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रूसी तेल का चाइनीज करेंसी में भुगतान: क्या भारत, चीन और रूस ने डॉलर को दरकिनार कर नई आर्थिक धुरी बना ली?

नई दिल्ली

पिछले दिनों इंटरनेशनल एनर्जी मार्केट से एक खबर महत्वपूर्ण थी. रिपोर्ट के अनुसार अब रूस से कच्चा तेल खरीदकर भारत ने चीन की मुद्रा युआन में भुगतान करना शुरू कर दिया है. यानी कि भारत कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है लेकिन रूस को पेमेंट चीनी मुद्रा युआन में कर रहा है. ये डॉलर के प्रभुत्व को खत्म करने एक बड़ी कोशिश है. 

हालांकि भारत के टोटल डील की तुलना में चीनी मुद्रा में होने वाला भुगतान कम है लेकिन इससे भारत की ओर से पेमेंट सिस्टम में होने वाले शिफ्ट का पता चलता है और इससे यह भी बात समझ में आती है कि भारत-चीन और रूस ने बिना ब्रिक्स करेंसी बनाए ही ट्रंप के डॉलर अभिमान को किनारे लगाना शुरू कर दिया है. 

बता दें कि अभी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में एक युआन की कीमत 12.34 भारतीय रुपये है. भारत का यह कदम भले ही छोटा हो लेकिन इसके भू-राजनीतिक असर तगड़े हैं और मैसेज देते हैं. रूस के उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने पुष्टि की है कि भारत अभी भी मुख्य रूप से रूबल यानी कि रूसी मुद्रा में भुगतान कर रहा है, लेकिन युआन का उपयोग भी बढ़ रहा है. यह कदम बिना किसी ब्रिक्स मुद्रा के ही भारत, चीन और रूस के त्रिकोणीय गठजोड़ को मजबूत कर रहा है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'डॉलर डिप्लोमेसी' को झटका दे रहा है. 

Investing live नाम की वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हाल ही में भारत की सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने हाल ही में दो से तीन रूसी तेल कार्गो के लिए युआन में भुगतान किया है. 

यह कदम 2023 से एक बदलाव का संकेत देता है, जब चीन के साथ तनावपूर्ण संबंधों के दौरान सरकारी असहजता के बीच सरकारी रिफाइनरियों ने युआन से भुगतान रोक दिया था, जबकि निजी रिफाइनर इस मुद्रा का इस्तेमाल जारी रखे हुए थे. 

भारत की ओर से चीनी मुद्रा में फिर से भुगतान शुरू करना इस बात की ओर भी संकेत देता है कि दोनों देशों (भारत-चीन) के बीच संकेत मधुर हुए हैं.

ट्रंप की धमकी को याद कीजिए

भारत द्वारा कच्चे तेल के पेमेंट सिस्टम में बदलाव का लिंक राष्ट्रपति ट्रंप के एक बयान से है. अमेरिकी राष्ट्रपति-चुनाव डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों को नई मुद्रा बनाने या डॉलर के विकल्प का समर्थन करने पर सख्त चेतावनी दी थी. ट्रंप ने 30 नवंबर 2024 को ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा था कि, "ब्रिक्स देश नई मुद्रा न बनाएं, वरना 100% टैरिफ लगेगा और ये देश अमेरिकी बाजार से विदा हो जाएंगे."  

ट्रंप का ये बयान उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का हिस्सा है, जहां ट्रंप डॉलर की वैश्विक प्रभुता (Global dominance) को हर कीमत पर बचाए रखना चाहते हैं. ट्रंप का तर्क है कि डॉलर वैश्विक व्यापार का 58% हिस्सा है, ब्रिक्स की कोशिशें इसे कमजोर करेंगी. 

डी-डॉलरीकरण क्यों चाहते हैं ब्रिक्स देश

डी-डॉलरीकरण (De-dollarization) वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अमेरिकी डॉलर की प्रभुता को कम करने की प्रक्रिया है. यह मुख्य रूप से ब्रिक्स देशों द्वारा संचालित हो रही है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 40% और आबादी का 45% प्रतिनिधित्व करते हैं. 2025 तक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का वैश्विक हिस्सा 73% से घटकर 54% रह गया है.  

ब्रिक्स देश डी-डॉलरीकरण चाहते हैं ताकि अमेरिकी डॉलर की वैश्विक प्रभुता कम हो, और इन देशों की आर्थिक और भू-राजनीतिक स्वायत्तता को बढ़े. यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध लगाए और रूस को स्विफ्ट पेमेंट सिस्टम से बार कर दिया. इससे ब्रिक्स देशों को एहसास हुआ कि अमेरिका डॉलर का इस्तेमाल 'हथियार' के रूप में कर सकता है. 

भारत-चीन-रूस ने निकाला बीच का रास्ता

ब्रिक्स देश डी-डॉलरीकरण की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन ये रफ्तार धीमी है. ट्रंप की धमकी के बाद ब्रिक्स देशों ने ब्रिक्स की नई करेंसी का प्रस्ताव तो फिलहाल धीमा कर दिया है. दक्षिण अफ्रीका ने कहा है कि नई मुद्रा की कोई योजना नहीं है. 

ब्रिक्स ने 2025 रियो शिखर सम्मेलन में एक संयुक्त मुद्रा की योजना को स्थगित कर दिया. इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार पर जोर दिया गया.अब ब्रिक्स पे एक डिसेंट्रलाइ्ज्ड भुगतान प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित हो रहा है. जो स्विफ्ट का विकल्प बनेगा. 2025 में ब्रिक्स व्यापार का 90% स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है. रूस-चीन व्यापार में युआन का हिस्सा 44% है.

अब भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर चीनी मुद्रा में भुगतान करना ब्रिक्स करेंसी से इतर बीच का रास्ता है. जिससे भारत का काम भी निकल जाएगा और डॉलर के प्रभुत्व को भी चुनौती मिलेगी.  इसलिए भारत, चीन और रूस का यह युआन-आधारित व्यापार उसी 'पहले चरण' का वास्तविक स्वरूप है. 

विश्व के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता भारत ने सितंबर में रूस से कच्चा तेल खरीदने पर 2.5 बिलियन यूरो खर्च किए. ये पिछले महीने की तुलना में 14 प्रतिशत कम है.

भारत का यह युआन प्रयोग अभी भू-राजनीतिक कदम से अधिक एक व्यावहारिक मैकेनिज़्म है.  ताकि रूसी तेल सस्ते में मिले और पश्चिमी प्रतिबंधों से निपटा जा सके. इसके रणनीतिक निहितार्थ गहरे हैं. 

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