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राजनीती

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी: टीएमसी की सत्ता में परिवार बनाम संगठन की जंग तेज

  पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बीच का रिश्ता सिर्फ एक पारिवारिक बंधन नहीं बल्कि बंगाल की सत्ता और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भविष्य को तय करने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक समीकरण रहा है। वर्तमान में अभिषेक बनर्जी की स्थिति टीएमसी में ममता बनर्जी के बाद नंबर दो की है, जिसे चुनौती देने वाला फिलहाल पार्टी में कोई दूसरा चेहरा नहीं है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे अशांत और अस्तित्व के संकट वाले दौर से गुजर रही है। पार्टी में आंतरिक बगावत है। इससे पहले टीएमसी को सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा। अभिषेक बनर्जी इस पूरे चक्रव्यूह के केंद्र में आ गए हैं।

समर्थकों के लिए वे पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव का चेहरा हैं तो आलोचकों के लिए वे बंगाल के सबसे बड़े नेपो किड हैं, जिन पर पार्टी की मौजूदा दुर्दशा का ठीकरा फोड़ा जा रहा है।

कैसे हुआ अभिषेक का उदय?
ममता बनर्जी के कई भतीजे और भांजे हैं, लेकिन पार्टी के पुराने रणनीतिकारों का मानना है कि ममता के भाई अमित और भाभी लता के बेटे अभिषेक का उनकी राजनीतिक दुनिया में हमेशा एक विशेष स्थान रहा। जब ममता बनर्जी वाम मोर्चा के खिलाफ सड़कों पर एक बेहद कठिन और हिंसक राजनीतिक लड़ाई लड़ रही थीं, तब परिवार के युवा सदस्यों में अभिषेक ही थे जो उनकी इस राजनीतिक यात्रा के साथ जुड़े रहे।

पश्चिम बंगाल में 2011 में टीएमसी की जीत के बाद अभिषेक बनर्जी को युवा मंच की कमान सौंपी गई। वरिष्ठ नेताओं ने इसे मुख्य संगठन के समानांतर एक नया पावर सेंटर माना, जिससे पार्टी के भीतर पहली बार असहजता पैदा हुई। 2014 के लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर सीट से लोकसभा में उनकी एंट्री होती है। इसके बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा।

टीएमसी का बदला स्टाइल
पारंपरिक बंगाली राजनेताओं के विपरीत अभिषेक बनर्जी ने राजनीति में एक प्रबंधन की नीति को पेश किया। कोलकाता और फिर बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले अभिषेक ने तकनीक, डिजिटल आउटरीच, सोशल मीडिया अभियान और डेटा-आधारित चुनावी रणनीति को पार्टी का मुख्य हथियार बनाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने बंगाल में बड़ी बढ़त हासिल की, तब अभिषेक के नेतृत्व में ही टीएमसी ने अपना सबसे बड़ा कायाकल्प किया। उन्होंने राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC को जिम्मेदारी सौंपी, जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।

क्यों बने विलेन?
भले ही कॉरपोरेट और रणनीतिक तरीके से चुनाव जीत लिए गए हों, लेकिन इसने पार्टी के भीतर के पुराने और जमीन से जुड़े नेताओं को नाराज कर दिया। वरिष्ठ नेताओं की शिकायत थी कि दशकों के जमीनी काम से बने उनके राजनीतिक अनुभव को कंप्यूटर प्रेजेंटेशन और कंसल्टेंट्स के सुझावों से रिप्लेस किया जा रहा है। अभिषेक बनर्जी आज टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, लेकिन अनौपचारिक रूप से वे सर्वशक्तिमान नंबर दो हैं। यही कारण है कि आज जब पार्टी में सांसदों और विधायकों की सामूहिक बगावत हो रही है, तो सारा ठीकरा उन्हीं के सिर फूट रहा है। विपक्ष और नाराज नेताओं का मानना है कि सारी शक्ति एक नेता और उसके आंतरिक घेरे के पास केंद्रित हो गई है, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का मोहभंग हुआ है।

अभिषेक बनर्जी अपनी इस राजनीतिक विरासत और व्यक्तिगत उपलब्धि के बीच एक नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। सत्ता की निकटता और उसकी पूर्ण कमान हासिल करने के इस संघर्ष के बीच, वे अपनी ही पार्टी की इस अभूतपूर्व और अप्रत्याशित संकट की घड़ी में कई गुटों के लिए विलेन बनकर उभरे हैं, जिससे पार पाना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

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