसला तब तक प्रभावी रहेगा जब तक केंद्र सरकार इस पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं देती।

यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के सभी निर्यातों पर दोगुना टैरिफ लगा दिया है। माना जा रहा है कि यह निर्णय भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखने की "सीधी सजा" है। ट्रंप सरकार के इस कदम का उद्देश्य रूस पर यूक्रेन युद्ध समाप्त करने का दबाव बनाना है।

भारत सरकार ने औपचारिक रूप से तेल कंपनियों को रूस से तेल खरीदने से मना नहीं किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने कंपनियों से यह जरूर कहा है कि वे गैर-रूसी विकल्पों की योजना तैयार रखें।

भारतीय तेल कंपनियां आमतौर पर 1.5 से 2 महीने पहले के शॉर्ट-टर्म साइकिल में तेल की खरीद करती हैं, जिससे समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इस चक्र में फिलहाल अक्टूबर के लिए खरीद योजनाएं बन रही हैं। हालांकि यह संभावना नहीं है कि भारत की ओर से अक्टूबर लोडिंग वाले उरल्स की खरीद पूरी तरह रुक जाएगी, लेकिन खरीद में कमी जरूर आ सकती है।

इससे अमेरिका, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अन्य कच्चे तेल ग्रेड्स की मांग बढ़ सकती है। व्यापारियों का मानना है कि रूस अब चीन को और अधिक डिस्काउंट पर तेल बेच सकता है, हालांकि चीन उरल्स ग्रेड ज्यादा नहीं लेता। उरल्स ग्रेड तेल रूस से निर्यात किया जाने वाला एक प्रकार का कच्चा तेल है, जो मुख्य रूप से यूराल और वोल्गा क्षेत्रों के तेल क्षेत्रों से प्राप्त होता है। यह मध्यम-भारी और उच्च सल्फर युक्त कच्चा तेल है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से रिफाइनरियों में डीजल, गैसोलीन और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन के लिए किया जाता है।

गौरतलब है कि जुलाई के अंत में सितंबर लोडिंग के लिए उरल्स की खरीद में भी गिरावट देखी गई थी क्योंकि कीमतें अधिक थीं। इसके बाद सरकारी कंपनियों ने अन्य क्षेत्रों से स्पॉट टेंडर के जरिए तेल खरीदा है। वहीं निजी कंपनियां रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। नायरा एनर्जी को यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण उत्पादन दर में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।

रूस का उरल्स ग्रेड कच्चा तेल पश्चिमी रूस से आता है। अगस्त और सितंबर लोडिंग वाले कार्गो भारत को सामान्य रूप से डिलीवर होने की संभावना है, जब तक कि भारत सरकार से कोई नया निर्देश नहीं आता। कुछ टैंकरों ने हाल के दिनों में भारतीय बंदरगाहों पर कार्गो उतारा है, हालांकि कुछ मामूली देरी जरूर हुई है। यूक्रेन युद्ध से पहले भारत लगभग शून्य के बराबर रूसी तेल खरीदता था, लेकिन युद्ध के बाद यह आंकड़ा 20 लाख बैरल प्रतिदिन से भी ऊपर पहुंच गया था।

भारत पेट्रोलियम के पूर्व रिफाइनरी निदेशक आर. रामचंद्रन के अनुसार, “कुछ समय के लिए परिचालन में बाधा जरूर आएगी, लेकिन तेल की मांग और आपूर्ति में संतुलन बन जाएगा। यदि रूसी सप्लाई मुश्किल होती है, तो मध्य-पूर्वी देशों विशेषकर सऊदी अरब और इराक से कच्चा तेल बेहतर विकल्प हो सकता है।”

इस घटनाक्रम ने वैश्विक बाजार को भी झटका दिया है। ब्रेंट क्रूड के दाम फिलहाल 67 डॉलर प्रति बैरल के पास स्थिर हैं, जो लगातार पांच दिनों की गिरावट के बाद देखी गई स्थिति है। व्यापारी इस बात का आकलन कर रहे हैं कि अगर भारत रूस से तेल खरीद कम करता है तो वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर क्या असर पड़ेगा।

 

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