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मध्यप्रदेश

एमपी में बढ़ रहा पानी: 128 प्रतिशत वृद्धि के साथ देश में पहले स्थान पर, अमृत सरोवरों के क्रियान्वयन में भी अग्रणी

भोपाल 

 मध्यप्रदेश में जल संरक्षण को लेकर चलाए जा रहे जल गंगा संवर्धन अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। विगत वर्षों में अभियान के दो चरणों में प्रदेश में 6 हजार 393 अमृत सरोवरों में पहले चरण में 5 हजार 839 अमृत सरोवर बनाए गए हैं। वहीं दूसरे चरण में 554 अमृत सरोवरों का निर्माण कार्य प्रगतिरत है। इस प्रकार अभियान के क्र‍ियान्‍वयन में मध्यप्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हैं। मध्यप्रदेश मिशन अमृत सरोवर के तहत देशभर में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए पहले स्‍थान पर है। इसकी जानकारी आईआईटी दिल्ली और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से संचालित भू प्रहरी परियोजना की रिपोर्ट से आई है। अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में 128 प्रतिशत की वृद्धि के साथ मध्‍यप्रदेश देश में प्रथम स्‍थान पर है।

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य तालाबों के औसत सतह क्षेत्र में वृद्धि के मामले में देश में प्रथम स्थान पर है। पिछले दो वर्षों में प्रदेश में अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में 128.714 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत 11.27 प्रतिशत से कहीं अधिक है।

AI, सैटेलाइट और LiDAR तकनीक से किया आकलन

भारत सरकार ने मध्यप्रदेश में बने अमृत सरोवरों की आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैटेलाइट, SONAR और LiDAR के माध्यम से न केवल तालाबों के औसतन सतह क्षेत्र बल्कि जल की कुल मात्रा (वॉल्यूम) का भी आकलन किया गया। इसमें सामने आया कि मानसून के दौरान जल संचयन क्षमता में सुधार हुआ है और सूखा-प्रवण एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी गर्मियों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। सतह क्षेत्र में वृद्धि का सकारात्मक प्रभाव भूजल पुनर्भरण पर भी पड़ा है, जिससे आसपास के कुओं और ट्यूबवेल का जल स्तर बढ़ा है। साथ ही, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ने से किसानों की आजीविका में सुधार हो रहा है।

सिपरी सॉफ्टवेयर से किया चयन
मध्यप्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्‍त अवि प्रसाद ने बताया कि जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत प्रदेश में अमृत सरोवरों के निर्माण के लिए स्थानों का चयन वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है। इसके लिए सिपरी सॉफ्टवेयर का उपयोग किया गया। इसके माध्यम से भूविज्ञान, कंटूर, जल निकासी नेटवर्क, मिट्टी के प्रकार और भूमि का उपयोग जैसे विभिन्न डेटा लेयर्स का एकीकृत विश्लेषण किया गया। इस प्रक्रिया के जरिए ऐसे उपयुक्त स्थानों का चयन किया गया, जहां जल संरक्षण और संचयन को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। यह पहल प्रदेश में जल प्रबंधन को वैज्ञानिक और सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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