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विदेश

ईरान को 300 अरब डॉलर देने का वादा, लेकिन पैसा देगा कौन? खाड़ी दौरे पर मार्को रुबियो से उठेगा सबसे बड़ा सवाल!

वाशिंगटन/तेहरान 

मध्य पूर्व युद्ध को खत्म करने वाले समझौते की सबसे बड़ी शर्त रही- ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर के फंड की. ईरान को हुए नुकसान की भरपाई के लिए ये रकम काफी है लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि इस भारी-भरकम राशि का खर्चा कौन उठाएगा? इस्लामाबाद MoU में लिखा है कि अमेरिका अपने खाड़ी के साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर का एक ठोस योजना तैयार करेगा. इस योजना को अंतिम समझौते के साथ 60 दिनों के अंदर लागू किया जाएगा। 

इसके अलावा अमेरिका सभी जरूरी लाइसेंस, छूट और अनुमतियां भी देगा ताकि पैसे के लेन-देन में कोई रुकावट न आए. इस फंड के अलावा अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होते ही ईरान पर लगी सभी प्रकार की पाबंदियां हटा ली जाएंगी और उसे तुरंत तेल बेचने की छूट मिल जाएगी. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा है कि ईरान को ये सब पाने के लिए 60 दिनों में शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स का एक भी डॉलर ईरान को नहीं जाएगा. तो फिर ईरान को इतने पैसे देगा कौन?

कौन देगा ईरान को 300 बिलियन डॉलर?
    ईरान की इस डील को लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अमेरिका इसके पैसे अपने अमीर खाड़ी देशों से वसूलेगा. आपको बता दें कि ये वही देश हैं, जहां अमेरिका के मिलिट्री बेसेज हैं और जिन पर युद्ध के दौरान ईरान ने हजारों ड्रोन और मिसाइलें दागी थीं. युद्ध के तबाह हो चुके ईरान को इस फंड की बहुत जरूरत है, लेकिन खाड़ी देश अभी तैयार नहीं दिख रहे। 

    सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने पिछले हफ्ते इस फंड पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि पहले विश्वास बहाल करना होगा. ईरान के हमलों के बाद रिश्ते सुधारने की बातचीत जरूरी है, उसके बाद ही आर्थिक सहयोग और निवेश की बात हो सकती है. सऊदी अरब अपनी घरेलू परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है। 

    वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पहले ही ईरान से युद्ध क्षतिपूर्ति मांगी थी, हालांकि समझौते से पहले उसका रुख कुछ नरम हुआ था. UAE युद्ध से पहले ईरान का प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी था, बावजूद इसके उसे ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा। 

मार्को रुबियो देंगे इस सवाल का जवाब?
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो इन सवालों के बीच तीन दिन के खाड़ी देशों के दौरे पर आ रहे हैं, जहां वे यूएई, कुवैत और बहरीन के नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं. उनकी इस यात्रा का मकसद ही अपने साझेदार देशों में ये विश्वास जगाना है कि तेहरान के साथ अमेरिका की डील से उनका कोई नुकसान नहीं होगा. उन्होंने इस देशों को साफ करना होगा कि 300 अरब डॉलर का इंवेस्टमेंट पैकेज आएगा कहां से और उसे कैसे इस्तेमाल किया जाएगा. अमेरिका के लिए तो ये डील है लेकिन खाड़ी देशों के सर्वाइवल का सवाल है क्योंकि तेहरान ये रकम मिलने के बाद खुद को खड़ा तो करेगा लेकिन उनकी सेना और क्षेत्रीय प्रभाव भी मजबूत होगा. कतर, बहरीन, कुवैत, यूएई और सऊदी जैसे देश खाड़ी की सुरक्षा में अहम योगदान निभाते हैं, ऐसे में ईरान का मजबूत होना उनके लिए सिरदर्द है। 

क्या-क्या आ रही हैं चुनौतियां?
    खाड़ी देशों को डर है कि पैसा ईरान के हथियारों और प्रॉक्सी समूहों पर खर्च न हो जाए. इसलिए उन्हें मजबूत गारंटी चाहिए. जब तक उन्हें ये विश्वास मिल नहीं जाता, तब तक वे शायद ही अपना कोष ईरान के लिए खोलें। 

    समझौते में ईरान के फ्रोजन असेट्स को पूरी तरह उपलब्ध कराने का वादा है. जेडी वेंस ने कहा कि कतर और जेयर्ड कुश्नर ने इसके लिए एक दिलचस्प समाधान निकाला है. अमेरिका और कतर इस प्रक्रिया पर नजर रखेंगे। 

    वेंस के मुताबिक अगर पैसे छोड़े गए तो वे ईरानी लोगों को खाना खिलाने और अमेरिकी किसानों को फायदा पहुंचाने में लगाए जाएंगे. ईरान इस पैसे से अमेरिका से सोयाबीन, मक्का और गेहूं खरीद सकेगा. हालांकि तेहरान के केंद्रीय बैंक ने इससे इनकार कर दिया है। 

समझौते की 60 दिनों का मियाद अब शुरू हो चुकी है. अगर इस दौरान अच्छी प्रगति हुई तो 300 अरब डॉलर का फंड ईरान को नया जीवन दे सकता है, लेकिन अगर विश्वास की कमी बनी रही तो यह सिर्फ कागजी वादा बनकर रह सकता है. यह फंड मध्य पूर्व में स्थायी शांति का आधार बन सकता है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को समझौता करना होगा. फिलहाल सवाल यह है कि क्या खाड़ी देश ईरान को फिर से खड़ा करने के लिए अपना खजाना खोलेंगे?

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