मध्यप्रदेश

परंपरागत बीज संरक्षण के लिये बीज सखी का हुआ राज्य स्तरीय प्रशिक्षण

भोपाल .
आजीविका मिशन की पहल

मध्‍यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन द्वारा अभिनव पहल करते हुए 27 जिलों की बीज सखियों को परंपरागत बीज संरक्षण एवं बीज बैंक स्थापना के सम्बन्ध में दो दिवसीय राज्‍य स्‍तरीय प्रशिक्षण का आयोजन क्षेत्रीय ग्रामीण विकास संस्थान भोपाल में 9 एवं 10 फरवरी को आयोजित किया गया।

प्रशिक्षण में पद्म,  बाबूलाल दहिया जिला सतना द्वारा बीज संरक्षण के अनुभव साझा किए गए एवं बीज बैंक स्थापना पर व्याख्यान भी दिया गया। कर्नाटक राज्य की बी.बी. जान जो विगत 9 वर्षों से परंपरागत बीज संरक्षण का कार्य कर रही है, उनके द्वारा भी प्रतिभागियों को बीज संरक्षण के लिये प्रशिक्षण दिया। विगत 16 वर्षों से देशी बीजों का संरक्षण कर रहीं जिला डिंडोरी की सु फुलझरिया बाई द्वारा भी प्रशिक्षण में अपने अनुभव साझा किए एवं बीज संरक्षण के तरीके भी बताए। इसके अलावा कृषि एवं उद्यानिकी विभाग के प्रतिनिधियों ने भी जानकारी दी।

मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी आजीविका मिशन मती हर्षिका सिंह की पहल पर प्रदेश में महिला समूहों की सदस्‍यों को प्राकृतिक खेती को बढावा देने के उद्देश्‍य से परंपरागत बीज संरक्षण के लिये जिलों में बीज बैंक की स्‍थापना के लिये काम शुरू किया गया है। इसके अंतर्गत प्रारंभिक चरण में हितग्राहियों का चयन, प्रशिक्षण आदि किया जाना है। इसी क्रम में क्षेत्रीय ग्रामीण विकास संस्थान भोपाल में प्रशिक्षणों का आयोजन किया जा रहा है।

प्रशिक्षण में देशी बीजों को महत्‍व देते हुये उनके फायदे के संबंध में प्रतिभागियों को बताया गया। देशी बीज स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार ढले होने के कारण कम पानी, खाद व कीटनाशकों में भी बेहतर पैदावार देते हैं। इनकी अन्‍य विशेषतायें भी हैं जैसे यह अन्‍य की तुलना में अत्यधिक पौष्टिक होते हैं, सूखा-रोग प्रतिरोधी होते हैं जो किसानों को आत्मनिर्भर और खेती को किफायती व टिकाऊ बनाते हैं।

उद्यानिकी विभाग से  दीनानाथ धोटे द्वारा देशी सब्जी बीज संरक्षण पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदाय किया गया। कृषि विभाग से  जितेंद्र सिंह परिहार द्वारा भी प्राकृतिक खेती एवं परंपरागत बीज संरक्षण के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। आजीविका मिशन के राज्य परियोजना प्रबंधक कृषि,  मनीष सिंह एवं युवा सलाहकार सु पायल कुमारी द्वारा बीज बैंक की कार्ययोजना एवं आगामी 6 माह की कार्ययोजना तैयार करने के संबंध में जानकारी दी गई। आगामी समय में जिला स्तर पर बीज सखी के प्रशिक्षण आयोजित किए जाएंगे और बीज बैंक की स्थापना की जावेगी।

परंपरागत बीज की विशेषताएँ

आत्मनिर्भरता: किसान हर साल बीज खरीदकर खर्च करने के बजाय अपनी पिछली फसल से ही बीज सुरक्षित कर सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत बहुत कम हो जाती है। जलवायु-प्रतिरोधी – ये स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल होते हैं, इसलिए सूखे, अत्यधिक बारिश या कीटों का सामना करने की इनमें बेहतर क्षमता होती है। उच्च पौष्टिकता – देसी फसलों में संकर बीजों की तुलना में प्राकृतिक रूप से अधिक विटामिन, खनिज और पोषक तत्व होते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छे हैं। पर्यावरण संरक्षण – इन बीजों में कम रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और जल स्रोत भी सुरक्षित रहते हैं। जैव विविधता का संरक्षण: विभिन्न प्रकार की देसी किस्में पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखती हैं।

 

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