सीमा पर तनाव (Border Tension) के हालात में, भारत के लिए यह अच्छी खबर हो सकती है. ऐसी उम्मीद भी की जा सकती है कि विषम स्थितियों में चीन के खिलाफ महत्वपूर्ण देशों का समर्थन जुटाने के लिए भारत के पक्ष में माहौल तैयार है.
चीन के खिलाफ माहौल (Anti-China Sentiment) किस तरह और किस कदर बन चुका है, क्या आपको इसका अंदाज़ा है? अमेरिका और यूरोप (US & Europe) समेत बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में चीन के लिए निगेटिव भावनाएं (Negative Views for China) पिछले एक दशक में इस बार चरम पर पहुंच चुकी हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) के नेतृत्व की बात हो या फिर चीन की नीयत की, कोरोना वायरस (Corona Virus) के मामले में चीन की भूमिका का मुद्दा हो या विश्व की आर्थिक शक्ति (Economy Power) से जुड़ी बहस, चीन को लेकर दुनिया के संपन्न देशों की धारणा बद से बदतर हुई है.
दुनिया के 14 अग्रणी देशों में की गई हालिया रिसर्च के आधारपर प्यू रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी देशों ने चीन को लेकर नकारात्मक रुझान दिखाए. ऑस्ट्रेलिया, यूके, जर्मनी, नीदरलैंड्स, स्वीडन, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, स्पेन और कनाडा में तो ये चीन के खिलाफ नफरत पिछले दस सालों में सबसे ज़्यादा देखी गई. इस रिसर्च पर आधारित आंकड़ों पर विश्लेषणों को समझना ज़रूरी हो जाता है.
किस देश में चीन है सबसे बड़ा विलेन?
ऑस्ट्रेलिया में चीन के खिलाफ सबसे ज़्यादा नकारात्मक माहौल देखा गया. सर्वे में शामिल ऑस्ट्रेलियाई लोगों में से 81% ने चीन के लिए नकारात्मक वोट दिए. यह पिछले साल से 24% ज़्यादा रहा. इसी तरह, यूके में पिछले साल की तुलना में चीन के लिए नकारात्मक नज़रिया करीब 19 पॉइंट बढ़ गया. अमेरिका में पिछले साल की अपेक्षा 13 पॉइंट और जबसे डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तबसे चीन के प्रति नफरत करीब 20% बढ़ चुकी है.स्वीडन, नीदरलैंड्स और जर्मनी में पिछले साल क तुलना में चीन के खिलाफ नकारात्मक नज़रिया 15% बढ़ गया है. इसी तरह, दक्षिण कोरिया में 12, स्पेन में 10, फ्रांस में 8 और कनाडा में 6 फीसदी नकारात्मकता बढ़ी देखी गई. इटली और जापान में भी नकारात्मकता बढ़ी है, लेकिन पिछले साल की तुलना में बहुत कम प्रतिशत में.
आखिर क्यों बढ़ गई नफरत?
कोरोना वायरस महामारी को लेकर चीन की जितनी और जैसी आलोचना हुई, उसे एक बड़ा कारण माना गया है. जिन 14 देशों में सर्वे किया गया, वहां औसतन 61% लोगों ने माना कि चीन ने कोविड 19 मोर्चे पर भूमिका खराब ढंग से निभाई. दिलचस्प बात यह रही कि इन लोगों ने चीन के साथ ही, यह भी माना कि उनके अपने देश भी इस मोर्चे पर नाकाम रहे. अमेरिका में तो 84% लोगों ने माना कि अमेरिका ने ठीक से कदम नहीं उठाए, यानी चीन की तुलना में अमेरिका को ही ज़्यादा नकारात्मक माना.
शी के नेतृत्व से नाराज़गी
कोविड 19 के मुद्दे पर जिनपिंग में लोगों का भरोसा बहुत कम रह गया. 78% लोगों ने माना कि उन्हें या तो जिनपिंग की विश्व नेतृत्व क्षमता में कतई भरोसा नहीं है या फिर ज़्यादा यकीन नहीं है. जापान और स्पेन को छोड़कर बाकी सभी देशों में सर्वे के जो आंकड़े मिले, उनके आधार पर जिनपिंग के प्रति अविश्वास भी इस बार चरम पर दिखा. और अविश्वास के ये आंकड़े मामूली नहीं बल्कि दो अंकों के प्रतिशत में बढ़े हैं. उदाहरण के तौर पर नीदरलैंड्स में पिछले साल की तुलना में इस साल 17% ज़्यादा लोगों ने अविश्वास जताया.
ट्रंप बड़े विलेन हैं या जिनपिंग?
इन आंकड़ों में दिलचस्प पहलू ये है कि भले ही जिनपिंग के खिलाफ नकारात्मकता और ज़्यादा हुई हो, लेकिन ट्रंप के मुकाबले अब भी जिनपिंग बेहतर हैं. मिसाल के तौर पर, जर्मनी में 78% लोग जिनपिंग में भरोसा नहीं रखते, लेकिन ट्रंप में भरोसा न रखने की बात 89% लोगों ने कही. ट्रंप के मुकाबले भले ही जिनपिंग थोड़ा अकड़ सकें लेकिन सर्वे में एंजेला मर्केल, इमैनुएल मैक्रों और बोरिस जॉनसन जैसे नेताओं के बनिस्पत जिनपिंग पिछड़े दिखे.
कौन है लीडिंग अर्थव्यवस्था?
इस मामले में चीन और अमेरिका के बीच साफ तौर पर प्रतियोगिता देखी गई. सर्वे में यूरोप के लोगों ने बहुमत से माना कि आर्थिक तरक्की, मज़बूती और बढ़त के मामले में चीन तेज़ है और उसकी संभावना बेहतर है, जबकि अमेरिका में 52% लोगों ने अमेरिका को लीडिंग अर्थव्यवस्था माना. अमेरिका के बाहर केवल जापान और दक्षिण कोरिया ऐसे देश रहे, जिन्होंने इस मुद्दे पर अमेरिका को लीडिंग माना.
14 देशों के 14,276 लोगों की राय लेकर प्यू रिसर्च ने सर्वे 10 जून से 3 अगस्त के बीच करवाया था, जब कोविड 19 के चलते कई देशों की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही थी. इस सर्वे में एक ध्यान देने लायक यह भी तथ्य रहा कि जिन देशों ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चीन को अमेरिका से बेहतर माना, उन्हीं देशों ने चीन के खिलाफ नफरत और नकारात्मकता का रुझान भी ज़्यादा दिया.






