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मध्यप्रदेश

विश्व काल-गणना के केंद्र के रूप में उज्जैन की भूमिका पर हुई वैश्विक चर्चा

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में महाकाल की पावन धरा उज्जैन में शुक्रवार को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” हुआ। देश-विदेश के प्रख्यात खगोलविदों, वैज्ञानिकों और शीर्षस्थ विद्वानों ने भारतीय काल-गणना की वैज्ञानिकता और उसकी प्राचीन श्रेष्ठता पर गहन मंथन किया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य उज्जैन की गौरवशाली पहचान को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करना है। उज्जैन नगरी युगों तक विश्व के प्रधान मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) और काल-गणना का केंद्र रही है। विद्वानों ने एक स्वर में यह आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हम समय की वैश्विक अवधारणा के 'भारतीयकरण' की ओर बढ़ें और अपनी उस वैज्ञानिक विरासत को जीवंत करें, जो सदियों तक मानवता के लिए समय का बोध कराती रही है।

सम्मेलन के प्रथम सत्र का मुख्य विषय “समय क्या है? इसका मापन कैसे हुआ तथा प्रधान मध्यान्ह (मेरेडियन) रेखा के रूप में उज्जैन का महत्व” रहा। सत्र का संचालन करते हुए आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. तडीकोंडा वेंकट भारत ने समय के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारत काल-गणना के क्षेत्र में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शक था। कालांतर में सांस्कृतिक संक्रमण के कारण हमारा यह अमूल्य ज्ञान पाश्चात्य पद्धतियों के अधीन हो गया। अब समय की मांग है कि हम आधुनिक विज्ञान और शोध के माध्यम से अपनी विरासत का पुनरुद्धार करें। राज्यसभा की एस. राधाकृष्णन पीठ के इतिहासविद् डॉ. एम.एल. राजा ने गर्व के साथ भारत को 'काल-गणना का देवता' निरूपित किया। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य जगत जिस कालखंड की सूक्ष्मता को समझने का प्रयास कर रहा है, वह भारतीय मनीषियों के लिए हजारों वर्ष पूर्व भी प्रत्यक्ष सत्य था। डॉ. राजा ने भारतीय कैलेंडर की वैज्ञानिकता सिद्ध करते हुए बताया कि हमारी पद्धति में लीप ईयर जैसी कोई विसंगति नहीं है; यह खगोलीय पिंडों की गति का शुद्ध गणित है। उन्होंने 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक संवत' का दूरगामी विचार प्रस्तुत करते हुए भारतीय साक्ष्यों को अकाट्य प्रमाणों के साथ विश्व के सम्मुख रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

काशी के प्रो. विनय कुमार पांडेय ने उज्जैन (अवंतिका) के शास्त्रीय और खगोलीय महत्व को नए आयाम दिए। उन्होंने स्कंद पुराण, नारद पुराण और सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों का उदाहरण देते हुए बताया कि "काल-गणना का वास्तविक मूल केन्द्र अवंतिका ही है।" उन्होंने कहा कि उज्जैन विश्व का वह अनूठा भौगोलिक स्थल है जहाँ श्मशान और शक्तिपीठ एक साथ विद्यमान हैं, जो इसे समय की उत्पत्ति और लय का केंद्र बनाते हैं। खगोलशास्त्री पं. कैलाशपति नायक ने समय के आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष को जोड़ते हुए कहा कि समय के चक्र को गति देने वाले स्वयं भगवान महाकाल हैं। उन्होंने पंचांग की महत्ता को रेखांकित करते हुए उज्जैन को पुनः समय के मानक केंद्र के रूप में स्थापित करने के इस प्रयास की मुक्त कंठ से सराहना की।

सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव आधुनिक विज्ञान और प्राचीन परंपरा का अद्भुत समन्वय रहा। सीएसआईआर-एनपीएल के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने वर्तमान युग की परिशुद्ध समय मापन तकनीकों और एटॉमिक क्लॉक्स की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि नैनो सेकंड स्तर की सटीकता बनाए नहीं रखी जाए तो जीपीएस जैसी तकनीकों की सटीकता भी प्रभावित हो सकती है। डॉ. शर्मा ने यह महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि आधुनिक विज्ञान की यह सूक्ष्म परिशुद्धता वास्तव में हमारी प्राचीन भारतीय गणना पद्धतियों में पहले से ही अंतर्निहित रही है। उन्होंने पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया।

सम्मेलन का द्वितीय सत्र “काल चक्र: इनवॉल्यूशन एण्ड इवॉल्यूशन ऑफ सिविलाइजेशन इन टाइम एण्ड स्पेस” विषय पर केंद्रित रहा। सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, चेन्नई के अध्यक्ष प्रो. एम.डी. श्रीनिवास और कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि भारतीय कालचक्र की अवधारणा केवल एक रेखीय गति नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित चक्रीय व्यवस्था है, जो नैतिक मूल्यों और पर्यावरणीय संतुलन को भी अपने भीतर समेटे हुए है। भारतीय ज्ञान परंपरा नवाचार को प्राचीन सिद्धांतों की पुनर्खोज के रूप में देखती है, जो ज्ञान की निरंतरता को बनाए रखते हुए उसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने का मार्ग प्रदान करती है।

सम्मेलन के दोनों सत्रों में यह प्रतिपादित किया गया कि उज्जैन केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह विश्व के समय चक्र का वैज्ञानिक उद्गम स्थल भी है। विद्वानों ने इस संकल्प को दोहराया कि भारत की समृद्ध काल-गणना परंपरा को आधुनिक अनुसंधान के साथ जोड़कर भविष्य के लिए और अधिक उपयोगी बनाया जाएगा। यह अंतर्राष्ट्रीय मंथन न केवल उज्जैन की ऐतिहासिक भूमिका को पुनः स्थापित करने में सफल रहेगा, बल्कि इसने आने वाले समय में भारत को काल-विज्ञान के क्षेत्र में पुनः 'विश्व गुरु' के रूप में प्रतिष्ठित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा। 

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