मध्यप्रदेश

भोजशाला विवाद: 1978 के सर्वे का हवाला, Hindu Front for Justice ने हाई कोर्ट में कहा—यह मंदिर है, मस्जिद नहीं;

इंदौर

धार की ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के निर्धारण को लेकर मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में मंथन मंगलवार को भी जारी रहा। याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने लगातार दूसरे दिन तर्क रखे। उन्होंने कहा कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद नहीं; यह बात वर्ष 1978 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा कराए गए सर्वे में सिद्ध हो चुकी है।

यह जमीन कभी वक्फ बोर्ड की थी ही नहीं। भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है। वक्फ एक्ट के प्रावधान इस पर लागू होते ही नहीं हैं। एडवोकेट जैन ने अयोध्या राम मंदिर से जुड़े तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि “वन्स ए टेंपल, ऑलवेज ए टेंपल” नी एक बार मंदिर रहा स्थल हमेशा मंदिर ही रहेगा। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांत भी प्रस्तुत किए।

सलमान खुर्शीद ने मांगा शासन का पक्ष

मंगलवार दोपहर करीब ढाई बजे न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के समक्ष मामले में सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि शासन को भी अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पहले सभी याचिकाकर्ता अपना-अपना पक्ष रखेंगे, इसके बाद सभी प्रतिवादी एक-एक कर अपनी बात रखेंगे। अंत में हस्तक्षेपकर्ताओं को सुना जाएगा। सुनवाई बुधवार को भी होगी और एडवोकेट जैन अपनी बहस जारी रखेंगे।
मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थीं मस्जिदें

एडवोकेट जैन ने सोमवार की बहस आगे बढ़ाते हुए कहा कि इतिहास की पुस्तकों से स्पष्ट है कि भोजशाला मंदिर ही है। यह बात सिर्फ पुस्तकें ही नहीं बल्कि शासन की साइटें भी कह रही हैं। जैन ने कहा कि मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। एक बार मंदिर स्थापित होने के बाद वह स्थल हमेशा मंदिर ही माना जाता है। इतिहास की पुस्तकों से स्पष्ट है कि धार और मांडव में मंदिरों को तोड़कर दो मस्जिदें बनाई गई थीं। भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार इसके धार्मिक चरित्र के विपरीत जाकर कोई काम नहीं किया जा सकता। जैन ने कोर्ट को यह भी बताया कि इसके पहले भी तीन बार भोजशाला का मामला कोर्ट पहुंच चुका है।
शासन के शपथ पत्र और राजस्व रिकॉर्ड

जैन ने कहा कि शासन खुद शपथ पत्र पर यह स्वीकार कर चुका है कि भोजशाला मंदिर ही है। इसे कभी वक्फ संपत्ति के रूप में मान्यता नहीं मिली। उन्होंने कोर्ट को बताया कि राजस्व रिकॉर्ड में भी उक्त जमीन भोजशाला के रूप में ही दर्ज है, यह बात खुद शासन की ओर से प्रस्तुत शपथ पत्र में कही गई है। जिस जमीन पर कमाल मौला दरगाह बनी है वह अलग है। इसके पहले भी भोजशाला का नाम हटाने का प्रयास हुआ लेकिन कभी सफलता नहीं मिली। एडवोकेट जैन ने वक्फ संपत्ति के नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि वक्फ एक्ट में स्पष्ट लिखा है कि राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहरों पर यह एक्ट लागू नहीं होता है और भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है।

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