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कोविड पीड़ितों को मुआवजा: ‘नो-फॉल्ट’ कंपेंसेशन पॉलिसी, क्या यह न्याय की दिशा में बड़ा कदम या नई चुनौती?

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें केंद्र सरकार को कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर साइड इफेक्ट्स या इससे होने वाली मौतों के लिए 'नो-फॉल्ट' कंपेंसेशन पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया गया है. इस फैसले के अनुसार, प्रभावित परिवारों को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि मौत या कोई गंभीर इफेक्ट्स के लिए राज्य सरकार किसी भी तरह से जिम्मेदार है. राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान के दौरान होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए राहत प्रदान करे. यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है, जहां वैक्सीन लेने के बाद मौत या गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का दावा किया गया था. यह निर्णय न्याय की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

हालांकि इस फैसले को लागू करने में बहुत सी व्यावहारिक चुनौतियां हैं. क्योंकि इसके कार्यान्वयन में इतनी तरह की जटिलताएं हैं जिसका निदान करना असंभव हो सकता है.पर एक देश और समाज के रूप में, हमें इस फैसले की गहराई को समझना होगा. यह फैसला अव्यावहारिक लग सकता है लेकिन लंबे समय में महत्वपूर्ण साबित होगा. फैसले की पृष्ठभूमि में कोविड महामारी के दौरान भारत में चलाया गया दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान है. करोड़ों लोगों को वैक्सीन दी गई, जिसने संक्रमण दर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई।

हालांकि, सरकारी आंकड़ों से भी पता चलता है कि कुछ मामलों में वैक्सीन के बाद मौतें हुईं  हैं. यह बात तो वैक्सीन बनाने वालों ने भी स्वीकार किया था कि कुछ मामलों में साइड इफेक्ट संभव है. दुनिया की कोई भी वैक्सीन अपने आप को हंड्रेड परसेंट सुरक्षित होने का दावा नहीं कर सकती हैं. पर दुनिया भर में तरह तरह के वैक्सीन आम जनता के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए लगाईं जाती हैं. शायद यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार को आधार बनाते हुए कहा कि जब वैक्सीनेशन राज्य-प्रायोजित कार्यक्रम है, तो प्रभावितों को अदालतों में लंबी लड़ाई लड़ने के बजाय सीधा मुआवजा मिलना चाहिए. 'नो-फॉल्ट' का मतलब है कि बिना दोष साबित किए राहत, जो कई विकसित देशों में पहले से लागू है।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह भारत जैसे विकासशील देश में व्यावहारिक है? सबसे बड़ी चुनौती कार्यान्वयन की है. वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को साबित करना वैज्ञानिक रूप से जटिल है. कोविड वैक्सीन जैसे कोविशील्ड या कोवैक्सिन के बाद देश में बहुत सी मौतें हुईं हैं, लेकिन क्या हर दावे की जांच कैसे हो सकती है? अदालत ने स्वास्थ्य मंत्रालय को पॉलिसी बनाने का आदेश दिया है, लेकिन सरकार कोई ऐसी सर्वसुलभ प्रक्रिया बना पाएगी . इसमें संदेह है. उदाहरण के लिए, अमेरिका या यूके में ऐसी पॉलिसी है, लेकिन उनके पास मजबूत स्वास्थ्य डेटा सिस्टम हैं।

भारत में ग्रामीण इलाकों को छोड़िए शहरों में भी मेडिकल रिकॉर्ड इस तरह के नहीं हैं कि अदालत में यह साबित किया जा सके कि अमुक व्यक्ति की मौत कोविड के चलते हुई है. ग्रामीण इलाकों में तो मेडिकल रिकॉर्ड माशा अल्ला है. अब सवाल उठता है कि क्या वैक्सीन और मौत के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए विशेषज्ञ पैनल बनाए जाएंगे? अगर हां, तो क्या सरकार के पास इतने प्रशासनिक संसाधन है कि वह इसे क्रियान्वित कर सकेगी? स्वास्थ्य मंत्रालय पहले से ही AEFI (एडवर्स इफेक्ट्स फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन) की निगरानी करता है, लेकिन मौतों के मामलों में जांच लंबी चलती है. नई पॉलिसी से दावों की बाढ़ आ सकती है, जिसमें वास्तविक और फर्जी दोनों शामिल होंगे.देश में दलालों के रैकेट सक्रिय हो जाएगा जो सामान्य मौतों को भी कोविड से हुई मौत साबित करना शुरू कर देंगे.   दुरुपयोग की आशंका से सिस्टम चरमरा सकता है, और वित्तीय बोझ जो बढ़ेगा वो अलग से है।

इसके अलावा, यह फैसला वैक्सीन उत्पादकों की जिम्मेदारी को भी प्रभावित कर सकता है. वर्तमान में, वैक्सीन कंपनियां इंडेम्निटी क्लॉज के तहत सुरक्षित हैं, यानी वे सीधे जिम्मेदार नहीं. अगर राज्य मुआवजा देगा, तो क्या यह कंपनियों को और लापरवाह बना देगा? वैश्विक स्तर पर देखें तो WHO की COVAX योजना में भी ऐसी प्रावधान हैं, लेकिन भारत जैसे देश में जहां वैक्सीन आयात और उत्पादन दोनों होते हैं, यह जटिल हो जाता है।

इन सब के बावजूद इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि एक लोकतांत्रिक समाज में, राज्य की जिम्मेदारी सिर्फ वैक्सीन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसके जोखिमों को भी संभालना है. महामारी ने दिखाया कि वैक्सीनेशन सामूहिक प्रयास था, लेकिन कुछ लोगों ने व्यक्तिगत कीमत चुकाई. ऐसे में, 'नो-फॉल्ट' पॉलिसी न्याय सुनिश्चित करती है. यह अनुच्छेद 21 को मजबूत करती है, जो जीवन के अधिकार को सिर्फ नकारात्मक (हानि न करने) नहीं, बल्कि सकारात्मक (रक्षा करने) रूप में देखता है।

अदालत ने कहा कि राज्य स्वास्थ्य संरक्षण का दायित्व निभाए, जो सार्वजनिक विश्वास बढ़ाएगा. कल्पना कीजिए, अगर भविष्य में कोई नई महामारी आई, तो लोग वैक्सीन से डरेंगे नहीं क्योंकि वे जानेंगे कि दुर्घटना में सहायता मिलेगी. यह सामाजिक न्याय का प्रतीक है, जहां गरीब परिवारों को अदालतों की लंबी प्रक्रिया से मुक्ति मिलेगी. कई मामलों में, जैसे दो युवतियों की मौत पर याचिका, परिवारों ने संघर्ष किया. यह फैसला उन्हें राहत देगा और समाज को संदेश देगा कि राज्य अपने नागरिकों के साथ खड़ा है।

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