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लाइसेंस का झंझट होगा खत्म? भारत में सेल्फ-ड्राइविंग कारों की एंट्री का काउंटडाउन शुरू

नई दिल्ली

कई बार कुछ फैसले इतने टेक्निकल और जटिल होते हैं कि उनकी अहमियत तुरंत समझ में नहीं आती. लेकिन कुछ साल बाद वही फैसले आपकी डेली-लाइफ, रूटीन और पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देते हैं. ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म करने का सरकार फैसला भी ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. पहली नजर में यह सिर्फ नियमों में बदलाव जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत को सेफ, स्मार्ट और फ्यूचर की सेल्फ-ड्राइविंग मोबिलिटी की ओर ले जाने वाला बड़ा दरवाजा खोल सकता है। 

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इसके अलावा 5.9GHz बैंड पर चलने वाले सिस्टम के लिए भी लाइसेंस की जरूरत खत्म कर दी गई है. यही फ्रीक्वेंसी वाहन और सड़क किनारे लगे इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होती है. यह फैसला भारत को अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित ऑटोमोबाइल बाजारों के बराबर खड़ा करता है, जहां ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पहले से कहीं ज्यादा आसान नियम बनाए गए हैं। 

भारत में जब भी नई ऑटोमोबाइल तकनीक आती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं होती, बल्कि नियमों और मंजूरियों की जटिल प्रक्रिया भी होती है. किसी नई तकनीक को बाजार में लाने के लिए कंपनियों को ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है। 

अब जब रडार बेस्ड सिस्टम के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं रहेगी, तो वाहन निर्माता कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और तकनीक को भारत में भी आसानी से ला सकेंगी. उन्हें भारत के लिए अलग एडिशन तैयार करने की जरूरत कम पड़ेगी. इससे लागत घट सकती है और नई तकनीकियों का इस्तेमाल आसान और तेज हो जाएगा। 

ADAS अब लग्जरी फीचर नहीं रहेगा
कुछ साल पहले तक ADAS यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम केवल महंगी लग्जरी कारों में देखने को मिलता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह तकनीक मुख्यधारा की कारों तक पहुंच रही है. अब कम दाम या यूं कहें कि मिड-साइज एसयूवी और अन्य कारों में भी यह फीचर दिया जाने लगा है. कम्पटीशन के इस दौर में तकरीबन हर वाहन निर्माता की कोशिश है कि, वो अपनी काम में अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले ज्यादा फीचर दे सके. इसके लिए ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं। 

ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स रडार सेंसर की मदद से काम करते हैं. ये सिस्टम सिर्फ सुविधा नहीं देते, बल्कि कई बार गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में भी मदद करते हैं. भारत में अब तक ADAS तकनीक का इस्तेमाल सिमित रहा है. इसकी एक वजह लागत और दूसरी वजह नियम और प्रोसेस हैं. ऐसे में लाइसेंस की बाध्यता हटना इस तकनीक को ज्यादा तेजी से फैलाने में मदद कर सकता है। 

सेल्फ-ड्राइविंग कारों की बुनियाद
आज दुनिया के कई देश सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों पर तेजी से काम कर रहे हैं. भारत अभी उस लेवल से काफी दूर है, लेकिन किसी भी तकनीक की शुरुआत इंफ्रा से ही होती है. रडार सेंसर और व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम भविष्य में आने वाली ऑटोनॉमस यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हैं. इसलिए यह फैसला सिर्फ आज की कारों के लिए नहीं, बल्कि अगले दशक की मोबिलिटी को ध्यान में रखकर लिया गया कदम भी माना जा रहा है। 

इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 5.9GHz बैंड से जुड़ा है. यह V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग सिस्टम को सपोर्ट करता है. सरल भाषा में समझें तो भविष्य में गाड़ियां सिर्फ सड़क पर नहीं चलेंगी, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत भी करेंगी. कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाए, किसी ब्लाइंड मोड़ के पीछे खतरा हो या कोई एम्बुलेंस तेजी से आ रही हो, तो ऐसी जानकारी पहले ही दूसरी गाड़ियों तक पहुंच सकती है। ऐसी तकनीकियां इंसानी आंखों की तरह काम करेंगी. जो सड़क पर अचानक से रिएक्ट करने की समय को कम करने में मदद करेंगी. यही कारण है कि दुनिया भर में इन्हें रोड सेफ्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 

इन कंपनियों को फायदा
अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि नई तकनीक का फायदा केवल विदेशी कंपनियों को मिलता है. लेकिन इस मामले में तस्वीर कुछ अलग है. जहां मर्सिडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी को आसानी से भारत ला सकेंगी. वहीं मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी यह मौका होगा कि वे तेजी से ADAS बेस्ड फीचर्स को अपनी गाड़ियों में शामिल करें। 

हालांकि ये भारतीय कंपनियां पहले से ही अपने कुछ प्रीमियम मॉडलों में ये फीचर दे रही हैं. लेकिन आने वाले समय में जब ये तकनीकी और किफायती होगी तो इसका इस्तेमाल सस्ती कारों में भी देखने को मिल सकता है. इसके अलावा Bosch, Continental और Qualcomm जैसी तकनीकी कंपनियों को भी नए अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि आधुनिक वाहनों में इनकी टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ेगी। 

इस फैसले की सबसे मजबूत वजह रोड सेफ्टी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1.77 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई. ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों या बेहतर सड़कों का मुद्दा नहीं है. आधुनिक तकनीक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ADAS और V2X जैसे सिस्टम उन परिस्थितियों में एक्स्ट्रा सेफ्टी दे सकते हैं जहां ड्राइवर की नजर या रिएक्ट करने की क्षमता कम हो जाती है। 

अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सरकार ने इस टेक्नोलॉजी को अनिवार्य नहीं बनाया है. केवल लाइसेंस की बाध्यता हटाई गई है. यानी यह फैसला रास्ता साफ करता है, लेकिन यह पक्का नहीं करता कि हर नई कार में तुरंत ये तकनीकी दिखाई देने लगेंगी. फिर भी यह एक ऐसा कदम है जो इंडस्ट्री को सही दिशा देने में मददगार साबित होगा. जब नियम आसान होते हैं, लागत कम होती है और तकनीक तेजी से पहुंचती है, तो अंततः फायदा ग्राहक को ही मिलता है। 
 

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