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महाराष्ट्र

BMC ने मरीजों के अस्पताल पहुंचने का इंतजार नहीं किया, घर-घर जाकर संक्रमित खोजे और उन्हें इलाज दिया

मुंबई में कोरोना की रफ्तार पर ब्रेक लगाने में बृहन्मुंबई महा नगरपालिका (BMC) काफी हद तक कामयाब रही है। BMC के लोगों ने मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की बजाय उनके घर जाकर जांच और इलाज करने का तरीका इस्तेमाल किया। इसी वजह से यहां कोरोना अब तेजी से कंट्रोल हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही BMC के इस तरीके की तारीफ की थी और दिल्ली समेत दूसरे शहरों को इसका पालन करने को कहा था। BMC के इस सिस्टम में विभागीय स्तर पर नगर निगम की ओर से स्थापित किए गए ‘वार्ड वार रूम’ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनके जरिए 10,000 मरीजों को संभालने की योजना बनाई गई है।

76 दिन में 3 लाख से 6 लाख केस हो गए
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान शुरू में मुंबई में रोगियों की संख्या बढ़ रही थी। 10 फरवरी तक, शहर में कुल 3 लाख 13 हजार संक्रमित थे। इसके 76 दिनों में यह संख्या 6 लाख 22 हजार पर पहुंच गई। मौतों के आंकड़ों की तुलना की जाए तो 10 फरवरी में कुल 11 हजार 400 मौते हुई थी। 25 अप्रैल को यह संख्या 12 हजार 719 पहुंच गई। इस दौरान में 1,319 मरीजों की मौत हुई। यहां डेथ रेट 0.04% है। यह डेथ रेट विश्व में सबसे कम है।

प्राइवेट हॉस्पिटल का अधिग्रहण किया गया
मुंबई में कोविड जंबो सेंटर के माध्यम से 9 हजार बेड तैयार कर इसमें 60% बेड्स में ऑक्सीजन की सुविधा जोड़ी गई। शहर के सभी प्राइवेट अस्पतालों का अधिग्रहण किया गया। फिलहाल मुंबई में 35 बड़े और 100 छोटे अस्पतालों के 80% बेड्स पर नगर निगम का नियंत्रण है। इन अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की दर तय कर दी गई है। सभी बेड्स का मैनेजमेंट वार्ड वॉर रूम से ही किया जाता है।

6 लाख से ज्यादा मरीजों की व्यवस्था की गई
पिछले साल जून से आज तक 6 लाख मरीजों की व्यवस्था इस माध्यम से की गई है। खासतौर पर मुंबई में प्रतिदिन करीब 40 से 50 हजार टेस्टिंग हो रही है। इसमें 30 से 35 हजार RT-PCR होता है। इन सभी प्रयासों से मुंबई में रोगियों की संख्या को नियंत्रित किया गया।

ऐसा है वायरस रोकने का मुंबई पैटर्न

  • ‘चेस द वायरस’ के अंतर्गत हर घर में जाकर टेस्टिंग की।
  • हर विभाग में ‘वार्ड वॉर रूम’ बनाया। सभी बेड्स को इसी से मैनेज किया गया।
  • भीड़ वाली जगह, झुग्गियों में जाकर संदिग्धों की जांच की गई।
  • जंबो कोविड सेंटर्स में 9,000 बेड्स तैयार किए गए।
  • 60% बेड्स में ऑक्सीजन की सुविधा उपलब्ध करवाई गई।
  • हर दिन 40 से 50 हजार लोगों की टेस्टिंग की गई।
  • प्राइवेट अस्पतालों के 80% बेड्स पर नगर निगम का नियंत्रण रखा गया।
  • नगर निगम के सभी अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण किया गया।
  • सेंट्रलाइज ऑक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था की गई।

ऑक्सीजन सप्लाई और वैक्सीनेशन
मरीजों को पहले सिलिंडर से ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती थी। इसमें समय और ऑक्सीजन की काफी बर्बादी हो रही थी। यह बात ध्यान में आते ही नगर निगम क्षेत्र के सभी अस्पतालों में 13 से 26 हजार लीटर क्षमता के ऑक्सीजन टैंक स्थापित किए गए। ज्यादातर हॉस्पिटल में सेंट्रलाइज्ड ऑक्सीजन सप्लाई की जा रही है।

टीकाकरण में मुंबई सबसे आगे है। डेथ रेट कम करने के लिए ‘मिशन जीरो’ पर अमल किया जा रहा। ‘मेरा परिवार मेरी जिम्मेदारी’ अभियान के अंतर्गत 35.10 लाख घरों तक स्वास्थ्य सेविकाओं और स्वास्थ्य दूतों ने निरीक्षण किया है। इनकी जुटाई जानकारी के आधार पर संक्रमण का शिकार हुए 51 हजार लोगों को ढूंढने में सफलता मिली है। मास्क न लगाने वाले 27 लाख लोगों पर कार्रवाई की गई है। उन्हें मास्क भी दिया गया। इस वजह से मरीजों की संख्या नियंत्रित करने में सहयोग मिला।

मरीजों तक पहले पहुंचना हमारी प्राथमिकता: सुरेश काकाणी नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्त, सुरेश काकाणी ने बताया,’कोरोना संक्रमण बड़ी मात्रा में हो रहा है। यह देख हमने भीड़ वाले इलाके, बाजार, गलियां, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और बस्तियों में पहुंचकर मरीज को ढूंढा और उनका इलाज किया। इसकी वजह से मरीजों की संख्या नियंत्रण में आई। उन्होंने आगे बताया कि जिस दौरान सभी जगहों पर रेमडेसिविर की कमी थी। उस वक्त वह नगर निगम के अस्पतालों में उपलब्ध था।

लोगों ने पहले से इंतजाम करने पर हमें टोका, लेकिन हम नहीं रुके: मेयरमुंबई की महापौर किशोरी पेडनेकर ने बताया, ‘शुरू से ही हम सावधान थे। काम में निरंतरता बनाए रखने पर जोर दिया। किसी भी अस्पताल में दवा और ऑक्सीजन की कमी नहीं होने दी। कुछ लोगों ने शुरुआत में ऑक्सीजन प्लांट निर्माण की जरूरत पर टोका, लेकिन हमने ऑक्सीजन प्लांट बनवाकर मरीजों की जान बचाई।

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